साइकिल की सोच अच्छी पर तैयारी की जरूरत

3 दिसंबर 2015
संपादकीय
रायपुर नगर निगम के महापौर प्रमोद दुबे ने आज से एक नया साइकिल अभियान शुरू किया है कि महीने में एक दिन लोग साइकिल चलाएं। इसके लिए जैसा कि समारोह होता है, हो गया, और अगले महीने कुछ लोगों को शायद यह बात याद रहे, और अधिकतर लोग शायद इसे भूल जाएं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि साइकिल का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल जिंदगी के लिए कितना फायदेमंद है। गरीब तो मजबूरी में साइकिल चलाते हैं, क्योंकि उससे अधिक कुछ खरीद और चला पाना उनके बस के बाहर होता है। और संपन्न तबका या तो घर पर कसरत की साइकिल चला लेता है, या फिर महंगी साइकिल लेकर सड़क पर भी शौक से चला लेता है। लेकिन जो सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय तबका है, उसमें साइकिल का चलन बहुत कम है। साइकिल को बढ़ावा देने की सोच अच्छी है, लेकिन उसके साथ की दिक्कतों, और उसके खतरों को समझना पड़ेगा। 
आज जितनी लापरवाही से लोग गाडिय़ां चलाते हैं, उस पर राजधानी की पुलिस का भी कोई काबू जब नहीं है, तब यह उम्मीद करना खतरनाक होगा कि लोग साइकिल चलाएंगे, और तेज रफ्तार गाडिय़ां आकर उनके लिए खतरा खड़ा नहीं करेंगी। ऐसी नौबत में लोग अगर पर्यावरण की सोचकर, या अपनी सेहत की सोचकर महीने में एक दिन या हफ्ते में कुछ घंटे साइकिल की सोचें भी, तो भी सड़कें और ट्रैफिक उसके लायक नहीं है। दुनिया के सबसे विकसित शहरों में से एक लंदन में वहां के मेयर ने साइकिलों का ऐसा विशाल ढांचा तैयार किया कि लोग हर महीने एक छोटा सा भाड़ा देकर कहीं से भी साइकिल उठा सकते हैं, और कहीं पर भी छोड़ सकते हैं। लेकिन उसके लिए वहां की सड़कों के किनारे एक साइकिल ट्रैक अलग से रहता है, और यही वजह है कि योरप में लोग खूब साइकिलें चलाते हैं। वहां के सैलानी एक देश से दूसरे देश जाते हुए भी ट्रेन में अपनी साइकिलें ले जाते हैं, और दूसरे देश पहुंचते ही उन पर घूमना शुरू कर देते हैं। अमरीका के भी बहुत से शहरों में सिटी बसों में साइकिलों के लिए अलग से जगह रहती है, और लोग उन पर साइकिल रखकर ले जाते हैं। 
हमने पहले भी एक सुझाव दिया था कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को हर तरह की साइकिलों पर से हर तरह का टैक्स हटा देना चाहिए। उससे गरीब को एक राहत मिलेगी, और जो लोग महंगी साइकिलें खरीदते हैं, हो सकता है वे अपनी महंगी गाडिय़ों को कुछ देर राहत दें, और उससे सड़कों पर भीड़ और प्रदूषण घटेंगे। दूसरा इंतजाम राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को करना पड़ेगा कि सार्वजनिक जगहों पर साइकिलों को बांधकर ताला लगाने के लिए लोहे के पुराने परंपरागत ढांचे बनाकर रखे जाएं, ताकि लोग साइकिल रखने का हौसला कर सकें। इसके बिना लोग साइकिल लेकर निकल भी जाएं, तो उसके चोरी हो जाने का खतरा बने रहेगा। आज सार्वजनिक जगहों पर साइकिल रखने का इंतजाम सबसे ही कमजोर रखा जाता है क्योंकि कोई ताकतवर लोग तो साइकिल पर आते नहीं हैं। जिस तरह शहर में अलग-अलग खेलों के मैदान या स्टेडियम हैं, उसी तरह एक साइकिल ट्रैक बनाना चाहिए जिस पर खिलाड़ी और आम लोग साइकिल चलाने का अपना शौक पूरा कर सकें, और उससे धीरे-धीरे सड़कों पर भी साइकिल की उनकी आदत बने।
हम इसे एक अच्छी शुरुआत मानते हैं, और लोगों को इससे जुडऩा चाहिए। साथ ही यह बात अकेले रायपुर शहर तक सीमित रहने से नहीं बनेगी, इसमें राज्य सरकार को बाकी प्रदेश के लिए भी बुनियादी सहूलियतें जुटानी चाहिए। और सबसे पहले शुरुआत तो सरकार साइकिल टैक्स खत्म करके कर ही सकती है। 

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