सोनिया-राहुल पर कोर्ट केस पर संसद में हंगामा क्यों ?

संपादकीय
9 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी के शेयरों को एक नई कंपनी बनाकर उसमें डालने के मामले में भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी सोनिया-राहुल सहित कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अदालत गए हुए हैं, और यह पहला मौका है जब सोनिया गांधी किसी अदालती कटघरे में खड़ी होने जा रही हैं। हालांकि यह मामला कंपनी कानूनों के तहत एक जटिल मामला है, और इसके गुण-दोष पर हम कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन इस अदालती मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने संसद के भीतर जिस तरह का बर्ताव किया है, वह भारी गैरजिम्मेदारी का है। अगर देश में सांसदों के खिलाफ चल रहे तमाम अदालती मामलों को लेकर संसद के भीतर ऐसा हंगामा होने लगे, तो साल में 365 दिन और चौबीसों घंटे चलने वाली संसद में भी समय का टोटा पड़ेगा। ऐसा करके कांग्रेस ने पता नहीं अपनी घबराहट उजागर की है, या खीझ जताई है, उसकी चाहे जो भी नीयत हो, यह काम उसके खिलाफ जा रहा है। 
सार्वजनिक जीवन में लोगों को दो तरह की अदालतों का सामना करना पड़ता है। जनता की अदालत का, और कानून की अदालत का। जहां तक ईश्वर की अदालत का सवाल है, तो उसके बारे में आस्थावान लोग बता सकते हैं कि मरने के बाद लोगों को वहां खड़ा होना पड़ता है या नहीं, और वहां पर कोई हिसाब-किताब होता है नहीं। लेकिन जब जमीन पर कानून की अदालत कोई कार्रवाई कर रही है, तो उसके खिलाफ संसद के भीतर हंगामा खड़ा करके कांग्रेस पार्टी इस अदालत की तौहीन भी कर रही है, और संसद का वक्त भी बर्बाद कर रही है। कल के दिन संसद में कही बातों को लेकर लोग उसके खिलाफ अदालत जाने लगें, या अदालत में कही बातों को लेकर चुनावी सभाओं में जाने लगें, तो लोकतंत्र का मटियामेट ही हो जाएगा। यह मामला चूंकि कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च स्तर से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके नेताओं को अपने बर्ताव को काबू में भी रखना था, और कानून की लड़ाई कानूनी औजारों से लडऩी थी। 
आज कांग्रेस ने यह मामला दायर करने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी को भाजपा का वरिष्ठ नेता करार देते हुए इस अदालती मामले को भाजपा का राजनीतिक बदनीयत का अभियान करार दिया है। पल भर के लिए यह मान भी लिया जाए कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा की सहमति या अनुमति से यह मुकदमा चला रहे हैं, तो भी बात तो मुकदमे के गुण-दोष पर होनी चाहिए, न कि उसके पीछे की नीयत पर। और अब जब अदालत में इसकी सुनवाई तय हो चुकी है, तब अदालत के बाहर जुबानी जमा-खर्च से यही जाहिर होता है कि कांग्रेस कानूनी रूप से कहीं कमजोर है। ऐसा है या नहीं, यह तो अदालत और वकील जानें, लेकिन ऐसी आक्रामक कार्रवाई संसद के भीतर और मीडिया के बयानों में कांग्रेस का सम्मान नहीं बढ़ा रही। 
देश में अधिकतर पार्टियों के बहुत से नेताओं को बहुत सी अदालतों में जाना पड़ता है, और कांग्रेस पार्टी का यह रूख लोगों के गले नहीं उतरेगा कि उसके नेताओं के खिलाफ कोई व्यक्ति निजी हैसियत से भी मुकदमा न करें। सुब्रमण्यम स्वामी एक बहुत ही बड़बोले और लड़ाकू नेता हैं। वे लंबे समय से जयललिता, सोनिया, राहुल, इंदिरा, राजीव जैसे कई पसंदीदा निशानों पर हमले करते आए हैं। वे भाजपा में भी हमेशा नहीं रहे, पार्टी के भीतर आते-जाते रहे हैं। इसलिए उनके इस मुकदमे को भाजपा का मुकदमा समझना भाजपा के साथ ज्यादती होगी। दूसरी बात यह कि अगर मोदी सरकार का कोई विभाग या उसकी कोई जांच एजेंसी इस मामले में अलग से कार्रवाई करती, तो भी उसे हम खारिज करने के बजाय कांग्रेस और सोनिया परिवार से उसका जवाब देने की उम्मीद करते। सार्वजनिक जीवन में हर नेता को बहुत से मामलों में जवाब देने पड़ते हैं, और उनको सही जगह पर ही जवाब देना चाहिए। संसद, अदालत, मीडिया, और चुनावी सभा, ऐसे बहुत से अलग-अलग मंच लोकतंत्र में रहते हैं, और लोगों को एक जगह की बहस को दूसरी जगह नहीं ले जाना चाहिए, खासकर जब तक वे सही जगह पर पूरा जवाब न दे दें। नेशनल हेराल्ड के मामले में अदालत में कार्रवाई अभी शुरू ही हुई है, और कांग्रेस को इतनी जल्दी हड़बड़ाकर ऐसा जाहिर नहीं करना चाहिए कि उसके नेता या तो अदालतों से ऊपर हैं, या वे अदालतों में जाना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी आमतौर पर विनम्रता की बात करती हैं, लेकिन कल की उनकी प्रतिक्रिया एक आक्रामक जवाबी हमला थी कि वे इंदिरा गांधी की बहू हैं, और किसी से डरती नहीं हैं। वे इंदिरा की बहू हैं, यह एक निर्विवाद तथ्य है, और जिसने कुछ गलत न किया हो, उसे अदालत से डरने की जरूरत नहीं है, यह भी एक निर्विवाद तथ्य है। इसलिए ऐसी पैनी राजनीतिक बात कहने का कोई मौका एक अदालती कार्रवाई के सिलसिले में नहीं था, और वे ऐसा कहने से बच भी सकती थीं। फिलहाल कांग्रेस को इस मामले में संसद और सड़क का वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, और अदालत में उसके सामने सारे विकल्प खुले हुए हैं। 

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