दिल्ली-प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से जागने की जरूरत

संपादकीय
16 दिसंबर 2015
दिल्ली के प्रदूषण से दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट कई तरह के अभूतपूर्व फैसले ले रहा है। उधर दिल्ली सरकार अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कई तरह की कोशिशें कर रही है, और केन्द्र सरकार के सीधे करने का इस मौके पर कुछ दिख नहीं रहा है। देश के पर्यावरण को लेकर बनाई गई एक संवैधानिक संस्था, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, ने दिल्ली में गाडिय़ों को लेकर, खरीद-बिक्री, आवाजाही, डीजल-पेट्रोल के मुद्दों पर कई तरह के आदेश दिए हैं। और दिल्ली में प्रदूषण के स्तर से इन तमाम संस्थाओं की प्रतिक्रिया वैसी ही है कि नींद से जागकर कोई देखे कि घर में आग लगी हुई है। पिछले कई बरसों से सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र-राज्य सरकारें दिल्ली के प्रदूषण को देखते आ रही हैं, लेकिन अब तक जो फैसले लिए गए, उनके बाद आज हड़बड़ाकर आग बुझाने जैसा काम करना पड़ रहा है। 
लेकिन खैर यह तो दिल्ली है जहां कि देश की सबसे बड़ी अदालत बसती है, जहां देश की संसद चलती है, और जहां से देश की सरकार काम करती है। लेकिन इससे परे हिन्दुस्तान के सैकड़ों ऐसे शहर हैं जो कि इसी तरह प्रदूषित हैं, और जहां कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। फिर यह प्रदूषण सिर्फ हवा का नहीं है, पानी का भी है, शोर का भी है, और कारखानों की चिमनी से निकलकर खेतों की मिट्टी पर फैला हुआ भी है। इस मोर्चे पर देश भर में सरकारों की हालत बहुत ही खराब है। भोपाल में अभी पिछले हफ्ते ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की क्षेत्रीय शाखा ने शादी-ब्याह और दूसरे मौकों पर कान फोडऩे वाले डीजे बजाने को लेकर कहा कि राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर जाकर रात भर डीजे बजाया जाए, तो ट्रिब्यूनल उसकी इजाजत दे देगा, इसके बाद छत्तीसगढ़ में भी शासन ने इस कोलाहल के खिलाफ आदेश निकाला, लेकिन उस आदेश को पाते ही जिले के अफसरों ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया, और राजधानी रायपुर रात-दिन इसका सुबूत देख रही है। 
हमारा मानना है कि राजधानियों का हाल तो सरकारी और अदालती आतंक के चलते हुए बाकी शहरों के मुकाबले कुछ बेहतर हो सकता है, लेकिन बाकी शहरों में तो न मंत्री बसते, न राजभवन होते, न अफसर रहते, और न ही जज रहते। इसलिए हर राज्य के ऐसे एक-दो शहरों को छोड़कर बाकी के कोई माई-बाप नहीं होते। नतीजा यह है कि जिसके पास कारखाना चलाने का पैसा है, उसको मानो हवा में, पानी में जहर घोलने का हक मिला हुआ है। जिसके पास लाउडस्पीकरों की फौज को भाड़े पर लेने का पैसा है, उसको आम लोगों की जिंदगी हराम करने का लायसेंस मिला हुआ है। और जिन लोगों के पास गाड़ी रखने को जगह भी नहीं है, उन तमाम लोगों को सरकारी जमीन पर गाडिय़ां खड़ी करने का हक है, और उस बूते गाडिय़ां बढ़ाते चलने का भी हक है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही रात-दिन सड़क-चौराहों पर धुआं उगलती हुई गाडिय़ां देखते हैं, ऐसी गाडिय़ां जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तो दिल्ली में तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रहा है, लेकिन उनकी यहां जांच तक नहीं होती। सरकार के जो विभाग इसके लिए जिम्मेदार हैं, वे किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं। और सत्ता या ताकत के अलग-अलग भागीदार अपने-अपने घर-दफ्तर, अपने-अपने इलाकों को सभी तरह के प्रदूषणों से मुक्त रखकर मानो प्रदेश को प्रदूषण से मुक्त समझ बैठते हैं। 
दिल्ली की हालत को देखकर आज सुप्रीम कोर्ट और बाकी तमाम संवैधानिक संस्थाएं जिस तरह हड़बड़ाए हैं, उनसे हर राज्य को सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ में बड़े अफसरों को सड़कों पर खड़े रहकर गाडिय़ों का धुआं देखना चाहिए, कारखानों के इलाकों में जाकर उनकी चिमनियों का हाल देखना चाहिए। दरअसल प्रदूषण से मौत इतने धीमे-धीमे होती है कि वह खबर नहीं बन पाती। जिस तरह दिल्ली में मशहूर डॉक्टर नरेश त्रेहन ने दिल्ली की गर्द जमे हुए फेंफड़े की तस्वीर जारी की है, रायपुर के औद्योगिक क्षेत्र के फेंफड़ों का हाल उससे कई गुना बदतर होगा। नमूने के लिए उस इलाके के किसी बाशिंदे के मरने पर परिवार से इजाजत लेकर पोस्टमार्टम से उसका फेंफड़ा निकालकर देखना चाहिए, और उसे एक जार में रखकर शहर के चौराहे पर रखना चाहिए। ऐसे नजारों से कम किसी और बात से भारत के शहर, भारत के प्रदेश, जागते हुए नहीं दिख रहे हैं। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि सत्ता के तमाम लोगों पर कारों की खिड़कियां खोलकर चलने की शर्त लगाई जाए, और चौराहों पर, लालबत्तियों पर रूकने की शर्त भी। कुछ दिनों के भीतर ही प्रदूषण घटाने के लिए क्रांतिकारी कार्रवाई शुरू हो जाएगी। 

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