डिजिटल छेडख़ानी शोभा नहीं देती भारत सरकार को

संपादकीय
4 दिसंबर 2015
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेन्नई-बाढ़ के हवाई सर्वे की तस्वीर को लेकर भारत सरकार का प्रचार विभाग आलोचना के घेरे में है। हेलीकॉप्टर में बैठे मोदी के साथ की खिड़की की जगह पर डूबे हुए शहर की एक तस्वीर जोड़ दी गई, और उसे इंटरनेट पर जारी कर दिया गया। वैसे तो मीडिया में ऐसी जोड़-तोड़ आए दिन होती है, और मोदी की तस्वीर में यह सरकारी फेरबदल उसी जगह की तस्वीर जोड़कर किया गया था, जिसके साथ आसानी से यह लिखा जा सकता था कि दो तस्वीरें जोड़ी गई हैं। इससे कोई विवाद खड़ा नहीं होता। लेकिन रात-दिन प्रचार की पल-पल की हड़बड़ी ऐसी गलतियां करवा देती हैं। और फिर आज की डिजिटल टेक्नालॉजी में यह काम इतना आसान हो गया है कि फोटो एडिटिंग के एक सबसे लोकप्रिय सॉफ्टवेयर, फोटोशॉप, को अब एक ब्रांड की बजाय एक विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 
आज ही एक दूसरी खबर यह है कि इंटरनेट पर कुछ दूसरी समाचार वेबसाइटों पर एक विवादास्पद खबर के साथ की तस्वीर किसी एक पत्रकार के फेसबुक अकाउंट से लेकर लगाई गई है, और इस महिला पत्रकार को वहां से अपनी खबर हटवाने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ी। यह एक अलग बात है कि भारत में मौजूदा आईटी कानून बहुत ही कड़क है, और किसी के खिलाफ कुछ झूठा छप जाए, उसके मुकाबले डिजिटल तकनीक पर कुछ झूठा पोस्ट हो जाए, तो कई गुना कड़ी सजा की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन लोग अभी भी ऐसे डिजिटल-खतरों को समझ नहीं रहे हैं। हम इसी जगह पर हर कुछ महीनों में इस बारे में लिखते हैं, और ऐसी छेड़छाड़ से परे भी लोगों को इस बात के लिए आगाह करते हैं कि वे बिना जांचे-परखे दूसरे लोगों की जालसाजी को आगे बढ़ाने में मददगार न हों। 
दरअसल मोदी इस देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने डिजिटल तकनीक और संचार माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल किया है। उनके साथ-साथ उनके समर्थक, उनके प्रशंसक, और हो सकता है कि उनके कुछ विरोधी भी, लगातार डिजिटल-धोखाधड़ी करते हुए पूरी दुनिया की जगह-जगह की कामयाबी की तस्वीरों को मोदी के गुजरात, या मोदी के कार्यकाल के साथ जोड़कर रात-दिन फैला रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता कि मोदी-भक्तों का कोई न कोई झूठ उजागर न हो रहा हो।  इससे उन अनजाने भक्तों का तो कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि वे बेचेहरा और बेनाम हैं, लेकिन इससे मोदी का, या वैसे किसी भी दूसरे नेता का बड़ा नुकसान होता है। और जब सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की हैसियत से, या निजी हैसियत से नरेन्द्र मोदी ऐसे लोगों को ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे उनकी हरकतों से अनजान रहने का फायदा भी नहीं पा सकते। दूसरे लोगों के गलत कामों से बदनामी पाने से बचने के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री को, बल्कि सार्वजनिक जीवन के और लोगों को भी मेहनत करनी पड़ेगी। सोशल मीडिया महज वाहवाही दिलाए, और बदनामी का खतरा बिल्कुल न दिलाए, ऐसा नहीं हो सकता। 
लेकिन आज की बात हमने जिस मुद्दे से शुरू की है, वह और गंभीर है। जब अनजान लोग डिजिटल-छेड़छाड़ या जालसाजी की तस्वीरें पोस्ट करें, तो वह तो कम खतरनाक मामला है। जब भारत सरकार में बैठे लोग ही ऐसा करने लगें, तो वह अधिक फिक्र की बात है। हम उम्मीद करते हैं कि सूचना प्रसारण मंत्रालय इस चूक को पहली और आखिरी चूक साबित करने की गारंटी करेगा। 

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