तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो...

संपादकीय
14 जनवरी 2016

भारत में मकर संक्रांति बहुत से हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाने वाला त्यौहार है, और इसके पीछे आज सूर्य की स्थिति बदलना रहता है जिसकी वजह से आज से ठंड घटना शुरू होती है, और गर्मी बढ़ती है। बहुत से राज्यों में आज के दिन तिल और गुड़ के बने हुए लड्डू खिलाए जाते हैं, और मराठी की एक कहावत है कि तिल-गुड़ खाओ, और मीठा-मीठा बोलो। अब यह बात अकेले त्यौहार के दिन पर लागू नहीं होती, और न ही लड्डू खाने के बाद के लिए ही लागू होती। लोगों को वैसे भी मीठा बोलना चाहिए, अगर कड़वा बोलने की कोई खास जरूरत न हो, या कड़वा बोलने का कोई इस्तेमाल न हो। 
बोलचाल में बहुत से लोग इस बारीकी का ध्यान नहीं रख पाते कि हास्य कब व्यंग्य में बदल जाता है, और कब वह कटाक्ष बन जाता है जो कि गहरी चोट पहुंचा सकता है। गांधी जैसे साफ दिल और खरा-खरा बोलने वाले महात्मा ने कहा था कि सोच बोलो, पर कड़वा सच मत बोलो। लेकिन कुछ दूसरे महान ऐसे भी हुए जिन्हें सच को कड़वा कहने से कोई परहेज नहीं रहा, और कबीर जैसे लोगों ने इतना खरा कहा है जो कि खासा कड़वा भी रहा है। लेकिन बहुत से लोग ऐसा कड़वा कहते हैं, कि जिसकी कोई जरूरत नहीं होती है, और जिससे कोई फायदा भी नहीं होता है। कुछ लोग सुबह उठते ही आसपास के लोगों को कुछ न कुछ कड़वा कहने के बहाने तलाश लेते हैं, और दिन में जिस किसी से मिलें, पहली मुलाकात में किसी न किसी शिकायती लहजे में कुछ न कुछ कड़वा कह लेने के बाद ही वे दुआ-सलाम भी कर पाते हैं। यह बात कुछ तो मिजाज में घर कर जाती है, और फिर ऐसे मिजाज को बदलने की बात भी आसपास के लोगों को समझ नहीं पड़ती, तो फिर वह जारी रहती है। 
हम कड़वी बातों के खिलाफ जरा भी नहीं हैं, बल्कि हमारा यह मानना है कि जब सीधे-सरल सच का असर होना कम होने लगे, तो उसे धारदार बनाने, और कड़वी जुबान में कहने की जरूरत रहती है क्योंकि ऐसे नर्म सच का भी क्या मतलब जिसका कि असर ही न हो। लेकिन कड़वाहट ऐसी नहीं रहनी चाहिए कि चेहरे के तेवर कड़वे हो जाएं, जुबान के शब्द तीखे हो जाएं, आवाज कड़ी हो जाए, लेकिन तथ्यों और तर्कों में दम न रहे। जब बात में दम नहीं रहता, तो आवाज ऊंची करने से भी कोई फायदा नहीं होता। आज मीठा खाने और मीठा बोलने के इस दिन पर हम इस चर्चा को इसलिए छेड़ रहे हैं कि आज से भारत में मौसम का जो नया कैलेंडर शुरू होता है, आज लोग जिस तरह से त्यौहार मनाते हैं, तो यह मौका मीठी बातों के महत्व को समझने का हो सकता है। लोगों की कोशिश यह रहनी चाहिए कि उनकी बातों के तर्क और तथ्य मजबूत हों, और कड़वी जुबान के बिना भी वे असर डाल सकें। लेकिन जब वजनदार तर्क और तथ्य भी बेअसर होने लगें, तो ही कड़वी जुबान का इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों को न सिर्फ अपने बारे में, बल्कि अपने आसपास के लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए, और उनसे बात करनी चाहिए कि गैरजरूरी कड़वाहट से कैसे बचा जाए। तिल-गुड़ के लड्डू तो साल में दो-चार बार ही खाए जा सकते हैं, लेकिन जहां तक मुमकिन हो वहां तक मीठा बोलना तो रोज ही हो सकता है। ऐसी कड़वाहट किसी काम की नहीं रहती कि पानी पीना तो न हो पाए, और गिलास टूट जाए। मकर संक्रांति के मौके पर बदन में गुड़ और शक्कर झोंकने के अलावा इस बारे में भी सोचना चाहिए।

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