मजदूर-कर्मचारी कल्याण नियमों के साथ दिक्कत यह है कि...

29 दिसंबर 2015
संपादकीय

केंद्रीय महिला-बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि निजी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश बारह हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए श्रम मंत्रालय से की गई पहल पर ऐसे कानून को बदलने पर विचार चल रहा है। दूसरी तरफ देश के श्रम कानूनों के तहत बहुत से ऐसे उद्योग हैं जिनके लिए केंद्र सरकार ने वेतनमान तय किए हुए हैं, जिनमें मीडिया भी एक है, और पत्रकार-गैरपत्रकार कर्मचारियों की तनख्वाह एक वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर घोषित की गई है। इसके अलावा देश में मजदूर कानून, या औद्योगिक सुरक्षा के कानून बहुत से हैं, पर्यावरण से जुड़े हुए कानून बहुत से हैं, और इन सबको देखें तो लगता है कि भारत के संगठित कर्मचारी और कामगार बड़ी अच्छी हालत में हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी कागजों पर नियम-कानून बनाकर, और कागजों पर वेतनमान तय करके पूरी कर लेते हैं, उन पर अमल का कोई ठिकाना नहीं रहता। 
जब मीडिया के लिए वेजबोर्ड लागू किया गया, तो बड़े-बड़े बहुत से अखबारों ने लोगों की अघोषित छंटनी कर दी, और उनको निकालने के बजाय, उनको इतने दूर-दूर तबादले पर भेज दिया, कि उनका नौकरी छोड़ देना तय सा था। वैसे भी कम्प्यूटर और इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के चलते मीडिया के लिए कम लोगों से अधिक काम निपटा लेना आसान हो गया है, और वेतन आयोग की सिफारिशों से अखबारों का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से जर्जर हो जाने की नौबत आ गई। नतीजा यह हुआ कि नई नौकरियां निकलना कम हो गईं, और मीडिया लोगों को ठेके पर रखने लगा।
जब कभी किसी देश में मजदूर कानून वहां की बाजार की हकीकत को देखे बिना, और अमल की सरकार की ताकत और नीयत को आंके बिना बनाए जाते हैं, तो उनसे कभी कोई फायदा भी हो सकता है, और कभी कोई नुकसान भी हो सकता है। जब महिला कर्मचारियों को पुरूष कर्मचारियों के मुकाबले कई गुना अधिक चिकित्सकीय या प्रसूति अवकाश देना पड़ेगा, तो फिर हो सकता है कि निजी उद्योग और कारोबार महिला कर्मचारियों को रखने से कतराने लगें। आज निजी क्षेत्र में महिलाओं के लिए किसी तरह कोई आरक्षण नहीं है। ऐसे में निजी मैनेजर या देखेंगे कि महिलाओं की उत्पादकता अगर कम मिल रही है, तो उनको अधिक संख्या में क्यों रखा जाए? ऐसी कई तरह की दिक्कतें आ सकती हैं, जिनसे नफे के बजाय नुकसान अधिक हो सकता है।
हम कहीं भी महिला कर्मचारियों के हक के खिलाफ बात नहीं कर रहे, लेकिन अगर महिलाओं को नौकरी मिलना कम हो गया, तो फिर प्रसूति अवकाश अधिक मिलने से उनका क्या फायदा होगा? भारत अभी उन विकसित देशों जैसी अर्थव्यवस्था नहीं बन पाया है यहां पर कर्मचारियों को ऐसे और इतने हक दिए जा सकें। सरकार ऐसे नियम तो बना सकती है, लेकिन शायद बाजार उनसे बचने के रास्ते निकाल ले, और एक आसान रास्ता यही रहेगा कि महिलाओं को काम पर रखने से ही बचा जाए। आज बाजार में बहुत से कारोबार मंदी का रोना रो रहे हैं, ऐसे में हो सकता है कि मजदूर कल्याण की योजनाएं लागू न हो सकें। सरकार तो मौजूदा नियम-कायदों को भी जरा भी लागू नहीं करवा पाती है, और किसी मजदूर-विवाद पर अदालतों के फैसले भी बरसों तक नहीं आ पाते हैं। इसलिए नियमों-योजनाओं और उन पर अमल के बीच एक तालमेल बिठाना जरूरी है।

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