उद्यमशीलता, कल्पनाशीलता की राह में सरहदें नहीं बचीं

संपादकीय
17 जनवरी 2016

आज जब मुम्बई की फिल्मों में एक-एक बड़े सितारा कलाकार की फीस सौ करोड़ रूपए तक होने की खबरें आती हैं, और ये खबरें भी आती हैं कि पहले हफ्ते में किस-किस फिल्म ने सौ-सौ करोड़ रूपए कमाकर एक क्लब सा बना लिया है, तो उस बीच यह बात अटपटी लगती है कि अमिताभ बच्चन जैसे बड़े कलाकार को लेकर कुल 35 करोड़ की लागत से एक फिल्म बनी, और उसने पहले ही हफ्ते में अपनी पूरी लागत निकाल ली। और यह कोई प्रयोगात्मक-कला फिल्म नहीं थी, मुम्बई के लोकप्रिय सिनेमा बनाने वाले निर्माता-निर्देशकों ने यह फिल्म बनाई, और इसने फिल्म-उद्योग का एक नए किस्म का समीकरण सामने रखा। आज यह बात मायने इसलिए रखती है कि नए उद्यमियों की उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने कल से स्टार्टअप इंडिया नाम का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया है, और उसका मकसद नई सोच के साथ काम शुरू करने वाले नौजवानों को बढ़ावा देना है। 
आज जो लोग यह सोचते हैं कि परंपरागत तरीके से ही कारोबार चलाया जा सकता है, या घरेलू कारखानों को अगली पीढ़ी बढ़ा सकती है, उनको अमरीकी नौजवान पीढ़ी की उद्यमशीलता देखनी चाहिए। वहां पर रहते हुए एक भारतवंशी नौजवान ने हॉटमेल शुरू किया था जो कि उस वक्त का ई-मेल का सबसे कामयाब और लोकप्रिय माध्यम था। इसके बाद अलग-अलग नौजवानों ने वहां पर तरह-तरह के नए काम किए और कारोबार के इतिहास रचे। अमरीका में एक शरणार्थी परिवार का बच्चा बड़ा होकर स्टीव जॉब्स बना, और उसने एप्पल नाम की कंपनी बनाकर दुनिया के सबसे कामयाब कम्प्यूटर, फोन, संगीत उपकरण बनाए। एक और नौजवान ने फेसबुक नाम की एक नई सोच सामने रखी, और दुनिया के खरबपतियों में शामिल हो गया। इसलिए उद्यमशीलता न किसी के लहू में रहती है, न किसी के डीएनए में, और इसकी सबसे बड़ी कामयाबी एक नई सोच में रहती है। 
अमरीका में उद्यमशीलता को इतना बढ़ावा मिलने की एक वजह यह भी है कि दुनिया में कमाई का सबसे बड़ा रास्ता न तो खदानों से निकलता है, और न ही कारखानों से। न ही मोटी कमाई पारिवारिक व्यापार से होती है, और न ही तेल के कुओं से। इन सबकी संभावनाएं सीमित रहती हैं, लेकिन सोच की कोई सीमा नहीं रहती। जो लोग एक नई सोच से, एक कल्पनाशीलता से काम करते हैं, उनके कामयाब होने की संभावना कम या अधिक हो सकती है, लेकिन जब वे कामयाब होते हैं, तो एप्पल की तरह, या फेसबुक की तरह आसमान पर पहुंचते हैं। अमरीका में बाजार का रूख भी नए एंटरप्रुनर्स के लिए बड़ा हौसले का रहता है। वहां पर पूंजीनिवेशक नए-नए नौजवानों की मौलिक सोच को देखकर उनके साथ पूंजी लगाते हैं, और कहीं वे गंवाते हैं, तो कहीं कमाते हैं। बाजार का यह हौसला अगली पीढ़ी को आसमान तक पहुंचने में मदद करता है। और खतरे लेकर जब नौजवान काम करते हैं, उनके साथ एंजल-इन्वेस्टर कहे जाने वाले पूंजीनिवेशक आ मिलते हैं, तो वह बाजार की कामयाबी बनती है। 
भारत के बारे में हम बहुत ज्यादा आशावादी इसलिए नहीं हैं कि यहां सरकारें किसी भी तरह की कल्पनाशीलता को कुचलने के लिए बड़े-बड़े बुलडोजर लेकर तैनात रहती हैं। फिर भी इन दिनों दुनिया की सरहदें गायब हो चुकी हैं, और कब भारत में सोची गई सोच दुनिया के किसी दूसरे देश में जाकर आगे बढ़ सकती है, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए बड़ी बात नौजवान पीढ़ी के लिए यह है कि उसे कल्पनाशीलता के साथ एक बड़ी सोच रखनी चाहिए, बड़े हौसले रखने चाहिए, और हो सकता है कि उनका साथ देने के लिए पूंजीनिवेशक सात समंदर पार करके यहां आ जाएं, या उन्हें उठाकर उन देशों में ले जाएं जहां सरकारों और बाजारों का रूख कल्पनाशीलता का हिमायती है। 

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