गैरजरूरी भड़काने और उकसाने के खतरे

5 दिसम्बर
संपादकीय

अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए पिछले कुछ हफ्तों में लगातार बयान सामने आ रहे हैं, और आरएसएस सहित बहुत से हिन्दू संगठनों के बयान ऐसे हैं, जिनका कोई नया मतलब नहीं निकलता, सिवाय इसके कि अदालती फैसला आने के बाद मंदिर बनेगा, या मंदिर बनना ही चाहिए, या मंदिर बनाकर रहेंगे, या सर्वसम्मति से मंदिर बनना चाहिए। कुल मिलाकर बात वहीं की वहीं है, और एक मुद्दे को महज कुरेदा जा रहा है, यह साबित करने के लिए कि राम मंदिर का मुद्दा अभी मुद्दा ही है, उसकी समाधि नहीं बनाई गई है। जितनी बातें अशोक सिंघल के गुजरने के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों ने कही है, उनमें न कुछ नया है, और न ही कुछ ठोस है। ये बयान महज अखबारी सुर्खियों के मार्फत इतिहास में यह दर्ज कराने के लिए दिए गए हैं कि किन-किन लोगों ने मंदिर का मुद्दा छोड़ नहीं दिया है। 
अब सवाल यह है कि यह देश और कितने तरह के उकसावे और भड़कावे धर्म के नाम पर बर्दाश्त करे? मंदिर के नाम पर, मस्जिद के नाम पर, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर, आबादी के नाम पर, धर्मांतरण के नाम पर, आदिवासियों को वनवासी बुलाने की जिद्द के नाम पर, मंदिरों में, दरगाहों पर महिलाओं के दाखिले के नाम पर, दलितों के मंदिर-प्रवेश-रोक के नाम पर, कौन-कौन से गैरजरूरी मुद्दों के उठाकर देश के आगे बढऩे को पटरी से उतारा जा सकता है, इस पर बहुत से लोग और संगठन उतारू हैं। इसलिए उतारू हैं कि उनका खुद का अस्तित्व ऐसे ही मुद्दों को छेडऩे पर कायम रह सकता है। अगर ये मुद्दे बने न रहें, तो किसी को यह याद भी नहीं होगा कि ऐसे बड़बोले नेता, और उनके संगठन जिंदा भी हैं। और एक दूसरी आशंका यह भी है कि अगर ये लोग ऐसी भड़काऊ बातें नहीं करेंगे, तो धर्मांध और कट्टर लोगों से इनको चंदा मिलना भी बंद हो जाएगा। 
और यह बात महज हिंदुस्तान में नहीं है, दुनिया में जगह-जगह नफरतजीवी लोग ऐसा ही भड़काऊ काम करके चंदा पाते हैं, और भड़काऊ काम करके अपने-आपको जिंदा रखते हैं। आज अगर एक धर्म के दंगाजीवी लोग घर बैठ जाएं, तो दूसरे धर्म के हिंसक हमलावरों की दूकान ही बंद हो जाए। मंदिर बनाने को लेकर बिना किसी मतलब और महत्व वाले कुछ बयान आए, तो उसके खिलाफ बयान देते हुए कुछ ऐसे नाम खबरों में आए जो कि शायद बरसों से ताक पर बैठे हुए थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा की बातों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी भी भारतीय की बातों के मुकाबले अधिक ध्यान से सुनते हैं। ओबामा ने अमरीका में मुस्लिमों के खिलाफ कही जा रही आक्रामक और हिंसक बातों पर फिक्र जाहिर की है। हमें उम्मीद है कि ओबामा मोदी से फोन पर होने वाली गप-शप के दौरान अपनी इस सोच को भी बांटेंगे कि किसी एक धर्म के खिलाफ अगर देश में हिंसक बातें होती हैं, तो वे देश के हित के खिलाफ जाती हैं, और उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। और मोदी जिस अमरीका की तरफ बार-बार देखते हैं, और अपने दोस्त बराक से फोन पर बातें करते रहते हैं, उन नरेन्द्र मोदी को भी चाहिए कि वे ओबामा से पूछें और समझें कि हिंसक बातों के खिलाफ उन्होंने ऐसी फिक्र क्यों जाहिर की है?
हमारा यह मानना है कि जिस देश को आगे बढऩा है, उसे भड़कावे और उकसावे वाली तमाम बातों से अपने को बचाना होगा, क्योंकि इंसानी मिजाज ऐसा है कि एक भड़कावे के खिलाफ दूसरा भड़कावा भड़कने को तैयार बैठे रहता है, बल्कि एक पैर पर खड़े रहता है। मोदी को यह समझना चाहिए कि भारत में आज अहिष्णुता के खतरे जो लोग गिना रहे हैं, वे लोग बदनीयत नहीं हैं, बल्कि वे देश के लिए फिक्रमंद हैं।

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