मप्र की साम्प्रदायिक हिंसा भाजपा और शिवराज को सोचने की जरूरत

संपादकीय
13 जनवरी 2016
मध्यप्रदेश में एक बार फिर साम्प्रदायिक हिंसा के चलते हुए भारी तनाव खड़ा हुआ है, धार जिले का एक कस्बा जल रहा है, और सरकार पर से काबू करने की जिम्मेदारी खड़ी हुई है। यह बात समझने की जरूरत है कि ऐसे तनाव पुलिस की बड़ी मौजूदगी से वक्ती तौर पर काबू में पाए जा सकते हैं, लेकिन बाद में भी लोगों के टकराव की नफरत राख के नीचे सुलगती रहती है, और वह कभी यहां, तो कभी वहां भड़कती है। यह सिलसिला मध्यप्रदेश में कभी खत्म ही नहीं हुआ है। और भाजपा के राज वाले कुछ और राज्यों में, समाजवादी पार्टी के राज के उत्तरप्रदेश में भी ऐसा हुआ है। और अभी हम इस बात पर जाना नहीं चाहते कि इसके पीछे किस पार्टी के, या किस संगठन के लोग रहे। खास बात यह है कि राज्य दंगों को, साम्प्रदायिक हिंसा को, किस तरह काबू करता है। 
इस बारे में हम छत्तीसगढ़ का जिक्र जरूर करना चाहेंगे जहां पर कि साम्प्रदायिक हिंसा के चलते पिछली बार कब कफ्र्यू लगा हो, यह किसी को याद नहीं पड़ता। शायद एक पूरी पीढ़ी निकल गई होगी, और साम्प्रदायिक वजहों से कफ्र्यू इस राज्य में नहीं लगा है। दूसरी तरफ साम्प्रदायिक तनाव भी देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में नहीं के बराबर है। और ऐसा भी नहीं कि यहां पर साम्प्रदायिक ताकतें नहीं हैं। मुस्लिम प्रतिबंधित संगठन सिमी के लोग यहां पर बरसों बसे हुए रहे, और गिरफ्तार हुए। दूसरी तरफ कुछ हिन्दू आक्रामक संगठन यहां पर ईसाई संस्थानों पर बीच-बीच में हमले करते रहे, लेकिन उनमें से अधिकतर मामलों पर कार्रवाई हुई और कहीं भी तनाव बढ़ नहीं पाया। आज जब यह देश सहिष्णुता और असहिष्णुता के बहस में झुलस रहा है, तब भी इस राज्य में भाजपा संगठन के लोग, और राज्य सरकार के मंत्री, सांसद और विधायक, किसी तरह की साम्प्रदायिक बहस में नहीं उलझे। इसकी दो वजहें हैं, एक तो यह कि राज्य के मुखिया, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने बारह बरसों के किसी भी चुनाव अभियान में किसी साम्प्रदायिक मुद्दे का न इस्तेमाल किया, और न ही जिक्र किया। इस अखबार को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने सात-आठ बरस पहले चुनाव अभियान के बीच यह कहा था कि वे मंदिर, मस्जिद, हिन्दू, मुस्लिम, धर्मांतरण, जैसे किसी भी मुद्दे को कभी चुनाव में या चुनाव से परे इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि वे चुनाव चाहे हार जाएं, इनमें से कोई मुद्दा उनका मुद्दा नहीं है। यह छोटी बात नहीं थी, और उनकी यह सोच, उनका यह रूख, सरकार और उनके संगठन में, उनके सहयोगी संगठनों में नीचे तक उतरा हुआ दिखता है। 
छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिकता को दूर रखने की एक दूसरी वजह यह है कि यहां की जनता की सोच साम्प्रदायिकता से परे की रही है, और अहिंसक रही है। हम इसकी वजह यहां की आदिवासी संस्कृति को मानते हैं जिसके बीच जंगल में बसे लोगों की अपार सहनशीलता है, और वे किसी तरह के तनाव या भड़कावे से दूर रहते हैं। इस प्रदेश में उस वक्त भी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए, जब भारत में हर हफ्ते-पखवाड़े  कहीं न कहीं बड़ा साम्प्रदायिक दंगा होता था। देश के कुख्यात साम्प्रदायिक नेता भी छत्तीसगढ़ आकर किसी तरह की बयानबाजी नहीं करते, क्योंकि उनको मालूम है कि यहां पर न जनता उन्हें मंजूर करेगी, और न ही सरकार उसे झेलेगी। नतीजा यह है कि यह प्रदेश साम्प्रदायिकता से परे रहकर आगे बढ़ रहा है, और मध्यप्रदेश में जहां पर कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, मंत्री, और केन्द्रीय मंत्री लगातार साम्प्रदायिकता की बात करते हैं, वहां पर साम्प्रदायिक हिंसा एक आम बात है जो कि लगातार सामने आती है। भारतीय जनता पार्टी को और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपने नेताओं के बयानों को लेकर, धार्मिक और धर्मान्ध पूर्वाग्रहों को लेकर, भेदभाव को लेकर चले आ रहे खतरे के बारे में सोचना चाहिए। सरकारें तो आती-जाती रहती हैं लेकिन साम्प्रदायिक नफरत, साम्प्रदायिक हिंसा के जख्म, सरकारों के जाने के बाद भी नहीं जाते।

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