खतरों से परे रहने वाले हिंदुस्तानियों में ऐसे भी...

9 जनवरी 2016
संपादकीय

इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि मध्यप्रदेश के एक आईएएस अधिकारी डॉ. रोमन सैनी ने इस्तीफा दे दिया है। वे 2013 बैच के अफसर हैं, और अभी उनकी ट्रेनिंग भी पूरी नहीं हुई है। लेकिन वे पिछले कुछ समय से लगातार इंटरनेट पर वीडियो के माध्यम से शिक्षण-प्रशिक्षण का एक मौलिक काम कर रहे थे, और दिल्ली में गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रहे थे। वे एम्स में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिले के इम्तिहान में देश में सोलहवें नंबर पर थे, और कमउम्र में डॉक्टर, आईएएस बनकर वे लगभग पूरे देश के सपने की तरह के थे। अब वे पढ़ाने के लिए अगर यह सब छोड़कर नए सिरे से कुछ करने जा रहे हैं, तो यह एक बड़ी अभूतपूर्व बात है। 
भारत में ऐसी बातें थोड़ी सी अटपटी हैं, लेकिन दुनिया में बहुत से देशों में लोग इस तरह के कई काम करते हैं जो कि जिंदगी सहूलियतों की हिफाजत से परे, खतरों से खेलते हुए, चुनौतियों को झेलते हुए की जाती हैं। अब अगर ऐसा नौजवान दूसरों को पढ़ाने के मकसद से देश की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली नौकरी छोड़ रहा है, तो यह कई लोगों के लिए सोचने की एक बात है कि बंधी-बंधाई हिफाजत से परे भी अपने मन का कुछ बड़ा काम करना कितना मायने रख सकता है। बिहार में आनंद नाम का एक नौजवान सुपर-30 नाम से गरीब बच्चों के लिए एक क्लास चलाता है, और इन बच्चों को आईआईटी दाखिले में पास कराकर दम लेता है। उसके आधे से अधिक बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, और वह एक फक्कड़ की तरह गरीबी में यह काम करके मजा लेता है। अब हाल यह है कि अमरीका के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में उसे लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। 
भारत की नौजवान पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है कि बंधी-बंधाई कुछ गिनीचुनी सड़कों पर चलना जिंदगी की बेबसी नहीं होती। खुद को जो अच्छा लगे, वैसे काम में हाथ आजमाना भी इसलिए जरूरी होता है कि लोग अपनी अधूरी हसरतों को लेकर न चल बसें। भारत में बहुत से लोगों को किसी भी तरह का खतरा उठाना नासमझी लगती है, लेकिन दुनिया में वे ही लोग आगे बढ़ते हैं जो अपनी मर्जी के काम करने का हौसला रखते हैं। आज भारत के बहुत बड़े हिस्से में बच्चों की पढ़ाई तक मां-बाप ही तय करते हैं, वे ही उनके लिए कपड़े खरीदते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनकी शादी भी वे ही अपनी मर्जी से करें। ऐसी दबी हुई पीढ़ी अपनी अपूरित इच्छाओं के साथ भड़ास में तो जीती है, लेकिन अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाती। इसलिए इस नौजवान आईएएस के इस्तीफे की खबर लोगों को यह सोचने का मौका देती है कि बंधी-बंधाई नौकरी, या जमा-जमाया काम ही जिंदगी का अंत नहीं होना चाहिए। लोगों को अपने पंखों पर भरोसा रखना चाहिए, और उडऩे को तैयार रहना चाहिए।

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