बलात्कार की शिकार, अदालत से निराश युवती की खुदकुशी

संपादकीय
31 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक दिल दहलाने वाली खबर है कि गरीब परिवार की एक युवती ने बलात्कार के लंबे सिलसिले के बाद पुलिस में जाने का हौसला दिखाया और मामले के अदालत में चलते हुए न्याय व्यवस्था से निराश होकर उसने खुदकुशी कर ली। यह बलात्कार अस्पताल में एक डॉक्टर और दो पुलिस सिपाहियों ने किया था, और इस युवती की शिकायत के मुताबिक इन लोगों ने उसे वीडियो रिकॉर्डिंग की धमकी दे-देकर महीनों तक बलात्कार जारी रखा। आखिरकार रिपोर्ट होने पर पुलिस ने तुरंत इन तीनों को गिरफ्तार किया, लेकिन अदालत की पांच पेशियों पर जाते हुए, अदालत के रूख को देखते हुए इंसाफ की तरफ से बिल्कुल ही निराश होकर इस युवती ने आखिरी चि_ी लिखी और खुदकुशी कर ली। 
किसी के भी मृत्युपूर्व बयान को मोटे तौर पर सही माना जाता है, इसलिए हम अभी इस युवती के बयान को लेकर अधिक खुलासे में नहीं जा रहे, और इस देश में बलात्कार की शिकार महिला की समाज से लेकर अदालत तक हालत यही रहती है। बड़े कड़वे शब्दों में कहें, तो बलात्कार का विरोध करते हुए, उसकी रिपोर्ट लिखाने वाली महिला के साथ बाद के बरसों में थाने से लेकर अदालत तक और परिवार से लेकर पड़ोस के समाज तक कई बार और बलात्कार हो जाता है। बलात्कार की शिकार महिला को भारतीय समाज में एक मुजरिम की तरह देखा जाता है, और उसके इस हौसले की कोई तारीफ नहीं करते कि उसने एक मुजरिम को उजागर करने का काम किया है जिससे कि वैसे बलात्कारी से बाद में दूसरे लोग बच भी सकें। ऐसे योगदान को गिनने के बजाय लोग बलात्कार की शिकार महिला को ही दागी मानकर चलते हैं, और उसे ही बदचलन करार देते हैं। 
भारत की न्याय व्यवस्था, भारत की जांच एजेंसियां ऐसे तमाम मामलों में संवेदनाशून्य हैं। खुदकुशी करने वाली इस युवती ने अपनी वकील के बारे में भी लिखा है कि उसने भी बहुत निराश किया और लगातार यह समझाने में लगी रही कि उसे इंसाफ मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह बात अगर सही है तो भी अटपटी इसलिए नहीं है कि भारतीय समाज में अधिकांश लोग ऐसी महिला को ठीक यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, और परिवार के भीतर बच्चों के यौन शोषण से लेकर कामकाज की जगह पर महिला के शोषण, या महिला के साथ हुए किसी भी तरह के सेक्स-अपराध को लेकर लोगों का रूख यही रहता है कि बात को बढ़ाने से महिला की ही बदनामी होगी। इसी रूख के चलते सौ सेक्स-अपराधों से किसी एक की ही पुलिस रिपोर्ट होती होगी, और उसी का नतीजा रहता है कि मुजरिम समाज में, घर और पड़ोस में फिर ऐसा ही जुर्म करने के लिए आजाद घूमते रहते हैं। 
भिलाई की इस घटना को लेकर अस्पताल को अपने इंतजाम के बारे में सोचना चाहिए, पुलिस को अपने सिपाहियों के बारे में सोचना चाहिए, अदालत को आखिरी चि_ी में लगाई गई इस तोहमत के बारे में सोचना चाहिए कि पांच पेशियों में पहुंची इस युवती से अदालत में हाजिरी के दस्तखत भी नहीं करवाए गए, और इंसाफ न मिलने का आसार देखकर जुर्म की शिकार एक युवती को खुदकुशी करनी पड़ी। अगर इस मामले को तीन बलात्कारियों को सजा दिलाने तक सीमित रखा गया, तो फिर व्यवस्था को सुधारने की कोई संभावना नहीं होगी। इस मामले को एक नमूना मानकर राज्य सरकार को सभी पहलुओं पर गंभीरता से रिपोर्ट तैयार करवानी चाहिए, महिला आयोग को इसे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए, और अपने अस्तित्व को साबित करना चाहिए। 

इंसानों के सिरों को फूटने की आजादी देना बंद करे सरकार

संपादकीय
30 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में बीती रात फिर एक सड़क हादसे में कई लोग मारे गए। यह बात खबर इसलिए बन रही है कि वहां सरकारी अफसरों के सुबह तक न पहुंचने पर लोगों ने सड़क पर घेरा डाला, और उसकी तस्वीरें खबरों के लिए आईं। वैसे तो राज्य में जगह-जगह हर दिन कई लोग मारे जाते हैं, और खबरें भी अखबारों के उन्हीं इलाकों के संस्करण तक आमतौर पर सीमित रह जाती हैं। जिस तरह देश के प्रमुख शहरों में देश की आबादी के आंकड़े और प्रदूषण के आंकड़े इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर सड़क किनारे दिखाकर लोगों को जागरूक किया जाता है, उसी तरह हर प्रदेश को पिछले चौबीस घंटों में सड़कों पर मौतों के आंकड़े भी दिखाने चाहिए। 
छत्तीसगढ़ के बारे में हम यह कहना चाहेंगे कि पुलिस और परिवहन विभाग आधे-अधूरे मन से कार्रवाई करते हैं, और राजधानी रायपुर में हेलमेट लागू करने जैसे आसान काम को पिछले बरसों में कई बार किया गया, और अधूरा छोड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि लोगों के मन में यह बात घर कर गई है कि हेलमेट पर चालान कुछ दिन होंगे,और उसके बाद इंसानी सिरों को फूटने की आजादी फिर मिल जाएगी। लोगों के बीच जागरूकता की बदहाली ऐसी है कि लोग समझते हैं कि हेलमेट ट्रैफिक पुलिस की जान बचाने के लिए है, और बाकी दुपहिया चलाने वालों के सिर लाईफ टाईम गारंटी के साथ बनकर आए हैं, और किसी हादसे में भी वे फूट नहीं सकते। बेवकूफों की ऐसी बस्ती में सरकार को जिस कड़ाई की जरूरत है, वह गायब है। राजधानी के हर चौराहे पर पुलिस खड़ी रहती है, और अगर एक पखवाड़े भी हेलमेट के लिए कड़ाई से अभियान चलाया जाए, गाडिय़ों को जब्त किया जाए, लोगों के लाइसेंस निलंबित किए जाएं, तो लोगों को अक्ल आ जाएगी। 
मध्यप्रदेश से खबरें आती हैं कि वहां अलग-अलग शहरों में प्रशासन ने यह नियम लागू किया है कि बिना हेलमेट लगाए आने वाले दुपहिया चालकों को पेट्रोल नहीं बेचा जाएगा। अब पता नहीं ऐसा नियम कानून के मुताबिक मुमकिन है या नहीं, लेकिन कानून के मुताबिक जो मुमकिन है, वह काम भी अगर राजधानी में नहीं होता है तो बाकी राज्य में तो उसकी कल्पना करना बेकार है। बार-बार आधे-अधूरे मन से, कमजोर कोशिश के साथ जबकि कोई बदलाव लाया जाता है, तो उसके नाकामयाब होने पर लोगों के मन में उसके लिए एक हिकारत पैदा हो जाती है। छत्तीसगढ़ में हेलमेट को लेकर यही हो रहा है। 
राज्य सरकार को चाहिए कि सड़क सुरक्षा को लेकर साल में एक बार एक हफ्ते का जलसा मनाने के बजाय हर दिन नियमों को कड़ाई से लागू करे, और लोगों की जान बचाए। एक जनकल्याणकारी सरकार को जनता की जान बचाने के लिए कई तरह की कड़ाई बरतनी पड़ती है। जब बिगड़ैल जनता तम्बाकू खा-पीकर अपनी जान देने पर आमादा रहती है, तब भी सरकार को कई तरह के नियम लागू करने पड़ते हैं। हेलमेट और सीट बेल्ट के नियम अगर कड़ाई से लागू किए जाएं, तो लोगों के मन में बाकी तरह का अनुशासन भी अपने आप आएगा। यह इंसानी मिजाज की बात है कि लापरवाही और सावधानी लोगों के दिल-दिमाग में हमेशा सहेलियों के साथ आती हैं। जो लोग सावधान रहते हैं, वे सभी मामलों में सावधान रहते हैं, और हर नियम को मानते हैं। राज्य सरकार बददिमाग और बेदिमाग लोगों पर कड़ी कार्रवाई करके आम जनता के बीच नियमों का सम्मान बढ़ाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करे, इसके बिना आने वाली पीढ़ी अभी से गैरजिम्मेदारी सीख रही है, और सड़कों पर जान भी दे रही है। 

राज्य सरकारें म्युनिसिपलों के लिए दानदाता बनना छोड़ें...

संपादकीय
 29 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की तरफ से संपत्ति कर को डेढ़ गुना करने की घोषणा के बाद विपक्षी कांग्रेस ने आज प्रदेश बंद रखा है, और सरकार के खिलाफ यह एक बड़ा मुद्दा बन रहा है। लोकतंत्र में एक तरफ सरकार को टैक्स बढ़ाकर कमाई करने, और उसे जरूरी कामों पर खर्च करने का एक बुनियादी हक है, और दूसरी तरफ सत्तारूढ़ पार्टी की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह अपने ऐसे काम को तर्कसंगत और न्यायसंगत ठहराने के लिए जनता के सामने अपना पक्ष रखे। दूसरी तरफ एक चौकन्ने विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी होती है कि सरकारी फैसलों से असहमत होने पर उन्हें लेकर सरकार को जनता के बीच घेरे। और संपत्ति कर बढऩे का मुद्दा किसी राजनीतिक कटुता का मुद्दा नहीं है, यह जनता से जुड़ा हुआ एक मुद्दा है, जिस पर सरकार को अपना नजरिया सार्वजनिक रूप से साफ करना ही होगा। 
शहरी विकास हो या गांवों का विकास, वह टैक्स बिना पूरा नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ-साथ दो-तीन मुद्दे जरूरी हैं, एक तो यह कि टैक्स का बोझ उन पर अधिक पडऩा चाहिए चूंकि उसे ढोने की ताकत रखते हैं। शहरों में बड़े और महंगे मकानों पर संपत्ति कर इसी आधार पर तय भी किया जाता है, लेकिन इसे और अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत है, और यह समझने की जरूरत है कि किस तरह संपन्न तबका सड़कों से लेकर सड़क पर गाडिय़ां खड़ी करने तक कई तरह से शहरी-क्षमता का इस्तेमाल करता है। दूसरी बात यह कि सरकार जब वसूले गए टैक्स का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के आरोपों के बिना कर पाती है, तो लोगों को टैक्स देने में उतना दर्द भी नहीं होता। शहरी स्थानीय संस्थाओं में अधिकारी-कर्मचारी से लेकर निर्वाचित लोगों तक ये भ्रष्टाचार की कहानियां रोज ही सामने आती हैं, और ऐसी संस्थाओं द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स देने में लोगों को दर्द अधिक होता है। तीसरी बात यह कि स्थानीय संस्थाओं को अपनी कमाई बढ़ाकर उससे काम चलाना सीखना चाहिए, और यह बात छत्तीसगढ़ सरकार के स्थानीय शासन मंत्री भी बार-बार कह चुके हैं। 
लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से प्रदेश की स्थानीय संस्थाओं के चुंगीकर को बंद करके म्युनिसिपलों की कमाई का एक बड़ा जरिया खत्म कर दिया गया था। उस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर संगठित चोरी होती थी, और कदम-कदम पर गाडिय़ों को रूककर जांच करानी पड़ती थी। उसका खत्म होना तो ठीक हुआ, लेकिन उसके बाद से म्युनिसिपल अनुदान के लिए राज्य सरकारों पर इस तरह मोहताज हो गई हैं कि मानो वे चंदा मांगते किसी के दरवाजे खड़ी हों। हमारा मानना है कि पश्चिमी देशों की तरह स्थानीय म्युनिसिपल को न सिर्फ टैक्स, बल्कि योजना बनाने, और कमाई बढ़ाने के अधिकार बहुत अधिक मिलने चाहिए, और इसी से स्थानीय लीडरशिप की कल्पनाशीलता का उपयोग हो सकेगा। अलग-अलग शहर अपनी कल्पनाशीलता, क्षमता और अपनी मेहनत से अपनी संभावनाओं को पा सकेंगे। और एक शहर दूसरे कामयाब शहर से कुछ सीख भी सकेंगे। 
राज्य सरकारें शहरों पर अपने कब्जे को ढीला करना नहीं चाहती हैं। जबकि सरकार को एक मोटे ढांचे के भीतर जाकर बहुत बारीकी के काम नहीं करना चाहिए। शहरों को अपने हिसाब से विकसित होने का मौका देना चाहिए। विकसित दुनिया में न सिर्फ फायर ब्रिगेड, बल्कि पुलिस भी स्थानीय संस्थाओं के मातहत होती है, और वैसी ही दुनिया अधिक आगे भी बढ़ती है। वहां पर स्थानीय संस्थाओं से निकलकर जो लीडरशिप सामने आती है वह प्रदेश और देश का बेहतर विकास भी कर पाती है। भारतीय सोच यह है कि जिसके हाथ में जो अधिकार आ गए हैं, उनको वे छोडऩा ही नहीं चाहते। अगर स्थानीय संस्थाओं को खुलकर काम करने दिया जाएगा, तो वे राज्य सरकारों के मुकाबले भी अधिक विकास करके दिखा सकती हैं। 
संपत्ति कर बढ़ाया जाए, या नहीं, और बढ़ाएं तो कितना बढ़ाएं, यह सब स्थानीय स्तर पर तय होना चाहिए, न कि राज्य सरकार के स्तर पर। और राज्य सरकार को बुनियादी पैमानों पर देख-रेख करने से परे, म्युनिसिपलों के रोज के कामकाज, उनके छोटे-छोटे मुद्दों में दखल नहीं देनी चाहिए। देश में एक स्वस्थ लोकतंत्र विकसित होने के लिए भी यह जरूरी है। लेकिन जब तक राज्य सरकारें अपने आपको अनुदान देने की दानदाता वाली भूमिका में पसंद करती रहेंगी, शहर विकसित नहीं हो पाएंगे।

धर्मस्थलों पर महिलाओं का बराबरी का हक हो

संपादकीय
28 जनवरी 2016

महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में महिलाओं को कभी दाखिला नहीं मिला, और कुछ महीने पहले एक महिला के वहां चले जाने के बाद जिस तरह से शनि प्रतिमा का शुद्धिकरण किया गया, उसके खिलाफ एक महिला आंदोलन वहां शुरू हुआ है। शुरुआती खबरें ये हैं कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस ने भी आंदोलन का समर्थन किया है और यह विचार व्यक्त किया है कि किसी भी मंदिर में महिलाओं पर रोक नहीं रहनी चाहिए। सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा के साथ ही कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि देश की कुछ प्रमुख दरगाहों में महिलाओं का दाखिला नहीं है, और वहां भी ऐसी ही व्यवस्था की जानी चाहिए।
 हर धर्म के रिवाज अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश में आम अधिकारों को लेकर कानून एक सरीखा है तो धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर भी ऐसी बात कई मामलों में उठती ही है। जब मस्जिदों पर लाउडस्पीकर लगे रहते हैं, तो मंदिरों से भी वैसी ही मांग उठती है, और फिर यह तर्क धरे रह जाता है कि मस्जिद से दिन में कुछ बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए ही आवाज लगाई जाती है, और मंदिरों में कई-कई दिनों का लगातार रामधुन सप्ताह भी होता है। इसी तरह सड़कों के किनारे धार्मिक जगहों के अवैध कब्जे हटाने की बात होने पर लोग एक-दूसरे के धर्म गिनाने लगते हैं। हमारा यह मानना है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को सार्वजनिक जीवन में धर्म के नाम पर होने वाले किसी भी तरह के गलत काम को इसलिए कड़ाई से रोकना चाहिए ्क्योंकि ये मामले आगे बढ़कर धार्मिक उन्माद की हिंसा, और देखा-देखी की साम्प्रदायिकता में भी बदलते हैं। आम जुर्म उतने गंभीर नहीं होते जितने कि धर्म से जुड़े हुए जुर्म होते हैं। इसलिए धार्मिक मामलों में सरकार का नजरिया बड़ा साफ रहना चाहिए, और सभी तरह के धर्मों के सभी गलत कामों के प्रति रियायत को सरकारी धर्मनिरपेक्षता मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। सभी धर्मों के सभी गलत कामों पर कड़ी कार्रवाई ही देश को बचा सकती है। 
जहां तक महिला अधिकारों की बात है तो सभी धर्मों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की तरफ आगे बढऩे की जरूरत है। और धर्म को माने बिना जिन लोगों का काम नहीं चलता उन महिलाओं से तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन जिन महिलाओं का काम धर्म के बिना चल सकता है, उनको धर्म को महत्वहीन मानकर भी चलना चाहिए। धार्मिक स्थल महिलाओं पर बंदिश लगाएं, उसके बजाय महिलाओं को ऐसे धार्मिक स्थलों के बहिष्कार की भी सोचनी चाहिए, और जो लोग महिलाओं के बराबर के हक के तरफदार हैं, उनको भी ऐसे धर्मस्थलों का पूरा बहिष्कार करना चाहिए। जब ऐसी जगहों को चलाने वाले ट्रस्टों की कमाई मारी जाएगी, तब उन्हें महिलाओं और उनके हक के हिमायती आदमियों का महत्व समझ में आएगा। 
फिलहाल हम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के इस मामले में अब तक के रूख की तारीफ करेंगे कि उन्होंने भाजपा के मुख्यमंत्री होते हुए भी हिन्दू धर्म से जुड़े हुए इस मामले में एक उदारता दिखाई है, और प्रगतिशील नजरिए से वे इसे निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। 

दूसरे देशों की संक्रामक महामारी से गंदे हिन्दुस्तान को सीखने की जरूरत

संपादकीय
27 जनवरी 2016

दक्षिण और मध्य अमरीका के कुछ देशों में जीका नाम के एक वायरस के खतरे को देखते हुए लोगों को यह सलाह दी गई है कि वे 2018 तक गर्भधारण न करें। डेंगू की तरह मच्छरों से फैलने वाले इस वायरस से दुनिया के दर्जनों देश खतरे में आ गए हैं, और अमरीका के आसपास के देशों के अलावा कैरेबियन देशों में भी यह बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है, और इससे प्रभावित गर्भवती महिलाओं के बच्चे बहुत छोटे और विकृत सिर के साथ पैदा हो रहे हैं। दूसरी तरफ एक अलग खबर में योरप के डेनमार्क से भी खबर आई है कि वहां एक नागरिक को जीका वायरस से प्रभावित पाया गया है। 
भारत इन इलाकों से खासा दूर है लेकिन भारत भी पिछले बरसों में डेंगू से लेकर स्वाइन फ्लू तक कई तरह की संक्रामक बीमारियों को झेल चुका है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले गुजरात के सूरत में प्लेग ऐसी बुरी तरह फैला था कि लोग वहां से आने वाली गाडिय़ों से लोगों का उतरना भी पसंद नहीं कर रहे थे। और भारत के साथ एक दिक्कत यह भी है कि यहां तीर्थयात्राओं के मौकों पर एक-एक जगह पर लाखों लोग जुटते हैं, और साफ-सफाई की समझ या परवाह हिन्दुस्तानियों में न के बराबर है। लोग जहां पखाना करते हैं, उसी के आसपास खाना भी पकता है और लोग वहीं खा भी लेते हैं। लोग गरीबी में गंदा पानी पीने को बेबस रहते हैं, और खराब हो चुके खाने से भी लाखों लोगों का पेट भरता है। ऐसे में अगर यह कल्पना करें कि जिस तरह मुर्गीखानों में बीमारियां फैलने के बाद एक-एक प्रदेश में दसियों लाख मुर्गियां या तो मर जाती हैं, या मारी जाती हैं, वैसी नौबत अगर भारत में इंसानों के बीच आ जाए तो क्या होगा? 
गुजरात के लोग बताते हैं कि प्लेग के बाद सूरत शहर में इतना साफ रहना सीख लिया था, कि वह लोगों के लिए मिसाल बन गया था। अब उसी गुजरात के नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनकर पूरे देश में सफाई अभियान छेड़े हुए हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी हैं कि गंदगी करने की अपनी अपार क्षमता के पूरे इस्तेमाल से कम और किसी बात पर समझौता नहीं करते। आज अगर हिन्दुस्तानी शहरों में लोग अगर यह सोचें कि वे पैदल चलकर ट्रैफिक जांच और ईंधन की खपत घटाने में मदद कर सकते हैं, तो सड़कों के किनारे आमतौर पर इस कदर गंदगी रहती है कि बदबू के बीच वहां से निकलना मुश्किल पड़ता है। ऐसे देश में जब संक्रामक रोग आकर फैलेगा, तो भ्रष्टाचार से लदी हुई सरकारी दवा खरीदी, बेअसर और निकम्मी सरकारी स्वास्थ्य सेवा किस हद तक किसी महामारी का मुकाबला कर पाएगी यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। आज हिन्दुस्तान इन खबरों को महज पढ़ रहा है कि किस तरह दूसरे देशों में बच्चे विकृत सिरों के साथ पैदा हो रहे हैं, लेकिन जो देश भी गंदा रहता है, वहां कभी भी इस तरह की, या इससे भी बुरी कोई संक्रामक बीमारी आ सकती है, और आने वाली पीढ़ी को जिंदगी भर के लिए कई तरह की बीमारियों के साथ पैदा करके टिकी भी रह सकती है। 
भारत जैसे गंदे देश को अपनी सेहत के लिए न सिर्फ इलाज पर अंधविश्वास से बचना चाहिए, बल्कि सामाजिक और निजी स्तर पर साफ-सफाई की आदत भी डालनी चाहिए। अगर किसी संक्रामक रोग से लाखों हिन्दुस्तानी मारे जाएंगे, तो भी वह सस्ता पड़ेगा, बजाय इसके कि लाखों बच्चे बाकी पूरी जिंदगी के लिए किसी गंभीर बीमारी के साथ पैदा हों। भारत में ऐसी नौबत आने पर लोग इसे पिछल जन्म के पाप से जोड़ देंगे, या यह कहने लगेंगे कि जब धरती की आबादी बढ़ती है तो ईश्वर इसी तरह उसे काबू में करता है। लेकिन ऐसी तमाम बातों के बीच लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे अपनी आने वाली पीढ़ी को गंदगी के साथ-साथ ऐसी महामारी का तोहफा भी देकर जाना चाहते हैं? लोग अपनी अगली पीढिय़ों के लिए जमीन-जायदाद तो जुटाकर जाते हैं ताकि अगली सात पुश्तें आराम से जियें, लेकिन गंदगी और महामारी के बीच जीना भी कोई जीना होगा?

आमिर के बाद अमिताभ, दिक्कत क्या है?

25 जनवरी 2016

भारत में विदेशी सैलानियों को खींचने के लिए बरसों से आमिर खान ब्रांड एम्बेसडर बने चले आ रहे थे। अब उनके साथ अनुबंध खत्म होने के बाद अमिताभ बच्चन को यह जिम्मा दिया गया है। लोगों को यह ताजा मामला याद होगा जब आमिर खान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि देश में असहिष्णुता को देखकर उनकी पत्नी सहमी हुई हैं, और उन्होंने आमिर से पूछा है कि क्या बच्चों के लिए यह देश सुरक्षित रहेगा, या इसे छोड़कर कहीं चले जाना चाहिए। ये शब्द थोड़े से अलग हो सकते हैं, लेकिन बात कुल मिलाकर ऐसी ही थी, और इसके लिए आमिर खान को देश का गद्दार तक करार दे दिया गया था, उनकी फिल्मों के बहिष्कार की घोषणा की गई थी, और सैकड़ों शहरों में उनकी तस्वीरों को जूते मारे गए थे। 
अब सोशल मीडिया और इंटरनेट मीडिया पर लोगों ने अमिताभ बच्चन को कोसना शुरू किया है कि आमिर खान को हटाकर मोदी सरकार ने जो रूख दिखाया है, उसके चलते अमिताभ को यह जिम्मा नहीं लेना था। कुछ लोगों को यह बात तर्कसंगत लग सकती है कि एक फिल्म अभिनेता को इस तरह हटाने, या जारी न रखने के मामले में दूसरे अभिनेता को यह जिम्मा नहीं लेना था। लेकिन बातों को तर्कसंगत या न्यायसंगत तरीके से देखना सीखना चाहिए। व्यक्ति और मुद्दे तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन इंसाफ का नजरिया बने रहना अधिक जरूरी होता है। 
पहली बात तो यह कि आमिर खान ने चाहे सार्वजनिक मंच से अपनी एक घरेलू बात का जिक्र किया हो, उस बात को देश के साम्प्रदायिक तबके ने गलत तरीके से लिया, और उसका एक बिल्कुल बेइंसाफ विरोध शुरू किया है। जब तक देश के किसी नागरिक ने सचमुच देश से गद्दारी न की हो, और वह किसी अदालत में साबित न हो जाए, तब तक उसे गद्दार कहने वाले लोग लोकतंत्र और इंसानियत के साथ गद्दारी तो करते ही हैं। आमिर को गद्दार कहने वाले तमाम लोग इस पैमाने पर अपने बयान के साथ ही गद्दार साबित हो चुके थे। 
लेकिन वह मुद्दा एक अलग है, और एक दूसरा मुद्दा अब यह आता है कि देश के पर्यटन को बढ़ावा देने का काम किसे दिया जाना चाहिए? आमिर खान ने अपनी घरेलू चर्चा को सार्वजनिक बहस बनाते हुए एक ऐसी छवि देश की बनाई कि यहां असहिष्णुता को लेकर लोगों के बीच घबराहट है। यह बात पूरी तरह सही है, और देश में लाखों लोग यह फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और वे लोग मुस्लिम या अल्पसंख्यक हों, भाजपा या संघ के विरोधी हों, ऐसा भी नहीं है, आम लोग देश में इन दिनों खड़े हुए तनाव को लेकर फिक्रमंद हैं। 
हर देश की जिम्मेदारी यह रहती है कि वह ऐसे तनावों के बीच भी दूसरे देश के सैलानियों को आकर्षित करे। और सरकार की अपनी ऐसी बुनियादी जिम्मेदारी क्या आमिर खान को ब्रांड एम्बेसडर बनाए रखकर जारी रह सकती थी? ब्रांड एम्बेसडर का मतलब ही यह होता है कि किसी की शोहरत, किसी की खूबसूरती, किसी का नाम, किसी का काम, इस्तेमाल करके किसी देश या प्रदेश के लिए लोगों को खींचा जा सके। ऐसा करने के लिए बाजारू कंपनियां भी जिन लोगों को ब्रांड एम्बेसडर बनाती हैं, उनके किसी भी विवाद में फंसने पर आनन-फानन उन लोगों को उस काम से हटा दिया जाता है। 
अब आमिर खान के साथ अनुबंध पूरा हो चुका था। सरकार को किसी नाम पर फैसला लेना ही था। ऐसे में जब आमिर खान एक विवाद, चाहे जायज, चाहे नाजायज, में फंसे हुए थे, तो यह बात जाहिर है कि वे भारत के नाम को दूसरे देशों में बढ़ावा देने के लिए सबसे सही व्यक्ति तो नहीं थे। और ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी यह बनती है कि वह किसी विवादहीन को यह जिम्मा दे, जो देश की हालत या आलोचना के साथ जुड़ा हुआ न दिखता हो। ऐसे में आमिर की जगह अमिताभ को लाने का सरकार का फैसला गलत नहीं कहा जा सकता, और आमिर को ही वह काम जारी न रखकर अमिताभ को दिया गया काम मंजूर करके अमिताभ ने कुछ गलत नहीं किया। यह न तो एक अभिनेता को बेरोजगार करके उसका काम छीनने जैसे बात है, और न ही आमिर ने इसे मुद्दा बनाकर किसी से यह अपील की थी कि उन्हें ब्रांड एम्बेसडर आगे भी रखा जाए, कोई और यह जिम्मा न ले। 
किसी सरकार या बाजार के लिए ही नहीं, बहुत से गैरसरकारी संगठन भी ऐसे होते हैं जो कि अपने मुद्दों के प्रचार-प्रसार के लिए किसी खिलाड़ी को, या किसी फिल्मी सितारे को ब्रांड एम्बेसडर बनाते हैं, और ऐसे लोगों के किसी भी विवाद मेें फंसने पर जब उनको हटाया जाता है तो वे खुद भी विवाद को आगे नहीं बढ़ाते, जैसा कि आमिर ने भी इसे आगे नहीं बढ़ाया।
दरअसल मोदी सरकार की आलोचना में लगे हुए चौकन्ने और जिम्मेदार लोग हर बात पर आलोचना करके कभी-कभी गैरजिम्मेदारी भी दिखा बैठते हैं। ऐसे ही लोग अमिताभ बच्चन को बहुत मतलबपरस्त कह रहे हैं कि उन्होंने भारत का ब्रांड एम्बेसडर बनना क्यों मंजूर कर लिया? किसी अखबार के संपादक का अनुबंध पूरा हो जाए, और उसे आगे न बढ़ाया जाए, तो क्या कोई दूसरा उसका संपादक न बने? किसी क्रिकेट टीम में किसी एक खिलाड़ी को आगे जारी न रखा जाए, तो क्या दूसरे खिलाड़ी उस टीम में शामिल ही न हों?
आज भारत में बहस में शामिल लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर अपनी खुद की विश्वसनीयता को खोकर भी अपनी असहमति को जताना चाहते हैं। मोदी के भक्त और मोदी के विरोधी तबके अपने-अपने पूर्वाग्रहों के साथ देश के हर मुद्दे को इन दो खेमों में बांटने में लगे रहते हैं। एक खेमा दूसरे को भक्त कहता है, फेंकू कहता है, और दूसरा तबका इन लोगों को सिक्यूलर (मानसिक बीमार सेक्युलर) साबित करते रहता है। इनके बीच तर्क और न्याय ये दोनों पिस रहे हैं। ऐसे में इंसाफपसंद एक ऐसा तबका जरूरी है जो दोनों तरफ के हमले झेलने की कीमत पर भी इंसाफ की बात कर सके, और पूर्वाग्रह की इस लड़ाई में खेमेबाजी में न लग जाए। हमारा यह मानना है कि किसी धर्म या विचारधारा, संगठन या मुद्दे के समर्थक भी तभी तक काम के रहते हैं जब तक कि वे अपनी खुद की विश्वसनीयता कायम रख सकें। अपनी साख खोने वाले अपने झंडे की साख को ऊपर नहीं ले जा सकते। 

संविधान की सालगिरह कड़वा एहसास लाती है

संपादकीय
25 जनवरी 2016

भारतीय संविधान के लागू होने की सालगिरह एक बार फिर आ गई। यह संविधान भारत के लोगों को जिन अधिकारों का भरोसा दिलाता है, वे सारे के सारे आज तरह-तरह के खतरों का सामना कर रहे हैं। धार्मिक समानता, अमीर और गरीब के अधिकारों का फर्क, अलग-अलग जातियों के बीच समानता की बात, लोगों के समान अवसरों की बात, ये सब खतरे में हैं। और जो तबके गैरबराबरी को झेल रहे हैं, वे इसकी तकलीफ को समझ रहे हैं, और मन के भीतर उबलते हुए भी उनको यह समझ नहीं आ रहा है कि लोकतंत्र के दायरे में रहते हुए वे क्या कर सकते हैं? 
देश की आर्थिक नीतियां लगातार बड़े पूंजीपतियों की मर्जी की होती चली गई हैं, और जनता के हक वाली खदानें, जमीनें, पानी, जंगल और आसमान, उन सब पर पैसे वालों का जिस तरह का हक हो गया है, उसमें गरीब की कोई आवाज नहीं रह गई, और उसका कोई हक नहीं रह गया। रात-दिन प्रदूषण की चर्चा होती है, उसके सुबूत और आंकड़े सवाल बने हुए खड़े रहते हैं लेकिन सरकारों का कोई काबू कारखानों पर नहीं रहता। धीरे-धीरे करके तमाम शहरी जिंदगी संपन्न तबके के लायक होती चली गई है, और गरीब हाशिए पर जा चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई से लेकर इलाज तक, इन सबका जिस रफ्तार से और जिस अंदाज में निजीकरण हुआ है, संविधान के बराबरी की सोच में अब गरीब कहीं नहीं रह गए। उनके बच्चों के इलाज से लेकर पढ़ाई तक गैरबराबरी झेल रहे हैं। 
संविधान के तहत देश का जो कानून है, वह गैरबराबरी की सबसे बड़ी मिसाल है। ताकतवर लोग अदालतों में और भी अधिक ताकतवर साबित होते हैं, और गरीब शिकायतकर्ता भी अदालतों में मुजरिम की तरह सहमे खड़े रहने को मजबूर रहते हैं। देश की मौजूदा न्याय व्यवस्था में किसी गरीब के इंसाफ पाने की संभावनाएं बहुत बुरी तरह घट चुकी हैं, और वे उतनी ही रह गई हैं, जितनी कि किसी ताकतवर के सजा पाने की हैं। लेकिन यह सब लोकतंत्र के नाम पर, और लोकतंत्र कहे जाने वाले ढांचे के भीतर ही इस तरह से हुआ है कि बिना खून बहाए लोकतंत्र के साथ हिंसा हो गई, गरीबों के तन-मन पर जख्म आ गए, और यह सब जुर्म की तरह दर्ज भी नहीं हो रहा है। 
भारत के लिए लोकतंत्र से बेहतर और कोई व्यवस्था हो नहीं सकती थी, हो नहीं सकती है, लेकिन लोकतंत्र के लचीलेपन का सारा इस्तेमाल जब ताकतवर तबके मिलकर अपने वर्गहित में कर रहे हैं, तो फिर संविधान की सालगिरह का क्या मतलब रह जाता है? हमारे पास मनाने के लिए इससे बेहतर और कोई बात है नहीं, लेकिन मनाने की यह नौबत भी भला किसी जश्न की नौबत है?

भारत में निराशा-हताशा, और आत्महत्याएं घटें भी तो कैसे?

संपादकीय
24 जनवरी 2016

दक्षिण भारत में एक मेडिकल कॉलेज की तीन छात्राओं ने कल प्रबंधन से नाराज होकर एक साथ कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में आज ही सुबह के अखबार दो बच्चों की अलग-अलग आत्महत्या की खबरों के हैं, एक को स्कूल न जाने पर मां-बाप ने डांटा तो उनके जाते ही उसने फांसी लगा ली, और एक दूसरी स्कूली बच्ची ने स्कूल से घर लौटते ही आग लगाकर जलते हुए छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। इन सब घटनाओं का एक-दूसरे से लेना-देना नहीं है, लेकिन हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र की दलित मुद्दों को लेकर की गई आत्महत्या के बीच ऐसी खबरें बच्चों और नौजवानों में निराशा और हताशा, और आत्महिंसा के बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं। 
हैदराबाद में जब एक दलित मां के बेटे ने आत्महत्या की, और दलित मुद्दों पर की, तो कई लोगों ने उसे कोसते हुए यह भी लिखा कि अगर वह हौसलेमंद था, तो उसे व्यवस्था से लडऩा था, न कि आत्महत्या करना था। यह बात तमाम आत्महत्याओं पर लागू होती है, और किसी पर सरकार की व्यवस्था, किसी पर स्कूल-कॉलेज की व्यवस्था, और किसी पर समाज-परिवार की व्यवस्था का तनाव या दबाव रहता है। अब सवाल यह है कि किस पर कितना दबाव था, और उसे बर्दाश्त करने की कितनी क्षमता रहनी थी, क्या-क्या करना था, और निराश-हताश को क्या-क्या मदद मिली, ये तमाम बातें हर खुदकुशी में अलग-अलग होती हैं। यह बात तो तय है कि फिल्म या टीवी देखकर नकल में चूक से आत्महत्या कर बैठे कुछ बच्चों की बात को छोड़ दें, तो बाकी तमाम लोग परले दर्जे के तनाव या निराशा, या गुस्से और उत्तेजना में से किसी एक या एक से अधिक बातों के साथ आत्महत्या करते हैं। हमारा यह मानना है कि ऐसी आत्महिंसा करने वाले लोगों के आसपास के लोग कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी पूरी न करने के जिम्मेदार रहते हैं, वह चाहे दफ्तर की बात हो, स्कूल-कॉलेज की बात हो, या समाज-परिवार की बात हो। अगर साथ के लोग मदद करें तो ऐसा तनाव नहीं आ सकता है। अधिकतर आत्महत्याएं टालने के लायक होती हैं, और समय रहते हमदर्दी या सलाह-मशविरे से उनको रोका जा सकता है। 
भारत में एक समय तो पारिवारिक या सामाजिक सलाह-मशविरे की जगह थी, लेकिन शहरीकरण बढऩे के साथ, पीढिय़ों का फासला बढऩे के साथ, परिवारों के छोटे होते जाने के साथ अब वह नौबत नहीं रही। ऐसे में अगर कोई पेशेवर मनोचिकित्सक या परामर्शदाता की मदद लेने की भी सोचे, तो भी भारत में ऐसे शिक्षित-प्रशिक्षित चिकित्सक या मनोविज्ञानी गिनती के हैं। दरअसल सरकार और समाज ने पिछली आधी सदी में कभी यह अंदाज नहीं लगाया कि समाज में तनाव धीरे-धीरे बढ़कर कितना हिंसक हो जाएगा, और उसमें कितनी मदद की जरूरत रहेगी। आज बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी इक्का-दुक्का मनोचिकित्सक रहते हैं, और दस-बीस लाख की आबादी के शहर में दस-बीस मनोचिकित्सक भी नहीं रहते। हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य का एक नमूना देखें तो यहां ढाई करोड़ आबादी पर ढाई सौ मनोचिकित्सक भी नहीं हैं। 
आज जरूरत है देश के विश्वविद्यालयों में मनोचिकित्सकों, और मनोविज्ञानी परामर्शदाताओं के कोर्स बढ़ाने की, ताकि धीरे-धीरे समाज में यह जरूरत पूरी हो सके, और न सिर्फ आत्महत्याएं, बल्कि  तमाम तरह की हिंसा, हर तरह के तनाव को घटाने में मदद मिल सके। यह एक लंबी तैयारी की बात है, और तकलीफ यह है कि हिन्दुस्तान में इसकी चर्चा भी नहीं होती। 

लोकतंत्र में जनता को इतिहास जानने का हक

संपादकीय
23 जनवरी 2016

मोदी सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी हुईं और आजादी के बाद से अब तक गोपनीय रखी गईं फाइलों को सार्वजनिक करने का काम शुरू किया है। कुछ फाइलें कुछ महीने पहले जनता के सामने रख दी गई थीं, और आज नेताजी की जयंती पर करीब सौ फाइलें और जारी कर दी गई हैं। इस देश में आजादी के पहले से कांग्रेस की राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम इन दोनों को लेकर नेहरू और सुभाष के बीच एक अंतहीन टकराव चलते आया था, और वह इतिहास में बड़ी अच्छी तरह दर्ज भी है। इसके बाद सुभाषचंद्र बोस की रहस्यमय मौत, या उनके गायब होने को लेकर नेहरू पर प्रत्यक्ष या परोक्ष तोहमतें लगती रहीं, और भारत के नेहरू-विरोधियों का यह पसंदीदा डंडा रहा जिसे साल में दो बार चलाने का मौका आते रहा है, और आते रहेगा। 
हम सुभाष या नेहरू के बीच के आपसी विरोध या उनकी प्रतिद्वंदिता, या उनकी कटुता की बात किए बिना भी इस बात के हिमायती हैं कि जो इतिहास ताजा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गोपनीय रखना जरूरी न रहे, उसे तुरंत उजागर कर देना चाहिए। दुनिया के जितने सभ्य और विकसित लोकतंत्र हैं, उनमें यह सिलसिला लगातार चलते आया है। और इसके बाद जब डिजिटल युग शुरू हुआ, तो सरकारों की छुपाई हुई दूसरी बातों को भी विकीलीक्स जैसी संस्थाओं ने उजागर कर दिया, और सरकारों के किए हुए अच्छे या बुरे काम जनता के सामने इस मकसद से रखे कि पब्लिक को सब जानने का हक है। यह बात सही है कि जहां-जहां जानकारी लोगों से छुपाई जाती है, वहां-वहां गलत काम होने का खतरा रहता है, और गलत काम होते ही हैं। भारत में भी सूचना का अधिकार आने के बाद तस्वीर बदल गई है, और अब फाइलों या कागजों पर मनमानी हुक्म जारी करने का सिलसिला धीमा पड़ा है। 
नेहरू या गांधी, या सुभाषचंद्र बोस जैसे लोग अब इतिहास हैं। उनके बीच की बातें, या भारत की जापान और रूस के साथ बातें, आज की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शायद ही कोई खतरा हो। हमारा तो अंदाज यह है कि वह पूरा जमाना चल बसा है, और अब आधी-पौन सदी के बाद उन बातों से किसी का कोई नुकसान अगर हो सकता है तो किसी नेता की झूठी छवि का ही हो सकता है। जो लोग खरे हैं, उनको इतिहास से डरने की जरूरत नहीं रहती है। और फिर गांधी हों या नेहरू, उनका समग्र मूल्यांकन उनके बहुत से काम, फैसलों, को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिए मोदी सरकार की नीयत चाहे जो हो, इससे गांधी और नेहरू की छोड़ी हुई, और अब उनकी नीतियों से दूर भटक चुकी कांग्रेस पार्टी की नियति इन फाइलों के बाद चाहे जो हो, इतिहास के ये पन्ने उजागर होने ही चाहिए, और हर लोकतंत्र का यह हक रहता है कि अपने इतिहास को जान सके।
इस देश में तो वैदिक काल से लेकर आज तक की परंपराओं, और ऐतिहासिक जानकारियों को लेकर विचार-मंथन चलते रहता है। जाति व्यवस्था से लेकर गाय को खाने या न खाने को लेकर भी चर्चा चलती रहती है। ऐसे में सरकार से जुड़ी हुई बातों को छुपाकर रखना अलोकतांत्रिक है। दुनिया भर में द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर, दूसरे देशों पर हमलों को लेकर, दूसरे देशों की महिलाओं को फौजी-वेश्या बनाने जैसे जुर्म को लेकर बड़े-बड़े देश भी अपने ऐतिहासिक-जुर्म मानते जा रहे हैं, कोई माफी मांग रहे हैं, और कोई मुआवजा दे रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने इतिहास को छुपाकर रखने की जरूरत नहीं है, और इससे देश की सुरक्षा को कोई खतरा होते नहीं दिखता है, अधिक से अधिक कोई खतरा अगर इससे खड़ा होगा, तो वह नेहरू की छवि को हो सकता है, और वैसा खतरा एक अच्छा लोकतांत्रिक काम होगा।

कुछ लोग गुजर जाते हैं, बिना कोई शून्य छोड़े, भरीपूरी दुनिया छोड़कर...

संपादकीय
22 जनवरी 2016

देश की विख्यात नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई कल गुजरी, तो वे सौ के करीब पहुंच रही थीं। इतनी लंबी जिंदगी, और दुनिया के कई देशों में सीखना, सिखाना, नृत्य की कई विधाओं में महारथ हासिल करना, यह सब आम बात नहीं है। अपनी बेटी मल्लिका साराभाई के साथ वे हजारों शिष्य-शिष्याओं का एक बहुत समुदाय छोड़ गई हैं। कल उनकी देह के इर्द-गिर्द जब बेटी और बाकी शिष्य-शिष्याएं नृत्य करके उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे थे, तो वह बड़ा अनोखा नजारा था। बहुत से लोग गुजरते हैं, और उनकी उम्र चाहे जो भी हो, उनके चाहने वाले, परिवार के लोग, रोते रह जाते हैं। किसी के गुजरने का दुख-दर्द तो एक स्वाभाविक बात है, लेकिन कुछ जिंदगियां ऐसी रहती हैं, जो शून्य नहीं छोड़ जातीं, एक बहुत ही संपन्न विरासत छोड़ जाती हैं, जो उनके गुजरने के दशकों बाद तक उनकी याद दिलाती रहती है, और उनका सम्मान भी बढ़ाती रहती है।
हर किसी के लिए यह तो मुमकिन नहीं हो सकता कि वे मृणालिनी साराभाई जैसे महान कलाकारों का दर्जा हासिल कर सकें, लेकिन एक मौत के बाद के श्मशान वैराग्य जैसे इस पल पर हमको लगता है कि लोगों को इतनी कोशिश तो करनी ही चाहिए कि उनके जाने के बाद उनका नाम सम्मान से लिया जा सके। बहुत से मामलों में किसी के गुजरने के बाद शोक सभा, या श्रद्धांजलि सभा में मृतक को सम्माननीय साबित करने के लिए लोगों को बहुत बड़े-बड़े सफेद झूठ बोलने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर मृतक की इज्जत बच पाती है। लोग ताकतवर तो हो जाते हैं, मशहूर भी हो जाते हैं, दौलतमंद भी हो जाते हैं, और बड़े ओहदों पर भी पहुंच जाते हैं, लेकिन असली इज्जत के हकदार बनना खासा मुश्किल होता है। और ऐसा करने के लिए किसी कला में पारंगत होना जरूरी नहीं है, जिंदगी में छोटे-छोटे अच्छे काम करते हुए भी लोग ऐसे हो सकते हैं कि उनके गुजरने पर घरवालों के रोने-पीटने से अधिक भी कुछ हो सके, और लोगों के कुनबे, या उनके नौकर-चाकर, या उनके संगठन के लोगों से परे भी उनके कुछ नामलेवा दिखते रहें। 
अच्छे काम करने के लिए किसी ऊंची और लंबी सीढ़ी पर एक साथ चढऩे की जरूरत नहीं रहती है। रोज अगर लोग किसी अच्छे काम की सोचें और रोज कुछ अच्छा काम करते चलें तो भी धीरे-धीरे जिंदगी में उनके किए हुए अच्छे काम की ऐसी लंबी फेहरिस्त बन सकती है कि उनका कुल मिलाकर हिसाब-किताब ही उन्हें महान योगदान के लिए गिन सकता है। और जो लोग सचमुच बड़े और महान बनते हैं, वे बड़े और महान बनने के मकसद को लेकर आगे नहीं बढ़ते, वे अच्छा करते चलते हैं, और महानता आकर उन्हें गले लगा लेती है। जिंदगी में जो लोग जिस काम को कर रहे हैं, जिस दायरे में जी रहे हैं, जिन लोगों के साथ उनका बर्ताव है, उन सब जगहों पर अगर लोग अपने आपको बेहतर बनाने में लगे रहें, बेहतर काम करते रहें, तो दुनिया की तस्वीर बदल सकती है। 

जब कोई दलित नहीं बचेंगे तब बाकी घर भी पहुंचेंगे हमलावर...

संपादकीय
21 जनवरी 2016

भारत में कई जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग लोगों ने इस्तीफे दिए हैं। अभी हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दलित मुद्दों को लेकर एक छात्र की आत्महत्या पर दक्षिणपंथी और बाकी तबकों के बीच एक तनाव खड़ा हो गया है, और उस विश्वविद्यालय से डी-लिट की उपाधि पाने वाले विख्यात कवि अशोक वाजपेयी ने उसे लौटाने की घोषणा की है। दुनिया भर के सैकड़ों प्राध्यापकों ने अलग-अलग देशों से ई-मेल भेजकर इस विश्वविद्यालय और केन्द्र सरकार के दलित-विरोधी रूख को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है। ऐसा पिछले महीनों या बरसों में मोदी सरकार से जुड़े हुए कई फैसलों पर और भी हुआ है, और सरकार के कोई फैसले जनदबाव में बदले नहीं गए हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे प्रतीकात्मक विरोध कोई मायने रखते हैं? सम्मान और पुरस्कार लौटाने से क्या असल जिंदगी पर कोई असर होता है? 
लोकतंत्र दरअसल एक इतनी लचीली व्यवस्था है कि उसमें न तो बातों का सीधा असर होता, और न ही सरकारें ऐसे किसी प्रतीकात्मक विरोध के सामने अनिवार्य रूप से झुकती हैं। लेकिन इसका एक असर जरूर होता है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं को देखने-सुनने, पढऩे वाली जनता अगले चुनावों तक राजनीतिक दलों के बारे में, नेताओं के बारे में, अपना दिमाग बनाते चलती है, और लोकतंत्र में जनता की प्रतिक्रिया की यही रफ्तार हो सकती है। जनता का राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण, उसकी सामाजिक जागरूकता बढ़ाना, उसके सामाजिक सरोकार बढ़ाना, यह सब उन ताकतों की जिम्मेदारी है जिनका लोकतंत्र पर भरोसा रहता है। और तो और जिन नक्सलियों का लोकतंत्र पर कोई भरोसा नहीं है, वे भी लंबे-लंबे बयान जारी करके जनता को अपनी सोच बताते हैं, अपने तर्क देते हैं, और अपनी हिंसा को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं। 
ऐसे में हम तमाम लोकतांत्रिक ताकतों, तबकों, संगठनों, और लोगों की यह जिम्मेदारी मानते हैं कि देश-विदेश के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर वे अपने दायरे में, या इन दिनों के सोशल मीडिया पर, अपनी राय रखें, विचार-विमर्श और बहस में हिस्सा लें, न कि किनारे बैठकर तमाशबीन बने रहें। आज दिक्कत यह है कि तमाशबीन जनता तमाशे को भ्रष्ट और हिंसक हो जाने देती है, अलोकतांत्रिक हो जाने देती है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर चलता है कि तमाशे और तमाशबीन के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। जबकि जो संगीत के या दूसरे किस्म के बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं, उनकी कामयाबी इस पर भी रहती है कि मंच पर मौजूद लोग श्रोताओं या दर्शकों से किस तरह की भागीदारी शुरू कर पाते हैं, लोगों को कैसे शामिल कर पाते हैं। देश के धधकते हुए मुद्दों पर भी जो लोग चुप रहते हैं, वे लोग तमाशबीन से भी गए-गुजरे रहते हैं। जिन लोगों के पास अखबारों में पाठकों के पत्र, या संपादक के नाम पत्र लिखकर भेजने के लिए भी वक्त नहीं रहता है, वे कभी अपने साथ होने वाली ज्यादती को अखबारों में छपवाने के हकदार भी नहीं रह जाते। लोकतंत्र में लोगों को आवाज उठाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, वरना उनके अधिकारों का जनाजा उठाने के लिए तो सत्ता की ताकतें हमेशा तैयार रहती ही हैं। 
हैदराबाद से आज उठे दलित सवालों पर लोगों को सोचने-विचारने की जरूरत है, इस पर बहस में हिस्सा लेने की जरूरत है, जो लोग आज घर बैठे रहेंगे, उनके घर भी हमलावर तब पहुंचेंगे, जब उनके पास मारने के लिए दलित नहीं बचेंगे। क्या आज के हिन्दुस्तानी अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे हमलावरों के हवाले करके जाना चाहती है?

पाकिस्तान की हिंसा को देखें, और भाजपा नेता की बात सुनें

संपादकीय
20 जनवरी 2016

पाकिस्तान के एक विश्वविद्यालय पर हुए तालिबानी हमले में अब तक दर्जनों मौतों की खबर आ रही है, और बड़ा आसानी से हमलावरों ने यह कर दिखाया है। पाकिस्तानी तालिबानी-दहशतगर्दों ने जो किया है, वह दुनिया के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले देश अमरीका में साल में कई बार होता है, और ऐसा कोई हमला भारत में अगर कहीं होगा, तो वह नामुमकिन नहीं रहेगा, और न ही ऐसे किसी हमले को रोकने के लिए किसी देश में पूरे इंतजाम किए जा सकते। पिछले दो दिनों से भारत में हैदराबाद के एक विश्वविद्यालय दलित मुद्दों को लेकर विश्वविद्यालय से निष्कासित छात्रों में से एक की खुदकुशी के बाद एक बेचैनी बिखरी हुई है, और इस बीच केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा के एक बड़े नेता संजय पासवान ने जो बयान दिया है, उस पर गौर करने की जरूरत है।  दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य संजय पासवान ने गंभीर चेतावनी जारी की है। संजय पासवान ने 2014 के चुनावों में पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे की कमान संभाली थी। हैदराबाद के छात्र रोहित की आत्महत्या के मामले में उन्होंने अपनी पार्टी का नाम लिए बिना, जैसे पार्टी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। संजय पासवान ने ट्वीट किया, सत्ता की राजनीति के भागीदारों को रोहित वेमुला प्रकरण को गंभीरता से लेना चाहिए या फिर विरोध, बदला, विद्रोह और प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के इन दो मामलों की तुलना कुछ लोगों अटपटी लग सकती है, लेकिन हम किसी तरह की तुलना करने के बजाय सिर्फ दो मामलों की चर्चा एक साथ कर रहे हैं, और अमरीकी विश्वविद्यालयों की भी। दुनिया के तमाम देशों को यह समझना होगा कि उनकी जमीन पर हिंसा के पीछे कौन सी वजहें हैं। क्योंकि अगर कुछ लोग हिंसा तय कर लेंगे, तो उनको रोकने में दुनिया की खासी बड़ी ताकत लग जाएगी। अमरीका में एक वजह हथियारों की अधिक मौजूदगी मानी जाती है, पाकिस्तान में यह बार-बार सामने आता है कि वहां कट्टरपंथी, धर्मान्ध आतंकी कभी फौज के उकसावे पर, तो कभी धर्म का नाम लेकर थोक में हिंसा करते हैं। पाकिस्तान की फौज भी ऐसे हमलों को रोक नहीं पा रही है, और गनीमत यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबा तनाव चलते हुए भी पाकिस्तान के ऐसे घरेलू हमलों की तोहमत भारत पर नहीं लगाई जा रही क्योंकि वहीं के आतंकी अपना हाथ होने का दावा करते हैं। लेकिन भारत को कुछ दूसरी बातों के बारे में सोचने की जरूरत है। 
जैसा कि भाजपा नेता संजय पासवान ने कहा है कि सत्ता की राजनीति के भागीदारों को रोहित वेमुला प्रकरण को गंभीरता से लेना चाहिए या फिर विरोध, बदला, विद्रोह और प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना चाहिए, यह सामाजिक तनाव भारत में एक खतरनाक मोड़ ले सकता है। हम आए दिन इसी जगह इस बात को लेकर फिक्र करते हैं कि इस देश में जिस हमलावर तेवरों के साथ एक निहायत गैरजरूरी धार्मिक, साम्प्रदायिक, जाति आधारित हिंसा खड़ी की जा रही है, उसकी प्रतिक्रिया अनुपातहीन भी हो सकती है, और कल्पना से परे भी हो सकती है। कहीं दलितों को कुचला जा रहा है, कहीं आदिवासियों को, और कहीं अल्पसंख्यकों को। आज केन्द्र में मोदी सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े हुए बहुत से संगठनों के लोग जिस तरह से एक सवर्ण-ब्राम्हणवादी हिन्दुत्व को खान-पान से लेकर रहन-सहन तक थोपने में लगे हुए हैं, उसकी प्रतिक्रिया धर्मांतरण के रूप में तो सामने आ ही रही है, एक सामाजिक संघर्ष के रूप में भी सामने आ सकती है, जिसमें बड़ी हिंसा का बड़ा खतरा खड़ा हो सकता है। भाजपा के एक दलित नेता ने जिन शब्दों में चेतावनी दी है, कम से कम उसे तो भाजपा को गंभीरता से लेना चाहिए, और अपनी पार्टी की सरकारों के देश-प्रदेश में उसे लागू करना चाहिए, और सहयोगी संगठनों को भी समझाईश देनी चाहिए। पड़ोस के देश में हिंसा की वजहें दूसरी हो सकती हैं, लेकिन हिंसा के वैसे खतरे को इस देश में भी हैं, और जब बहुत से तबकों को भारत में भी लगेगा कि यहां का लोकतंत्र उनके साथ इंसाफ नहीं कर पा रहा है, तो वे भी एक बगावत की तरफ देखने लगेंगे, जैसा कि भाजपा के संजय पासवान ने कहा है। 











































...यह चुप्पी तो चीख से भी अधिक जोरों से दर्ज हो रही

संपादकीय
19 जनवरी 2016

हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय से कई छात्रों को हॉस्टल से निकाल दिया गया था, और मैस में उनके जाने पर रोक लगा दी गई थी।  विश्वविद्यालय के दलित, अंबेडकरवादी छात्रों का वहां पर भाजपा के छात्र संगठन से टकराव चल रहा था, और एबीवीपी की शिकायत के बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने दखल देकर दलित छात्रों को हॉस्टल से निकलवाया था। यह मामला देश में चल रहे कई सामाजिक मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था, और दलित छात्र इन मुद्दों पर अपना अधिकार गिनाते हुए विश्वविद्यालय में ऐसी रोक का विरोध कर रहे थे। इस मामले के बहुत बारीक खुलासे में जाने की यहां पर कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि बात कई मुद्दों की है।
देश में धर्म के आधार पर, जाति या क्षेत्रीयता के आधार पर, खान-पान और उपासना पद्धति के आधार पर, पोशाक और रस्म-रिवाज के आधार पर एक बहुत ही आक्रामक भेदभाव चल रहा है। देश भर में लगातार एक सवर्ण हिंदुत्व की सोच के एक छोटे हिस्से की पसंद-नापसंद खूनी हमलों के साथ लागू की जा रही है। और दुनिया भर में भारत की एक बेहतर तस्वीर बेचने में लगे हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत भर में बढ़ाई जा रही इस असहिष्णुता के खिलाफ पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। उनका पूरा जोर देश की आर्थिक तस्वीर बदलने में है, और उनकी कोशिशों से ऐसा लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था और देश के सामाजिक वातावरण का आपस में कोई लेना-देना नहीं है। यह सोच बुनियादी तौर पर इसलिए गलत है कि इंसानी बदन के हाथ-पैर, आंख-कान अलग-अलग काम नहीं करते, वे सब एक-दूसरे से जुड़े रहकर ही इंसान बना पाते हैं। एक तरफ तो नरेन्द्र मोदी लगातार कमजोर तबकों और बेरोजगारों को अर्थव्यवस्था में जोडऩे की बातें कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं के लोग समाज को बुरी तरह से तोडऩे की बातें कर रहे हैं। और केंद्र सरकार मानो यह मानकर चल रही है कि सामाजिक तनाव को भयानक बढ़ाते हुए भी देश की आर्थिक तरक्की की जा सकती है।
जहां तक देश के दलित तबकों का सवाल है, तो वे तो रोजाना ही कहीं न कहीं कुचले जाते हैं। वे अगर जुबान खोलते हैं, तो उनको कहीं गांव से निकाला जाता है, कहीं मंदिर से, कहीं कुएं से हटाया जाता है, तो कहीं दुनिया से। ऐसे माहौल में मोदी की न तो स्टार्टअप इंडिया योजना कामयाब हो सकती, न जन-धन योजना, और न ही देश का आर्थिक विकास हो सकता। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, ऐसे बड़े-बड़े तबकों के हक लगातार छीनते हुए दुनिया का कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। और अफसोस यह भी है कि इस देश का कानून, इस देश की अदालतें, यहां की संसद, यहां के बड़े-बड़े संवैधानिक आयोग, सामाजिक समानता के नाम पर खाते तो हैं, समानता को लाने के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाते।
जिस तरह दबे-कुचले तबकों से निकलकर आए हुए छात्रों को आत्महत्या के लिए बेबस किया गया है, वह हिंदुस्तान के लिए एक शर्मनाक बात है, और इस पर भी अगर प्रधानमंत्री चुप हैं, तो यह चुप्पी तो इतिहास में चीख से भी अधिक जोरों से दर्ज हो रही है।

अमरीका-ईरान की समझदारी बाकी दुनिया के लिए मिसाल

संपादकीय
18 जनवरी 2016

अमरीका और ईरान के बीच तनाव घटने, ईरान पर से आर्थिक प्रतिबंध हटने, और दुनिया भर के देशों के साथ ईरान के बाजार खुलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम जमीन पर आ गए हैं। आज कच्चा तेल बारह बरस पहले के दाम पर आ गया है, और दुनिया भर में उन देशों की सरकारें इसे लेकर अधिक खुश होंगी, जहां पर तेल के दाम सरकार तय करती है। जहां-जहां निजी कंपनियां सरकारी नियंत्रण से परे यह काम करती हैं, वहां ग्राहक खुश होंगे। कुल मिलाकर ग्राहक या सरकार, जिसकी भी जेब में यह बेतहाशा बचत जा रही है, उसे यह तय करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय चढ़ाव-उतार वाले इस सामान से हो रही बचत का क्या किया जाए? 
हमारी आज की बात दोनों के लिए है, ग्राहकों को भी अगर सीधी बचत हो रही है, तो उनको सोचना चाहिए कि इस अप्रत्याशित बचत को बचाकर वे किस तरह रख सकते हैं ताकि किसी दिन अगर कच्चे तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएं, तो भी वे पेट्रोल-डीजल या रसोई गैस खरीद सकें। दूसरी तरफ सरकारों को भी यह चाहिए कि यह बचत बाकी बजट से अलग रखकर क्या इससे सीधे-सीधे सड़कों का ऐसा ढांचा खड़ा किया जा सकता है जिससे कि देश के लोगों को सहूलियत भी हो, और सड़कों का ईंधन भी बचे? होता यह है कि बचत कब आती है, और कब आदत बिगाड़ जाती है, यह पता भी नहीं चलता। लेकिन कल के दिन अगर खाड़ी के देशों में अमरीका या रूस, या वैसे किसी और देश के हमले से तेल के दाम आसमान पर पहुंच जाएंगे, तो उसके लिए दुनिया के कोई भी देश या ग्राहक तैयार नहीं होंगे। 
तेल के दाम तो इस चर्चा का एक बहाना है, असल बात तो यह है कि लोगों को अपनी निजी जिंदगी में ऐसी हर अचानक बचत का ऐसा इस्तेमाल करना चाहिए जिससे कि बुरे वक्त पर मदद ताक पर धरी रहे। लोगों को नशा छोडऩे, या फिजूलखर्ची छोडऩे से बचत की आदत डालनी चाहिए, और उसे स्वास्थ्य बीमा पर, या बीमारी के वक्त के लिए बचत पर लगाना चाहिए। लोग अगर थोड़ी सी सावधानी से सोचें, तो रोज वे दस-बीस रूपए तम्बाखू या ऐसी किसी और आदत से बचा सकते हैं, जिससे एक तरफ तो सेहत बचेगी, और दूसरी तरफ किसी बीमारी की नौबत आने पर उससे निपटने के लिए रकम भी रहेगी। 
अच्छे और बुरे दिन किसी को चि_ी लिखकर नहीं आते, और अमरीका और ईरान ने समझदारी दिखाते हुए जो अच्छे दिन दुनिया के लिए लाए हैं, उनसे सबक लेते हुए भारत और पाकिस्तान जैसे देशों को भी यह समझना चाहिए कि फौजी तनाव घटने से किस तरह के कारोबार बढ़ते हैं, और सभी देशों की कितनी बचत होती है। तेल के दाम गिरना एक बड़ी बात है, इससे पूरी दुनिया के कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। ऐसी ही समझदारी की जरूरत अफगानिस्तान से भारत तक आने वाली गैस की पाईप लाईन को लेकर दिखाने की जरूरत है, और भारत से लेकर कई दूसरे देशों तक रेल लाईन बिछाने की संभावना पर भी जरूरी है। लोगों के दिमाग अच्छे हो जाएं, तो अच्छे दिन तो अपने आप ही आ जाते हैं। 

उद्यमशीलता, कल्पनाशीलता की राह में सरहदें नहीं बचीं

संपादकीय
17 जनवरी 2016

आज जब मुम्बई की फिल्मों में एक-एक बड़े सितारा कलाकार की फीस सौ करोड़ रूपए तक होने की खबरें आती हैं, और ये खबरें भी आती हैं कि पहले हफ्ते में किस-किस फिल्म ने सौ-सौ करोड़ रूपए कमाकर एक क्लब सा बना लिया है, तो उस बीच यह बात अटपटी लगती है कि अमिताभ बच्चन जैसे बड़े कलाकार को लेकर कुल 35 करोड़ की लागत से एक फिल्म बनी, और उसने पहले ही हफ्ते में अपनी पूरी लागत निकाल ली। और यह कोई प्रयोगात्मक-कला फिल्म नहीं थी, मुम्बई के लोकप्रिय सिनेमा बनाने वाले निर्माता-निर्देशकों ने यह फिल्म बनाई, और इसने फिल्म-उद्योग का एक नए किस्म का समीकरण सामने रखा। आज यह बात मायने इसलिए रखती है कि नए उद्यमियों की उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने कल से स्टार्टअप इंडिया नाम का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया है, और उसका मकसद नई सोच के साथ काम शुरू करने वाले नौजवानों को बढ़ावा देना है। 
आज जो लोग यह सोचते हैं कि परंपरागत तरीके से ही कारोबार चलाया जा सकता है, या घरेलू कारखानों को अगली पीढ़ी बढ़ा सकती है, उनको अमरीकी नौजवान पीढ़ी की उद्यमशीलता देखनी चाहिए। वहां पर रहते हुए एक भारतवंशी नौजवान ने हॉटमेल शुरू किया था जो कि उस वक्त का ई-मेल का सबसे कामयाब और लोकप्रिय माध्यम था। इसके बाद अलग-अलग नौजवानों ने वहां पर तरह-तरह के नए काम किए और कारोबार के इतिहास रचे। अमरीका में एक शरणार्थी परिवार का बच्चा बड़ा होकर स्टीव जॉब्स बना, और उसने एप्पल नाम की कंपनी बनाकर दुनिया के सबसे कामयाब कम्प्यूटर, फोन, संगीत उपकरण बनाए। एक और नौजवान ने फेसबुक नाम की एक नई सोच सामने रखी, और दुनिया के खरबपतियों में शामिल हो गया। इसलिए उद्यमशीलता न किसी के लहू में रहती है, न किसी के डीएनए में, और इसकी सबसे बड़ी कामयाबी एक नई सोच में रहती है। 
अमरीका में उद्यमशीलता को इतना बढ़ावा मिलने की एक वजह यह भी है कि दुनिया में कमाई का सबसे बड़ा रास्ता न तो खदानों से निकलता है, और न ही कारखानों से। न ही मोटी कमाई पारिवारिक व्यापार से होती है, और न ही तेल के कुओं से। इन सबकी संभावनाएं सीमित रहती हैं, लेकिन सोच की कोई सीमा नहीं रहती। जो लोग एक नई सोच से, एक कल्पनाशीलता से काम करते हैं, उनके कामयाब होने की संभावना कम या अधिक हो सकती है, लेकिन जब वे कामयाब होते हैं, तो एप्पल की तरह, या फेसबुक की तरह आसमान पर पहुंचते हैं। अमरीका में बाजार का रूख भी नए एंटरप्रुनर्स के लिए बड़ा हौसले का रहता है। वहां पर पूंजीनिवेशक नए-नए नौजवानों की मौलिक सोच को देखकर उनके साथ पूंजी लगाते हैं, और कहीं वे गंवाते हैं, तो कहीं कमाते हैं। बाजार का यह हौसला अगली पीढ़ी को आसमान तक पहुंचने में मदद करता है। और खतरे लेकर जब नौजवान काम करते हैं, उनके साथ एंजल-इन्वेस्टर कहे जाने वाले पूंजीनिवेशक आ मिलते हैं, तो वह बाजार की कामयाबी बनती है। 
भारत के बारे में हम बहुत ज्यादा आशावादी इसलिए नहीं हैं कि यहां सरकारें किसी भी तरह की कल्पनाशीलता को कुचलने के लिए बड़े-बड़े बुलडोजर लेकर तैनात रहती हैं। फिर भी इन दिनों दुनिया की सरहदें गायब हो चुकी हैं, और कब भारत में सोची गई सोच दुनिया के किसी दूसरे देश में जाकर आगे बढ़ सकती है, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए बड़ी बात नौजवान पीढ़ी के लिए यह है कि उसे कल्पनाशीलता के साथ एक बड़ी सोच रखनी चाहिए, बड़े हौसले रखने चाहिए, और हो सकता है कि उनका साथ देने के लिए पूंजीनिवेशक सात समंदर पार करके यहां आ जाएं, या उन्हें उठाकर उन देशों में ले जाएं जहां सरकारों और बाजारों का रूख कल्पनाशीलता का हिमायती है। 

स्टार्टअप इंडिया के नए नारे भर से कुछ न होगा

संपादकीय
16 जनवरी 2016
मोदी सरकार ने आज एक और महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है जिसे हिन्दी में भी अंग्रेजी नाम ही दिया गया है, स्टार्टअप इंडिया। यह योजना उन नए उद्यमियों के लिए है जो कि पहली बार कोई काम शुरू कर रहे हैं, और कोई नया उद्योग लगाना चाहते हैं या इस तरह का कोई और काम बैंक से कर्ज लेकर शुरू करना चाहते हैं। हम योजना की तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते क्योंकि खबरों में यह जानकारी आ ही रही है, लेकिन क्या इससे सचमुच नए लोगों को कोई मदद मिल सकेगी? प्रधानमंत्री और केन्द्रीय वित्त मंत्री ने इस योजना को शुरू करते हुए कहा है कि बड़े उद्योगों पर लगने वाले टैक्स के भारी-भरकम नियम से ऐसे नए शुरू हो रहे उद्योगों को कई तरह की रियायत मिलेगी ताकि वे शुरुआत में ही दिक्कतों में न उलझें। 
अब सवाल यह उठता है कि अगर सरकारी नियम-कायदे, टैक्स, इन सबमें दिक्कतें हैं, तो उन्हीं को कम करने की बात क्यों नहीं होती? आज देश में जो आर्थिक मंदी चल रही है, उसकी एक वजह उद्योग-व्यापार के प्रति सरकार का नजरिया भी है। आज किसी भी काम को करने में जितना भ्रष्टाचार लोगों को झेलना पड़ता है, एक-एक सरकारी दफ्तर में जिस तरह धक्के खाने पड़ते हैं, एक-एक फाईल रेंगती हुई चलती है, और उसे रोक-रोककर हर टेबिल पर जिस तरह रंगदारी वसूली जाती है, वह हाल भारत के अधिकांश राज्यों में है, और केन्द्र सरकार के दफ्तरों में भी है। केन्द्र और राज्य सरकार ने कामों को तेज रफ्तार करने के लिए जो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम बनाए हैं, उनमें भी अधिकतर यही हाल है, और यही वजह है कि उनमें से बहुत से या तो घाटे में चले गए हैं, या फिर वे निजी क्षेत्र से मुकाबले में पिछड़ रहे हैं। इस देश में न सिर्फ नए लोगों के लिए, बल्कि सभी लोगों के लिए सरकारी कामकाज में नियमों का बोझ घटाने की जरूरत है, और सरकार के प्रतिबंध या रोक तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से ही लागू रखने की जरूरत है। 
भारत में बच्चे के पैदा होने के प्रमाणपत्र से लेकर मृत्यु का प्रमाणपत्र बनवाने तक का काम भ्रष्टाचार से घिरा हुआ है। किसी उद्योग-व्यापार के लिए सरकार इस तरह फंदे और शिकंजे लेकर खड़ी हो जाती है कि मानो नया-पुराना कैसा भी कारोबारी, जुर्म करने की नीयत से बाजार में उतरा है। सरकार के उद्योग-व्यापार को काबू करने के विभाग मनमानी ताकतों से लैस हैं। और आजादी की पौन सदी के करीब पहुंचकर भी सरकारें लाइसेंस राज, इंस्पेक्टर राज खत्म करने के नारे लगा रही हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली बाजार के प्रति उदार नजरिया रखने वाली समझी जाने वाली भाजपा के नेता हैं, लेकिन उन्होंने वित्त मंत्री बनते ही जिस तरह से आयकर के नए जटिल और कड़े नियम लादने की कोशिश की थी, उन नियमों का देश भर में जमकर विरोध हुआ था और उसके बाद उनको प्रधानमंत्री के स्तर से नर्म किया गया। यह सिलसिला हर उस सरकारी कुर्सी के साथ चलता है जिसे थोड़े से भी अधिकार मिल जाते हैं। आधार कार्ड बनाने से लेकर, पेंशन के लिए अपने आपको जिंदा साबित करने तक का सिलसिला लोगों को सरकारी दफ्तरों से नफरत के लिए बेबस कर देता है। और कमजोर तबके पर तो सरकारी कामकाज का नाम भी भारी पड़ता है। 
न सिर्फ स्टार्टअप इंडिया के लिए, बल्कि देश के सभी नागरिकों के रोज के कामकाज के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को, म्युनिसिपलों को अपने नियम, शर्तें, कागजी खानापूरी, इन सबको घटाना चाहिए, दुनिया के तमाम सभ्य देश इनमें कटौती करते हुए ही विकसित हो पाए हैं। अमरीका जैसे देश से भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बड़ी दोस्ती है, और बड़ी मोहब्बत है। वहां पर देश-प्रदेश से लेकर स्थानीय प्रशासन तक के किसी भी फॉर्म पर यह भी डला होता है कि उसे भरने में अंदाजन कितना वक्त लगेगा। और वहां के तमाम फॉर्म पर मांगी गई जानकारी कम से कम रखी जाती है, और एक भी गैरजरूरी जानकारी नहीं मांगी जाती। भारत में सरकार इतनी गैरजरूरी जानकारी मांगती है, कि किसी भी जरूरतमंद का फॉर्म ही पूरा न भरा जा सके, और वह रिश्वत देने को मजबूर हो। छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर लोगों से सुधार के लिए सुझाव मांगे हैं। हमारा पहला सुझाव तो यह है कि कोई भी सरकारी विभाग जनता से ऐसी कोई जानकारी न मांगे, जो कि उसके खुद के किसी विभाग में पहले से है। ऐसे हर बोझ को घटाने के बिना स्टार्टअप तो दूर, मौजूदा उद्योग-व्यापार भी खत्म होने की कगार पर हैं।

कमजोर तबकों से भेदभाव करने वाले धर्म को धिक्कारें

संपादकीय
15 जनवरी 2016

अभी देश की अलग-अलग अदालतों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचा है कि देश के कुछ प्रमुख मंदिरों में महिलाओं के दाखिले पर रोक क्यों है? इसमें महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक के बहुत से मंदिर हैं। इसके पहले दशकों से भारत में यह मुद्दा चले ही आ रहा है कि दलितों को मंदिरों में क्यों नहीं जाने दिया जाता? इस पर छत्तीसगढ़ के पांडातराई से लेकर राजस्थान के नाथद्वारा तक अनगिनत ऐसे मंदिर हैं जहां गोलियों की नौबत आई और लोग मारे गए। दलितों के साथ, महिलाओं के साथ, गरीबों के साथ भेदभाव धर्म के स्वभाव का एक बुनियादी हिस्सा है। जिस तिरूपति में आम लोग कुछ खास त्यौहारों पर तीन-तीन दिन तक लाईन में लगते हैं, वहां पर बच्चनों और अम्बानियों को लेने के लिए पुजारी दरवाजे पर खड़े रहते हैं, और उन्हें प्रतिमा के सामने बिठाकर इत्मीनान से पूजा करवाई जाती है। और यह हाल तब है जब तिरूपति ट्रस्ट का मुखिया प्रदेश का एक बड़ा आईएएस अफसर होता है। लेकिन यह हाल सिर्फ गिने-चुने मंदिरों का नहीं है, देश के अधिकांश धर्मस्थानों पर ओहदे, शोहरत, या दौलत की ताकत के सामने मुल्ला-पुजारी बिछ जाते हैं, और ईश्वर तक ताकतवरों को ऐसे ले जाया जाता है, मानो उन्हें वहीं पर स्वर्ग के बंगले की चाबी दी जाएगी। 
भारत के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि हिन्दू समाज में सवर्ण और ब्राम्हण तबकों की दबंगई के चलते अंबेडकर ने किस तरह दलितों को साथ लेकर बौद्ध धर्म में दाखिला लिया था, और उसके बाद ही दलितों की सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता बढ़ी, उनके बीच ध्रुवीकरण हुआ, और आज वे कम से कम महाराष्ट्र जैसे एक प्रदेश में बौद्ध-दलितों की एक बड़ी ताकत बन चुके हैं। हमारा यह मानना है कि किसी भी धर्म में जब इस कदर का हिंसक भेदभाव होता है, तो भेदभाव के शिकार लोगों को बजाय उस धर्म को सुधारने की कोशिश करने के, उस धर्म को छोड़ देना चाहिए। अगर धर्म छोडऩे की सोच न हो, तो भी ऐसे धार्मिक स्थलों को छोड़ देना चाहिए जो कि औरतों के साथ, दलितों के साथ, गरीबों के साथ ऐसा भेदभाव करते हैं। जिस धर्म से लोग अलग होने लगेंगे, उस धर्म की आंखें भी खुलने लगेंगी। जब हिन्दू धर्म की हिंसा से थककर उसके दलित और आदिवासी बौद्ध और ईसाई होने लगे, तो आज आक्रामक हिन्दुत्व की बात करने वाले लोग ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म में वापिस लाने की बात करने लगे हैं। अगर कमजोर तबका ही इन धर्मों में नहीं रहेगा, तो इन धर्मों के ताकतवर तबके आखिर कुचलेंगे किसको? ऐसी भुखमरी न आ जाए, इसलिए अब लोगों की घर वापिसी नाम का एक आंदोलन चलता है, जबकि दूसरी तरफ दलितों को और महिलाओं को अब भी मंदिरों से हकाल दिया जाता है। 
भारत का कानून कुछ हद तक तो इस गैरबराबरी के खिलाफ कमजोर तबके की मदद करता है, लेकिन पूरी तरह से वह असरदार नहीं है। हमारा यह साफ मानना है कि जिस धर्म में, जिस जाति में, जिस तबके में ऐसी हिंसक-गैरबराबरी हो, उसे छोड़ ही देना चाहिए। महिलाएं खुद होकर ऐसे मंदिरों का बहिष्कार करें, और वहां घुसने की इजाजत पाने के बजाय ऐसी रोक के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी करें, ताकि वहां पर आदमी भी जाना बंद करें।

तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो...

संपादकीय
14 जनवरी 2016

भारत में मकर संक्रांति बहुत से हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाने वाला त्यौहार है, और इसके पीछे आज सूर्य की स्थिति बदलना रहता है जिसकी वजह से आज से ठंड घटना शुरू होती है, और गर्मी बढ़ती है। बहुत से राज्यों में आज के दिन तिल और गुड़ के बने हुए लड्डू खिलाए जाते हैं, और मराठी की एक कहावत है कि तिल-गुड़ खाओ, और मीठा-मीठा बोलो। अब यह बात अकेले त्यौहार के दिन पर लागू नहीं होती, और न ही लड्डू खाने के बाद के लिए ही लागू होती। लोगों को वैसे भी मीठा बोलना चाहिए, अगर कड़वा बोलने की कोई खास जरूरत न हो, या कड़वा बोलने का कोई इस्तेमाल न हो। 
बोलचाल में बहुत से लोग इस बारीकी का ध्यान नहीं रख पाते कि हास्य कब व्यंग्य में बदल जाता है, और कब वह कटाक्ष बन जाता है जो कि गहरी चोट पहुंचा सकता है। गांधी जैसे साफ दिल और खरा-खरा बोलने वाले महात्मा ने कहा था कि सोच बोलो, पर कड़वा सच मत बोलो। लेकिन कुछ दूसरे महान ऐसे भी हुए जिन्हें सच को कड़वा कहने से कोई परहेज नहीं रहा, और कबीर जैसे लोगों ने इतना खरा कहा है जो कि खासा कड़वा भी रहा है। लेकिन बहुत से लोग ऐसा कड़वा कहते हैं, कि जिसकी कोई जरूरत नहीं होती है, और जिससे कोई फायदा भी नहीं होता है। कुछ लोग सुबह उठते ही आसपास के लोगों को कुछ न कुछ कड़वा कहने के बहाने तलाश लेते हैं, और दिन में जिस किसी से मिलें, पहली मुलाकात में किसी न किसी शिकायती लहजे में कुछ न कुछ कड़वा कह लेने के बाद ही वे दुआ-सलाम भी कर पाते हैं। यह बात कुछ तो मिजाज में घर कर जाती है, और फिर ऐसे मिजाज को बदलने की बात भी आसपास के लोगों को समझ नहीं पड़ती, तो फिर वह जारी रहती है। 
हम कड़वी बातों के खिलाफ जरा भी नहीं हैं, बल्कि हमारा यह मानना है कि जब सीधे-सरल सच का असर होना कम होने लगे, तो उसे धारदार बनाने, और कड़वी जुबान में कहने की जरूरत रहती है क्योंकि ऐसे नर्म सच का भी क्या मतलब जिसका कि असर ही न हो। लेकिन कड़वाहट ऐसी नहीं रहनी चाहिए कि चेहरे के तेवर कड़वे हो जाएं, जुबान के शब्द तीखे हो जाएं, आवाज कड़ी हो जाए, लेकिन तथ्यों और तर्कों में दम न रहे। जब बात में दम नहीं रहता, तो आवाज ऊंची करने से भी कोई फायदा नहीं होता। आज मीठा खाने और मीठा बोलने के इस दिन पर हम इस चर्चा को इसलिए छेड़ रहे हैं कि आज से भारत में मौसम का जो नया कैलेंडर शुरू होता है, आज लोग जिस तरह से त्यौहार मनाते हैं, तो यह मौका मीठी बातों के महत्व को समझने का हो सकता है। लोगों की कोशिश यह रहनी चाहिए कि उनकी बातों के तर्क और तथ्य मजबूत हों, और कड़वी जुबान के बिना भी वे असर डाल सकें। लेकिन जब वजनदार तर्क और तथ्य भी बेअसर होने लगें, तो ही कड़वी जुबान का इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों को न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि अपने आसपास के लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए, और उनसे बात करनी चाहिए कि गैरजरूरी कड़वाहट से कैसे बचा जाए। तिल-गुड़ के लड्डू तो साल में दो-चार बार ही खाए जा सकते हैं, लेकिन जहां तक मुमकिन हो वहां तक मीठा बोलना तो रोज ही हो सकता है। ऐसी कड़वाहट किसी काम की नहीं रहती कि पानी पीना तो न हो पाए, और गिलास टूट जाए। मकर संक्रांति के मौके पर बदन में गुड़ और शक्कर झोंकने के अलावा इस बारे में भी सोचना चाहिए।

मप्र की साम्प्रदायिक हिंसा भाजपा और शिवराज को सोचने की जरूरत

संपादकीय
13 जनवरी 2016
मध्यप्रदेश में एक बार फिर साम्प्रदायिक हिंसा के चलते हुए भारी तनाव खड़ा हुआ है, धार जिले का एक कस्बा जल रहा है, और सरकार पर से काबू करने की जिम्मेदारी खड़ी हुई है। यह बात समझने की जरूरत है कि ऐसे तनाव पुलिस की बड़ी मौजूदगी से वक्ती तौर पर काबू में पाए जा सकते हैं, लेकिन बाद में भी लोगों के टकराव की नफरत राख के नीचे सुलगती रहती है, और वह कभी यहां, तो कभी वहां भड़कती है। यह सिलसिला मध्यप्रदेश में कभी खत्म ही नहीं हुआ है। और भाजपा के राज वाले कुछ और राज्यों में, समाजवादी पार्टी के राज के उत्तरप्रदेश में भी ऐसा हुआ है। और अभी हम इस बात पर जाना नहीं चाहते कि इसके पीछे किस पार्टी के, या किस संगठन के लोग रहे। खास बात यह है कि राज्य दंगों को, साम्प्रदायिक हिंसा को, किस तरह काबू करता है। 
इस बारे में हम छत्तीसगढ़ का जिक्र जरूर करना चाहेंगे जहां पर कि साम्प्रदायिक हिंसा के चलते पिछली बार कब कफ्र्यू लगा हो, यह किसी को याद नहीं पड़ता। शायद एक पूरी पीढ़ी निकल गई होगी, और साम्प्रदायिक वजहों से कफ्र्यू इस राज्य में नहीं लगा है। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक तनाव भी देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में नहीं के बराबर है। और ऐसा भी नहीं कि यहां पर साम्प्रदायिक ताकतें नहीं हैं। मुस्लिम प्रतिबंधित संगठन सिमी के लोग यहां पर बरसों बसे हुए रहे, और गिरफ्तार हुए। दूसरी तरफ कुछ हिन्दू आक्रामक संगठन यहां पर ईसाई संस्थानों पर बीच-बीच में हमले करते रहे, लेकिन उनमें से अधिकतर मामलों पर कार्रवाई हुई और कहीं भी तनाव बढ़ नहीं पाया। आज जब यह देश सहिष्णुता और असहिष्णुता के बहस में झुलस रहा है, तब भी इस राज्य में भाजपा संगठन के लोग, और राज्य सरकार के मंत्री, सांसद और विधायक, किसी तरह की साम्प्रदायिक बहस में नहीं उलझे। इसकी दो वजहें हैं, एक तो यह कि राज्य के मुखिया, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने बारह बरसों के किसी भी चुनाव अभियान में किसी साम्प्रदायिक मुद्दे का न इस्तेमाल किया, और न ही जिक्र किया। इस अखबार को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने सात-आठ बरस पहले चुनाव अभियान के बीच यह कहा था कि वे मंदिर, मस्जिद, हिन्दू, मुस्लिम, धर्मांतरण, जैसे किसी भी मुद्दे को कभी चुनाव में या चुनाव से परे इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि वे चुनाव चाहे हार जाएं, इनमें से कोई मुद्दा उनका मुद्दा नहीं है। यह छोटी बात नहीं थी, और उनकी यह सोच, उनका यह रूख, सरकार और उनके संगठन में, उनके सहयोगी संगठनों में नीचे तक उतरा हुआ दिखता है। 
छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिकता को दूर रखने की एक दूसरी वजह यह है कि यहां की जनता की सोच साम्प्रदायिकता से परे की रही है, और अहिंसक रही है। हम इसकी वजह यहां की आदिवासी संस्कृति को मानते हैं जिसके बीच जंगल में बसे लोगों की अपार सहनशीलता है, और वे किसी तरह के तनाव या भड़कावे से दूर रहते हैं। इस प्रदेश में उस वक्त भी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए, जब भारत में हर हफ्ते-पखवाड़े  कहीं न कहीं बड़ा साम्प्रदायिक दंगा होता था। देश के कुख्यात साम्प्रदायिक नेता भी छत्तीसगढ़ आकर किसी तरह की बयानबाजी नहीं करते, क्योंकि उनको मालूम है कि यहां पर न जनता उन्हें मंजूर करेगी, और न ही सरकार उसे झेलेगी। नतीजा यह है कि यह प्रदेश साम्प्रदायिकता से परे रहकर आगे बढ़ रहा है, और मध्यप्रदेश में जहां पर कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, मंत्री, और केन्द्रीय मंत्री लगातार साम्प्रदायिकता की बात करते हैं, वहां पर साम्प्रदायिक हिंसा एक आम बात है जो कि लगातार सामने आती है। भारतीय जनता पार्टी को और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपने नेताओं के बयानों को लेकर, धार्मिक और धर्मान्ध पूर्वाग्रहों को लेकर, भेदभाव को लेकर चले आ रहे खतरे के बारे में सोचना चाहिए। सरकारें तो आती-जाती रहती हैं लेकिन साम्प्रदायिक नफरत, साम्प्रदायिक हिंसा के जख्म, सरकारों के जाने के बाद भी नहीं जाते।

हर प्रदेश के नौजवानों के इस जलसे की संभावनाएं

संपादकीय
12 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में आज राष्ट्रीय युवा उत्सव में देश भर से हजारों नौजवान पहुंचे हुए हैं। यह एक बड़ा ही महत्वपूर्ण मौका है जब देश के तकरीबन हर राज्य से युवक-युवतियां यहां आए हैं, और चार-पांच दिनों तक उन्हें साथ में रहने, उठने-बैठने, और साथ काम करने का मौका मिलेगा। एक दूसरे की बोली, कला, संस्कृति, और उनके समकालीन मुद्दों को समझने का एक अभूतपूर्व मौका यह रहेगा। हमें यह तो नहीं मालूम है कि आयोजकों और आयोजन में शामिल होने वाले लोगों ने इस पीढ़ी की जिंदगी के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के अधिक से अधिक बेहतर इस्तेमाल की क्या तैयारी की है, लेकिन हमारी अपनी सोच है कि इन सभी लोगों को अपने खुद के दायरे तक सीमित रहने के बजाय, दूसरे तमाम प्रदेशों के अपने साथियों के साथ दोस्ती बनाने और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। 
हमारा अपना लंबा अनुभव यह कहता है कि जिंदगी में इस तरह के मौके लोगों को स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई के मुकाबले कहीं अधिक सीखने का मौका देते हैं, और ये ही अंतरसंबंध लोगों को बेहतर इंसान बनाते हैं, अधिक जानकार बनाते हैं, और अधिक जागरूक बनाते हैं। इस कार्यक्रम में जो लोग पहुंचे होंगे उनमें से अधिकतर ने आधा दर्जन से अधिक राज्य नहीं देखे होंगे। और इनमें से बहुत कम ऐसे होंगे जो अपनी बाकी जिंदगी में भी भारत के दर्जन भर से अधिक राज्य देख पाएंगे। और फिर किसी राज्य को देखने का जो मतलब भारत में निकाला जाता है, वह वहां की कुछ दर्शनीय जगहों को देख लेने तक सीमित रहता है। जबकि होना यह चाहिए कि वहां की जिंदगी को देखा जाए। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद से लोगों के बीच दूर बैठे हुए भी एक-दूसरे की जिंदगी को जानने के जितने रास्ते मौजूद हैं, उनको देखते हुए छत्तीसगढ़ के इस आयोजन के आयोजकों को चाहिए कि इसमें हिस्सेदार लोगों के लिए फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाइटों पर अलग से पेज बनाएं, और यहां आए हुए, एक-दूसरे से मिले हुए, या न मिले हुए लोग इस दोस्ती को, इस संबंध को आगे बढ़ा सकें। अगर इन चार-पांच दिनों का रिश्ता आगे बढ़ता है, तो वही इस आयोजन की असली कामयाबी हो सकती है। 
देश के ऐसे नौजवान जो यहां मिल रहे हैं, वे अगर आगे एक-दूसरे के शहरों में, और प्रदेशों में जा सकें, उनके घरों में रूक सकें, उनके साथ उनका इलाका देख सकें, और फिर इस मेजबानी के जवाब में और दोस्तों को बुला सकें, तो यह पीढ़ी एक बेहतर समझ वाली हिन्दुस्तानी पीढ़ी होगी, उसकी सहिष्णुता बहुत अधिक रहेगी, उसमें धार्मिक उन्माद नहीं रहेगा, उसमें जातिवाद का जहर खत्म हो पाएगा, और उसमें क्षेत्रीयता भी एक आक्रामक भावना नहीं पनप पाएगी। इससे भी और आगे बढ़कर यह भी समझा जा सकता है कि किस तरह भारतीय समाज की लड़के-लड़की की असमानता, गरीब और अमीर की असमानता, खान-पान की असमानता, धार्मिक रीति-रिवाजों की असमानता घट सकेगी। लोगों में विविधता के लिए एक सम्मान पैदा हो सकेगा, और यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि इस कार्यक्रम से हो सकती है।
इस कार्यक्रम को एक सांस्कृतिक जमावड़ा बनाकर एक औपचारिकता भी पूरी हो सकती है, जिसमें चकाचौंध तो पूरी रहेगी, लेकिन जिसका राष्ट्रीय योगदान बड़ा सीमित रहेगा। इसलिए हम अभी से यह बात सुझाते हैं कि आने वाले चार दिनों में इस कार्यक्रम की मेजबान छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि यहां पहुंचे हजारों नौजवानों के बीच दोस्ती आगे बढ़ाने के लिए अलग से कई तरह की डिजिटल-कोशिश की जाए और यहां हुई पहचान को आगे बढ़ाया जाए, और यहां न हो पाई मुलाकात को वेबसाइट पर करवाया जाए। यह छोटी बात नहीं होती है कि देश के हर राज्य से लोग इस तरह पहुंचे और चार-पांच दिन साथ रहने का मौका मिले। अब तक भी जो तैयारी नहीं हो पाई होगी, उसके लिए भी इन सभी लोगों के संपर्क-सूत्र लेकर बात को बाद में आगे बढ़ाया जा सकता है। देश के इस नौजवान-कुंभ के लिए हमारी शुभकामनाएं, और हमारी उम्मीद कि इसमें आए तमाम लोग अपनी जिंदगी के लिए यहां से बहुत ही संपन्न अनुभव लेकर, अनगिनत दोस्ती लेकर लौटें। 

इस राज्य को जरूरत है एक इवेंट मैनेजमेंट-निगम की

संपादकीय
11 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में सरकार के कई निगम-मंडल, या आयोग ऐसे हैं, जो कि नाम के हैं, और राजनीतिक मनोनयन से वहां लोगों को कुर्सी, दफ्तर, बंगला, दर्जा तो मिल जाता है, लेकिन उनका कोई काम नहीं होता। दूसरी तरफ यह राज्य लगातार प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर के ऐसे कार्यक्रम देखते रहता है जिनमें सरकार का बहुत बड़ा अमला लगातार जुट जाता है। लोग दफ्तरों में बैठकर काम नहीं करते, और कभी स्टेडियम में खड़े तैयारी करवाते रहते हैं, तो कभी राज्योत्सव के मैदान पर किसी और कार्यक्रम के लिए जुटे रहते हैं। इस राज्य में एक-एक कार्यक्रम के लिए अलग-अलग विभागों के लोग लगते हैं, और जरूरत एक ऐसे निगम या मंडल की है जो कि सरकार के सभी विभागों के लिए कार्यक्रमों का इंतजाम करे। 
आज केन्द्र सरकार अपने मंत्रालयों को मिलाकर उनकी गिनती घटा रही है, राज्य में भी निगम-मंडल को प्रदेश की जरूरतों के मुताबिक दुबारा ढालने की जरूरत है। एक ऐसा निगम यहां पर चाहिए जो कि राज्योत्सव से लेकर सिरपुर उत्सव तक, या राष्ट्रीय खेलों से लेकर प्रधानमंत्री के प्रवास तक का इंतजाम कर सके। यह काम एक अलग तरह की विशेषज्ञता का रहता है, और इसके लिए अलग शिक्षण-प्रशिक्षण पाए हुए लोगों की जरूरत रहती है। आज तो किसी बड़ी शादी में भी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी काम सम्हालती है, और उसके मातहत बाकी लोग काम करते हैं। राज्य सरकार चाहे जिस नाम से करे, उसे एक इवेंट मैनेजमेंट निगम की जरूरत है, ताकि सरकार के अपने नियमित विभागों के लोग इंतजामअली बनकर दफ्तरों से बाहर व्यस्त न रहें, और कार्यक्रम भी बेहतर तरीके से हो सके। 
आज हालत यह है कि राजधानी रायपुर एक जिले के रूप में प्रदेश की बहुत सारी योजनाओं में पिछड़ गया है, क्योंकि यहां के अफसर राज्य स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों, और देश-परदेश से आने वाले लोगों की मेजबानी में कई-कई दिन अपने दफ्तर से बाहर रहते हैं। राज्य सरकार को अपने ऐसे तमाम काम नियमित विभागों से परे कर देना चाहिए, और उससे ऐसे निगम की अपनी संपत्ति भी बनती चलेगी, सभास्थल बन सकेंगे, सभागृह बन सकेंगे, और इस पर सरकार का सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना का खर्च घट सकेगा। आज सरकार के कई आयोग ऐसे कागजी हैं कि उनका इस्तेमाल सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों का एक झूठा सम्मान बनाने के लिए किया जाता है। इसके बजाय सरकार को राज्य स्तर का एक आयोजन-निगम बनाना चाहिए, जो सरकार की तरफ से मेजबानी कर सके, टूर्नामेंट का इंतजाम कर सके, साहित्य महोत्सव करवा सके, पर्यटन और संस्कृति विभाग के कार्यक्रमों का इंतजाम कर सके। ऐसा न होने पर आज हर जगह लोग सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते हैं, और अधिकारी शामियाने खड़े करवाते हुए बाहर दिखते हैं। 
—-

दिल्ली से सीखने की जरूरत, और दिल्ली को सिखाने की भी

संपादकीय
10 जनवरी 2016

दिल्ली में हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसके आभार पर अदालत ने सरकार से बार-बार पूछा कि उसे सम-विषम कार नियम लागू करके एक पखवाड़े तक प्रदूषण क्यों नापना है, और यह एक हफ्ते में क्यों नहीं हो सकता? सरकार ने अदालत को अपना जवाब दिया है, लेकिन हमारा यह मानना है कि यह प्रयोग सिर्फ प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बहुत से सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं, शहरी यातायात का बहुत सा ऐसा मामला है जो कि इन पन्द्रह दिनों में सामने आ सकता है। और इस प्रयोग को खत्म करने की ऐसी हड़बड़ी भी नहीं करनी चाहिए कि लोग एक पखवाड़े के लिए कारों के इस्तेमाल पर रोकथाम को बर्दाश्त न कर सकें, और प्रतिबंधों के हिसाब से अपनी आवाजाही को दुबारा तय न कर सकें। 
एक तो दिल्ली सहित पूरे हिन्दुस्तान में राजनीतिक कड़वाहट इतनी फैल चुकी है कि भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच नफरत के सिवाय और कोई बात नहीं दिखती। केजरीवाल की राज्य सरकार के इस प्रयोग को नाकामयाब बताने के लिए दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों की बहुत पुरानी भीड़ की तस्वीरों को ताजा बताते हुए सोशल मीडिया पर नफरत का एक अभियान छेड़ा गया, और केजरीवाल को कोसा गया। दूसरी तरफ आम जनता ने मोटे तौर पर इस भारी प्रतिबंधों वाले प्रयोग का साथ दिया, और महज बड़बोले लोग इसके खिलाफ रहे। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि जिस दिल्ली में आज प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि बच्चे भयानक बड़े पैमाने पर अस्थमा के शिकार हो रहे हैं, लोगों के फेफड़ों में जहर जमा हो रहा है, लोगों के घंटों सड़कों पर ट्रैफिक में फंसे हुए खराब हो रहे हैं, वहां पर अगर शहरी आवाजाही को सुधारने के लिए कोई प्रयोग हो रहे हैं, तो उन्हें शुरू होने के पहले ही खारिज करना एक बेअक्ली के सिवाय और कुछ नहीं होगा। 
लेकिन अकेले दिल्ली के मामले को लेकर लिखना हमारा मकसद नहीं है। अभी दो दिन छत्तीसगढ़ में भी देश भर के शहरी नियोजक इक_ा हुए, और टाऊन प्लानिंग पर चर्चा हुई। इसमें भी यह बात सामने आई कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन बढ़ाए बिना गुजारा नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी भी भारी ट्रैफिक जाम झेलती है, और देश के सैकड़ों और शहरों का भी ऐसा ही हाल है। यह सिलसिला सार्वजनिक बसों या दूसरे साधनों की कमी से और निजी गाडिय़ों को बढ़ावा देने से आगे बढ़ते चल रहा है। यह अमरीका जैसा मॉडल है जिसमें जिसके पास निजी गाड़ी नहीं है, वह मानो जिंदा ही नहीं है। भारत को बहुत तेजी से इस नौबत को बदलना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि आज तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल-पेट्रोल की कीमतें जमीन पर आ गिरी हैं, और देश पर बोझ घटा है। लेकिन अगर यह कीमत एक तिहाई होने के बजाय तीन गुना हो गई होती, तो क्या भारत में लोग डेढ़ सौ रूपए लीटर का पेट्रोल खरीदकर चल पाते? अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें भारत के हाथ में नहीं हैं, और किसी भी दिन दुनिया में कोई युद्ध छिडऩे से ऐसी नौबत आ सकती है। वैसी हालत में देश के लोग निजी गाडिय़ों को चलाते हुए दीवालिया हो जाएंगे, और इसलिए भी शहरों में लोगों के लिए सार्वजनिक गाडिय़ां जरूरी हैं जिनसे निजी किफायत हो, सरकार का पेट्रोलियम आयात घटे, प्रदूषण घटे, और शहरी ट्रैफिक जाम में लोगों का बर्बाद होने वाला वक्त भी घटे। आज आग लगी हुई नहीं है, इसलिए भारत को सार्वजनिक परिवहन बढ़ाने का एक मौका वक्त के साथ मिला हुआ है। समझदारी से और तेजी से इसका इस्तेमाल करके निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटानी चाहिए, और शहरों को बसों या दूसरे साधनों से ऐसा सुविधा-संपन्न बनाना चाहिए कि लोग अपनी अगली पीढ़ी को अस्थमा दिए बिना जा सकें। 
और यह भी जरूरी नहीं है कि बाकी का भारत दिल्ली के इस प्रयोग को देखने के बाद ही जागे। कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें राज्यों में हुए प्रयोग से भी देश की राजधानी सीख और नसीहत ले सकती है, और हर राज्य को युद्ध स्तर पर स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक शहरी आवाजाही के मॉडल विकसित करने चाहिए। 

खतरों से परे रहने वाले हिंदुस्तानियों में ऐसे भी...

9 जनवरी 2016
संपादकीय

इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि मध्यप्रदेश के एक आईएएस अधिकारी डॉ. रोमन सैनी ने इस्तीफा दे दिया है। वे 2013 बैच के अफसर हैं, और अभी उनकी ट्रेनिंग भी पूरी नहीं हुई है। लेकिन वे पिछले कुछ समय से लगातार इंटरनेट पर वीडियो के माध्यम से शिक्षण-प्रशिक्षण का एक मौलिक काम कर रहे थे, और दिल्ली में गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रहे थे। वे एम्स में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिले के इम्तिहान में देश में सोलहवें नंबर पर थे, और कमउम्र में डॉक्टर, आईएएस बनकर वे लगभग पूरे देश के सपने की तरह के थे। अब वे पढ़ाने के लिए अगर यह सब छोड़कर नए सिरे से कुछ करने जा रहे हैं, तो यह एक बड़ी अभूतपूर्व बात है। 
भारत में ऐसी बातें थोड़ी सी अटपटी हैं, लेकिन दुनिया में बहुत से देशों में लोग इस तरह के कई काम करते हैं जो कि जिंदगी सहूलियतों की हिफाजत से परे, खतरों से खेलते हुए, चुनौतियों को झेलते हुए की जाती हैं। अब अगर ऐसा नौजवान दूसरों को पढ़ाने के मकसद से देश की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली नौकरी छोड़ रहा है, तो यह कई लोगों के लिए सोचने की एक बात है कि बंधी-बंधाई हिफाजत से परे भी अपने मन का कुछ बड़ा काम करना कितना मायने रख सकता है। बिहार में आनंद नाम का एक नौजवान सुपर-30 नाम से गरीब बच्चों के लिए एक क्लास चलाता है, और इन बच्चों को आईआईटी दाखिले में पास कराकर दम लेता है। उसके आधे से अधिक बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, और वह एक फक्कड़ की तरह गरीबी में यह काम करके मजा लेता है। अब हाल यह है कि अमरीका के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में उसे लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। 
भारत की नौजवान पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है कि बंधी-बंधाई कुछ गिनीचुनी सड़कों पर चलना जिंदगी की बेबसी नहीं होती। खुद को जो अच्छा लगे, वैसे काम में हाथ आजमाना भी इसलिए जरूरी होता है कि लोग अपनी अधूरी हसरतों को लेकर न चल बसें। भारत में बहुत से लोगों को किसी भी तरह का खतरा उठाना नासमझी लगती है, लेकिन दुनिया में वे ही लोग आगे बढ़ते हैं जो अपनी मर्जी के काम करने का हौसला रखते हैं। आज भारत के बहुत बड़े हिस्से में बच्चों की पढ़ाई तक मां-बाप ही तय करते हैं, वे ही उनके लिए कपड़े खरीदते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनकी शादी भी वे ही अपनी मर्जी से करें। ऐसी दबी हुई पीढ़ी अपनी अपूरित इच्छाओं के साथ भड़ास में तो जीती है, लेकिन अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाती। इसलिए इस नौजवान आईएएस के इस्तीफे की खबर लोगों को यह सोचने का मौका देती है कि बंधी-बंधाई नौकरी, या जमा-जमाया काम ही जिंदगी का अंत नहीं होना चाहिए। लोगों को अपने पंखों पर भरोसा रखना चाहिए, और उडऩे को तैयार रहना चाहिए।

आम जनता पर बोझ बने खास लोग कुछ सुधरें...

संपादकीय
8 जनवरी 2016

दिल्ली की एक खबर पिछले हफ्ते आई थी कि वहां की पुलिस का एक बहुत बड़ा हिस्सा वीआईपी ड्यूटी में लगे रहता है। अब आज मुंबई की एक दूसरी खबर है कि बड़े-बड़े फिल्मी सितारों की सुरक्षा व्यवस्था घटाई गई है। और हम अपने राज्य में लगातार यह देखते हैं कि किसी मंत्री या जज के निकलने पर सड़कों पर पुलिस दौड़-भागकर बाकी लोगों को हटाती है, और जब बिलासपुर के हाईकोर्ट से रायपुर के हवाईअड्डे तक किसी जज का आना-जाना होता है, तो पूरे रास्ते के हर थाने को खबर होती है, और जज की कार के आगे पुलिस की गाड़ी चलती है। 
छत्तीसगढ़ जैसा जो प्रदेश इतना गरीब हो कि एक रूपए किलो चावल मिलने पर  ही लोग दो वक्त खा पाते हैं वहां पर शान-शौकत के लिए पुलिस पर इस तरह का खर्च किया जा रहा है। और मुंबई के फिल्मी सितारों की हिफाजत के लिए पुलिस तैनात है। इन दोनों ही किस्म के मामलों में देश की बर्बादी रोकने की जरूरत है। जो सरकारी या अदालती ओहदों पर बैठे हुए लोग हैं, उन्हें कोई खतरा होने पर ही उनके लिए हिफाजत का इंतजाम होना चाहिए, न कि उन ओहदों पर बैठे हुए हर किसी के साथ पुलिस तैनात कर दी जाए। दूसरी तरफ जिन पैसे वाले लोगों को पुलिस की हिफाजत की जरूरत है, उनसे एक तगड़ी वसूली की जानी चाहिए जो कि पुलिस बल के प्रशिक्षण से लेकर उनकी पेंशन तक के खर्च के हिसाब से रोजाना के रेट पर तय हो, और वह वसूली जाए। 
जो ताकतवर लोग हैं उनको खुद भी सार्वजनिक जीवन में इतना विनम्र रहना चाहिए कि वे जनता पर बोझ न बनें, चाहे वह सरकारी खर्च पर हो, या जनता की जिंदगी पर। सार्वजनिक जगहों पर ऐसे तथाकथित वीआईपी या वीवीआईपी लोगों के इंतजाम में भी बड़ी कटौती की जरूरत है। हम पहले कई मौकों पर यह बात भी लिखते आए हैं कि सार्वजनिक सफर में किसी भी ओहदे पर बैठे हुए व्यक्ति को सुरक्षा जांच से छूट नहीं मिलनी चाहिए। हमने देश के बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को तरह-तरह के जुर्म में शामिल देखा है। अब ऐसे कोई लोग किसी हथियार के साथ, किसी तरह की तस्करी करते हुए सफर करें, तो उसमें जरा भी हैरानी की बात नहीं होगी। इसलिए सुरक्षा जांच से छूट तो किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। आज छोटी-छोटी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग भी सरकार से बंदूकों की हिफाजत मांगते हैं, और इस चक्कर में रहते हैं कि विमानतल पर किस तरह वे बिना जांच के जा सकें। यह पूरा सिलसिला बड़ा अलोकतांत्रिक है, और खत्म होना चाहिए। 

जोगी से परे छत्तीसगढ़ कांग्रेस, और कांग्रेस से परे जोगी

संपादकीय
7 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के इतिहास में विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल को पार्टी से निकालने की कार्रवाई के बाद यह शायद तीसरी सबसे बड़ी कार्रवाई है जब अमित जोगी को पार्टी से निकाला गया है, और अजीत जोगी को निकालने का प्रस्ताव पारित करके पार्टी हाईकमान को फैसले के लिए भेज दिया गया है। बरसों से इस किस्म की सुगबुगाहट चली आ रही थी, और प्रदेश के लोगों को हर बार ऐसा लगता था कि अब शायद जोगी पिता-पुत्र पर पार्टी विरोधी हरकतों की वजह से कार्रवाई होगी, लेकिन लोगों का अनुभव यह था कि सोनिया गांधी के पास जोगी के खिलाफ किसी तरह की कोई सुनवाई नहीं होती, और सारी सिफारिश धरी रह जाती है। प्रदेश में कांग्रेस के एक से अधिक अध्यक्षों का अनुभव यही रहा कि दिल्ली में जोगी के खिलाफ कोई सुनवाई नहीं होती, और सोनिया के दरबार में उनकी पकड़ एक रहस्य बनी रहते आई है। अजीत जोगी सार्वजनिक रूप से हर मौके पर यह बात भी कहते आए हैं कि उनके परिवार के सारे मामले सोनिया गांधी खुद तय करती हैं, और वे अपने राजनीतिक फैसले खुद नहीं लेते।
छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति को दूर से देखने वाले लोगों का भी यह अनुभव रहा है कि अजीत जोगी और उनके बेटे का कांग्रेस संगठन के साथ शतरंज के घोड़े की तरह का ढाई घर का रिश्ता रहते आया है। चरणदास महंत हों, या धनेन्द्र साहू, या फिर भूपेश बघेल, अजीत जोगी के लिए इनमें से किसी को भी बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं था, और ऐसे दर्जनों मौके हैं जब दिल्ली से आए हुए कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में अजीत जोगी ने प्रदेश के बाकी तमाम बड़े नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई, और अपने लोगों से उठवाई। दरअसल जोगी का बर्ताव कांग्रेस के बाकी तमाम छत्तीसगढ़ी नेताओं के लिए बड़ी हिकारत का रहते आया है, और मौके-बेमौके उन्होंने इसे जाहिर करने से कोई परहेज नहीं किया। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने सरकार और संगठन को जिस तरह से अकेले चलाया, वे उस ताकत की याद और हसरत से कभी उबर नहीं पाए, और पिछले बारह बरस वे किसी और कांग्रेस नेता को बर्दाश्त नहीं कर पाए। 
लेकिन अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के कुछ समुदायों पर खासी पकड़ रखने की वजह से भी जाने जाते हैं, और उन पर लगातार ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि चुनावों में वे बहुत से कांग्रेस उम्मीदवारों को हराने का काम करते हैं। यह कांग्रेस पार्टी का भीतरी मामला है, और जनता के हक में महज यह हैरानी है कि ऐसे आरोपों के बावजूद कभी जोगी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लेकिन अनगिनत बरसों से छोटी और बड़ी अदालतों में लगातार जाति के मामले, नागरिकता या चुनाव याचिका के मामले झेलते हुए अमित जोगी और अजीत जोगी एक असाधारण लड़ाई लड़ते आए हैं। हत्या के मामले में अमित जोगी के जेल में कटे बरस को लेकर भी लोगों को लगता था कि उनकी ताकत टूट जाएगी, लेकिन वैसा नहीं हुआ। मुख्यमंत्री रहते हुए जोगी ने भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायकों का जिस तरह दल-बदल कराया, जिस तरह उसके बाद उनका नाम चुनाव हारने के बाद भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा, जिस तरह वे मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस पार्टी से निलंबित हुए, और जिस तरह एक  सड़क हादसे के शिकार होकर पहियों वाली कुर्सी पर आ गए, वह एक बहुत ही असाधारण जीवट जीवन है। 
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास पसंद बड़ी साफ दिखाई पड़ती है। या तो कांग्रेस पार्टी को जोगी के हवाले कर दिया जाए, और बाकी तमाम नेताओं को कांग्रेस से हटा दिया जाए, तो अजीत जोगी प्रदेश में सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। और दूसरी तरफ जोगी पिता-पुत्र को पार्टी से हटा दिया जाए, तो बाकी नेता प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि इन दोनों पक्षों का सहअस्तित्व बनाए हुए कांग्रेस पार्टी इस प्रदेश में कभी सरकार में आए, तो वह एक असंभव सी बात लगती है। राजनीति में संभव या असंभव कुछ नहीं होता, और किस तरह जमीन पर गिरने के बाद उठकर आसमान तक पहुंचा जाता है, यह अजीत जोगी ने कई बार साबित किया है। लेकिन अब देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी की बर्दाश्त के ऊपर से पानी निकल जाने के बाद कांग्रेस हाईकमान की आंख खुलती है या नहीं? और अगर पिता-पुत्र दोनों को कांग्रेस से हटा दिया जाता है, तो वे राज्य में एक तीसरी प्रादेशिक शक्ति के रूप में उभर सकते हैं, या नहीं? कांग्रेस से परे जोगी छत्तीसगढ़ के चुनावों में एक ऐसा त्रिकोण बना सकते हैं, जो मतगणना तक सभी लोगों को बेचैन रख सकता है। फिलहाल कांग्रेस पार्टी को यह तय करना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को जोगी परिवार को लीज पर देकर चुनाव जीतने की उम्मीद करे, या जोगी से परे बाकी कांग्रेस नेताओं को पार्टी में रखे। 

हमलावर सोच वाले अमरीका में ओबामा के आंसू बेमतलब

संपादकीय
6 जनवरी 2016

अमरीका में घर-घर में बिखरे हथियारों से हर दिन कोई न कोई बेकसूर मारे जा रहे हैं, और वहां पर हथियार बनाने वाली कंपनियां इन पर किसी तरह की रोक लगने नहीं देती। आज वहां पर गन-कंट्रोल की वकालत करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा रो पड़े। उन्होंने इस बात पर तकलीफ जताई कि हर दिन कहीं न कहीं बेकसूर बच्चे मारे जा रहे हैं। 
यह बात सही है कि हॉलीवुड की फिल्मों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी जंग की कहानियों तक, और अमरीका के घर-घर में फैले हुए भयानक हथियारों तक से अमरीकी मिजाज हमलावर और कातिल सा हो गया है। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि हथियार बनाने वाली कंपनियों से परे भी अमरीकी जनता खुद होकर हथियारों का मोह छोड़ पाएगी, तो इसके लिए उस देश को अपनी पूरी सोच बदलनी पड़ेगी। जिस देश में यह लंबा इतिहास हो कि दुनिया के बेकसूर देशों पर जाकर किस तरह बमबारी की जाए, किस तरह सरकारें पलटी जाएं, कैसे अपने जहाजी बेड़े दूसरे देशों में भेज दिए जाएं, उस देश में घरेलू सोच को हथियारों के आकर्षण से बचा पाना मुमकिन नहीं है। चूंकि हर आम अमरीकी वियतनाम या इराक जाकर फौजी विमानों से बम नहीं बरसा सकते, इसलिए वे हॉलीवुड के हीरो या विलेन की तरह हथियारों को थामकर अपनी हसरत पूरी करते हैं। वे निशानेबाजी के अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज में जाते हैं, बंदूकें लेकर जंगलों में शिकार के लिए जाते हैं, और घर-घर में हथियार सजाकर रखते हैं। दुनिया का यह सबसे विकसित देश इस कदर के बावलेपन का शिकार है कि आत्मरक्षा के नाम पर वहां पर लोगों को ऐसे हथियार खरीदने की इजाजत है जो कि मिनटों में सैकड़ों की जान ले सकते हैं। यह हथियार किसी भी तरह से आत्मरक्षा के लिए बने ही नहीं हैं, तब तक जब तक कि कोई फौज ही किसी घर पर हमला न कर दे। और ऐसे हथियारों के साथ जीते और सोते हुए लोग कब तनाव के किसी पल में उन्हें लेकर विश्वविद्यालयों में घुस जाते हैं, या स्कूलों में घुस जाते हैं, और दर्जनों को मारकर आ जाते हैं। 
अमरीका दरअसल एक बहुत ही हिंसक मानसिकता का देश कई मायनों में बन गया है। जानलेवा हथियारों से परे भी पर्यावरण के मुद्दों से लेकर कारोबार के कानूनों तक अमरीका दूसरे देशों पर धाक जमाए रखता है। और वहां की सरकारों की यही सोच वहां की जनता के दिल-दिमाग में भी समा जाती है। अपने देश को दुनिया का रखवाला, दुनिया का सबसे ताकतवर, दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक देश मानकर चलने वाले अमरीकी धरती पर अपना एक अनोखा हक मानकर चलते हैं। वे कुदरत के दिए हुए साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल, और बेजा इस्तेमाल, करते हैं, और बाकी दुनिया को प्रदूषण का बोझ उठाने का जिम्मा दे देते हैं। अमरीका हथियारों पर पाबंदी लगाए, यह तो उसका घरेलू मामला है, लेकिन बाकी दुनिया पर एक दादा की तरह हमले करे, यह तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं के सोचने का भी मुद्दा है जिन्हें कि अमरीका ने पांव-पोंछने जैसा बनाकर रखा है। 
फिलहाल अमरीकी राष्ट्रपति के आंसू अधिक मायने इसलिए नहीं रखते क्योंकि अमरीका में साल भर में घरेलू हथियारों से जितने अमरीकी मारे जाते हैं, उनसे सौ गुना अधिक बेकसूर दूसरे देशों में अमरीकी फौजें जाकर मारते आई हैं। अमरीका चूंकि मीडिया में छाए रहता है, इसलिए वहां ओबामा के आंसू दुनिया की हर टीवी स्क्रीन से टपकने लगते हैं, लेकिन अमरीका जब तक अपनी हमलावर सोच को नहीं मिटाएगा, तब तक उसके लोगों का मोह भी निजी हथियारों से कम नहीं होगा। यही एक फर्क है जो कि भारत जैसे अमन-पसंद देशों और अमरीका में हमेशा बने रहेगा। गांधी की बताई राह के चलते आम हिन्दुस्तानी लाठी तक से बचे रहते हैं। इस बारे में अमरीका को हिन्दुस्तान जैसे देशों से सीखना चाहिए।