छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भीतरघात, कांग्रेस हाईकमान का बर्दाश्त परले दर्जे की राष्ट्रीय मिसाल

संपादकीय
31 दिसंबर 2015
छत्तीसगढ़ के एक उपचुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी को बिठाने के लिए करोड़ों की सौदेबाजी के सुबूत सामने आने में कुछ वक्त लग सकता है, लेकिन लोगों को बिना सुबूत यह भरोसा तो हमेशा से था कि इस प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाओं को बरसों से बेचा जा रहा था। अब पहली बार ऐसी पुख्ता टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई है जिससे कांग्रेस की भयानक नौबत उजागर होती है। अभी हम किसी पर खरीदी-बिक्री का मामला साबित होने तक कोई तोहमत तो नहीं लगाते, लेकिन यह नौबत बताती है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय लीडरशिप को छत्तीसगढ़ की कितनी परवाह है। चुनाव आयोग को, या अदालत को, या सरकार को किसी कार्रवाई के लिए सुबूतों का शक से परे साबित होना जरूरी होता है, लेकिन पार्टी के भीतर के फैसलों के लिए तो किसी फोरेंसिक जांच की जरूरत नहीं पड़ती है। कांग्रेस में अगर समझदारी होती, तो इस राज्य में उसकी सरकार शायद पहले भी बन गई होती, लोकसभा में उसके लोग अधिक पहुंचते, और म्युनिसिपलों से लेकर पंचायतों तक कांग्रेस के लोग अधिक जीतते। लेकिन इस पार्टी में भीतरघात की नौबत इतनी भयानक है कि भाजपा के कई लोगों को अपनी पार्टी की क्षमता से अधिक कांग्रेस के भीतरघातियों पर भरोसा रहते आया है, और आज जब कांग्रेस के भीतर की साजिशें उजागर होते दिख रही हैं, तो भाजपा सबसे अधिक निराश है। 
कोई राष्ट्रीय पार्टी परंपरागत रूप से कांग्रेस समर्थक रहे हुए राज्य में अपनी संभावनाओं को किस कदर तबाह कर सकती है, यह देखना हो तो छत्तीसगढ़ से बड़ी मिसाल शायद ही कहीं मिले। इस राज्य में कांग्रेसी उम्मीदवारों को हराने की जैसी खुली साजिश कांग्रेस के ही नेता करते आए हैं, उससे देश में एक रहस्यमय सवाल बरसों से खड़ा है कि कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ऐसे भीतरघात पर, साजिशों के ऐसे सिलसिले पर कभी कोई कार्रवाई क्यों नहीं करतीं? कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच इस रहस्य पर आमतौर पर चुप्पी रहती है, और फिर कुछ लोग अगर बंद कमरे में दबी जुबान से कुछ कहने को तैयार होते हैं, तो उन बातों से कांग्रेस हाईकमान का कोई सम्मान नहीं बढ़ता। इस प्रदेश में कांग्रेस को देखकर ऐसा लगता है कि यहां कांग्रेस संगठन के मुकाबले कांग्रेस हाईकमान खुद ही एक बी-टीम को ऐसे खड़ा करके रखता है कि कहीं पार्टी राज्य में जीत न जाए। यह रूख ऐसा है कि कांग्रेस के कुछ लोगों को अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने के लिए तैनात किया गया है। 
जहां तक राज्य में कांग्रेस उम्मीदवारों की खरीद-बिक्री का मामला है, तो यह बात महज कांग्रेस तक सीमित नहीं है। राज्य के पहले तीन बरसों में भाजपा के दर्जन भर विधायक जिस तरह कांग्रेसी मुख्यमंत्री के हाथों बिके थे, वह मामला बेमिसाल था। और शायद अगले विधानसभा चुनाव में उन 13 में से कुल 2 विधायक विधानसभा पहुंच पाए थे। लेकिन फिर भी ये मामले तो खबरों में इसलिए रहे कि यह दलबदल इतिहास में दर्ज है, कदम-कदम पर, हर चुनाव में होता हुआ भीतरघात सुबूतों के साथ तो इतिहास में दर्ज नहीं हो सकता, खबरों में हमेशा बने रहता है। देश के एक बड़े अखबार, इंडियन एक्सप्रेस की जिस ताजा रिपोर्ट से कांग्रेस की संभावनाओं को बेचने की टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई है, वह रिपोर्ट दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान ने जरूर देखी होगी, और उस पर अगर अगले दस बरस भी कोई कार्रवाई नहीं होगी, तो भी कांग्रेस के लोगों को हैरानी नहीं होगी। 
छत्तीसगढ़ की कांग्रेस में भीतरघात की आजादी देश की किसी भी पार्टी में सबसे बड़ी आजादी है। और कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर सहिष्णुता की बात करते हुए अपनी इस सहिष्णुता को एक सुबूत की तरह दिखा सकती है कि भीतरघात पर उसका बर्दाश्त किस परले दर्जे का है। जिस पार्टी के अपने घर को सम्हालने का होश नहीं है, वह सत्ता पर आने की हकदार भी नहीं रह सकती, लेकिन छत्तीसगढ़ के मौजूदा कांग्रेस-संगठन नेता पता नहीं क्यों एक दमदार विपक्ष का काम कर रहे हैं, और सत्ता में आने की संभावनाओं को पुख्ता कर रहे हैं, तब तक के लिए, जब तक कि कांग्रेस हाईकमान की बेमिसाल बर्दाश्त के तहत भीतरघात का अगला दौर संभावनाओं को बहाकर न ले जाए।

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