अदनान सामी के बहाने से उग्र राष्ट्रवाद पर कुछ चर्चा

संपादकीय
2 जनवरी 2016

एक पाकिस्तानी गायक अदनान सामी पिछले बहुत बरस से हिन्दुस्तान में रह रहे थे, और भारतीय नागरिकता की अर्जी दे रखी थी। नए साल के पहले दिन केन्द्र सरकार ने उन्हें नागरिकता दी और उसके बाद अदनान सामी ने भारत के प्रति देशप्रेम की बहुत सी बातें कहीं। उनको लेकर कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना कर रहे हैं, कि जो अपनी ही मातृभूमि का न हुआ, वह किसी और देश का क्या होगा। 
दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच सरकारों और फौजों में रिश्तों की कड़वाहट इतनी अधिक है कि उनकी हमलावर बयानबाजी के चलते मीडिया और सोशल मीडिया के तेवर भी बिना किसी बात के देशभक्ति और देशद्रोह जैसे दो तबकों में बंट जाते हैं। दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों को देखें, तो योरप या अमरीका में लोग पूरी-पूरी जिंदगी काम करते रह जाते हैं, और उनकी नागरिकता उनके आड़े नहीं आती। योरप में तो एक यूरोपीय समुदाय बनाकर देशों के बीच आवाजाही के लिए वीजा की जरूरत भी खत्म कर दी है, और अनगिनत ऐसे मामले हैं जिनमें परिवार के अलग-अलग लोग अलग-अलग देशों के नागरिक रहते हैं, और उनका परिवार भी चलता है, और कारोबार भी चलता है। 
भारत और पाकिस्तान में जो लोग एक कट्टर राष्ट्रवाद के शिकार हैं, उनको यह समझना चाहिए कि सरहद की जरूरत कुछ मामलों में तो होती है, लेकिन हर मामले में सरहद को बीच में डालकर नफरत और तनाव को खड़ा करके चलना, सरहद के दूसरी तरफ के लोगों को दुश्मन करार देना, अपने देश के असहमत लोगों को दूसरे देश भेजने के फतवे जारी करना, धर्म के नाम पर, धर्म के आधार पर लोगों को देशद्रोही या किसी दूसरे देश का करार देना, यह सब ऐसे तंगनजरिए, और ऐसी तंगदिली की बातें हैं कि जिनसे नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होता। जिन लोगों की दिलचस्पी सरहद पर तनाव में रहती है, धर्म को लेकर नफरत फैलाने में रहती है, फौजी सामान खरीदने में रहती है, वे लोग कभी भी अपनी जनता को राष्ट्रवाद के झांसे के बाहर निकलने नहीं देना चाहते। राष्ट्रवाद अपने देश के भले पर टिका हो, तब तो ठीक है, लेकिन जिस राष्ट्रवाद को किसी दूसरे देश से नफरत पर टिका दिया जाए, वह राष्ट्रवाद दूसरे देश का नुकसान कर सके या न कर सके, वह आत्मघाती जरूर होता है। 
अदनान सामी का मामला न तो पाकिस्तान के खिलाफ कोई मामला है, और न ही भारत के गर्व का कोई मामला है। इस मामले को सही संदर्भों में, और सही अनुपात में ही महत्व देना चाहिए। अमरीका में तो हर बरस दुनिया भर के देशों से लाखों लोग आकर नागरिकता की कतार में लगते हैं, ऐसे में अगर अमरीका अपने पर गर्व करने पर आमादा हो जाए, तो उसके पास और कोई भी काम करने के बजाय चौबीसों घंटे बस गर्व करने का काफी सामान मौजूद है। जिन देशों के पास असली गौरव की बातें कम होती हैं, वे एक नामौजूद इतिहास को लेकर झूठा गौरव खड़ा करने लगते हैं, जो किसी दूसरे के खिलाफ अपनी नफरत को भी अपना गौरव साबित करने लगते हैं, ऐसे लोगों से किसी भी समझदार देश को सावधान रहने की जरूरत है। 
भारत में ही नहीं, कम समझदार लोगों की भीड़ वाले बहुत से देशों में आम जनता को ऐसे राष्ट्रवादी उन्माद में झोंकने वाले कट्टरपंथी हमेशा रहते आए हैं, और ये बहुत बड़ा नुकसान करते हैं। समझदार लोगों को यह मानना चाहिए कि अपनी मां से मोहब्बत करने के लिए पड़ोस की औरत से, किसी और की मां से नफरत करना जरूरी नहीं होता है। फिर दूसरी बात यह है कि देशों के बीच असल जिंदगी की हकीकत मातृभूमि की सोच से परे भी रहती है। सिर्फ देशप्रेम से दुनिया के किसी भी देश के लोगों का पेट नहीं भरता, और लोगों को नारों से परे देश के विकास पर ध्यान देना चाहिए। 
—-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें