सोनिया-राहुल एक अभूतपूर्व मोड़ पर

संपादकीय
19 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के लिए आज एक बड़ा और ऐतिहासिक दिन है। पार्टी के दो मुखिया, सोनिया और राहुल गांधी, पार्टी का वर्तमान और भविष्य, पहली बार अदालती कटघरे में खड़े हो रहे हैं, और यह पहला मौका है जब सरकार के किसी पद पर रहे बिना कांग्रेस अध्यक्ष-उपाध्यक्ष अदालत जा रहे हैं। इसके पहले इंदिरा और संजय गांधी भी अदालत और जांच आयोग का सामना कर चुके हैं, लेकिन इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रह चुकी थीं, और संजय गांधी आपातकाल में सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल, और जनता पर जुल्म के बहुत से आरोप लगे थे। सोनिया और राहुल एक बिल्कुल अलग किस्म के मामले में अदालत में हैं, जो कि एक नागरिक की हैसियत से सुब्रमण्यम स्वामी नाम के वर्तमान भाजपा नेता ने दायर किया हुआ है, और यह कांग्रेस पार्टी, नेशनल हेराल्ड प्रकाशित करने वाली कंपनी की जमीन-जायदाद, शेयर, और फंड-कर्ज से जुड़े हुए कंपनी-कानून तोडऩे के आरोप वाला एक मामला है। यह एक जटिल तकनीकी मामला है, और जनता की नजर में इसमें अधिक भ्रष्टाचार कुछ नहीं दिखता, क्योंकि देश के लोग यह मानकर चलते हैं कि कांग्रेस पार्टी सोनिया-राहुल की सम्पत्ति है, और सोनिया-राहुल ही कांग्रेस पार्टी की अकेली सम्पत्ति हैं। ऐसे में इन दोनों पक्षों में से कौन किसका क्या इस्तेमाल करता है, यह आम लोगों की नजर में जुर्म नहीं बनता, यह एक अलग बात है कि कंपनी-कानून नेशनल हेराल्ड के मामले में टूटा है या नहीं। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पिछले कई दिन से संसद को चलने नहीं दिया, और उसने यह माहौल बनाने की कोशिश की कि सुब्रमण्यम स्वामी के पीछे मोदी सरकार है, और सोनिया-राहुल को प्रधानमंत्री की पहल पर निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन देश में राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले सभी लोग इस बात को जानते हैं कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा में हमेशा से नहीं रहे, और वे अटल बिहारी से लेकर अरूण जेटली तक बहुत से भाजपा नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाने वाले रहे हैं। वे इसके पहले भी जयललिता से लेकर कांग्रेस की सरकारों तक के खिलाफ बहुत से अदालती मामले लड़ चुके हैं, और जीत भी चुके हैं। इसलिए यह आरोप निहायत बेबुनियाद है कि वे भाजपा की ओर से सोनिया-राहुल पर हमला कर रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी दरअसल एक ऐसा पिन निकला हुआ हथगोला हैं, जो कि जिस हाथ में रहे, उस हाथ को भी विस्फोट में टुकड़ा-टुकड़ा कर सकता है। 
लेकिन इस अदालती कार्रवाई से परे, अपने तमाम राजनीतिक जीवन में सोनिया और राहुल पहली बार सड़क और अदालत की लड़ाई में उतरे हैं, और अब वे घर पर आराम से बैठकर राजनीति करने वाले नहीं रहकर, सार्वजनिक राजनीति की अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। कांग्रेस ने यह समझदारी दिखाई है कि दिल्ली में उसने सड़कों पर नौटंकी नहीं करना तय किया, हालांकि यह एक अलग बात है कि सोनिया-राहुल का साथ देते हुए दिखने के लिए देश भर में कांग्रेस के लोग आज प्रदर्शन कर रहे हैं।  पिछले दस बरस के यूपीए राज में सोनिया-राहुल ने बहुत सावधानी से अपने आपको सरकार के हर फैसले से अलग रखा था, और कागजों पर कहीं भी उनका नाम नहीं था। मनमोहन सिंह नाम का एक वफादार ड्राइवर रखकर सोनिया-राहुल पीछे की सीट पर बैठे सरकार चला रहे थे, और स्टियरिंग पर कहीं भी उनकी उंगलियों के निशान नहीं थे। इसलिए यूपीए सरकार के दस बरसों के अनगिनत और अंतहीन अपराधों में उनकी कोई भागीदारी अदालत के लायक नहीं रही, लेकिन वे एक बिल्कुल ही लगभग घरेलू मामले में उलझ गए हैं। एक ही कमरे में बैठे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा इस पूरे नेशनल हेराल्ड के मामले में मानो अपनी ही जैकेट की एक जेब से निकालकर कांग्रेस की जायदाद दूसरी जेब में रख रहे थे, और दूसरी जेब से निकालकर तीसरी जेब में रख रहे थे, और इस बीच शायद कांग्रेस के दिग्गज वकीलों को भी यह अंदाज नहीं था कि कोई कानून टूट सकता है। इस पूरे घरेलू लेन-देन में दिक्कत केवल यही रही कि एक कंपनी, एक राजनीतिक दल, और दूसरी कंपनी के लेन-देन देश के कुछ कानूनों के तहत सही ठहराए जाते हैं, या नहीं।
इस मामले के नतीजे पर जाने की अभी जल्दबाजी नहीं करना चाहिए क्योंकि निचली अदालत से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हुए इसमें बरसों लगना तय है, और मोदी सरकार के सोनिया-परिवार से संबंध चाहे जैसे हों, यह मामला दायर करने वाले सरकार से परे के एक बेकाबू सुब्रमण्यम स्वामी हैं जो कि आए दिन सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही रहते हैं। इसलिए कानूनी कार्रवाई से परे एक राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस की इन दिनों सुस्त चल रही जिंदगी में शुरू हुई है, और लोग यह तुलना किए बिना नहीं रह पा रहे हैं कि आज ही के दिन 1978 में इंदिरा गांधी गिरफ्तार हुई थीं। खुद सोनिया गांधी ने लोगों को ऐसी तुलना करने के लिए उकसाया है, यह कहकर कि वे इंदिरा की बहू हैं, और किसी से नहीं डरती हैं। यह उनका अभूतपूर्व राजनीतिक तेवर है, और भारत की चुनावी राजनीति जिन तेवरों से प्रभावित होती है, उनमें यह पार्टी के फायदे का तेवर भी हो सकता है। कांग्रेस पार्टी को अपनी वर्तमान और अपनी भावी लीडरशिप के इर्द-गिर्द जुटने का यह एक बड़ा मौका मिल रहा है, और पार्टी विपक्ष की राजनीति के तेवर दिखाते दिख भी रही है। देश की जनता दिलचस्पी के साथ यह देखेगी कि आज अदालत में भी नौबत आने पर सोनिया-राहुल जमानत की अर्जी देंगे, या जेल जाना पसंद करेंगे। दूसरी तरफ दिल्ली की राजनीति के इस भारी उथल-पुथल ने भाजपा के भी चेहरे पर शिकन डाली है, और उसे कांग्रेस का रूख भांपते हुए चलना पड़ेगा। 

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