...यह चुप्पी तो चीख से भी अधिक जोरों से दर्ज हो रही

संपादकीय
19 जनवरी 2016

हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय से कई छात्रों को हॉस्टल से निकाल दिया गया था, और मैस में उनके जाने पर रोक लगा दी गई थी।  विश्वविद्यालय के दलित, अंबेडकरवादी छात्रों का वहां पर भाजपा के छात्र संगठन से टकराव चल रहा था, और एबीवीपी की शिकायत के बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने दखल देकर दलित छात्रों को हॉस्टल से निकलवाया था। यह मामला देश में चल रहे कई सामाजिक मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था, और दलित छात्र इन मुद्दों पर अपना अधिकार गिनाते हुए विश्वविद्यालय में ऐसी रोक का विरोध कर रहे थे। इस मामले के बहुत बारीक खुलासे में जाने की यहां पर कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि बात कई मुद्दों की है।
देश में धर्म के आधार पर, जाति या क्षेत्रीयता के आधार पर, खान-पान और उपासना पद्धति के आधार पर, पोशाक और रस्म-रिवाज के आधार पर एक बहुत ही आक्रामक भेदभाव चल रहा है। देश भर में लगातार एक सवर्ण हिंदुत्व की सोच के एक छोटे हिस्से की पसंद-नापसंद खूनी हमलों के साथ लागू की जा रही है। और दुनिया भर में भारत की एक बेहतर तस्वीर बेचने में लगे हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत भर में बढ़ाई जा रही इस असहिष्णुता के खिलाफ पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। उनका पूरा जोर देश की आर्थिक तस्वीर बदलने में है, और उनकी कोशिशों से ऐसा लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था और देश के सामाजिक वातावरण का आपस में कोई लेना-देना नहीं है। यह सोच बुनियादी तौर पर इसलिए गलत है कि इंसानी बदन के हाथ-पैर, आंख-कान अलग-अलग काम नहीं करते, वे सब एक-दूसरे से जुड़े रहकर ही इंसान बना पाते हैं। एक तरफ तो नरेन्द्र मोदी लगातार कमजोर तबकों और बेरोजगारों को अर्थव्यवस्था में जोडऩे की बातें कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं के लोग समाज को बुरी तरह से तोडऩे की बातें कर रहे हैं। और केंद्र सरकार मानो यह मानकर चल रही है कि सामाजिक तनाव को भयानक बढ़ाते हुए भी देश की आर्थिक तरक्की की जा सकती है।
जहां तक देश के दलित तबकों का सवाल है, तो वे तो रोजाना ही कहीं न कहीं कुचले जाते हैं। वे अगर जुबान खोलते हैं, तो उनको कहीं गांव से निकाला जाता है, कहीं मंदिर से, कहीं कुएं से हटाया जाता है, तो कहीं दुनिया से। ऐसे माहौल में मोदी की न तो स्टार्टअप इंडिया योजना कामयाब हो सकती, न जन-धन योजना, और न ही देश का आर्थिक विकास हो सकता। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, ऐसे बड़े-बड़े तबकों के हक लगातार छीनते हुए दुनिया का कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। और अफसोस यह भी है कि इस देश का कानून, इस देश की अदालतें, यहां की संसद, यहां के बड़े-बड़े संवैधानिक आयोग, सामाजिक समानता के नाम पर खाते तो हैं, समानता को लाने के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाते।
जिस तरह दबे-कुचले तबकों से निकलकर आए हुए छात्रों को आत्महत्या के लिए बेबस किया गया है, वह हिंदुस्तान के लिए एक शर्मनाक बात है, और इस पर भी अगर प्रधानमंत्री चुप हैं, तो यह चुप्पी तो इतिहास में चीख से भी अधिक जोरों से दर्ज हो रही है।

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