स्टार्टअप इंडिया के नए नारे भर से कुछ न होगा

संपादकीय
16 जनवरी 2016
मोदी सरकार ने आज एक और महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है जिसे हिन्दी में भी अंग्रेजी नाम ही दिया गया है, स्टार्टअप इंडिया। यह योजना उन नए उद्यमियों के लिए है जो कि पहली बार कोई काम शुरू कर रहे हैं, और कोई नया उद्योग लगाना चाहते हैं या इस तरह का कोई और काम बैंक से कर्ज लेकर शुरू करना चाहते हैं। हम योजना की तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते क्योंकि खबरों में यह जानकारी आ ही रही है, लेकिन क्या इससे सचमुच नए लोगों को कोई मदद मिल सकेगी? प्रधानमंत्री और केन्द्रीय वित्त मंत्री ने इस योजना को शुरू करते हुए कहा है कि बड़े उद्योगों पर लगने वाले टैक्स के भारी-भरकम नियम से ऐसे नए शुरू हो रहे उद्योगों को कई तरह की रियायत मिलेगी ताकि वे शुरुआत में ही दिक्कतों में न उलझें। 
अब सवाल यह उठता है कि अगर सरकारी नियम-कायदे, टैक्स, इन सबमें दिक्कतें हैं, तो उन्हीं को कम करने की बात क्यों नहीं होती? आज देश में जो आर्थिक मंदी चल रही है, उसकी एक वजह उद्योग-व्यापार के प्रति सरकार का नजरिया भी है। आज किसी भी काम को करने में जितना भ्रष्टाचार लोगों को झेलना पड़ता है, एक-एक सरकारी दफ्तर में जिस तरह धक्के खाने पड़ते हैं, एक-एक फाईल रेंगती हुई चलती है, और उसे रोक-रोककर हर टेबिल पर जिस तरह रंगदारी वसूली जाती है, वह हाल भारत के अधिकांश राज्यों में है, और केन्द्र सरकार के दफ्तरों में भी है। केन्द्र और राज्य सरकार ने कामों को तेज रफ्तार करने के लिए जो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम बनाए हैं, उनमें भी अधिकतर यही हाल है, और यही वजह है कि उनमें से बहुत से या तो घाटे में चले गए हैं, या फिर वे निजी क्षेत्र से मुकाबले में पिछड़ रहे हैं। इस देश में न सिर्फ नए लोगों के लिए, बल्कि सभी लोगों के लिए सरकारी कामकाज में नियमों का बोझ घटाने की जरूरत है, और सरकार के प्रतिबंध या रोक तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से ही लागू रखने की जरूरत है। 
भारत में बच्चे के पैदा होने के प्रमाणपत्र से लेकर मृत्यु का प्रमाणपत्र बनवाने तक का काम भ्रष्टाचार से घिरा हुआ है। किसी उद्योग-व्यापार के लिए सरकार इस तरह फंदे और शिकंजे लेकर खड़ी हो जाती है कि मानो नया-पुराना कैसा भी कारोबारी, जुर्म करने की नीयत से बाजार में उतरा है। सरकार के उद्योग-व्यापार को काबू करने के विभाग मनमानी ताकतों से लैस हैं। और आजादी की पौन सदी के करीब पहुंचकर भी सरकारें लाइसेंस राज, इंस्पेक्टर राज खत्म करने के नारे लगा रही हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली बाजार के प्रति उदार नजरिया रखने वाली समझी जाने वाली भाजपा के नेता हैं, लेकिन उन्होंने वित्त मंत्री बनते ही जिस तरह से आयकर के नए जटिल और कड़े नियम लादने की कोशिश की थी, उन नियमों का देश भर में जमकर विरोध हुआ था और उसके बाद उनको प्रधानमंत्री के स्तर से नर्म किया गया। यह सिलसिला हर उस सरकारी कुर्सी के साथ चलता है जिसे थोड़े से भी अधिकार मिल जाते हैं। आधार कार्ड बनाने से लेकर, पेंशन के लिए अपने आपको जिंदा साबित करने तक का सिलसिला लोगों को सरकारी दफ्तरों से नफरत के लिए बेबस कर देता है। और कमजोर तबके पर तो सरकारी कामकाज का नाम भी भारी पड़ता है। 
न सिर्फ स्टार्टअप इंडिया के लिए, बल्कि देश के सभी नागरिकों के रोज के कामकाज के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को, म्युनिसिपलों को अपने नियम, शर्तें, कागजी खानापूरी, इन सबको घटाना चाहिए, दुनिया के तमाम सभ्य देश इनमें कटौती करते हुए ही विकसित हो पाए हैं। अमरीका जैसे देश से भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बड़ी दोस्ती है, और बड़ी मोहब्बत है। वहां पर देश-प्रदेश से लेकर स्थानीय प्रशासन तक के किसी भी फॉर्म पर यह भी डला होता है कि उसे भरने में अंदाजन कितना वक्त लगेगा। और वहां के तमाम फॉर्म पर मांगी गई जानकारी कम से कम रखी जाती है, और एक भी गैरजरूरी जानकारी नहीं मांगी जाती। भारत में सरकार इतनी गैरजरूरी जानकारी मांगती है, कि किसी भी जरूरतमंद का फॉर्म ही पूरा न भरा जा सके, और वह रिश्वत देने को मजबूर हो। छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर लोगों से सुधार के लिए सुझाव मांगे हैं। हमारा पहला सुझाव तो यह है कि कोई भी सरकारी विभाग जनता से ऐसी कोई जानकारी न मांगे, जो कि उसके खुद के किसी विभाग में पहले से है। ऐसे हर बोझ को घटाने के बिना स्टार्टअप तो दूर, मौजूदा उद्योग-व्यापार भी खत्म होने की कगार पर हैं।

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