कमजोर तबकों से भेदभाव करने वाले धर्म को धिक्कारें

संपादकीय
15 जनवरी 2016

अभी देश की अलग-अलग अदालतों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचा है कि देश के कुछ प्रमुख मंदिरों में महिलाओं के दाखिले पर रोक क्यों है? इसमें महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक के बहुत से मंदिर हैं। इसके पहले दशकों से भारत में यह मुद्दा चले ही आ रहा है कि दलितों को मंदिरों में क्यों नहीं जाने दिया जाता? इस पर छत्तीसगढ़ के पांडातराई से लेकर राजस्थान के नाथद्वारा तक अनगिनत ऐसे मंदिर हैं जहां गोलियों की नौबत आई और लोग मारे गए। दलितों के साथ, महिलाओं के साथ, गरीबों के साथ भेदभाव धर्म के स्वभाव का एक बुनियादी हिस्सा है। जिस तिरूपति में आम लोग कुछ खास त्यौहारों पर तीन-तीन दिन तक लाईन में लगते हैं, वहां पर बच्चनों और अम्बानियों को लेने के लिए पुजारी दरवाजे पर खड़े रहते हैं, और उन्हें प्रतिमा के सामने बिठाकर इत्मीनान से पूजा करवाई जाती है। और यह हाल तब है जब तिरूपति ट्रस्ट का मुखिया प्रदेश का एक बड़ा आईएएस अफसर होता है। लेकिन यह हाल सिर्फ गिने-चुने मंदिरों का नहीं है, देश के अधिकांश धर्मस्थानों पर ओहदे, शोहरत, या दौलत की ताकत के सामने मुल्ला-पुजारी बिछ जाते हैं, और ईश्वर तक ताकतवरों को ऐसे ले जाया जाता है, मानो उन्हें वहीं पर स्वर्ग के बंगले की चाबी दी जाएगी। 
भारत के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि हिन्दू समाज में सवर्ण और ब्राम्हण तबकों की दबंगई के चलते अंबेडकर ने किस तरह दलितों को साथ लेकर बौद्ध धर्म में दाखिला लिया था, और उसके बाद ही दलितों की सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता बढ़ी, उनके बीच ध्रुवीकरण हुआ, और आज वे कम से कम महाराष्ट्र जैसे एक प्रदेश में बौद्ध-दलितों की एक बड़ी ताकत बन चुके हैं। हमारा यह मानना है कि किसी भी धर्म में जब इस कदर का हिंसक भेदभाव होता है, तो भेदभाव के शिकार लोगों को बजाय उस धर्म को सुधारने की कोशिश करने के, उस धर्म को छोड़ देना चाहिए। अगर धर्म छोडऩे की सोच न हो, तो भी ऐसे धार्मिक स्थलों को छोड़ देना चाहिए जो कि औरतों के साथ, दलितों के साथ, गरीबों के साथ ऐसा भेदभाव करते हैं। जिस धर्म से लोग अलग होने लगेंगे, उस धर्म की आंखें भी खुलने लगेंगी। जब हिन्दू धर्म की हिंसा से थककर उसके दलित और आदिवासी बौद्ध और ईसाई होने लगे, तो आज आक्रामक हिन्दुत्व की बात करने वाले लोग ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म में वापिस लाने की बात करने लगे हैं। अगर कमजोर तबका ही इन धर्मों में नहीं रहेगा, तो इन धर्मों के ताकतवर तबके आखिर कुचलेंगे किसको? ऐसी भुखमरी न आ जाए, इसलिए अब लोगों की घर वापिसी नाम का एक आंदोलन चलता है, जबकि दूसरी तरफ दलितों को और महिलाओं को अब भी मंदिरों से हकाल दिया जाता है। 
भारत का कानून कुछ हद तक तो इस गैरबराबरी के खिलाफ कमजोर तबके की मदद करता है, लेकिन पूरी तरह से वह असरदार नहीं है। हमारा यह साफ मानना है कि जिस धर्म में, जिस जाति में, जिस तबके में ऐसी हिंसक-गैरबराबरी हो, उसे छोड़ ही देना चाहिए। महिलाएं खुद होकर ऐसे मंदिरों का बहिष्कार करें, और वहां घुसने की इजाजत पाने के बजाय ऐसी रोक के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी करें, ताकि वहां पर आदमी भी जाना बंद करें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें