जब कोई दलित नहीं बचेंगे तब बाकी घर भी पहुंचेंगे हमलावर...

संपादकीय
21 जनवरी 2016

भारत में कई जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग लोगों ने इस्तीफे दिए हैं। अभी हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दलित मुद्दों को लेकर एक छात्र की आत्महत्या पर दक्षिणपंथी और बाकी तबकों के बीच एक तनाव खड़ा हो गया है, और उस विश्वविद्यालय से डी-लिट की उपाधि पाने वाले विख्यात कवि अशोक वाजपेयी ने उसे लौटाने की घोषणा की है। दुनिया भर के सैकड़ों प्राध्यापकों ने अलग-अलग देशों से ई-मेल भेजकर इस विश्वविद्यालय और केन्द्र सरकार के दलित-विरोधी रूख को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है। ऐसा पिछले महीनों या बरसों में मोदी सरकार से जुड़े हुए कई फैसलों पर और भी हुआ है, और सरकार के कोई फैसले जनदबाव में बदले नहीं गए हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे प्रतीकात्मक विरोध कोई मायने रखते हैं? सम्मान और पुरस्कार लौटाने से क्या असल जिंदगी पर कोई असर होता है? 
लोकतंत्र दरअसल एक इतनी लचीली व्यवस्था है कि उसमें न तो बातों का सीधा असर होता, और न ही सरकारें ऐसे किसी प्रतीकात्मक विरोध के सामने अनिवार्य रूप से झुकती हैं। लेकिन इसका एक असर जरूर होता है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं को देखने-सुनने, पढऩे वाली जनता अगले चुनावों तक राजनीतिक दलों के बारे में, नेताओं के बारे में, अपना दिमाग बनाते चलती है, और लोकतंत्र में जनता की प्रतिक्रिया की यही रफ्तार हो सकती है। जनता का राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण, उसकी सामाजिक जागरूकता बढ़ाना, उसके सामाजिक सरोकार बढ़ाना, यह सब उन ताकतों की जिम्मेदारी है जिनका लोकतंत्र पर भरोसा रहता है। और तो और जिन नक्सलियों का लोकतंत्र पर कोई भरोसा नहीं है, वे भी लंबे-लंबे बयान जारी करके जनता को अपनी सोच बताते हैं, अपने तर्क देते हैं, और अपनी हिंसा को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं। 
ऐसे में हम तमाम लोकतांत्रिक ताकतों, तबकों, संगठनों, और लोगों की यह जिम्मेदारी मानते हैं कि देश-विदेश के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर वे अपने दायरे में, या इन दिनों के सोशल मीडिया पर, अपनी राय रखें, विचार-विमर्श और बहस में हिस्सा लें, न कि किनारे बैठकर तमाशबीन बने रहें। आज दिक्कत यह है कि तमाशबीन जनता तमाशे को भ्रष्ट और हिंसक हो जाने देती है, अलोकतांत्रिक हो जाने देती है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर चलता है कि तमाशे और तमाशबीन के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। जबकि जो संगीत के या दूसरे किस्म के बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं, उनकी कामयाबी इस पर भी रहती है कि मंच पर मौजूद लोग श्रोताओं या दर्शकों से किस तरह की भागीदारी शुरू कर पाते हैं, लोगों को कैसे शामिल कर पाते हैं। देश के धधकते हुए मुद्दों पर भी जो लोग चुप रहते हैं, वे लोग तमाशबीन से भी गए-गुजरे रहते हैं। जिन लोगों के पास अखबारों में पाठकों के पत्र, या संपादक के नाम पत्र लिखकर भेजने के लिए भी वक्त नहीं रहता है, वे कभी अपने साथ होने वाली ज्यादती को अखबारों में छपवाने के हकदार भी नहीं रह जाते। लोकतंत्र में लोगों को आवाज उठाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, वरना उनके अधिकारों का जनाजा उठाने के लिए तो सत्ता की ताकतें हमेशा तैयार रहती ही हैं। 
हैदराबाद से आज उठे दलित सवालों पर लोगों को सोचने-विचारने की जरूरत है, इस पर बहस में हिस्सा लेने की जरूरत है, जो लोग आज घर बैठे रहेंगे, उनके घर भी हमलावर तब पहुंचेंगे, जब उनके पास मारने के लिए दलित नहीं बचेंगे। क्या आज के हिन्दुस्तानी अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे हमलावरों के हवाले करके जाना चाहती है?

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