चेन्नई से उपजे कई सवालों पर देश को आत्ममंथन की जरूरत

7 दिसंबर 2015
संपादकीय
तमिलनाडु की बाढ़ के पीछे की वजहों को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वे बताती हैं कि नेताओं-अफसरों, और बिल्डरों ने मिलकर पिछले दशकों में राजधानी चेन्नई की जो तबाही की है, उसी का नतीजा रहा कि कुदरत की मार से शहर पर जख्म इतने अधिक आए। अदालती आदेशों के बावजूद सरकार और स्थानीय शासन ने चेन्नई शहर को बचाने की कोई कोशिश नहीं की, तालाब घटते चले गए, नाले-नालियां पटते चले गए, झील के किनारे बड़े-बड़े अवैध निर्माण हो गए, आबादी बढ़ती चली गई, और पानी की निकासी के रास्ते घटते चले गए। नतीजा यह हुआ कि तेज बारिश हुई तो देश के इस महानगर में सड़कों पर मोटरबोट चलाकर लोगों की जिंदगियां बचानी पड़ीं। 
अब जब मौतें हो रही हैं और लोग डूबे हुए हैं, तो देश के प्रधानमंत्री वहां जाकर सिवाय कुछ हजार करोड़ की मदद देने के और क्या कर सकते हैं? और वही हुआ, केंद्र सरकार ने चार हजार करोड़ रुपये तमिलनाडु को दिए, जिसका अधिकतर हिस्सा इस शहर के लिए अम्मा ब्रांड की राहत सामग्री में खर्च होगा। अब सवाल यह है कि देश के संघीय ढांचे के भीतर जब राज्य सरकार बेलगाम होकर, अपनी मनमर्जी से नियम-कानून के खिलाफ काम करेगी, और किसी आपदा के आने पर केंद्र सरकार से बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखेगी, तो इस सिलसिले को कैसे थामा जाएगा? जब कोई राज्य हजारों करोड़ के स्मारक बनाए, और भूकंप या बाढ़ आने पर हजारों करोड़ की राहत की उम्मीद केंद्र से करे, तो ऐसे में वे राज्य बेवकूफ साबित होंगे जो कि अपने साधनों से मनमानी स्मारक नहीं बनवाते हैं। यह बात ठीक है कि भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकार अधिक होने चाहिए, लेकिन क्या राज्यों की गलत कामों की मनमर्जी भी असीमित होनी चाहिए? क्या शहरी विकास और पर्यावरण के नियम तोड़कर धरती को बर्बाद करने की आजादी भी राज्यों को होनी चाहिए? क्या उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में, जहां पर कि आज लोग घास-पत्तों की रोटी बनाकर खा रहे हैं, और कुपोषण के शिकार हैं, वहां पर हजारों करोड़ के स्मारक बनने चाहिए? राज्य के समाजवादी मालिक मुलायम सिंह यादव का सौ करोड़ का जन्मदिन मनाया जाना चाहिए? आखिर राज्य की कैसी मनमानी पर केंद्र सरकार को रोक लगाने का हक होना चाहिए?
केंद्र सरकार का पैसा आसमान से आया हुआ नहीं है। इसी देश में राज्यों से पैसा केंद्र में आता है, और जरूरत के मुताबिक राज्यों को वापिस जाता है। यह एक मिलाजुला खजाना है, और राज्य अपने पैसे को मनमानी से बर्बाद करें, और फिर मानवीय जरूरत दिखाते हुए केंद्र से उम्मीद करें, तो यह संघीय ढांचे की भावना और उसकी सीमाओं के खिलाफ है। राज्य सरकारों को अपने साधनों से तो सब कुछ करने की छूट है, लेकिन राज्यों को केंद्र सरकार की मदद के पहले राज्यों की अपनी मुसीबत से उबरने की तैयारियों को भी देखने का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र में होना चाहिए। यह सिलसिला जब लंबा चलता है, तो केंद्र सरकार या उसके मुखिया की हैसियत से प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं, या राजनीतिक मजबूरियों के मुताबिक अलग-अलग राज्यों को मनमर्जी से मदद वैसे ही देते हैं जैसे कि राजशाही के दिनों में राजा गले से निकालकर मोतियों की माला दे देते थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और केंद्र सरकार को राज्यों पर एक पर्यावरण जुर्माना लगाने का अधिकार भी होना चाहिए, क्योंकि एक राज्य का बर्बाद किया हुआ पर्यावरण उसकी सीमाओं से बाहर भी दूसरे लोगों को भी बर्बाद करता है। चेन्नई से उपजी मुसीबत और फिक्र को लेकर देश के बाकी हिस्सों को भी अपनी गलतियों पर आत्ममंथन करना चाहिए। 

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