लोकतंत्र में जनता को इतिहास जानने का हक

संपादकीय
23 जनवरी 2016

मोदी सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी हुईं और आजादी के बाद से अब तक गोपनीय रखी गईं फाइलों को सार्वजनिक करने का काम शुरू किया है। कुछ फाइलें कुछ महीने पहले जनता के सामने रख दी गई थीं, और आज नेताजी की जयंती पर करीब सौ फाइलें और जारी कर दी गई हैं। इस देश में आजादी के पहले से कांग्रेस की राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम इन दोनों को लेकर नेहरू और सुभाष के बीच एक अंतहीन टकराव चलते आया था, और वह इतिहास में बड़ी अच्छी तरह दर्ज भी है। इसके बाद सुभाषचंद्र बोस की रहस्यमय मौत, या उनके गायब होने को लेकर नेहरू पर प्रत्यक्ष या परोक्ष तोहमतें लगती रहीं, और भारत के नेहरू-विरोधियों का यह पसंदीदा डंडा रहा जिसे साल में दो बार चलाने का मौका आते रहा है, और आते रहेगा। 
हम सुभाष या नेहरू के बीच के आपसी विरोध या उनकी प्रतिद्वंदिता, या उनकी कटुता की बात किए बिना भी इस बात के हिमायती हैं कि जो इतिहास ताजा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गोपनीय रखना जरूरी न रहे, उसे तुरंत उजागर कर देना चाहिए। दुनिया के जितने सभ्य और विकसित लोकतंत्र हैं, उनमें यह सिलसिला लगातार चलते आया है। और इसके बाद जब डिजिटल युग शुरू हुआ, तो सरकारों की छुपाई हुई दूसरी बातों को भी विकीलीक्स जैसी संस्थाओं ने उजागर कर दिया, और सरकारों के किए हुए अच्छे या बुरे काम जनता के सामने इस मकसद से रखे कि पब्लिक को सब जानने का हक है। यह बात सही है कि जहां-जहां जानकारी लोगों से छुपाई जाती है, वहां-वहां गलत काम होने का खतरा रहता है, और गलत काम होते ही हैं। भारत में भी सूचना का अधिकार आने के बाद तस्वीर बदल गई है, और अब फाइलों या कागजों पर मनमानी हुक्म जारी करने का सिलसिला धीमा पड़ा है। 
नेहरू या गांधी, या सुभाषचंद्र बोस जैसे लोग अब इतिहास हैं। उनके बीच की बातें, या भारत की जापान और रूस के साथ बातें, आज की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शायद ही कोई खतरा हो। हमारा तो अंदाज यह है कि वह पूरा जमाना चल बसा है, और अब आधी-पौन सदी के बाद उन बातों से किसी का कोई नुकसान अगर हो सकता है तो किसी नेता की झूठी छवि का ही हो सकता है। जो लोग खरे हैं, उनको इतिहास से डरने की जरूरत नहीं रहती है। और फिर गांधी हों या नेहरू, उनका समग्र मूल्यांकन उनके बहुत से काम, फैसलों, को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिए मोदी सरकार की नीयत चाहे जो हो, इससे गांधी और नेहरू की छोड़ी हुई, और अब उनकी नीतियों से दूर भटक चुकी कांग्रेस पार्टी की नियति इन फाइलों के बाद चाहे जो हो, इतिहास के ये पन्ने उजागर होने ही चाहिए, और हर लोकतंत्र का यह हक रहता है कि अपने इतिहास को जान सके।
इस देश में तो वैदिक काल से लेकर आज तक की परंपराओं, और ऐतिहासिक जानकारियों को लेकर विचार-मंथन चलते रहता है। जाति व्यवस्था से लेकर गाय को खाने या न खाने को लेकर भी चर्चा चलती रहती है। ऐसे में सरकार से जुड़ी हुई बातों को छुपाकर रखना अलोकतांत्रिक है। दुनिया भर में द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर, दूसरे देशों पर हमलों को लेकर, दूसरे देशों की महिलाओं को फौजी-वेश्या बनाने जैसे जुर्म को लेकर बड़े-बड़े देश भी अपने ऐतिहासिक-जुर्म मानते जा रहे हैं, कोई माफी मांग रहे हैं, और कोई मुआवजा दे रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने इतिहास को छुपाकर रखने की जरूरत नहीं है, और इससे देश की सुरक्षा को कोई खतरा होते नहीं दिखता है, अधिक से अधिक कोई खतरा अगर इससे खड़ा होगा, तो वह नेहरू की छवि को हो सकता है, और वैसा खतरा एक अच्छा लोकतांत्रिक काम होगा।

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