ये कुनबा अपनी लठैती अपने बंगलों के भीतर क्यों नहीं निपटा लेता?

संपादकीय
31 दिसंबर 2016


उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी के घरेलू झगड़े पर कुछ लिखना खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि बिखरे हुए पारे की बूंदों की तरह बाप-बेटे का मिजाज कभी आ मिलता है, तो कभी छिटककर बिखर जाता है। पिछले कई महीनों से जिस तरह मुलायम और अखिलेश के बीच तलवारें खिंचीं हुई थीं, उसके चलते कल रात पार्टी से निष्कासन का लहू भी बहने लगा था, लेकिन आज दोपहर होते-होते पार्टी से निकाला गया बेटा, और चचेरा भाई, वापिस ले लिए गए, और कहा गया कि साम्प्रदायिक ताकतों से लडऩे के लिए यह एका किया जा रहा है।
इस बिखराव के पीछे अपने-आपको राष्ट्रीय दलाल कहने वाले अमर सिंह को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, और आज दोपहर के एके के पीछे आजम खान का योगदान बताया जा रहा है जो कि हमेशा से अमर सिंह से सांप-नेवले जैसे रिश्ते रखते आए हैं, और पार्टी में फूट के पीछे अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराते भी आए हैं। जाहिर तौर पर बाप-बेटे के बीच आज रिश्तों की मरम्मत में बिहार के लालू यादव का योगदान भी दिख रहा है जो कि मुलायम-कुनबे के समधी भी हैं, और जिन्होंने आज बाप-बेटे से बात करके दोनों को झगड़ा खत्म करने कहा, और सार्वजनिक रूप से मीडिया को यह बात बताई कि उन्होंने यह पहल की है।
जो बात हमारे जैसे किसी मामूली समझ-बूझ के इंसान की समझ से परे की है, वह यह कि इतने बड़े-बड़े सरकारी बंगलों पर काबिज रहने के बाद बाप-बेटे, चाचा-भतीजे, भाई-भाई, अपनी लाठियां घर के भीतर भांजकर बाहुबल को वहीं क्यों नहीं तौल लेते हैं? आज जब चुनाव सिर पर खड़े हैं, और कुनबे में से हर कोई मुलायम के नाम का झंडा लेकर चल रहे हैं, और इस झंडे के डंडे से साम्प्रदायिकता को पीटने का नारा भी लगाते चल रहे हैं, तो सड़क पर आकर ऐसी हफ्तावार लठैती क्यों कर रहे हैं? जिस नेताजी की प्रधानमंत्री बनने की हसरत हो, और राजनीतिक गणित के हिसाब से थोड़ी बहुत संभावना भी हो, उसे ऐसी हरकत क्यों करना चाहिए कि सोशल मीडिया पर लोग लिखने लगें कि आजकल वे क्या पीते हैं? इससे परे भी लोग परिवार के भीतर एक से अधिक शादी और एक से अधिक मां के मुद्दे को लेकर भी लिखने लगते हैं कि परिवार के भीतर की कटुता पार्टी को डुबा रही है। यह सिलसिला न तो मुलायम जैसे बुजुर्ग को सुहाता, और न ही विदेशों में पढ़े-लिखे और बेहतर मुख्यमंत्री समझे जाने वाले नौजवान अखिलेश को सुहाता। फिर जब एक घर के भीतर सत्ता के गोश्त के कतरे-कतरे पर कुनबे के लोग जंगल के जानवर पर भोज करते जानवरों की तरह लडऩे लगता है, झपटने और छीनने लगता है, तो लोगों को समाजवाद के नाम पर उत्तरप्रदेश की यह कुनबापरस्ती और भी खटकने लगती है।
कम्प्यूटर पर जो ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर काम करते हैं, उनमें पिछली किसी तारीख और समय की सेटिंग पर लौटने का एक विकल्प रहता है। समाजवादी पार्टी नाम का यह कुनबा उसी विंडोज की तरह अपनी सेटिंग को पिछली तारीख और समय पर वापिस ले जाता है। आज दोपहर बाप-बेटे ने मिलकर कल बीती हुई दोपहर पर सेटिंग को दुबारा पहुंचा दिया है। फिलहाल हम महज यही दुआ कर रहे हैं कि इन शब्दों के छप जाने तक, और अखबार के बंट जाने तक, पारे की यह एक हो चुकी बूंद फिर से न बिखर जाए, क्योंकि छपाई एक बार शुरू होने के बाद उसे बार-बार बदलना मुश्किल और खर्चीला रहता है, और फिर हमारे जैसे अखबारों के पास उत्तरप्रदेश सरकार का पैसा तो है नहीं कि मुख्यमंत्री से लेकर बाकी सरकार तक जनता के पैसे पर यही फेरबदल करती रहें।

जाते हुए राष्ट्रपति ओबामा के कुछ आखिरी फैसले

संपादकीय
30 दिसंबर 2016


अमरीका में इन दिनों एक दिलचस्प टकराव चल रहा है। दो कार्यकाल पूरे करने के बाद जा रहे डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ने निर्वाचित रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चुनावी नतीजे आने के तुरंत बाद राष्ट्रपति भवन न्यौता देकर उनके साथ लंबी बात की थी, और दोनों की मौजूदगी में ओबामा ने मीडिया से कहा था कि वे बहुत अच्छे तरीके से सत्ता का यह हस्तांतरण करना चाहते हैं, और उनकी टीम ट्रम्प के सहयोगियों के साथ मिलकर यह काम करेगी। नतीजे आने के करीब चालीस दिन बाद राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण होता है जिसे अमरीकी जुबान में इनॉगरेशन कहते हैं। यह बीस जनवरी को होना है, लेकिन इस बीच ऐसा लगता है कि मौजूदा और अगले राष्ट्रपति के बीच कुछ तनातनी चल रही है, और कुछ हो भी सकती है।
इन दोनों ही नेताओं के बर्ताव को देखकर बाकी लोगों को भी सीखने का कुछ मौका मिलता है। कुछ दिन पहले जब चीन के पास समंदर में अमरीकी फौज का एक द्रोन जब्त हुआ, तो डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक बयान दिया कि चीन उसे रख ले, अमरीका उसे वापिस नहीं चाहता। जबकि अमरीकी प्रशासन उसे वापिस पाने की कोशिश में लगा हुआ था, और उसे एक फौजी गोपनीय रहस्य मानकर उसकी तकनीक को भी चीनी हाथों में जाने से अमरीका रोकना चाहता था। ऐसे में ट्रम्प का यह बयान उनके कुर्सी संभालने के पहले दिया गया गैरजिम्मेदारी का एक बयान था। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने आखिरी कुछ हफ्तों में विदेश नीति के कुछ ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनका असर लंबे समय तक होगा। और यह बात हमें कुछ अटपटी लग रही है कि ये फैसले सही होते हुए भी क्या इनको टालना बेहतर नहीं होता?
संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के खिलाफ आए एक प्रस्ताव पर अमरीका ने वीटो नहीं किया, बल्कि अमरीकी प्रतिनिधि ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। इसे अमरीका की फिलीस्तीन-इजराइल नीति में एक बड़ा फैसला माना जा रहा है, और इजराइली सरकार की तरफ से यह भी कहा जा रहा है कि उसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में आए इस प्रस्ताव के पीछे बराक ओबामा ने मेहनत करके इजराइल की फजीहत का इंतजाम किया। हमारी अपनी नीति इजराइल के खिलाफ आए इस प्रस्ताव के समर्थन की है, लेकिन ओबामा का यह रूख कार्यकाल के आखिरी कुछ हफ्तों के हिसाब से कुछ अटपटा है, और अगले राष्ट्रपति को इस नीति और इस रूख को तुरंत ही पलटना भी होगा।
ओबामा ने दूसरा फैसला लिया जब आज उन्होंने दर्जनों रूसी राजनयिकों को जासूसी के आरोप में अमरीका से बाहर निकाल दिया। पाठकों को याद होगा कि पूरे चुनाव अभियान में अमरीका में ये आरोप चलते रहे कि रूसी हैकरों ने ओबामा की पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के निजी ईमेल खातों में घुसपैठ करके उनके खिलाफ जानकारी ट्रम्प को मुहैया कराई थी। इस बात को लेकर ओबामा और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच सार्वजनिक तनातनी चल ही रही थी। अब ओबामा को इस कार्रवाई का हक तो पूरा है, लेकिन कार्यकाल के आखिरी तीन हफ्तों में उनका यह फैसला अगले राष्ट्रपति के कार्यकाल को दूर तक प्रभावित करने वाला रहेगा, और लोग यह जरूर सोचेंगे कि क्या ओबामा को इससे बचना चाहिए था?
एक आखिरी बात इस सिलसिले में यह भी है कि अमरीका के कुछ विचारक ओबामा से दो बातों पर अपने विशेषाधिकार से आदेश करके जाने की अपील कर रहे हैं। वहां के एक उदारवादी विचारक नोम चॉमस्की ने ओबामा से कहा है कि वे अमरीका में बसे हुए तमाम अवैध प्रवासियों की मौजूदगी वैध करने का एक आदेश जारी करें। और अमरीका के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ओबामा से अपील की है कि वे जाते-जाते फिलीस्तीन को एक देश का दर्जा घोषित करके जाएं। हमारा मानना है कि ओबामा को अगर कोई फैसले लीक और परंपरा से हटकर लेने भी थे, तो वे ये दो फैसले हो सकते थे। हालांकि उनके लिए हुए दोनों फैसलों से हम अधिक असहमत भी नहीं हैं, लेकिन वे फैसले जाते हुए राष्ट्रपति के हिसाब से थोड़े से अटपटे जरूर हैं। 

कांग्रेस की कमसमझी और यादवी लठैती से निराशा...

संपादकीय
29 दिसंबर 2016


ढाई बरस बाद के अगले आम चुनाव में मोदी के खिलाफ गैरभाजपा, गैरएनडीए दलों का एक मोर्चा बनाने की लोगों की हसरत फिलहाल तो कुछ उसी तरह कमजोर दिख रही है जिस तरह नोटबंदी से कालेधन पर काबू की हसरत कमजोर साबित हुई है। इसकी एक वजह यह है कि कोई दो बरस पहले जब मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में एक विपक्षी मोर्चा ऐसा बन रहा था जिसमें नीतीश और लालू सभी शामिल थे, और फिर वह बनते-बनते टूट भी गया। और आज उत्तरप्रदेश से जो खबरें आ रही हैं, उनमें एक तरफ तो मुलायम सिंह यादव माईक पर यह मुनादी कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी का किसी दूसरी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं होगा, और दूसरी तरफ वे अपने कुनबे के भीतर चल रही यादवी-लठैती से सिर बचाकर किसी तरह अब तक तो कायम हैं, आने वाले हफ्तों में उनका, उनकी पार्टी का, और उनके कुनबे का क्या होगा, इसे कोई भविष्यवक्ता ही बता सकते हैं।
उत्तरप्रदेश के चुनाव एक तरफ तो मायावती की बसपा को किसी भी तरह के भावी गठबंधन से दूर करते चल रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इन दोनों से उनकी मौजूदा बढ़ती हुई कटुता आगे चलकर एक साथ आने को नामुमकिन सा कर रही है। दूसरी तरफ अगर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, और बसपा सब अकेले-अकेले मैदान में रहते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी या एनडीए के लिए चुनावी मोर्चा अपेक्षाकृत आसान रह सकता है, हालांकि चुनावी नतीजे पर अटकलबाजी लगाना, नोटबंदी की इस आंधी के बीच समझदारी नहीं होगी।
लेकिन भाजपा-एनडीए के विरोध में किसी मोर्चे के बनने के आसार बन नहीं पाते हैं, और बिगड़ जाते हैं। नोटबंदी पर संसद के भीतर और बाहर एक मोर्चा बनते दिख रहा था, और शायद राहुल गांधी को अपने राजनीतिक जीवन में दूसरी पार्टियों का सबसे बड़ा साथ भी मिलते दिख रहा था, कि उन्होंने महज कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल मोदी तक ले जाकर विपक्षी एकता की संभावना को खत्म सा कर दिया। यह महज राहुल गांधी की नासमझी या कमसमझी का मामला नहीं था, यह कांग्रेस पार्टी की एक रणनीतिक चूक थी कि वे बाकी पूरे वक्त विपक्ष के साथ मिलकर विरोध पर तालमेल बनाए, लेकिन किसानों का नाम लेकर मोदी से अकेले मिल आएं। नतीजा यह हुआ कि चतुर नरेन्द्र मोदी ने तुरंत राहुल गांधी से कहा कि वे मिलते रहा करें, और यह एक लाईन अखबारी सुर्खी बनकर विपक्ष को फिर तितिर-बितिर कर गई।
हालांकि एक दूसरी बात यह भी है कि आम चुनावों के वक्त मोदी विरोधी एक मोर्चे के बनने की नौबत आने में खासा वक्त बाकी है, और कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना रहता है कि मौके की मजबूरी बहुत से मेंढकों को तराजू के एक पलड़े पर एक साथ बैठने के लिए मजबूर भी कर देती है, और आपातकाल की जनता पार्टी से लेकर यूपीए और एनडीए तक बहुत से ऐसे सुबूत भी हैं कि मौका आने पर एक लीडर के सामने आने में भी वक्त नहीं लगता, और उसके इर्द-गिर्द दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं को जुटने में भी वक्त नहीं लगता। लोगों को याद होगा कि राजीव गांधी की सरकार छोड़कर निकले वी.पी.सिंह एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने इतिहास को बदलकर रख दिया था। लेकिन भारत का ऐसा कोई भी गठबंधन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बिना बनना थोड़ा मुश्किल होगा, और कांग्रेस की कमसमझी और सपा की घरेलू लाठीबाजी भाजपा की खुशी बढ़ाने के अलावा और किसी काम की नहीं दिख रही हैं। यहां पर बिहार के मुख्यमंत्री और अगले एक संभावित प्रधानमंत्री-प्रत्याशी समझे जाने वाले नीतीश कुमार की चर्चा भी जरूरी है कि किस तरह बिना किसी वजह के उन्होंने नोटबंदी की तारीफ करके गैरभाजपाई पार्टियों को निराश कर दिया, जबकि उस वक्त नोटबंदी के मुद्दे पर खुद भाजपा के भीतर लोग गहरे संदेह से भरे हुए थे, और आज पचासवें दिन नोटबंदी पूरी तरह फ्लॉप शो साबित हो चुकी है, तो नीतीश कुमार के पास अब बोलने को कुछ नहीं है। भारत की चुनावी राजनीति में अब भाजपा-एनडीए का विरोध कतरा-कतरा में नहीं हो सकता, भाजपा विरोधी पार्टियों को, और उनके नेताओं को इन ढाई बरसों में शतरंज के ढाई घर की तरह की समझदारी की चाल चलनी होगी, वरना अगला चुनाव भी मोदी विरोधियों के लिए आसान नहीं होगा।

सामान सौ बरस का, कल की खबर नहीं

संपादकीय
28 दिसंबर 2016


भारतीय ओलंपिक संघ की कल हुई आमसभा में भ्रष्टाचार के दो आरोपियों को आजीवन संरक्षक और अध्यक्ष चुन लिया गया। अब तक राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के कटघरे में खड़े हुए सुरेश कलमाड़ी को आजीवन संरक्षक और राजनीति में भ्रष्टाचार के लिए जानी जाने वाली परंपरा के अभय चौटाला को आजीवन अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है कि खेलों की दुर्गति और अधिक होगी, और संभावनाएं खत्म होती चलेंगी। लेकिन हमने खेल संघों में अफसरों और पदाधिकारियों के कब्जे से होने वाले नुकसान के बारे में दो-चार दिन पहले ही लिखा है, इसलिए आज उन पहलुओं पर लिखने के बजाय एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में किस तरह लोग अपने आपको सार्वजनिक ओहदों पर आजीवन बनाए रखने की बेशर्मी दिखाते हैं।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पहले इसी जगह अविभाजित मध्यप्रदेश के एक संवेदनशील कहे जाने वाले मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बारे में लिखा था कि किस तरह उन्होंने कला और संस्कृति के एक राष्ट्रीय केन्द्र, भारत भवन, को बनाकर अपने आपको उसका आजीवन ट्रस्टी बना लिया था। जनता के पैसों से जो संस्थान बनते हैं, या कि जो सार्वजनिक जीवन के संस्थान होते हैं, उनमें आजीवन भला क्या हो सकता है, और क्यों होना चाहिए? किसी भी इंसान को ऐसी खुशफहमी में क्यों रहना चाहिए कि वे मरने तक किसी जगह का भला कर सकते हैं, और उनकी जगह कोई और काबिल आ ही नहीं सकते? कई लोग ऐसे रहते हैं जो अपने जीते जी अपने कब्जे के संगठनों या ट्रस्ट-संस्थानों पर अपनी कुर्सी अपने ही औलादों को देकर समाज पर एक एहसान सा करके जाते हैं। राजनीति में लोग अपनी चुनावी सीट को अपने बाद अपनी औलाद को देते आए ही हैं, और इंदिरा गांधी गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह के लिए नाहक ही बदनाम होती रहीं कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा।
भारत में किसी भी संस्था के पद पर ऐसे लोगों के चुनाव लडऩे या मनोनीत होने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए जो कि अदालतों में आपराधिक मुकदमे झेल रहे हैं। और भारतीय ओलंपिक संघ के इस ताजा मामले से यह भी समझ आता है कि भारत के खेल संघों पर किस तरह के लोग किस हद तक हावी हैं, और इस पर भी रोक लगनी चाहिए। हमारा मानना है कि अमरीका के राष्ट्रपति जिस तरह चार-चार बरस के दो कार्यकाल के बाद किसी भी सरकारी ओहदे पर नहीं रह सकते, उसी तरह भारत में भी कम से कम सार्वजनिक पदों के लिए तो यह होना ही चाहिए। और अगर यह भी हो जाए कि कोई व्यक्ति किसी विधानसभा या लोकसभा, या राज्यसभा में दो कार्यकाल से अधिक के लिए निर्वाचित या मनोनीत नहीं हो सकेंगे, तो भी भारत की राजनीति का बहुत भला हो सकता है।
अपने आपको किसी पद पर आजीवन देखना एक बहुत सामंती सोच है। लोगों को अपने आने वाले कल की खबर नहीं होती कि वे इज्जत की किसी कुर्सी पर होंगे, या कि जेल में होंगे, और वे अपने आपको आजीवन मनोनीत करवा लेते हैं। किसी समझदार ने एक वक्त लिखा था- सामान सौ बरस का, कल की खबर नहीं।
जिन लोगों को कल और जेल का अंदाज न हो, वे भी अपने आपको सौ बरस के लिए कुर्सी पर बांधकर उस पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर धिक्कार के सिवाय और क्या किया जा सकता है?

गर संजय गांधी के हाथ इतनी जानकारी होती तो क्या होता?

संपादकीय
27 दिसंबर 2016


लालू यादव की बेटी और सांसद मीसा यादव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ट्वीट करके यह पूछा है कि डिजिटल खरीददारी की बंदिश से लोगों की निजता खत्म होगी और कोई व्यक्ति सरकारी रिकॉर्ड के लिए यह क्यों बताए कि उसने जूते खरीदे हैं या भीतरी कपड़े खरीदे हैं, वे हनीमून पर कहां जा रहे हैं, और तैयारी के लिए क्या सामान लिए हैं? यह सवाल मीसा ने तो अपनी पीढ़ी के हौसले के मुताबिक सार्वजनिक रूप से खुलकर पूछा है, लेकिन यह सवाल बहुत से लोगों के जेहन में पहले से तैर रहा है। और लोगों को यह भी याद होगा कि आधार कार्ड को जिस तरह से हर चीज में अनिवार्य किया जा रहा है, उससे भी यह नौबत आ रही है कि लोगों की निजी जिंदगी की हर बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होती जाएगी, और यह तो जाहिर है ही कि सरकारें, न सिर्फ हिन्दुस्तान की, बल्कि सभी जगहों की, अपने हाथ आई जानकारी का बेजा इस्तेमाल करती ही हैं। जब दूसरों की जिंदगी, कारोबार, खरीददारी, इन सबमें ताकझांक करने का मौका सरकारों को मिलता है, तो वह अपने लालच पर काबू नहीं पा सकतीं।
दस-पन्द्रह बरस पहले अमरीका की एक फिल्म आई थी, एनेमी ऑफ द स्टेट। इस फिल्म में सरकार एक नौजवान वकील के पीछे पड़ जाती है, क्योंकि उसके हाथ सरकार के एक बड़े ताकतवर नेता के कुछ सुबूत लग जाते हैं। अब इन सुबूतों को उससे छीनने के लिए सरकार जिस तरह से टेलीफोन, इंटरनेट, खरीदी के रिकॉर्ड, रिश्तेदारियों के रिकॉर्ड, और उपग्रह से निगरानी रखने की ताकत, जासूस और अफसर, टेलीफोन पर बातचीत और घर के भीतर खुफिया कैमरों से निगरानी रखकर जिस तरह इस नौजवान को चूहेदानी में बंद चूहे की तरह घेरने की कोशिश करती है, वह अपने आपमें दिल दहला देने वाली घुटन पैदा करती है। भारत में जो लोग आधार कार्ड को हर जगह जरूरी करने के कानून के खिलाफ हैं, उनका भी मानना है कि इससे निजता खत्म होगी। भारत में आज जिस तरह आधार कार्ड को जरूरी कर दिया गया है, उससे सरकार हर नागरिक की आवाजाही, सरकारी कामकाज, भुगतान और बैंक खाते, खरीददारी, सभी तरह की बातों पर पल भर में नजर रख सकती है।
और फिर जो बातें बैंकों और निजी कंपनियों के रिकॉर्ड में आती जाती हैं, उनका इस्तेमाल तो बाजार की ताकतें भी करती ही हैं। यह एक भयानक तस्वीर बनने जा रही है जिसमें भारत की सरकार लोगों से यह उम्मीद करती है कि वे अपनी हर खरीद-बिक्री, हर टिकट, हर रिजर्वेशन को कम्प्यूटरों पर दर्ज होने दें। आने वाले दिनों में किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम के लिए किसी शहर में पहुंचने वाले लोगों की लिस्ट रेलवे से पल भर में निकल आएगी, और सत्तारूढ़ पार्टी के कम्प्यूटर यह निकाल लेंगे कि ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों में पहुंचने वाले लोग पहले भी क्या ऐसे ही कार्यक्रमों में जाते रहे हैं, और फिर उनकी निगरानी, उनकी परेशानी एक बड़ी आसान बात होगी।
आज जो दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देश हैं, वहां भी नगद भुगतान उतना ही प्रचलन में है जितना कि क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान करना। भुगतान के तरीके की आजादी एक बुनियादी अधिकार है, और भारत सरकार आज कैशलेस और डिजिटल के नारों के साथ जिस तरह इस अधिकार को खत्म करने पर आमादा है, उसके खतरों को समझना जरूरी है।
जिस मीसा यादव ने यह सवाल उठाया है, उस मीसा का जन्म ही आपातकाल के दौर में हुआ था, जब संजय गांधी अपने को नापसंद हर हिन्दुस्तानी को मीसा में बंद करने पर आमादा था। उस काले कानून की याद में, मीसा में बंद रहे लालू यादव ने बेटी का यह नाम रखा था। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह याद रखना चाहिए कि उनकी पार्टी के लोग भी आपातकाल में बड़ी संख्या में जेल भेजे गए थे। उस वक्त अगर संजय गांधी के हाथ यह जानकारी होती कि किन-किन लोगों ने क्या-क्या सामान खरीदे हैं, तो उस जानकारी का भी बेजा इस्तेमाल हुआ होता। आज भारत में निजी जिंदगी की प्राइवेसी या निजता पर चर्चा अधिक नहीं हो रही है, और यह अनदेखी अपने आपमें बहुत खतरनाक है। एक नौजवान सांसद मीसा ने यह जायज सवाल उठाया है, और इसे दूर तक ले जाना चाहिए। 

ताकतवर को उसी जुर्म के लिए कमजोर से अधिक सजा मिले

संपादकीय
26 दिसंबर 2016


हर दिन देश में कहीं न कहीं से खबर आती है कि बैंकों में किस तरह किसी गरीब के जन-धन खाते में करोड़ों रूपए जमा हो गए। अब मेरठ की ताजा खबर यह है कि एक महिला के खाते में सौ करोड़ रूपए आ गए, और उसने दहशत में प्रधानमंत्री को इसकी खबर भेजी है। चारों तरफ से कई निजी और सरकारी बैंकों में संगठित जालसाजी की खबरें भी आ रही हैं और दो-चार मामलों में बैंक अफसर गिरफ्तार भी हुए हैं। और बैंकों के कागजात में दर्ज इस पूरी धांधली से परे भी चारों तरफ से खबरें आती हैं कि किस तरह करोड़ों के नोट एक-एक जगह से मिल रहे हैं, और कैसे कुछ कारोबारी पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने का ही धंधा कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिस नोटबंदी को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती की तरह शुरू किया है, वह किस बुरी तरह धोखाधड़ी और जालसाजी का शिकार हो रही है। और देश के मौजूदा कानून अगर बाकी जुर्म की तरह ही इसको भी निपटाएंगे, तो हो सकता है कि इसमें बरसों लग जाएं।
आज देश में जरूरत दो अलग-अलग किस्म के कानूनों की है। हम पहले भी कई मामलों में यह लिख चुके हैं कि देश में संपन्नता के आधार पर दो अलग-अलग तरह के कानूनों की जरूरत है। एक जालसाजी जिसमें कोई ताकतवर किसी गरीब के खिलाफ साजिश करे, तो उसे अधिक सजा देनी चाहिए। जब ताकतवर किसी ताकतवर के खिलाफ जुर्म करे तो उन दोनों को तो आपस में निपटने की सहूलियत रहती है, और दोनों ही अदालतों का अपनी मर्जी और ताकत से बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं, और जुर्म के बाद भी बच भी सकते हैं। लेकिन जब गरीब के खिलाफ कोई साजिश कोई ताकतवर करते हैं तो गरीब के पास बचने का कोई रास्ता नहीं होगा। देश में कानून बदलकर ताकतवर तबके को अधिक सजा का हकदार बनाने का वक्त आ चुका है। हमारा मानना है कि आर्थिक संपन्नता, राजनीतिक या प्रशासनिक, संवैधानिक ओहदों का दर्जा देखते हुए ताकत का एक पैमाना तय होना चाहिए। और उसी अनुपात में सजा का पैमाना बनना चाहिए। जो जितना अधिक ताकतवर हो, उसे उतनी ही अधिक सजा मिले। ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि गरीब तो कभी किसी बेबसी या मजबूरी में किसी जुर्म में फंस सकते हैं, लेकिन ताकतवर के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती।
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी को लेकर हर दिन नियम-कायदे बदल रहे हैं, और अब बात उनकी इज्जत पर बन आई है, नोटबंदी के साथ-साथ वे बेनामी संपत्ति को लेकर भी कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं, इंकम टैक्स जैैसे विभाग एक बार फिर पूरी ताकत से कालेधन की तलाश में लोगों के कारोबार में पहुंच रहे हैं, यह सही समय है जब कानून में ऐसे बदलाव की पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को करनी चाहिए, यह उनका एक ऐसा सामाजिक समानता का कदम होगा, जो कि लंबे समय तक याद रखा जाएगा, और हो सकता है कि नोटबंदी की नाकामयाबी से उबरने में भी उन्हें मदद करेगा। इसके लिए संविधान में एक बड़े संशोधन की जरूरत पड़ेगी, और यह काम किया जाना चाहिए, बिना देर किए हुए। 

सुशासन की गारंटी के लिए रिटायर्ड अफसरों की नहीं, मुसद्दीलालों की जरूरत

संपादकीय
25 दिसंबर 2016


भारत में भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए उनके जन्मदिन, 25 दिसंबर, क्रिसमस पर सुशासन दिवस मनाया जाता है। इसे 2014 में शुरू किया गया, और आज ऐसा तीसरा दिवस रहा। छत्तीसगढ़ सहित देश के शायद सभी राज्यों मेें इसे मनाया गया, और जाहिर है कि बेहतर सरकार, बेहतर शासन, और बेहतर प्रशासन की जरूरत लोकतंत्र में हमेशा ही बनी रहेगी जिसमें कि सुधार की गुंजाइश रहती ही रहती है। अब इसी सिलसिले में देखें तो छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सुधार आयोग पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के वक्त भी बनाया गया था, और एक ऐसे ताजा-ताजा रिटायर हुए मुख्य सचिव अरूण कुमार को उसका मुखिया बनाया गया था जो कि सरकारी नौकरी में रहते हुए भी कोई काम न करने के लिए जाने जाते थे। जानकार लोगों को पता है कि वे रिटायर होने के बाद किसी तरह का पुनर्वास चाहते थे, और यह कुर्सी और उससे जुड़ी सहूलियतें पाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री और उनके सचिव का जीना हराम कर दिया था। आखिर में उनसे छुटकारा पाने के लिए उन्हें वह कुर्सी दी गई थी।  जो काम न करने के लिए बदनाम रहा हो, उसे सरकार ने यह काम दे दिया कि काम बेहतर कैसे किया जाए!
दूसरी तरफ मौजूदा रमन सरकार ने कुछ समय पहले इस आयोग की कुर्सी पर एक दूसरे भूतपूर्व मुख्य सचिव सुयोग्य कुमार मिश्र को बिठाया, जो अपने कार्यकाल में सुयोग्य माने जाते रहे, और उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे सरकारी कामकाज को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन हमारा सवाल यह है कि जो लोग एक ही प्रदेश में रहते हुए दशकों लंबी अपनी नौकरी सरकारी सेवा में गुजारते हैं, क्या उनके पास ऐसा कुछ नया तिलस्म छुपा रहता है कि वे प्रशासन में कोई ऐसा सुधार कर दिखाएं जो कि वे मुख्य सचिव रहते हुए भी नहीं दिखा पाए थे? अगर प्रशासन में सुधार की कोई संभावना या गुंजाइश उन्हें सूझती, तो उसका इस्तेमाल तो उन्हें प्रशासन का मुखिया रहते हुए कर ही लेना था। लेकिन उस वक्त कुछ न करने वाले, या दूसरे नजरिए से देखें, तो सब कुछ कर लेने वाले लोगों को अब क्या सोचकर ऐसी कुर्सियों पर बिठाया जाता है?
लेकिन प्रशासनिक सुधार से जुड़ी कुछ और कुर्सियां भी हैं। राज्य और केन्द्र में सूचना आयोग तो एक संवैधानिक संस्था है, और यह संस्था जनता के सरकार से सूचना पाने के हक की गारंटी करने के लिए बनाई गई है। लेकिन परंपरागत रूप से पूरे देश में इस आयोग की कुर्सियों पर रिटायर्ड अफसरों को ही बिठाया जाता है, जिनकी सारी नौकरी इस संस्कृति में काम करते हुए गुजरती है कि किस तरह जानकारी को जनता से, विधानसभा से, संसद से, यथासंभव छुपाकर रखा जाए। जो लोग पूरी जिंदगी जानकारी की गोपनीयता की शपथ लेकर काम करते आए हैं, उन लोगों को इस बिल्कुल नए ताजा लोकतांत्रिक हथियार के इस्तेमाल की गारंटी का जिम्मा दे देना निहायत ही नासमझी का इंतजाम है, लेकिन यह पूरे देश में चल रही व्यवस्था है। कुछ ऐसा ही एक दूसरा आयोग मानवाधिकार आयोग है जिसमें आमतौर पर पुलिस के जुल्म के खिलाफ शिकायतें पहुंचती हैं। लेकिन इसकी कुर्सी पर भी रिटायर्ड पुलिस वालों को बिठाने का सिलसिला पूरे देश में है, और उनका नजरिया जिंदगी भर वर्दी का काम करते हुए वर्दी को बचाना रह जाता है। सरकार की ऐसी कई संवैधानिक कुर्सियां हैं जिन पर अगर संविधान की भावना की इज्जत करते हुए लोगों को मनोनीत करना है, तो वहां पर राजनीति से परे के, सरकार से परे के, सार्वजनिक जीवन के ऐसे लोगों को रखा जाना चाहिए जो कि न कल सरकार से उपकृत थे, न आज रहेंगे, और न कल उपकार चाहेंगे। अगर इस नजरिए से संवैधानिक सुधार और निगरानी की कुर्सियां भरी जाएंगी, तो अपने आप सुशासन आने लगेगा। लेकिन सरकारों की नीयत समारोह की जरूर रहती है, बुनियादी सुधार की नहीं रहती, क्योंकि उससे बेकाबू दिक्कतें ही दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं।
हमारा मानना है कि किसी भी राज्य को अगर सचमुच प्रशासनिक सुधार करना है, तो उसे ऐसे आयोग को मौजूदा या रिटायर अफसरों से परे रखना होगा। ऐसे आयोगों में जनता के बीच से ऐसे लोगों को लाना होगा जिनका सरकार के साथ लंबा वास्ता पड़ते रहा हो, जो सरकारी काम को बाहर से देखते रहे हों, और दुख भोगते रहे हों। लोगों को याद होगा कि टीवी पर एक सीरियल आता था जो सरकारी दफ्तरों की मनमानी को दिखाता था, और उसमें मुसद्दीलाल नाम का एक आम नागरिक धक्के खाते रहता था। आज प्रशासनिक सुधार या दूसरे संवैधानिक आयोगों में ऐसे सीरियल के सरकारी अधिकारियों को बिठा दिया गया है, जबकि जरूरत मुसद्दीलालों को बिठाने की है। 

कुपोषण के शिकार, भूखे बच्चों को नेताओं के अहंकार के लिए मुंह का कौर दान देना ही होगा

संपादकीय
24 दिसंबर 2016


महाराष्ट्र में आज सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां के मराठा शासक रहे छत्रपति शिवाजी की एक विशाल प्रतिमा बनाने का काम शुरू किया। यह प्रतिमा साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक लागत से बनने जा रही है, और भारत की सरकारी योजनाओं का जो आम हाल रहता है वह अगर इस योजना के साथ हुआ तो हो सकता है कि यह लागत बढ़कर डेढ़-दो गुना भी हो जाए। फिलहाल मुंबई के समंदर के पानी के बीच शिवाजी का यह स्मारक कुछ ऐसा बनने जा रहा है कि वह गुजरात में बनने जा रही सरदार पटेल की प्रतिमा से भी ऊंचा रहेगा।
महाराष्ट्र में मराठा समुदाय एक बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता है, और प्रदेश की राजनीति में कोई भी राजनीतिक दल न इस तबके को अनदेखा कर सकता है, और न ही महाराष्ट्र में क्षेत्रीय स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक छत्रपति शिवाजी को अनदेखा कर सकता है। यही वजह है कि मुंबई का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन, और मुंबई का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ये दोनों ही छत्रपति शिवाजी के नाम पर हैं, और अब यह देश का सबसे महंगा, सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा स्मारक भी उन्हीं के नाम पर बन रहा है। इस मौके पर बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर यह ऑनलाईन अभियान छेड़ा है कि सरकार को इतनी बड़ी फिजूलखर्ची से रोका जाए, और कहा जाए कि यह रकम महाराष्ट्र के आत्महत्या करते किसानों की मदद पर खर्च की जाए, या महाराष्ट्र के कुपोषण से मरते आदिवासी बच्चों पर खर्च की जाए, या शिवाजी के बनवाए हुए बहुत से किले खंडहर हो रहे हैं, उनकी मरम्मत करवाई जाए। एक मुद्दा यह भी है कि समंदर में जिस जगह यह स्मारक बनाया जा रहा है उससे समुद्री पर्यावरण और वहां के जीवों पर भी बड़ा बुरा असर पड़ेगा, इसलिए भी पानी के भीतर ऐसा स्मारक न बनाया जाए।
लेकिन दुनिया का इतिहास है कि स्मारकों के बिना शासकों का काम चलता नहीं है। चाहे वे दूसरे देशों पर हमला करने वाले मुगल शासक रहे हों, या आपातकाल में इस देश पर राज करने वाला संजय गांधी रहा हो, इन सबके लिए दुनिया भर में स्मारक बनते ही हैं। संजय गांधी न तो किसी भी संवैधानिक पद पर थे, और न ही देश के लिए उनका जुल्म के अलावा कोई योगदान था, इसके बावजूद दिल्ली में उनके लिए एक बड़ा स्मारक बनाया गया, और नेहरू-गांधी परिवार एक ऐसी परंपरा शुरू की, जिसकी मिसाल दे-देकर अब देश के किसी भी मुजरिम के नाम पर भी स्मारक बनाया जा सकता है। संजय गांधी लोकतंत्र में एक खलनायक के अलावा कुछ नहीं रहे, और इंदिरा गांधी के पतन की सबसे बड़ी वजह भी वही रहे, जब उनके नाम पर देश की राजधानी में कई एकड़ जमीन पर स्मारक बन सकता है, तो फिर आपातकाल के बाकी खलनायकों के नाम पर भी बन सकता है।
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में जिंदा मायावती ने अंबेडकर, कांशीराम, और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं लगवाकर भी लाखों करोड़ की जमीन पर हजार करोड़ की लागत से स्मारक बनवाकर एक नई परंपरा शुरू की। और हमारा ख्याल है कि सरदार पटेल और शिवाजी की आसमान छूती ऐसी प्रतिमाओं के बाद अब तमिलनाडू में जयललिता की पार्टी इस स्वाभाविक मानसिक दबाव में आ जाएगी कि चेन्नई के समंदर में वह इन दोनों स्मारकों से अधिक ऊंचा स्मारक जयललिता का बनवाए, और हमारा ख्याल है कि कुछ महीनों के भीतर ही ऐसी घोषणा सामने आ जाएगी। हो सकता है कि आज जब प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की खबर चेन्नई में देखी जा रही हो, तब यह फैसला लिया भी जा चुका होगा।
यह देश मूर्तिपूजकों का देश है, और इस देश के नेता अपने कुनबे और अपने बड़े नेताओं की प्रतिमाओं को बनाना अपनी राजनीतिक कामयाबी मानते हैं। यहां की सड़कें गड्ढों से भरी रहें, लेकिन वहां पर प्रतिमाओं को लगाना राजनीतिक प्रतिष्ठा और जनता के संतुष्टिकरण का मामला रहता है। ऐसी प्रतिमाएं जिन लोगों की रहती हैं, उन्होंने अगर महानता की कुछ बातें कही भी हों, तो उन बातों पर अमल के बजाय उन लोगों की प्रतिमाओं को बनाने पर भारतीय लोकतंत्र का अधिक भरोसा है। ऐसे में इस देश के भूखे और कुपोषण के शिकार बच्चों को अपने मुंह का कौर दान देना ही होगा ताकि नेताओं का अहंकार पूरा हो सके। 

खेल के मामले में भारत है सतही और औसत दर्जे का

संपादकीय
23 दिसंबर 2016


भारत के एक दिग्गज गोल्फ खिलाड़ी एसएसपी चौरसिया ने कहा है कि उन्हें खेल मंत्रालय द्वारा रियो ओलंपिक पर उनके खर्च के 30 लाख रूपए अभी तक नहीं दिए हैं। इस रकम की मंजूरी उन्हें पहले भी मिल चुकी थी, लेकिन महीनों गुजर जाने पर भी यह भुगतान नहीं किया गया है, और ओलंपिक निपट जाने के बाद खेल मंत्रालय ने लिखित वायदे की अपनी चि_ी से मुकरते हुए इस रकम को घटाकर आधा कर दिया, और आज तक उसमें से चौरसिया को कुल साढ़े 5 लाख रूपए ही दिए गए हैं। खेल संघ और मंत्रालय के अपने कड़वे अनुभव गिनाते हुए इस खिलाड़ी ने कहा कि न तो रियो ओलंपिक में खिलाडिय़ों के लिए गाड़ी का इंतजाम किया गया, और न ही ठंड और बारिश में छाते या रेनकोट तक का इंतजाम हुआ। उन्होंने कहा कि मंत्रालय और खेल संघ के अधिकारी ऐसा बर्ताव करते थे जैसे वे मालिक हों, और खिलाड़ी उनके नौकर हों।
यह हाल पूरे देश में, अधिकतर प्रदेशों में, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अधिकतर जिलों में भी देखने मिलता है जहां खेल संघों पर सत्ता और राजनीति से जुड़े हुए, नेता-अफसर और कारोबारी काबिज हैं, और उनकी पसंद खिलाडिय़ों को चुनने से लेकर उनको सहूलियतें दिलाने तक हर जगह हावी रहती हैं। ओलंपिक में गए हुए कई खिलाड़ी पहले भी यह कह चुके हैं कि भारत से रियो तक का एक-डेढ़ दिन का सफर उन्होंने इकॉनामी क्लास की तंग सीटों पर तय किया, और खेल संघों के पदाधिकारी और मंत्रालय के अफसर महंगी क्लास की आरामदेह सीटों पर गए। ऐसा कहने वाले कई खिलाड़ी रहे, और दूसरी तरफ भारत के खेल मंत्री ने रियो में जाकर जो शर्मनाक बर्ताव किया था, उसके चलते स्थानीय आयोजकों ने भारत के प्रतिनिधि मंडल को लिखित नोटिस भी दिया था।
आज चीन, रूस, अमरीका जैसे देश अगर ओलंपिक से किलो-किलो सोना-चांदी ले जाते हैं, और भारत जैसा सवा अरब की आबादी का देश इक्का-दुक्का मैडल को देश का गौरव मानकर लौटता है, तो उसके पीछे भारत के यह सरकारी रवैया, और खेल संघों की राजनीति है जिनके चलते खिलाड़ी खड़े ही नहीं हो पाते। दूसरी बात यह कि हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से यह देखते हैं कि किस तरह स्कूलों से ही खेल के सामान की खरीदी में भारी भ्रष्टाचार चलता है, शहरों के मैदान सिमटते जा रहे हैं, और राज्य सरकार अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम को, उनमें साल में एक-दो बड़े सितारा-मैचों को प्रदेश में खेल का विकास मानकर बैठी रहती है। स्कूल और कॉलेज के बच्चे मुकाबलों में आने-जाने के लिए बिना सीट पाए सफर करते हैं, दरियों पर सोते हैं, और अभावों में खेल की, मुकाबले की तैयारी करते हैं। प्रदेश में एक के बाद एक, अलग-अलग शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम प्रदेश का खेल विकास बताया जाता है, जबकि बच्चों के रोज के खेलने के मैदान घटते जा रहे हैं, शहरों में खेल के मैदानों पर साल भर बाजार की प्रदर्शनियों से लेकर ऑटो और हाउसिंग मेले लगे रहते हैं, राजनीतिक और धार्मिक प्रवचन चलते रहते हैं, और गड्ढों सहित छोड़े गए मैदान बीच-बीच में कुछ दिन मैदान गिन लिए जाते हैं।
भारत के खेल के माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इसे ओलंपिक में और अधिक मैडल मिलें या दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में इसके खिलाड़ी मैडल लेकर आएं। आज इक्का-दुक्का मैडल जो आते हैं, वे सरकार और खेल संघों की वजह से नहीं आते हैं, उनके बावजूद आते हैं, और खिलाडिय़ों की यह उपलब्धि छोटी नहीं है। बहुत से लोग यह कहते भी हैं कि भारत को ओलंपिक से कुछ बरसों के लिए हट जाना चाहिए क्योंकि सौ खेलों की तैयारी करके जाने वाले खिलाड़ी आधा दर्जन मैडल भी नहीं ला पाते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान जिस तरह बाकी तमाम बातों में भी बहुत सतही और औसत दर्जे के काम वाला देश है, वही हाल खेल के मामले में भी है। 

मोदी के सामने दीर्घकालीन नीतियों की बड़ी चुनौती

संपादकीय
22 दिसंबर 2016


एक वक्त हिन्दुस्तान पर राज करने वाले ब्रिटेन से भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना करते हुए एक रिपोर्ट आई है कि पहली बार भारत का जीडीपी ब्रिटेन को पछाड़ रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है और ब्रिटेन में यूरोपियन यूनियन को छोडऩे के बाद अब वहां आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। दो देशों के जीडीपी की तुलना महज आंकड़ों की तुलना होती है, न कि वहां के नागरिकों की आर्थिक स्थिति की। ब्रिटेन की आबादी बहुत कम है और वहां प्रति व्यक्ति आय भारत से बहुत अधिक है, लेकिन एक देश के रूप में अगर सकल घरेलू उत्पादन दूसरे देश के इस आंकड़े से आगे निकलता है, और यह रफ्तार जारी रहने का अंदाज भी है, तो यह कल के गुलाम, और आज तरक्की कर रहे एक देश में थोड़ी सी खुशी की वजह तो बनती है। एक दूसरे मोर्चे पर क्रिकेट है जिसमें भारत ने इंग्लैंड की टीम को बुरी तरह से हराया है और एक बड़ी खुशी खेल प्रेमियों को दी है।
भारत को इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि दुनिया की बहुत सी ऐसी अर्थव्यवस्थाएं रही हैं जो एक समय आसमान पर थीं, और वे बाद में जमीन पर आ गईं। भारत में विकास की रफ्तार मौजूदा सरकार की लाई हुई नहीं है, मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री रहते हुए भी जिस तरह के आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की थी, उससे गरीब और अमीर के बीच का फासला तो चाहे बढ़ गया था, लेकिन देश की कुल माली हालत बेहतर हुई थी। आज जब भारत नोटबंदी की वजह से रोजगार और कारोबार दोनों खो रहा है, और रिजर्व बैंक का अंदाज एक धीमी विकास दर का है, तब यह समझने की जरूरत है कि हर छोटी-छोटी कमाई मायने रखती है। अभी तक अंतरराष्ट्रीय बाजार से मोदी सरकार को लगातार बहुत सस्ते में पेट्रोलियम मिल रहा है। नतीजा यह हुआ है कि उस पर सरकारी टैक्स-शुल्क बढ़ाकर जनता को मिल सकने वाली राहत खुद सरकार ने रख ली, और अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का काम किया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार भारत के काबू से परे रहता है, और हो सकता है कि आगे चलकर यह तेल बड़ा महंगा हो जाए, और वह एक बात ही भारत सरकार और भारतीय जनता दोनों की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए काफी हो सकती है। एक दूसरी बात यह कि ब्रेक्सिट के फैसले के बाद ब्रिटेन बुरे हाल से गुजर रहा है,  और उससे जुड़े हुए भारत के रोजगार और कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। तीसरी बात यह कि अमरीका के अगले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जो रूख गैरअमरीकी कामगारों के बारे में हैं, तो उससे ऐसी आशंका है कि करीब 80 हजार हिन्दुस्तानी अमरीका में काम खो सकते हैं। डॉलर में कमाने वाले ये लोग वापिस अपने देश भी रकम भेजते हैं, और यह नुकसान खासा बड़ा हो सकता है। जो बात खबरों में अधिक नहीं रहती है, वह यह भी है कि सउदी अरब के दिन बहुत खराब चल रहे हैं, और वहां काम करने वाले हिन्दुस्तानी महीनों की मजदूरी पाए बिना किसी तरह हिन्दुस्तान लौट पा रहे हैं, और यह जाहिर है कि ऐसी हालत में वहां पर हिन्दुस्तानियों के और अधिक रोजगार पाने का मौका नहीं है, बल्कि वहां से लौटे हुए लोग इस देश में खाली बैठे रहेंगे।
इसलिए भारत को आज न केवल देश के भीतर, बल्कि बाकी दुनिया के रोजगार और कारोबार के बाजार में अपनी संभावनाओं को लगातार बढ़ाना होगा। भारत के पास जो मौलिक खूबियां हैं, उनमें बड़ी संख्या में कामगार हैं, यहां पर खूब सौर ऊर्जा हो सकती है, यहां पर खूब बंदरगाह हैं, यहां लोहे और कोयले जैसे कई खनिजों के बड़े भंडार हैं, और यह अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कई देशों के बीच पड़ता है। आज देश की ऐसी दीर्घकालीन नीतियों की जरूरत है जो कि भारत की इन खूबियों को इस्तेमाल करके कारोबार और रोजगार दोनों पैदा करे। आज नोटबंदी और उसके बाद के दौर में भारत एक बड़ी उथल-पुथल से गुजर रहा है। पहली नजर में नोटबंदी के नुकसान ही नुकसान दिख रहे हैं, और कालेधन का कोई पता नहीं चल रहा है। अब इस दौर से जूझते हुए आगे दूर तक की सड़क तय करना आसान भी नहीं है, लेकिन मोदी सरकार के पास कोई भी लंबी नीतियां बनाने के लिए कुछ महीनों का ही वक्त है, और उसके बाद उन पर अमल शुरू करने के लिए अधिक से अधिक दो बरस हैं। ऐसे वक्त में एक दिक्कत यह भी रहती है कि मतदाताओं को सीधे खुश करने वाले फैसले लिए जाएं, न कि चुनाव के बरसों बाद तक की सोची जाए। ये दोनों बातें इस सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है, और देखना यह है कि मोदी क्या फैसले लेते हैं।

चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना

संपादकीय
21 दिसंबर 2016


नोटबंदी पर और कुछ न लिखने की कसम खाने के बाद भी हर तीसरे दिन तक इस मुद्दे पर लिखने को फिर इतना कुछ जुट जाता है, और वह देश के सबसे कमजोर तबके की जिंदगी पर इतनी बुरी तरह असर डालने वाला रहता है कि इस पर न लिखें, एक बार और न लिखें, तो अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं लगती। मोदी सरकार सदमे पर सदमे दिए चली जा रही है। दो दिन पहले यह फैसला आया कि पांच हजार रूपए से अधिक अगर कोई जमा करेंगे, तो बैंक के दो अफसर उनसे पूछताछ करेंगे, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग होगी, और उसके बाद जब बैंक संतुष्ट हो जाएगा कि अब तक यह रकम जमा क्यों नहीं की गई थी, तब जाकर इसे जमा किया जाएगा। पूरा देश मोदी के होर्डिंग और इश्तहार देखते आ रहा था कि लोग हड़बड़ी में बैंक या डाकघर न पहुंचें, क्योंकि तीस दिसंबर तक पुराने नोट जमा किए जा सकते हैं। अब जो लोग कतार में पूरे-पूरे दिन धक्के खाने के बजाय, और मरने के बजाय राह देखते रहे कि कब भीड़ छंटे, और कब वे अपने पुराने नोट जमा करने पहुंचें, तब तक यह नई रोक लगा दी गई। और आज दोपहर खबर आती है कि यह रोक हटा ली गई है, और लोग अब जितनी चाहे उतनी रकम जमा कर सकते हैं।
नोटबंदी के हर दिन बदलते हुए नियमों को देखते हुए यह हैरानी होती है कि केन्द्र सरकार के स्तर पर देश भर से पहुंचे हुए मंत्री और सांसद, और देश के सबसे काबिल माने जाने वाले अफसर, बैंकों के अनुभवी लोग, रहते हुए मोदी सरकार यह नहीं समझ पा रही है कि वह लोगों का विश्वास किस रफ्तार से खो रही है, किस रफ्तार से वह लोगों की जिंदगी को दिक्कतों से भर रही है। मजे की बात यह है कि देश के सबसे अधिक योजनाबद्ध तरीके से कॉलोनी जैसे बने हुए आधुनिक शहर चंडीगढ़ की म्युनिसिपल के कुछ लाख वोटरों के वार्ड चुनाव में जीत को देश भर में मोदी समर्थक नोटबंदी की जीत बता रहे हैं। इस शहर में अधिकतर लोग क्रेडिट या डेबिट कार्ड वाले, पढ़े-लिखे, शहरी, और अपेक्षाकृत खाते-पीते लोग हैं, और देश की आधी से अधिक गरीब-ग्रामीण आबादी की जिंदगी का ऐसी चंडीगढ़ी जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है। और अगर ऐसे चुनावी नतीजे को हवा का रूख माना जा रहा है, तो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार खुद भाजपा के लोगों की भावनाओं को नहीं देख रही है, और सोशल मीडिया पर लोगों का एक तबका, जो कि मोदीभक्त कहा जाता है, उसकी लिखी हुई बातों को वह देश की नब्ज मानकर चल रही है।
यह पूरा सिलसिला मोदी और भाजपा के लिए चाहे कितना ही नुकसानदेह और खतरनाक क्यों न हो, हम उसे लेकर अधिक फिक्रमंद नहीं हैं। हमारी फिक्र देश की उस अनगिनत गरीब जनता की है जो कि नोटबंदी के बाद से लगातार अपना कारोबार, अपनी रोजी-मजदूरी खो रही है, जगह-जगह कारखाने बंद हो रहे हैं, निर्माण बंद हो रहे हैं, और मजदूर अपने गांवों को लौटने के लिए मजबूर हैं। यह हकीकत मीडिया से होते हुए रात-दिन देश के सामने पहुंच रही है, और इसे अनदेखा करना भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही नुकसानदेह नौबत है। पिछले सवा महीने में इस देश में गरीबों की कमाई को जो धक्का लगा है, उससे उबरने में साल-छह महीने लगेंगे, और गरीब को निजी स्तर पर जो नुकसान हुआ है, उससे वे कभी नहीं उबर पाएंगे। जो सबसे गरीब हैं उनकी नुकसान सहने की क्षमता सबसे कम रहती है, और यह नौबत किसी ने सोची नहीं थी, और सरकार रोजाना इस नौबत को और मुश्किल बनाए दे रही है।
बाकी बातों को बार-बार यहां लिखकर दुहराना ठीक नहीं है, लेकिन एक पुरानी कहावत चली आ रही है जिसे मोदी के लिए दुहराया जाना चाहिए- चि_ी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना।

तुर्की में रूसी राजदूत की हत्या के मायने

संपादकीय
20 दिसंबर 2016


तुर्की में रूसी राजदूत को एक पुलिस वाले ने आर्ट गैलरी में सरे आम गोली मार दी। यह पुलिस अफसर ड्यूटी पर नहीं था, और राजदूत वहां एक भाषण दे रहे थे। इस नौजवान अफसर ने यह नारा लगाते हुए गोली मारी कि तुम्हारे लोग सीरिया के अलेप्पो में हमारे लोगों को मार रहे हैं, और यहां पर हम तुम्हें मारेंगे। उल्लेखनीय है कि सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में रूस अपनी खुली फौजी दखल से वहां की सरकार की मदद कर रहा है, और वहां के अलेप्पो शहर पर हुए हवाई हमलों में दसियों हजार लोगों को मारा गया है। दुनिया भर में ऐसी मौतों को लेकर बड़ी फिक्र हो रही है, और लोग इस बहस में लगे हुए हैं कि सरकारी फौजों और बागियों के बीच की हथियारबंद लड़ाई में देश की सरकार अपने ही लोगों पर हवाई हमले करके थोक में लोगों को कैसे मार सकती है।  तुर्की और अड़ोस-पड़ोस के कुछ देशों के बीच भी बेकसूर तुर्क लोगों की ऐसी बड़ी संख्या में मौतों को लेकर प्रदर्शन चल रहे हैं, और करोड़ों लोग इन मौतों को देखकर विचलित हैं। जाहिर है कि जिस नौजवान पुलिस अफसर ने यह कत्ल किया है, उसके लगाए हुए नारे, सीरिया को मत भूलो, अलेप्पो को मत भूलो, दुनिया के बहुत से लोगों की भावना को बताते हैं।
अब जब 2016 का साल खत्म होने जा रहा है, और बहुत से समाचार वेबसाइट सालभर की चुनिंदा तस्वीरों को पोस्ट कर रही हैं, तो यह देखकर हैरानी होती है कि यह पूरा साल किस कदर खूनी गुजरा है। चारों तरफ तबाही, चारों तरफ गृहयुद्ध और आतंकी हमले, चारों तरफ मजहब के नाम पर हिंसा और खून-खराबा, मानो पूरा साल महज तबाही ही छोड़ गया है। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि मुस्लिम देशों पर अमरीका या पश्चिम के ईसाई बहुल देश जिस तरह की फौजी कार्रवाई करते आए हैं, जिस तरह फिलीस्तीन पर इजरायल फौजी कार्रवाई करते आया है, उसके जख्म जल्द भरने वाले नहीं हैं, और ऐसी फौजी कार्रवाई से कोई स्थायी शांति नहीं आ सकती। तुर्की में रूसी राजदूत की यह ताजा हत्या उसी बेचैनी का एक सुबूत है, और दुनिया के ताकतवर देशों को यह सोचना पड़ेगा कि वे किस तरह बिना फौजी इस्तेमाल के बाकी रास्तों से आतंक को, गृहयुद्ध को खत्म कर सकते हैं, क्योंकि फौजी कार्रवाई में बेकसूर मौतों की प्रतिक्रिया बरसों तक होती रहेगी।

तालाबों के लिए लड़ते-लड़ते चला गया एक बेहतर आदमी

संपादकीय
19 दिसंबर 2016


हिन्दुस्तान के तालाबों पर सबसे अधिक काम करने वाले एक गांधीवादी पर्यावरण आंदोलनकारी अनुपम मिश्र आज गुजर गए। वे तो चले गए लेकिन देश के तालाबों को बचाने की उनकी कोशिश इतिहास में दर्ज है, और आज इस मौके पर उनके उठाए हुए इस मुद्दे पर बातचीत जरूर होनी चाहिए जिसके लिए उन्होंने तमाम जिंदगी काम किया, और ऐसी किताबें लिखीं जो कि देश के तमाम भाषाओं में अनुवाद के बाद छपती रहीं, और मोटे तौर पर भारत के देश-प्रदेश की सरकारों के रूख के चलते जिन पर कोई काम नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ जैसा प्रदेश जो कि तालाबों से भरापूरा प्रदेश रहा है, उसमें भी शहरों से लेकर पंचायतों तक तालाब तभी सरकारी नजरों में आए जब उन पर खर्च का कोई तरीका निकला। तालाबों के किनारों को खूबसूरत बनाना तो सरकार और स्थानीय संस्थाओं की प्राथमिकता रही, लेकिन इससे परे धरती और समाज के लिए तालाबों की जो बुनियादी भूमिका रही है, उस तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
छत्तीसगढ़ को ही लेकर अगर हम बात करें, तो गांव-गांव में तालाबों से जुड़ी हुई जिंदगी को देखते हुए भी बढ़ती हुई आबादी, और धरती की भूजल की बढ़ती हुई जरूरत को देखते हुए भी तालाबों की गिनती नहीं बढ़ी, बल्कि रफ्तार से कम होती गई। तालाबों की जितनी गिनती बाकी है, उसमें भी तालाबों का इलाका घटते गया, और गाद भरने के कारण उनकी पानी रखने की क्षमता घट गईं। पूरे प्रदेश में, और बाकी देश में भी, पंप लगाकर जमीन से पानी तो निकाल लिया जाता है, लेकिन तालाबों के मार्फत जो पानी जमीन में वापिस डाला जा सकता था, वह काम लगातार घटते गया, क्योंकि तालाबों की गिनती घटी, उनके किनारों पर अवैध कब्जे हुए, और शहरी जरूरतों के लिए सैर-सपाटे के लिए भी तालाबों के किनारे पाट दिए गए। इस बढ़ती शहरी और ग्रामीण जरूरत के मुताबिक नए तालाब बनाने की जो अपार संभावना छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में थी, उस मोर्चे पर कोई काम नहीं किया गया। तरह-तरह के राहत कार्य, और सरकारी रोजगार के काम से जितने तरह के तालाब, प्रदेश के जितने हिस्सों में बनाए जा सकते थे, उस मोर्चे पर काम नहीं हुआ, और नतीजा यह है कि जमीन के भीतर पानी का जाना कम हो गया, नदियों में बहकर जाने वाली मिट्टी बढ़ गई, और उनमें बाढ़ आने लगी, और पंपों को हजार-हजार फीट की गहराई तक डालकर पानी निकालना पड़ रहा है।
अनुपम मिश्र को एक व्यक्ति के रूप में याद करने की जरूरत नहीं है। पूरे देश की सरकारें कहने के लिए उनका बड़ा सम्मान करती रहीं, उन्हें बुलाकर सुनती रहीं, और फिर उनकी किताबों की कुछ कापियां खरीदकर अपने लाइब्रेरी की आलमारियों में बंद करती रहीं, लेकिन जमीन पर तालाबों के लिए काम नहीं हुआ जो कि अनुपम मिश्र का पूरी जिंदगी का संघर्ष था। आज भी उनकी लिखी और कही हुई बातों पर अमल की जरूरत हर दिन बढ़ती चल रही है, क्योंकि भारत जैसे देश में तालाबों से चलने वाली जिंदगी को बदतर बनने से बचने के लिए तालाब सम्हालने की जरूरत है, और नए तालाब बनाने की जरूरत। अगर कोई तालाबों को महज इंसानों और जानवरों के इस्तेमाल का सामान मानकर चलते हैं, तो उन्हें यह समझना चाहिए कि तालाब महज किनारे तक जाकर इस्तेमाल के लिए नहीं होते, वे भूजल को बढ़ाने के लिए भी होते हैं, और ऐसी जरूरत के तालाब प्रदेश में आबादी से दूर भी बनाए जाने चाहिए जहां से पानी बहकर नदियों तक चले जाता है। जंगल या सुनसान इलाके के बीच भी ऐसे तालाब बनाए जा सकते हैं जिनका आबादी को कोई सीधा इस्तेमाल न हो, और जो महज धरती के लिए बनाए जाएं। राज्य सरकारें चाहें तो आबादी से दूर के ऐसे तालाब मशीनों से भी बनवा सकती हैं, और धरती की इस जरूरत, इंसानों और जानवरों की इस जरूरत को महज रोजगार से जोड़कर देखना भी ठीक नहीं है। अनुपम मिश्र को याद करने का एक तरीका यही हो सकता है कि लोग तालाबों की बात करें, उनके लिए कुछ करें, उनकी गिनती बढ़ाएं, उनका क्षेत्रफल बढ़ाएं, उनकी गहराई बढ़ाएं, और अपनी खुद की जिंदगी बेहतर बनाएं। 

डिजिटल-जानकारी के खतरे, ट्रम्प से लेकर भारत तक

संपादकीय
18 दिसंबर 2016


अमरीका से, जैसी कि आशंका थी, ट्रम्प से जुड़ी हुई एक डरावनी खबर आ रही है कि अभी वहां की सबसे बड़ी कुछ कम्प्यूटर कंपनियों के साथ अपनी बैठक में निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह मदद मांगी कि ये कंपनियां अपने रिकॉर्ड में दर्ज मुस्लिम-अमरीकियों की जानकारी सरकार को दें। एक खबर यह कहती है कि एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजान जैसी कंपनियों ने ट्रम्प को इसके लिए साफ मना कर दिया है। लोगों को याद होगा कि चुनाव अभियान के दौरान ट्रम्प ने यह घोषणा की थी कि अमरीका में बसे हुए मुस्लिमों के बारे में सरकार अलग से जानकारी जुटाकर उनकी प्रोफाइल तैयार करेगी। जो अमरीका दुनिया में अपने आपको एक मेल्टिंग-पॉट के रूप में स्थापित करके सभी धर्मों और रंगों का एक बेमिसाल मेल बना हुआ है, उस अमरीकी संस्कृति को खत्म करने पर ट्रम्प शुरू से आमादा है, और यह कोई नई बात नहीं है, ट्रम्प ने इसी हमलावर मुद्दे और तेवर के साथ यह चुनाव जीता है, और दुनिया के सामने, खासकर अमरीका के सामने वह एक बड़ा खतरा बनकर खड़ा हुआ है।
दुनिया में संकीर्णता और नफरत का एक नया सैलाब भारत से लेकर ब्रिटेन तक, और अमरीका के बाद जर्मनी और फ्रांस तक फैलते दिख रहा है। अमरीका की सारी खूबी उसकी मिलीजुली संस्कृति रही है, और वही हाल भारत का भी रहा है। भारत में सभी धर्मों, जातियों, और प्रांतों की मिलीजुली संस्कृति ने एक साथ रहकर ही तरक्की की है। लेकिन पिछले दो-तीन बरस में, पिछले आम चुनाव से लेकर अब तक, और अगले आम चुनाव तक, साम्प्रदायिक ताकतें बड़े हमलावर अंदाज में काम करते दिख रही हैं। कभी गाय के नाम पर, तो कभी तिरंगे के नाम पर, कभी राष्ट्रगान के नाम पर, तो कभी किसी के देशभक्त और देशद्रोही होने के नारे लगाकर इस देश की भावनाओं को टुकड़ा-टुकड़ा किया जा रहा है। फिर ऐसा भी नहीं है कि कुछ आक्रामक हिन्दू संगठन दूसरे धर्म के लोगों के साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हैं। वे दूसरे धर्मों के साथ-साथ हिन्दू धर्म का हिस्सा रहे हुए दलितों के साथ भी वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं, और उन्हें अपने से काटने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ वे उन आदिवासियों के साथ भी वही बर्ताव कर रहे हैं जिन्हें कि वे हिन्दू मानते-गिनते हैं, और जो दरअसल हिन्दू धर्म से परे अपनी आदिवासी संस्कृति में जीते हैं।
अमरीका के लोग अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए भारत के मुकाबले बहुत अधिक जागरूक हैं। और वहां पर ट्रम्प की यह नफरत एक चुनाव तो जीत सकती है, लेकिन वह अमरीकी जिंदगी के रूख को नहीं बदल सकेगी। वहां के लोग इस नफरत को रफ्तार से खारिज कर देंगे, और भावनात्मक दहशत दिखाकर ट्रम्प ने जो चुनाव जीता है, उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय आतंकी घटनाएं भी रही हैं, और यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले चुनाव तक दुनिया और अमरीका में ऐसी नौबत नहीं रहेगी। फिलहाल अमरीकी कंपनियों पर ट्रम्प के इस दबाव से एक खतरा पूरी दुनिया पर दिखता है। भारत में भी आज लोगों की सारी निजी जानकारी, उनका लेन-देन, यह सब कुछ सरकारी कम्प्यूटरों पर दर्ज किया जा रहा है। जिस दिन इस देश की कोई सरकार ऐसी सारी जानकारी को अपने ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल करने की सोचेगी, तो आज की यह सारी डिजिटल-सहूलियत एक खतरनाक हथियार में तब्दील हो जाएगी। इसीलिए आज आधार कार्ड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उसके मुद्दों को सुनकर उसके खतरों पर सोचने की भी जरूरत है कि सरकार के हाथ अपने नागरिकों की कितनी जानकारी रहनी चाहिए, और कितनी जानकारी बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ रहेगी। 

न्यायपालिका का इतिहास इसे एक बहुत बड़ी गलती के रूप में दर्ज करेगा

संपादकीय
17 दिसंबर 2016


सुप्रीम कोर्ट ने कल नोटबंदी पर एक आदेश देते हुए देश भर की कई उच्च न्यायालयों में नोटबंदी के खिलाफ लगाई गई याचिकाओं को रोक दिया, और खुद सुप्रीम कोर्ट में इस पर चल रही सुनवाई को पांच जजों वाली संविधान पीठ के हवाले कर दिया। मतलब यह कि अगले कई दिनों में इस पीठ के लिए जज चुने जाएंगे, और फिर वह इस सुनवाई को एक नए सिरे से शुरू करेगी, और ऐसा अंदाज है कि उसका कोई भी आदेश आने में कई हफ्ते या कई महीने लग जाएंगे, और उसका फैसला आने में तो महीनों लगना तय ही है। उसके बाद भी सरकार के पास हो सकता है कि पुनर्विचार याचिका जैसे कोई संवैधानिक विकल्प बाकी रहें, और जनता तक उस फैसले का असर पडऩे में साल भी लग सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रूख समझ से बिल्कुल ही परे है कि उसने कोई तत्काल राहत नहीं दी है, जबकि बैंक-एटीएम की कतारों में मरने वाले कब के सौ से अधिक हो चुके हैं, देश में मजदूरों के सैकड़ों करोड़ कार्यदिवस खत्म हो चुके हैं, लोग भूख और निराशा में डूबे हुए हैं, कामकाज, कारोबार, कारखाने, और रोजाना की जिंदगी से जुड़े हर किस्म के रोजगार बुरी तरह तबाह हो चुके हैं, और केन्द्र सरकार के नोटबंदी के नियम सिरकटे मुर्गे की तरह चारों तरफ दौड़ रहे हैं, रास्ता बदल रहे हैं। हिन्दुस्तान के इतिहास में यह सबसे बड़ी मानवनिर्मित तबाही है, और सुप्रीम कोर्ट को इस पर कोई राहत देने की नहीं सूझी है! यह तर्क, न्याय, और समझ से परे का फैसला है कि दसियों करोड़ हिन्दुस्तानी आज तकलीफ में हैं, और सुप्रीम कोर्ट इसे कोई जरूरी मुद्दा न समझकर एक संवैधानिक बहस का मुद्दा मानकर इसे संविधान पीठ को दे रहा है।
लोगों को याद रखना चाहिए कि यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो अपने आसपास के धूल और धुएं, धुंध और प्रदूषण से डरकर तरह-तरह के आदेश जारी करता है, उसे लागू करवाता है। यह वही सुप्रीम कोर्ट है जो दिल्ली के ट्रैफिक पर सुनवाई करता है, या सहारा जैसे खरबपति की जमानत पर कई-कई दिन का अपना समय लगाता है। यहां पर फिल्मी सितारे बहुत सा वक्त पाते हैं, और बहुत किस्म की रियायतें भी पाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज मानो स्टेडियम में बैठे हुए क्रिकेट देख रहे हों, और उसके सामने बीसीसीआई जैसे भ्रष्ट खेल संगठन बाउंसर फेंक रहे हों। जिस सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी तमाम बातों के लिए वक्त ही वक्त है, एक-एक कंपनी या संगठन के बोर्ड या संचालक मंडल की बैठक तय करने या टालने के लिए वक्त ही वक्त है, उसके पास बैंकों की कतारों में लगे लोगों की मौत, उनके इलाज, उनकी भूख के लिए वक्त नहीं है, और जहां पहली सुनवाई के दिन ही राहत दी जानी चाहिए थी, सरकार से रातों-रात जवाब मांगना था, वहां पर सुप्रीम कोर्ट इसे महीनों चलने वाली संवैधानिक बहस का मुद्दा मान रहा है।
इससे एक बात साबित होती है कि जमीनी हकीकत और तकलीफों से सुप्रीम कोर्ट कट चुका है। बड़े-बड़े जज अरबपति वकीलों की बहस को सुनते हुए इस मकडज़ाल में फंसे हुए दिखते हैं कि कौन से वकील के तर्क अधिक दमदार हैं। यह दम तौलना अधिक मायने रखते दिखता है, बजाय एक प्राकृतिक न्याय करने के। इंसाफ का तकाजा तो यह था कि केन्द्र सरकार को दिन भर कटघरे में खड़े रखकर उससे सुप्रीम कोर्ट जनता की तकलीफों को घटाने, उसे तुरंत राहत दिलवाने का कोई आदेश करती, लेकिन ऐसा लगता है कि सौ करोड़ आबादी की तकलीफें अकेले सुब्रत राय सहारा की दिक्कतों के मुकाबले कम मायने रखती हैं। यही हालत देश की संसद की है, जहां पर अरबतियों और करोड़पतियों से नीचे के लोग न के बराबर रह गए हैं। यही हाल प्रदेशों की विधानसभाओं का है। और यही हाल राजनीतिक दलों का है जिन्हें कि कल केन्द्र सरकार ने नोटबंदी से छूट दी है। गरीब का रोजगार, उसकी रोटी, उसका इलाज, यह सब कुछ राजनीतिक दलों के उस काले चंदे के मुकाबले कोई मायने नहीं रखता, जिस चंदे को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया है। कल से जब से यह खबर आई है कि राजनीतिक दलों को पुराने नोट जमा करने की छूट जारी रखी गई है, तब से देश की जनता सोशल मीडिया पर उबल पड़ी है कि सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच संसद के भीतर और संसद के बाहर की नूराकुश्ती क्या इसीलिए थी कि राजनीतिक दल अपने कालेधन को बैंकों में जमा कराने की रियायत तो पा ही जाएं, वे दूसरों के पुराने नोटों को जमा करने की एक मशीन भी बन जाएं?
सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता को इस बुरी तरह निराश किया है कि जिसका कोई जवाब नहीं। और भारत की न्यायपालिका का इतिहास इसे एक बहुत बड़ी गलती के रूप में दर्ज भी करेगा। 

मीडिया के अपने सुधार के लिए मानहानि मुकदमे जरूरी

संपादकीय
16 दिसंबर 2016


राहुल गांधी ने मोदी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप के सुबूत होने की बात तो उछाली, लेकिन उस बारे में कुछ कहा नहीं। अब सोशल मीडिया और इंटरनेट पर उनके दुबक जाने के तरह-तरह के विश्लेषण किए जा रहे हैं। इनमें से एक बात जो उभरकर आती है, वह यह है कि प्रधानमंत्री या भाजपा की तरफ से मानहानि का कोई मुकदमा होने पर वह राहुल गांधी को एक बार फिर अदालत तक घसीट सकता है, और वे अभी आरएसएस के बारे में कही अपनी एक बात को लेकर वैसे भी अदालती कटघरे में खड़े हुए हैं कि गांधी की हत्या संघ के लोगों ने की थी। लोगों का ऐसा मानना है कि वे संसद के भीतर तो यह बात कहना चाहते थे, क्योंकि संसद में कही बात पर कोई अदालती कार्रवाई नहीं हो सकती। लेकिन इस बारे में हम दो दिन पहले लिख चुके हैं, और आज लिखने का मुद्दा राहुल गांधी न होकर मानहानि का कानून और मानहानि के मुकदमे हैं।
देश में अलग-अलग ताकत रखने वाले लोग मानहानि के कानून का अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करते हैं। मोटे तौर पर कोई भी बयान मीडिया के मार्फत ही सार्वजनिक जीवन में आते हैं, और ऐसे बयान देने वाले लोगों के साथ-साथ अखबार या टीवी पर भी मुकदमा चलाया जाता है। ये मुकदमे दो तरीके के रहते हैं, एक में तो झूठी बदनामी करने के आरोप में बयान देने वाले, या रिपोर्ट छापने वाले को सजा की मांग की जाती है, और दूसरे मामले रहते हैं जिनमें मानहानि के लिए मुआवजे की मांग की जाती है। देश में सौ-सौ करोड़ रूपयों का मुआवजा मांगते हुए मानहानि के मुकदमे हर बरस दो-चार तो सामने आते ही हैं, और छत्तीसगढ़ में भी नेता, अफसर ऐसे कई मुकदमे दायर करते हैं, और उनमें से अधिकतर मामले किसी समझौते के साथ खत्म हो जाते हैं।
हम यहां मोटे तौर पर मीडिया के बारे में लिखना चाहते हैं, जिसका एक हिस्सा हमेशा ही ब्लैकमेलर की तरह बदनाम रहता है, और मीडिया में बुरे लोग उसी तरह रहते ही हैं जिस तरह सरकार या राजनीति में रहते हैं, कारोबार या धर्म-आध्यात्म में रहते हैं। ऐसे में जब कोई ताकतवर कमर कस लेते हैं कि झूठी खबर या रिपोर्ट छापने वाले या टीवी पर दिखाने वाले को अदालत से सजा दिलवाना ही है, तो भारत के कानून मीडिया का साथ अधिक दूर तक नहीं दे पाते। और ऐसा भी नहीं है कि किसी रिपोर्ट के सच होने पर कानून मीडिया का साथ देता हो। कानून केवल उसी सच का साथ दे पाता है जो अदालत के कटघरे में अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने होने को साबित कर पाता है। जो सच अदालत में साबित नहीं हो पाता, वह सबको पता होने पर भी किसी काम का नहीं रहता। अदालत किसी सच को नहीं मान लेती, वह उसी सच को मानती है जिसे कि साबित किया जा सकता है। ऐसे में मीडिया के जो लोग किसी सच को लेकर इस धोखे में रह जाते हैं कि उसे दिखाकर या छापकर लोकतंत्र में बचा जा सकता है, वे लोग फंस जाते हैं। फिर मीडिया के कुछ लोग सोचा-समझा झूठ छापकर अपने आपको बेचते हैं, और सचमुच ही किसी की मानहानि में लग जाते हैं। ऐसे लोग भी तभी तक शान से घूम सकते हैं जब तक कोई उन्हें अदालत में चुनौती न दें।
दरअसल भारत में मीडिया की आदतें इसलिए बिगड़ी हुई हैं कि सार्वजनिक जीवन के लोग मानहानि का मुकदमा दायर करके अदालती कटघरे में खड़े होकर सौ किस्म के और सवालों के जवाब देना नहीं चाहते। अदालत के बाहर की बातों पर तो वे अदालत तक आ जाते हैं, लेकिन जब अदालत में मीडिया के वकील उनसे सौ तरह के और दूसरे सवाल करते हैं, तो उनके जवाब देने का हौसला कम ही लोगों में रहता है। ऐसे में कानून रहते हुए भी उसकी तरफ से बेफिक्र मीडिया बदनीयत भी हो जाता है, और लापरवाह भी। कभी वह सोच-समझकर किसी के खिलाफ झूठी बातें छापने-दिखाने लगता है, तो कभी वह लापरवाही से यह सोचकर यह काम करने लगता है कि उसके खिलाफ भला कोई क्या अदालत जाएगा।
हमारा यह मानना है कि खुद मीडिया के भले के लिए मानहानि के मुकदमे होने चाहिए, और जब उनमें सचमुच कुसूरवार लोगों को सजा मिलेगी, तो ही बाकी मीडिया के लोगों को नसीहत मिलेगी। आज कुछ कुसूरवार बचे रहते हैं, तो बाकी लोग चाहकर या बिना चाहे ही कुसूरवार बनते रहते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और लोकतंत्र में मीडिया की आजादी जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है मीडिया का जिम्मेदार होना। किसी भी सभ्य समाज में जिम्मेदारी के बिना कोई अधिकार नहीं दिए जा सकते।

मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप, तर्कसंगत और न्यायसंगत अंत तक लेकर जाएं राहुल

संपादकीय
15 दिसंबर 2016


राहुल गांधी ने कल एक बड़ा वजनदार बयान दिया कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजी भ्रष्टाचार के सुबूत हैं, और इसीलिए उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। अगर उन्हें संसद में बोलने दिया गया तो मोदी का गुब्बारा फूट जाएगा। यह कांग्रेस के सबसे बड़े नेता का अब तक का लगाया हुआ सबसे बड़ा आरोप है। और सोनिया गांधी के बाद कांग्रेस पार्टी का मालिकाना हक जिस तरह राहुल को मिलने की घोषणा हो चुकी है, उससे उनकी बात को हम बहुत गंभीरता से नीचे लेना भी नहीं चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार के सुबूत किसी के पास हैं, तो वे सुबूत न महज संसद में सामने आने चाहिए, बल्कि संसद के बाहर भी देश के सामने आने चाहिए, और जब ऐसे सुबूत सामने आ जाएं तो न सिर्फ प्रधानमंत्री को जवाबदेह होना चाहिए, बल्कि देश की जांच एजेंसियों को भी खुद होकर उसे परखना चाहिए।
अब जब राहुल गांधी बड़े गंभीर आरोपों का एक बड़ा सा गुब्बारा सामने रख चुके हैं, तो कुछ सवाल खड़े होते हैं। इनमें एक सवाल यह है कि राहुल गांधी संसद के प्रति जवाबदेह हैं, या कि भारत के लोकतंत्र के प्रति जिसका कि संसद महज एक हिस्सा है। लोकतंत्र संसद से बहुत बड़ी होती है, और एक राजनीतिक दल के नेता, देश के नागरिक, जनता के निर्वाचित लोग लोकतंत्र के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। ऐसे में हर नागरिक की यह जिम्मेदारी होती है कि वे उनकी जानकारी में आए हुए भ्रष्टाचार के मामलों को जांच एजेंसियों को भेजें, या कि अदालत तक जाने की उनकी ताकत हो, तो वे अदालत में जनहित याचिका लगाएं, या कम से कम मीडिया को तो यह जानकारी दे ही दें, ताकि जांच एजेंसियां उस पर कार्रवाई को मजबूर हो जाएं। लोगों को याद होगा कि मनमोहन सरकार के वक्त राहुल गांधी ने दिल्ली प्रेस क्लब में मीडिया के सामने मनमोहन मंत्रिमंडल द्वारा लाया जा रहा एक कानून फाड़कर फेंक दिया था, और यह पूरा मामला मीडिया के सामने एक सोचे-समझे तमाशे की तरह पेश किया गया था। वह तो कांग्रेस और यूपीए का घरेलू मामला था लेकिन अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सचमुच भ्रष्ट हैं, तो यह आरोपों से परे का मामला है और कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, देश के सांसद, राहुल गांधी की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे बिना देर किए इस मामले का भांडाफोड़ करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह समझा जाएगा कि वे लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी पूरी नहीं कर रहे हैं, और न ही उनके पास ऐसे कोई सुबूत हैं।
फिर एक दूसरी बात यह भी है कि अगर प्रधानमंत्री को अपने काम पर बहुत भरोसा है, तो उन्हें राहुल गांधी का यह बयान देश की तीनों-चारों बड़ी जांच एजेंसियों को भेज देना चाहिए, और यह मांग करनी चाहिए कि वे राहुल गांधी से मिलकर सुबूत हासिल करें, और उसकी जांच करें। हमारा मानना है कि देश के सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की बात किसी आम राजनीतिक बयानबाजी की तरह न तो उछाली जानी चाहिए, और न ही अनदेखी की जानी चाहिए। राहुल गांधी ने यह बयान देकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने सरीखा काम किया है, और उनको इस सिलसिले को एक न्यायंसगत और तर्कसंगत अंत तक पहुंचाना चाहिए, वरना वे अपना थोड़ा-बहुत मौजूदा वजन भी खो बैठेंगे।

नई पीढ़ी पर अपनी इच्छाओं को थोपते हिंदुस्तानी मां-बाप

संपादकीय
14 दिसंबर 2016


जबलपुर से एक खबर है कि टीवी सीरियल क्राईम पेट्रोल में काम करने वाले एक अभिनेता कमलेश पाण्डेय ने अपने-आपको गोली मार ली। कुछ अखबारों का कहना है कि वे इस बात से नाखुश थे कि उनके साढू की बेटी ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी। बात थोड़ी अटपटी है क्योंकि पत्नी की भांजी अगर अपनी मर्जी से शादी करे तो उसमें किसी का इतना विचलित होना अजीब है, लेकिन हिंदुस्तान इसी तरह का देश है, और आए दिन कहीं पे्रमी जोड़े पेड़ों पर साथ टंगे मिलते हैं, तो कहीं पर बेटी के पे्रमी के पूरे कुनबे को मारकर उसके पिता और भाई फूले नहीं समाते हैं, और ऐसी शान दिखाने के बाद फिर वे चाहे पूरी जिंदगी जेल ही क्यों न चले जाएं। यह देश अपने इतिहास और संस्कृति में तो श्रृंगार रस और पे्रम से भरा हुआ रहा है, लेकिन आज वर्तमान को पे्रम से पूरी तरह अलग रखने के लिए एक अजीब किस्म का माहौल इस समाज में बना दिया गया है। अब इसमें भारत की जाति व्यवस्था, और भारत के धार्मिक टकराव की बात और जुड़ जाती है, और जो जोड़े आत्महत्या नहीं भी कर पाते हैं, वे लगातार एक तनाव और कुंठा के बीच जीने को मजबूर रहते हैं।
फिर आत्महत्या और हत्या के आंकड़े तो खबरों में आ जाते हैं उनसे परे जो लोग घुट-घुटकर जीते हैं, उनकी जानकारी न पुलिस की रिपोर्ट में आती, और न ही यह पता लगता कि उनकी ऐसी हालत की वजह से देश की उत्पादकता पर क्या फर्क पड़ा है। हकीकत यह है कि दुनिया के जो देश अपनी निजी पसंद को लेकर सबसे अधिक आजादी पाते हैं, और देते हैं, वहीं के लोग सबसे अधिक कामयाब भी होते हैं, और वे ही लोग सबसे आगे भी बढ़ते हैं। आज जब हिंदुस्तान के लोग भी अंतरिक्ष में जाकर लौट रहे हैं, तब भी यह देश पुराने पाखंड को ढोकर अपनी नई पीढ़ी को खत्म करने में एक अलग किस्म का आत्मगौरव पाता है।
हिंदुस्तान में मां-बाप को अपनी पसंद बच्चों पर थोपना बहुत अच्छा लगता है। जो बच्चे वोट देने की उम्र के हो जाते हैं, उनके लिए भी कपड़े पसंद करने को भी मां-बाप साथ चले जाते हैं। स्कूल के बाद कॉलेज के विषय तय करने की आजादी मां-बाप बच्चों को नहीं देते हैं, और ऐसे अनगिनत मामले रहते हैं जिनमें मां-बाप अपनी जिंदगी में अपूरित रह गई अपनी इच्छाओं को अपने बच्चों पर लादकर उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ डॉक्टर-इंजीनियर जैसा कुछ बनाने में जुटे रहते हैं। नाकामयाबी को ढोते हुए ऐसे बच्चे कभी-कभी खुदकुशी भी कर लेते हैं। जो बच्चे नोट कमाने लगते हैं, उनको भी अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं रहती है।
अपनी अगली पीढ़ी को अपने काबू में रखने और रखे रहने की यह हसरत एक किस्म की दिमागी बीमारी है जो कि मां-बाप को इसी में राहत देती है कि उनके बच्चे उनके काबू के बाहर नहीं हैं। इस सिलसिले से जब तक यह देश उबरेगा नहीं, तब तक यह आगे नहीं बढ़ सकता। नई पीढ़ी के दिल-दिमाग से देश की उत्पादकता भी जुड़ी रहती है, और तरह-तरह की सामाजिक बातें भी। अपनी इच्छाओं को थोपना खत्म होना चाहिए।

आने वाले चुनाव में ऐसे सारे लुटेरों के हाथ नोट रहें न रहें, एक-एक वोट जरूर रहेंगे

संपादकीय
13 दिसंबर 2016


कर्नाटक में रिजर्व बैंक के एक अफसर को भारत सरकार की जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया है क्योंकि वह नोटों की बदली के धंधे में लगा हुआ था। कई और जगहों पर बैंकों का ऐसा काम पकड़ में आ रहा है, और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में यह सुनाई पड़ रहा है कि किस तरह सरकारी कामकाज में मजदूरी और दूसरे भुगतान में पुराने नोटों का इस्तेमाल करके उन्हें नए भुगतान की तरह दिखाया जा रहा है, और नए नोट बचा लिए जा रहे हैं। हम पिछले महीने भर में नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार की नीयत से लेकर गरीब जनता की नियति तक हर पहलू पर बहुत कुछ लिख चुके हैं, लेकिन पिछले दो-चार दिनों में बैंकों की जो धांधली सामने आई है, वह बताती है कि इस देश में सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र, या स्थानीय संस्थाओं के अफसरों और कर्मचारियों के भरोसे इतने बड़े पैमाने का ऐसा कोई काम ईमानदारी से होना मुमकिन ही नहीं था, जितना बड़ा काम नोटबंदी है। नतीजा यह हुआ है कि कालेधन वाले सारे के सारे लोग दस-बीस फीसदी नोटों के नुकसान के बाद नए नोट पाकर राहत में हैं, और गरीब लोग कतारों में मर रहे हैं, या आत्महत्याएं कर रहे हैं। इन दोनों किस्म की मौतों के आंकड़े तो खबरों में आ जाते हैं, लेकिन नोटबंदी से जुड़ी हुई बाकी मौतों, तकलीफों, और दूसरे नुकसानों की खबरें आंकड़ों में नहीं आती हैं, और इसका नुकसान कभी भी सरकारी अनुमानों में देखने नहीं मिलेगा।
लेकिन आज भारत के लोगों के ईमानदारी के लिए नजरिए पर बात करने का मौका है। जिस तरह इस देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा किसी भी साफ-सुथरी जगह को देखकर तुरंत ही थूकने या मूतने लगता है कि कोई जगह इस देश में साफ-सुथरी रह न जाए, उसी तरह ईमानदारी की कोई चुनौती सामने खड़ी करने पर हिन्दुस्तानी लोग एकदम कमर कसकर बेईमानी पर उतारू हो जाते हैं कि कहीं उनकी राष्ट्रीय-पहचान पर किसी को शक न हो जाए। जब रात-दिन टीवी चैनल और अखबार बैंक-एटीएम की कतारों में खड़े बेबस, बीमार, बूढ़े, और रोते-बिलखते लोगों की तस्वीरें दिखा रहे हैं, उनके बयान सुना रहे हैं, तो उस बीच भी इस तरह से कमाने के लिए बेईमानी और भ्रष्टाचार करना हिन्दुस्तान का आम चरित्र है, और इसीलिए दुनिया की जितनी वित्तीय संस्थाएं दुनिया भर में भ्रष्टाचार की लिस्ट बनाती हैं, तो उनमें भारत बहुत ऊपर रहता है।
कुछ लोगों को यह लगता है कि दो बरस पहले तक देश में यूपीए की सरकार थी, और यूपीए की भागीदार पार्टियां भ्रष्टाचार में लगी हुई थीं, और आज उनको यह दिखता है कि देश में जहां-जहां नए नोटों का जखीरा पकड़ा रहा है, जहां-जहां किसी नेता के घर करोड़ों-अरबों के खर्च से शादियां हो रही हैं, तो ऐसे सारे लोग भाजपा से जुड़े हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वामपंथी दलों के गिने-चुने लोगों को अगर छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों में बेईमानी के पैमाने पर कोई बहुत बड़ा फर्क आपस में दिखता नहीं है। छपी हुई खबरों से परे हवा में तैरती हुई बातों को सुना जाए, तो नेता, अफसर, और कारोबारी एक साथ मिलकर, बैंक और दलालों को साथ लेकर अपने कालेधन के नोटों को बदलने में पूरी तरह कामयाब हो गए हैं। आज पूरे देश से नोटबंदी के बाद एक खबर भी ऐसी नहीं आई है कि किसी करोड़पति-अरबपति ने किसी गगनचुंबी इमारत से छलांग लगाई हो, या नुकसान के डर से खुदकुशी कर ली हो। मरने वाले सारे के सारे लोग गरीब हैं, और वे रोजगार खो रहे हैं, सरकार, देश, और अपने आप पर भरोसा खो रहे हैं, और तकलीफ पा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि चुनाव के करीब खड़े उत्तरप्रदेश में भाजपा की परिवर्तन यात्रा लेकर पहुंचीं भाजपा की केन्द्रीय मंत्री कृष्णाराज ने अभी सार्वजनिक रूप से कहा है- बैंकों की लाईन में उन्हीं लोगों की मौत हो रही है, जो देश को लूट रहे थे।
आने वाले चुनाव में ऐसे सारे लुटेरों के हाथ नोट रहें न रहें, एक-एक वोट जरूर रहेंगे। 

नए साल की पहली सुबह बैंकों के आंकड़ों से उपजे सवाल लेकर आएगी

संपादकीय
12 दिसंबर 2016


जिस बड़े पैमाने पर देश भर में जगह-जगह करोड़ों के नए नोट बरामद हो रहे हैं, उससे कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि कालाधन किस तरह और किस हद तक कुछ हाथों में इक_ा हो सकता है, इसकी एक मिसाल नोट हैं, जो कि कुल कालेधन के कुल चार फीसदी होने का अंदाज अर्थशास्त्रियों को है। दूसरी बात यह कि आज जब देश की अधिकतर आबादी कुछ सौ या कुछ हजार नोटों के लिए तरसते घूम रही है, तब चार हफ्ते पहले जारी दो हजार के नए नोट किस तरह थोक बंडलों में एक साथ जमा मिल रहे हैं। तीसरी बात यह कि देश के बैंक बड़े पैमाने पर नोटों की अदला-बदली में गैरकानूनी काम करते शामिल दिख रहे हैं, और हमारे आसपास की बाजार की चर्चा भी यही कहती है कि बैंकों में जगह-जगह कर्मचारी ही कारोबारियों से मिलकर सब तरह का काम कर रहे हैं। नोटबंदी की पहली रात ही कई बैंकों में जो छोटे नोट जमा थे, उनके बदलने का इंतजाम कर लिया गया था, और वहां से लेकर अभी थोक में नए नोट निकलने तक हर तरह का काम बैंकों में हो रहा है। बाजार की जानकारी यह है कि हजार-पांच सौ के नकली नोट भी नियमित ग्राहक बैंकों की मेहरबानी से खपा दे रहे हैं क्योंकि सबको यह भरोसा है कि पुराने नोटों का यह समंदर कभी जांचा नहीं जा सकेगा। आज ही खबर है कि प्रधानमंत्री ने देश के सैकड़ों बैंकों में स्टिंग ऑपरेशन करवाया है, और उसमें गड़बडिय़ां पकड़ में भी आई हैं। दिल्ली में एक्सिस बैंक में जैसी साजिश के साथ कालेधन को सफेद करने का काम किया गया है, वह तो देखने लायक है, और देश के बहुत से सहकारी और सरकारी बैंक भी अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग किस्म की साजिशों में हिस्सेदार पकड़ाते रहे हैं, और ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि नोटबंदी के इस दौर में उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ नहीं धोए होंगे।
अब तक की जानकारी यह कहती है कि हजार-पांच सौ के जितने नोट प्रचलन में थे, वे शायद पूरे के पूरे अगले पखवाड़े बैंक पहुंच जाएंगे। ऐसे में नोटों की शक्ल में जो कालाधन होने का अंदाज था, और जो नकली नोट प्रचलन में होने का अंदाज था, उन सबका बैंकों से बाहर हो जाने का मकसद शायद पूरा होते नहीं दिख रहा है। ऐसे में अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं कि क्या नोटबंदी की पहली घोषणा में प्रधानमंत्री ने जिन फायदों को गिनाया था, क्या उनमें से कोई भी पूरे नहीं होने जा रहे, और क्या अब कैशलेस का नया नारा जोड़कर इस नाकामयाबी को ढांका जा रहा है? यह बात यह है कि संसद के भीतर और संसद के बाहर भाषणों में अलग-अलग नेता चाहे जो कहें, आने वाले दिनों में सरकार को नोटबंदी से जुड़े हुए सारे तथ्यों को सामने रखना होगा कि इसकी लागत घोषित रूप से कितनी आई, बाजार के जानकार अर्थशास्त्री बनाएंगे कि नोटबंदी से अघोषित नुकसान कितना हुआ, और जनता आने वाले चुनावों में बताएगी कि नोटबंदी को उसने देशपे्रम कितना माना, और उसके जख्म राष्ट्रवाद के मरहम से कितने भरे। आज नोटबंदी के बारे में सोशल मीडिया पर कही जा रही एक बात सही लगती है कि खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा सत्तर पैसा। लेकिन नोटबंदी से कालेधन के मोर्चे पर, आतंक की फंडिंग के मोर्चे पर, और नकली नोटों के मोर्चे पर नाकामयाबी के बावजूद एक नई कामयाबी की शुरूआत इसके बाद जरूर हो सकती है, भारतीय ग्राहकों और दूकानदारों के एक बड़े हिस्से को कैशलेस बनाने की। लेकिन नोटबंदी का यह तो मकसद था नहीं, और इससे लोगों की जिंदगी, उनका रोजगार, ये सब जिस कदर तबाही से गुजरे हैं, उसकी कोई जरूरत तो भारतीय बाजार को कैशलेस बनाने के लिए थी नहीं। आने वाले दिन बहुत से सवाल लेकर खड़े हैं, और नई साल की पहली सुबह बैंकों से निकलने वाले आंकड़ों के साथ सवाल लिए खड़ी रहेगी।

बातचीत की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए...

संपादकीय
11 दिसंबर 2016


इन दिनों खबरों में सबसे पीछे है कश्मीर। बर्फबारी की तरह कश्मीर कभी खबरों पर बरसता है, और फिर कई महीनों के लिए आंखों से दूर हो जाता है कि मानो वह मौजूद ही न हो। आज वहां से जरा सी खबर आई है कि यशवंत सिन्हा की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल फिर तमाम लोगों से बात करने गया है ताकि वहां अमन-चैन कायम करने और बनाए रखने का कोई रास्ता ढूंढा जाए। इस प्रतिनिधिमंडल को केन्द्र सरकार की कोई मान्यता नहीं है, और न ही किसी राजनीतिक दल ने इन्हें यह जिम्मा दिया है, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि औपचारिक और अधिकृत प्रतिनिधिमंडलों के मुकाबले कई बार ऐसी अनौपचारिक कोशिशें अधिक असर डालती हैं, और कोई रास्ता निकलता है।
हम दरअसल आज इसी एक मामले को लेकर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि बातचीत की सारी अहमियत पर चर्चा करना चाहते हैं। यह बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच भी हो सकती है, दिल्ली और श्रीनगर के अलगाववादियों के बीच भी हो सकती है, और छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार और नक्सलियों के बीच भी हो सकती है। अभी एक-दो बरस पहले जब भारत के एक बुजुर्ग पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक अपनी निजी कोशिश से पाकिस्तान जाकर वहां हाफिज सईद से मिलकर बात करके आए थे, तो बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया था कि उनको ऐसा करने का हक किसने दिया था। इसी तरह भारत के भीतर भी कभी-कभी कुछ लोग नक्सलियों से बातचीत करके कुछ रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं और ऐसे लोगों को केन्द्र या किसी राज्य की तरफ से ऐसा करने के लिए कहा नहीं गया रहता है, लेकिन सामाजिक जवाबदेही के तहत बहुत से लोगों को लगता है कि हिंसा या जुर्म के खिलाफ अगर कोई रास्ता निकल सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए। दुनिया भर में बहुत से जनसंगठन, सामाजिक आंदोलन इसी तरह की मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं, और उनकी वजह से बहुत से रास्ते भी निकलते हैं।
ऐसी तमाम बातचीत, चाहे वह भाईयों के बीच जायदाद के बंटवारे का झगड़ा हो, या किसी कारोबार के भागीदारों के बीच का विवाद हो, दो देश, दो प्रदेश, या दो विचारधाराओं के बीच का तनाव हो, ऐसे तमाम मामलों में बातचीत का सिलसिला कभी भी खत्म नहीं करना चाहिए, चाहे दोनों तरफ से गोलियां ही क्यों न चल रही हों, चाहे दोनों तरफ से आतंकी हमले ही क्यों न हो रहे हों। किसी भी सरकार को किसी हमले के खिलाफ पुलिस या फौजी कार्रवाई करने का पूरा हक रहता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई से परे बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहिए। जब कभी बातचीत के पहले कोई शर्त जोड़ दी जाती है, तो उससे एक संभावना खत्म हो जाती है। इसका एक और पहलू यह है कि जब दो देशों के बीच सरहद पर तनाव होता है, तो एक-दूसरे की फिल्मों, कलाकारों, खिलाडिय़ों और मैचों पर रोक लगाकर अमन की गुंजाइश को कम ही किया जाता है।
आज अगर यशवंत सिन्हा भाजपा के भीतर भी भाजपा लीडरशिप और प्रधानमंत्री मोदी के काम के तरीकों के आलोचक हैं, तो भी उनकी इस पहल को महत्व देने की जरूरत है और कश्मीर में अमन की वापिसी का रास्ता इसी तरह की गैरसरकारी पहल से निकल पाएगा। आज कोई अगर यह माने कि कश्मीर के अलगाववादियों से कोई बात नहीं की जाएगी, और इसी शर्त पर वहां के बाकी लोगों से बात की जाएगी, तो यह कोई समाधान नहीं हो सकेगा। बात खुले दिल से, खुले दिमाग से, खुली बाहों से गले लगाने की तैयारी से, और बिना किसी शर्त के होना चाहिए, और ऐसी बातचीत ही वो समाधान निकाल सकती है जो कि फौजी बंदूकें नहीं निकाल सकतीं। हम बार-बार छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों को भी यही सलाह देते आए हैं जो कि नक्सल हिंसा के शिकार हैं। इन सरकारों को भी नक्सलियों से बिना किसी शर्त के बातचीत करनी चाहिए, और ऐसी बातचीत के साथ-साथ सरकार जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए पुलिस कार्रवाई जारी भी रख सकती है। बातचीत का ही नतीजा था कि अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए अर्जुन सिंह ने चंबल के डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया था, और उस वक्त जो डकैत चंबल के बीहड़ों में पुलिस से अधिक बड़ी ताकत रखते थे, वे आज नोट बदलवाने एटीएम की कतार में लगे हुए दिख रहे थे। इसलिए बातचीत की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए। 

डिजिटल तकनीक इस्तेमाल में सावधानी सिखाना जरूरी

संपादकीय
10 दिसंबर 2016


एक खबर है जिसकी सच्चाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तान के डिजिटल-राह पर बढऩे में एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। एक किसी छोटे दुकानदार ने पेटीएम से भुगतान लेना शुरू किया, और जब उसने अपने बैंक खाते में रकम डालने की कोशिश की, तो साढ़े 17 लाख रूपए की रकम गायब हो गई। ऐसी चार घटनाएं, और उसकी चार लाख जगहों पर पढ़ी गई खबरों से हो सकता है कि लोग कैशलेस होने का इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन ये खबरें आती हैं कि किस तरह किसी के एटीएम कार्ड से जालसाजी हो गई, और उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुट गई। जब लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता की तैयारी डिजिटल होने की नहीं है, तब आंधी-तूफान की रफ्तार से डिजिटलीकरण के खतरे कम नहीं हैं। और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही जहां मुख्यमंत्री ने यह तय किया है कि कुछ महीनों में ही दस लाख लोगों को डिजिटल लेन-देन के हिसाब से तैयार किया जाएगा, तो ऐसी कई तरह की ठगी के बारे में भी सोचना होगा। और लोगों के घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसी की भी जानकारी को हासिल करना भी आसान है, और उसे लूट लेना भी आसान है। दो दिन पहले ही इस मुद्दे पर हमने यह लिखा है कि केन्द्र सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देन में जो लोग ठगी या जुर्म के शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करने के लिए एक बीमा योजना लाई जाए, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनता के हितों के खिलाफ जाएगा।
आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में साइबर जुर्म से निपटने के लिए पुलिस भी तैयार नहीं है, और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमों तक पहुंचकर लूट को वापिस लाने के मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगों के डिजिटल-शिक्षण के काम को युद्धस्तर पर शुरू कर रही है, तो पहले से ही लोगों को सावधानी सिखाना जरूरी है, और ऐसा सिखाने वाले लोगों को भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वे खुद समझें, और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले, फोन से भुगतान करने वाले लोगों को समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकों को संगठित रूप से सिखाने का मौका भी आसान नहीं होगा। और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है, तो ऐसे में किसी छोटे दुकानदार को प्रशिक्षण के लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह का होगा। इसलिए सरकार को अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्क से भी लोगों को जुर्म से सावधान रहने का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वे भी अपने बचपन से पहले सिक्के, और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आए हैं। और इसलिए वे इसमें धोखे से आमतौर पर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारों में जब साइबर धोखाधड़ी की खबरें पढ़ते हैं, तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगों को मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोन से भुगतान जैसे कई चीजों की तरफ मोड़ा जा रहा है, तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों का भरोसा इस नई तकनीक पर अगर बैठ नहीं पाया, तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा, और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे। 

फौज के मुद्दों का राजनीतिकरण पर्रिकर को सलाह का क्या हक?

संपादकीय
9 दिसंबर 2016


प्रतिरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को चिट्ठी लिखकर कहा है कि सेना को राजनीति में घसीटना ठीक नहीं है। उन्होंने कुछ दिन पहले कोलकाता में सेना के एक अभ्यास पर ममता बैनर्जी की आपत्ति करने के सिलसिले में यह बात लिखी है। ममता का आरोप था कि राज्य सरकार की इजाजत के बिना सड़कों पर सेना की ऐसी तैनाती उनकी सरकार को पलटने की साजिश है। पर्रिकर ने इसे सेना के नियमित अभ्यास का हिस्सा बताते हुए कहा है कि सेना को राजनीति में खींचना गलत है। इस चिट्ठी के बारे में ममता की तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद डेरेक ओ ब्रायन का कहना है कि यह चिट्ठी अभी तक ममता तक पहुंची भी नहीं है और इसे मीडिया को लीक कर दिया गया है, तो यह राजनीति कौन कर रहा है?
पिछले कुछ महीनों में सेना को लेकर राजनीति करने की कई बातें हुई हैं। इसमें सबसे बड़ी और पहली घटना रही भारत द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राईक करने का दावा जिसका कि पाकिस्तान आज तक खंडन करता है। इस फौजी कार्रवाई को अभूतपूर्व कहा गया और पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी ने इसे लेकर जश्न सरीखा मनाया, उनके कार्यकर्ता सड़कों पर निकले, और कुछ ऐसा माहौल बनाया गया कि मानो पाकिस्तान को निपटा दिया गया है। इसे लेकर चुनाव के मुहाने पर खड़े उत्तरप्रदेश में भाजपा के नेताओं ने पोस्टर लगाए, और जब तक रिटायर्ड फौजी और दूसरी पार्टियों के लोग यह गिनाते कि इसके पहले भी सर्जिकल स्ट्राईक होते आई हैं, इसे मोदी की बहुत बड़ी कामयाबी साबित करने की कोशिश चलती रही। कुछ समझदार लोगों ने यह कहा भी कि अगर फौज का सम्मान करना है, तो इस फौजी कार्रवाई का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, और अगर इसे कामयाबी भी मानना है, तो इसे एक फौजी कामयाबी ही मानना चाहिए। दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ से लगातार हमले चलते रहे, और इस सर्जिकल स्ट्राईक के बाद भी तकरीबन रोज ही औसतन एक या अधिक हिन्दुस्तानी सैनिक या नागरिक मारे जा रहे हैं। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि अगर उस सर्जिकल स्ट्राईक के लिए मोदी को तारीफ देनी है, तो उसके बाद के पाकिस्तानी हमलों में हुई मौतों की जिम्मेदारी किसे दी जाए?
फिर इसके बाद कुछ दिन पहले हमने गोवा की चुनावी सभा को लेकर मनोहर पर्रिकर के भाषण पर लिखा था कि जिस अंदाज में वे अपने गृहप्रदेश जाकर लोगों के सामने भड़काऊ दावे कर रहे हैं, वह बात देश के प्रतिरक्षा मंत्री के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने तो वहां जाकर यह घोषणा तक कर दी कि वे अब बिना बुलेटप्रूफ शीशों वाली कार में चलेंगे, और जिसे मारना है आकर मार दे, और पाकिस्तान पर हमले के बारे में भी उन्होंने कई तरह की बातें कहीं। प्रतिरक्षा मंत्री जब भारत सरकार के घोषित और औपचारिक फैसलों से परे जाकर नारों की जुबान में देश की विदेश नीति से जुड़ी हुई बातों पर हमलावर बयान देते हैं, तो वह चुनावी सभा की राजनीति भर रहती है, वह देश के भले का काम नहीं रहता। यह बात आज मनोहर पर्रिकर को याद दिलाना इसलिए जरूरी है कि वे आज ममता से शिकायत कर रहे हैं कि फौज को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। हमारा भी यह मानना है कि फौज को लेकर या सरकार के किसी भी नियमित काम को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। और इस बारे में सभी पार्टियों के लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने चुनावी फायदे के लिए ऐसी खोखली बयानबाजी करने, पोस्टर और बैनर लगाने, होर्डिंग सजाने से कैसे बच सकते हैं। फिलहाल प्रतिरक्षा मंत्री की बंगाल की मुख्यमंत्री को यह नसीहत खोखली लगती है, क्योंकि वे ममता से कहीं अधिक राजनीतिकरण फौज का कर रहे हैं। 

नोटबंदी की तबाही के बीच भी फायदे की संभावना बाकी

संपादकीय
8 दिसंबर 2016


अब जब नोटबंदी को महीना पूरा हो चुका है, और करीब तीन हफ्ते तक तो इसका चलना तय है ही, तो फिर अब इसे लेकर मोदी सरकार से जवाब-तलब एक अलग बात है, एक दूसरी बात यह है कि अब जो हो चुका है, उससे सबक लेकर और आगे इसका क्या फायदा उठाया जा सकता है। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें राख के ढेर से भी कुछ अच्छी चीज उठकर खड़ी हो पाती है। लोगों को याद होगा कि एक वक्त गुजरात के सूरत शहर में प्लेग फैला था, और वहां पर लगातार मौतें हो रही थीं, लेकिन उस हादसे ने उस शहर को यह मौका दिया था कि वह अपनी गंदगी दूर करके साफ हो सके। नतीजा यह निकला कि आज वह देश के एक साफ-सुथरे शहर में गिना जाता है। इसी तरह अब जब नोटों की किल्लत ने लोगों में दहशत पैदा कर ही दी है, करोड़ों लोगों के दर्जनों दिनों के रोजगार छीन ही लिए हैं, तो अब कुछ ऐसा करने की सोचना चाहिए जिससे कि आगे चलकर कभी ऐसी दिक्कत न हो। मोदी सरकार के किए हुए पर जनता अगले चुनावों में मनचाहा फैसला लेगी, लेकिन फिलहाल केन्द्र और राज्य सरकारों को, समाज और कारोबार को, जनता को यह समझने की जरूरत है कि बिना नगदी के काम करने से देश और लोगों का क्या भला हो सकता है। और यह भी कि भला हो भी सकता है या नहीं, या उसमें क्या-क्या खतरे हो सकते हैं, उसके क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं।
आज पूरे देश में राज्य सरकारें जगह-जगह बिना नोटों के किसी कार्ड से या मोबाइल फोन से भुगतान को बढ़ावा दे रही हैं। लेकिन आज भी अखबार ऐसी खबरों से रंगे हुए हैं कि पढ़े-लिखे नौकरीपेशा लोग भी किस तरह टेलीफोन पर ठगी और जालसाजी के शिकार हो रहे हैं, किस तरह लोग एटीएम कार्ड का फ्रॉड कर रहे हैं, किस तरह झारखंड का एक पूरा गांव ही ऐसा है जहां पर हजारों लोग केवल टेलीफोन पर ठगी और धोखाधड़ी का काम करते हैं। ऐसे में इस देश के करोड़ों अनपढ़, बुजुर्ग, और तकनीक को न जानने वाले लोग किस तरह धोखा खाने के खतरे में जिएंगे, इसको भी देखने की जरूरत है। टेक्नालॉजी अपने आपमें एक अच्छी चीज है, लेकिन देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसके लिए तैयार है या नहीं, इसको समझना होगा, और क्या सरकार साइबर-धोखाधड़ी को रोकने के लिए तैयार है, यह भी अंदाज लगाना होगा। अभी दो दिन पहले ही यह खबर आई है कि रूस के बैंकों से अरबों की रकम घुसपैठियों ने ऑनलाईन ही निकाल ली है, तो ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के खतरे हिन्दुस्तान की जनता पर नहीं रहेंगे। अगर भारत में ऐसी व्यवस्था लागू करनी है, तो केन्द्र सरकार को इसके लिए एक ऐसी बीमा योजना भी लागू करनी चाहिए जिससे कि किसी भी तरह की साइबर-ठगी, या ऑनलाईन-जुर्म के शिकार लोगों के नुकसान की भरपाई हो सके।
आज देश में मोबाइल फोन या क्रेडिट-डेबिट कार्ड से भुगतान करने की एक नई जागरूकता आई है। हम यह बात लिखते हुए मोदी सरकार के इस फैसले का मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं, लेकिन आज की जो हकीकत है, उसी पर लिख रहे हैं। हकीकत यह है कि अधिक से अधिक छोटे-छोटेे कारोबारी भी भुगतान के लिए मशीनों और मोबाइल फोन की तरफ जा रहे हैं, और धीरे-धीरे हो सकता है कि आम जनता भी इसका इस्तेमाल करने लगे। और नोट बंद तो हो नहीं रहे हैं, जिनको ऐसे भुगतान नहीं करने हैं, उनके लिए नोट भी खुले ही रहेंगे, और धीरे-धीरे लोग अपनी प्राथमिकता तय कर पाएंगे। आज देश में बड़े पैमाने पर डिजिटल-ट्रेनिंग की जरूरत है, ताकि बैंकों के ग्राहक और बाजार में लेन-देन करने वाले लोग बिना नोटों के काम चला सकें, और मौजूदा नोटबंदी के सारे नुकसानों के बाद भी ऐसी नौबत का यह एक फायदा भी उठाया जा सकता है, और अगर ऐसा हो सका, तो इस पूरे महीने के नुकसान की एक अलग तरह की भरपाई हो सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट को आजम खान के माफीनामे पर रूकना नहीं चाहिए

संपादकीय
7 दिसंबर 2016


उत्तरप्रदेश के बड़बोले समाजवादी नेता और मंत्री आजम खान का माफीनामा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। बलात्कार की शिकार एक लड़की के बारे में आजम खान ने बहुत ही गंदा बयान सार्वजनिक रूप से मीडिया में दिया था, और उसके ऊपर जब सुप्रीम कोर्ट से नोटिस मिला, तो आजम खान ने बिना शर्त माफी मांगने का प्रस्ताव रखा। लेकिन अभी जब उनके वकील ने माफीनामा रखा, तो उसने अगर और यदि जैसे शब्द लिखे गए थे, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ऐसे शब्दों के साथ कोई भी माफीनामा बिना शर्त का नहीं माना जा सकता। आजम खान को दुबारा बिना शर्त का माफीनामा दाखिल करने को कहा गया है।
देश की ममता बैनर्जी जैसी महिला नेताओं से लेकर वामपंथी नेताओं से लेकर दक्षिणपंथी नेताओं तक बहुत से लोग बलात्कार के शिकार लड़की या महिला के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसे बयान जारी करते हैं, और उसकी नीयत पर शक करने में उन्हें दो पल भी नहीं लगते। खुद ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनते ही बंगाल के एक बड़े चर्चित बलात्कार को अपनी सरकार को बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश करार दिया था, और इसके कुछ हफ्तों के भीतर ही उन्हीं की पुलिस ने उसी बलात्कार में गिरफ्तारी की, और कुछ महीनों में ही अदालत से उस आदमी को सजा भी हो गई।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम लगातार यह लिखते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भड़काऊ या आपत्तिजनक बातें करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, और अगर इनके खिलाफ कोई व्यक्ति अदालत तक न जा सके, तो अदालत को खुद होकर ऐसे लोगों को नोटिस देने चाहिए, और सजा देनी चाहिए। हमारा तो यह भी मानना है कि ऐसे बयान देने वालों को चुनाव लडऩे के लिए अपात्र करने का भी इंतजाम होना चाहिए, क्योंकि चुनाव ही नेताओं की कमजोर रग रहती है, और उससे कम किसी तरह का नुकसान उनके लिए बहुत मायने नहीं रखता है।
हमने तीन अगस्त को आजम खान के बयान के बाद इसी जगह पर लिखा था- आजम खान ने कहा है कि बलात्कार की इस शिकायत के पीछे राजनीतिक साजिश हो सकती है। आजम खान का यह कहना है कि वोटों के लिए लोग किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं, और जब मुजफ्फरनगर हो सकता है, शामली और कैराना हो सकता है तो यह क्यों नहीं हो सकता। जाहिर है कि ऐसे संवेदनाशून्य बयान पर इस बलात्कार की शिकार नाबालिग के पिता ने जवाब में यह सवाल किया है कि क्या आजम खान के परिवार के साथ ऐसी घटना होती तब भी क्या वे ऐसी बात कहते? भारत में न सिर्फ राजनीति, बल्कि जिंदगी के किसी भी दायरे में ताकत पा जाने वाले लोगों में से कुछ लोग इतने बददिमाग हो जाते हैं, कि वे न सिर्फ बेदिमागी की, बल्कि हिंसा की भी बातें करने लगते हैं। हम पहले भी इसी कॉलम में लिख चुके हैं कि ऐसी हिंसक और ओछी बकवास के खिलाफ मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग जैसे राज्य और केन्द्र के संवैधानिक संगठनों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों को भी ऐसे हिंसक बयानों पर नोटिस जारी करना चाहिए। लेकिन राजनीति में एक-एक करके अधिकतर पार्टियों के लोग गंदगी की बातें करते आए हैं, और हरेक के सामने गंदगी के लिए दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मिसाल मौजूद रहती है। लेकिन हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसे मामलों पर चुप रहने के बजाय खुलकर बोलना चाहिए, और जब कभी ऐसे बकवासी नेता चुनाव मैदान में रहें, उनके खिलाफ एक अभियान भी छेडऩा चाहिए। किसी नेता के पेट पर लात दो ही मौकों पर पड़ सकती है, जब उसका वोट कमाने का मौका हो, या जब उसका नोट कमाने का मौका हो।
लेकिन बलात्कार को भारत में बहुत से लोग कॉर्टून और लतीफों का सामान भी मान लेते हैं और हमारा मानना है कि सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। देश की जनता की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का दीवाला ऐसा निकला हुआ है कि सलमान खान बलात्कार का मजाक बनाता है, और उसकी फिल्म हिट हो जाती है, जो कि जाहिर है कि महिला दर्शकों के बिना नहीं हो सकती, और ऐसे आदमियों के बिना भी नहीं हो सकती जिनको किसी महिला ने जन्म दिया है। इसलिए जब तक देश की जनचेतना हिंसक बयानों के खिलाफ नहीं होगी, तब तक नेताओं की बेशर्मी जारी रहेगी। हम अगर उत्तरप्रदेश या देश के महिला आयोग की कुर्सी पर होते तो आजम खान को नोटिस जारी करते, और अगर उत्तरप्रदेश या देश की सबसे बड़ी अदालत के जज होते, तो भी आजम खान को बिना किसी रिपोर्ट के अदालती कटघरे में खींच लाते।

जयललिता सोचे-समझे शून्य की गारंटी करके गईं हैं...

संपादकीय
6 दिसंबर 2016


तमिलनाडु मुख्यमंत्री जयललिता का गुजरना उस प्रदेश के लिए जिंदा लोगों की जिंदगी का एक युग गुजर जाने सरीखा है। पिछले कई दशकों से तमिलनाडु अम्मा कहे जाने वाली जया के साए में चल रहा था, और सत्ता में न रहने पर भी वे प्रदेश में सबसे अधिक ताकतवर नेता कई मायने में थीं। और आज उनके गुजर जाने पर भारत में ऐसे मौके पर कही जाने वाली एक बात पूरी तरह खरी लगती है कि वे अपने पीछे एक विशाल शून्य छोड़ गई हैं, जिसे कि शायद ही कोई कभी भर सके।
जयललिता का मूल्यांकन करते हुए शायद इसी एक बात को सबसे अधिक अहमियत की बात मानना होगा, क्योंकि उन्होंने पूरी कोशिशों से, और पूरी कामयाबी से अपनी पार्टी के भीतर एक ऐसा शून्य बना रखा था जिसमें कि उनके बाद एक से दस नंबर तक के दर्जों पर और कोई भी नेता नहीं थे, और उनकी पार्टी में किसी भी और नेता की जगह महज जयललिता के पैर हुआ करते थे। इस राज्य के एक इतिहासकार ने अभी यह कहा है कि जयललिता ऐसे दण्डवत अनुयाइयों को न सिर्फ देखना चाहती थीं, बल्कि दुनिया को दिखाना भी चाहती थीं। इसलिए उनकी पार्टी में उनके बाद किसी नेता को पैरों पर खड़ा भी नहीं होने दिया गया, और उनकी तस्वीर को कमीज की जेब से झांकते हुए दिखाना इस पार्टी में जिंदा रहने की एक शर्त की तरह लागू रहा।
लेकिन जयललिता के बहुआयामी व्यक्तित्व की कुछ दूसरी बातों की भी चर्चा जरूरी है। उन्होंने दशकों पहले राजनीति शुरू करने के बाद पलटकर नहीं देखा, और एक महिला होने को उन्होंने कभी अपने आड़े नहीं आने दिया। इसी तरह प्रदेश के गरीबों के लिए अनगिनत सहायता-योजनाओं को लागू करते हुए उन्हें कभी इस बात की परवाह नहीं रही कि अनुपातहीन संपत्ति जुटाने की तोहमत उन पर लगती रहीं, और अदालत से उन्हें इसी बात के लिए सजा भी हुई। अपनी संपन्नता, और लोकप्रियता पाने के लिए विपन्नता की मदद का मिलाजुला काम एक अनोखा मेल था, और देश में शायद ही ऐसी कोई दूसरी मिसाल हो कि राज्य की हर रियायत अम्मा नाम से जुड़कर ही निकले, और पूरे प्रदेश को इस बात का अहसास रहे कि अम्मा से अधिक जनकल्याणकारी और कोई नहीं।
यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि जयललिता ने जनता को रियायतें देने का जो विश्वरिकॉर्ड बनाया है, उससे उनकी जनता का सबसे गरीब तबका सचमुच बड़ा फायदा पा सका, या कि इस राज्य की औद्योगिक कमाई का एक अनुपातहीन बड़ा हिस्सा वोटों के लिए फिजूलखर्च किया गया। तमिलनाडु गरीबों की मदद के लिए सरकारी खर्च से जितनी योजनाएं शुरू की गईं, शायद उतनी योजनाएं देश के बाकी तमाम प्रदेशों में मिलकर भी नहीं बनाई गई होंगी, और इस तरह जयललिता ने जनता को रिझाने का दशकों लंबा एक निरंतर कार्यक्रम चलाया, जो कि एक बिल्कुल ही अलग किस्म का लोकतंत्र रहा।
लेकिन जयललिता के राजकाज के बारे में यह बात भी कहना होगा कि लोकतंत्र के तमाम स्तंभों और उसकी तमाम परंपराओं को खारिज करते हुए भी वे चुनावी राजनीति में एक बिल्कुल ही अलग ही किस्म से  कामयाब रहीं। उनके प्रदेश के सरकारी कामकाज को लेकर बाहर बदइंतजामी की अधिक खबरें सुनाई नहीं देती थीं, और ऐसा माना जाता है कि अपने नेताओं की तरह वे अपनी सरकार के अफसरों से भी पूरी निष्ठा की उम्मीद करती थीं, और समर्पित नौकरशाही की एक अलग मिसाल तमिलनाडु में उन्होंने बनाई।
चलते-चलते आखिरी में उनके बारे में एक बात और कहने की जरूरत है कि वे हिंदुस्तान की अपने कद की अकेली नेता रहीं जिन्होंने दशकों की राजनीति मीडिया के लिए पूरी हिकारत के साथ चलाई। उनकी राजनीति में जनता तक पहुंचने के लिए मीडिया की कोई उपयोगिता नहीं थी, वे अपनी शर्तों पर पे्रस से बात करती थीं, और जनता से सीधे जुडऩे के लिए वे कभी भी अखबारों और टीवी पर आश्रित नहीं रहीं। उनकी राजनीति के अलग-अलग पहलुओं पर आज ही के हमारे अखबार में बहुत से जानकारों के लेख छप रहे हैं, और उन सब पहलुओं का अधिक जिक्र यहां पर करना गैरजरूरी है। कुल मिलाकर जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में एक इतना बड़ा शून्य छोड़ गई हैं, कि उसे भरने में हो सकता है कि उनकी अपनी पार्टी के टुकड़े हो जाएं। लेकिन ऐसे किसी शून्य की आशंका छोड़कर वे नहीं गईं, वे ऐसे शून्य की गारंटी करके गई हैं, और इसे अगर कोई पूरी तरह भर सकेगा, तो ऐसे लोग जयललिता की आत्मा को बेचैन करके छोड़ेंगे।

बच्चों पर बोझ बनता पीएम पद छोड़ दिया न्यूजीलैंड पीएम ने

संपादकीय
5 दिसंबर 2016


न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री पी.एम. जॉन ने आज अचानक घोषणा की कि वे पद से इस्तीफा दे रहे हैं। वे पिछले आठ बरस से प्रधानमंत्री हैं अपनी पार्टी को तीन चुनाव जिता चुके हैं, और यह माना जा रहा था कि वे अगले चुनाव में भी पार्टी की अगुवाई करेंगे। लेकिन उन्होंने यह तय किया है कि वे महज सांसद बने रहेंगे ताकि उनके चुनाव क्षेत्र को एक गैरजरूरी मध्यावधि चुनाव न झेलना पड़े। उन्होंने इस्तीफे की जो वजह बताई है, उसके बारे में भारत के नेताओं को भी सोचना चाहिए। प्रधानमंत्री जॉन ने कहा है कि मेरे बालिग हो चुके बच्चों को अपने पिता के इस काम के चलते हुए बेहद दबाव और दखलंदाजी का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए मैं अपने करीबी लोगों और अपने परिवार के साथ मिलकर यह फैसला ले चुका हूं और 12 दिसंबर को मेरी पार्टी नए प्रधानमंत्री को चुन लेगी।
भारत के बारे में अगर देखें तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई अपने बच्चों का ख्याल करके कुर्सी छोड़ भी सकते हैं। भारतीय राजनीति में लोग अपने बाद अपनी कुर्सी अपने बच्चों को देने के लिए पूरा इंतजाम करने में लगे रहते हैं, और इंदिरा गांधी के वक्त यह नारा चला था कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा। इसी तरह कांग्रेस के उसी दौर में जब नया चुनाव चिन्ह हासिल किया गया, तो गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह को लेकर भी इंदिरा गांधी और संजय गांधी के नाम पर अनगिनत मजाक होने लगे थे। और आज तो देश में बहुत सारे ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जो कि एक कुनबे के भीतर चलते हैं, और पिछले कुछ महीनों से ऐसे एक कुनबे की घरेलू लड़ाई के चलते हुए मुलायम-अखिलेश का झगड़ा देखने लायक भी रहा है।
दुनिया की विकसित सभ्यताएं, और विकसित लोकतंत्र लोगों को कुनबे से ऊपर उठने का मौका देते हैं। भारत में तो किसी वार्ड या पंचायत में भी जब आरक्षण के चलते किसी आदमी को अपनी सीट खोनी पड़ती है, और अगर वह सीट महिला के लिए आरक्षित हो जाती है, तो रातों-रात हलफनामा देकर पत्नी के नाम के साथ पति का नाम जोड़ दिया जाता है, और उसे पार्षद या पंच बनाने का काम शुरू हो जाता है। भारतीय राजनीति में जो ताजा शब्दावली है, उसमें सरपंच-पति को सांप, और पंच-पति को पाप भी कहा जाने लगा है, और यह कुनबापरस्ती कम होते दिखती नहीं है। फिर ऐसा भी नहीं है कि परिवार को आगे बढ़ाने का काम सिर्फ क्षेत्रीय दल के मालिक लोग ही करते हैं, बड़ी-बड़ी पार्टियों में परिवार को आगे बढ़ाना एक पूरी तरह से आम संस्कृति मान ली गई है।
न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री की इस मिसाल से बहुत से लोगों को सीखने की जरूरत है। अगर उनको यह तकलीफ है कि उनकी कुर्सी की वजह से उनके बच्चों पर बहुत दबाव पड़ रहा है, और वे ठीक से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, उनके कामकाज में बहुत दखल होती है, तो इसका एक मतलब यह है कि वे अपने बच्चों के कामकाज को भी प्रधानमंत्री के पद के इस्तेमाल से आगे बढ़ाना नहीं चाहते। जिसका कार्यकाल आधा बचा हो, और जिसका अगला चुनाव जीतकर आना पक्का दिख रहा हो, वह इस तरह कुर्सी को छोड़ दे, तो उसका यह साफ मतलब है कि वहां पर कुर्सी का बेजा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी पिछले दिनों ताईवान की राष्ट्रपति से फोन पर बात की, जो कि अमरीकी विदेश नीति के ठीक खिलाफ बात थी। अब ताईवान की मेयर का यह बयान सामने आया है कि कुछ महीने पहले उनसे एक महिला ने आकर यह प्रस्ताव रखा था कि ताईवान शहर के विकास की कुछ बड़ी योजनाओं में ट्रंप की कंपनी कारोबार करना चाहती है। ट्रंप के साथ यह आशंका बनी हुई थी कि अपने कई देशों में फैले हुए कारोबार के चलते उनकी विदेश नीति में हितों के टकराव की बात आएगी, और यह आ भी गई है। ऐसे में न्यूजीलैंड और अमरीका के इन दो नेताओं की सोच के फर्क को देखने की जरूरत है।