इंसानों के सिरों को फूटने की आजादी देना बंद करे सरकार

संपादकीय
30 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में बीती रात फिर एक सड़क हादसे में कई लोग मारे गए। यह बात खबर इसलिए बन रही है कि वहां सरकारी अफसरों के सुबह तक न पहुंचने पर लोगों ने सड़क पर घेरा डाला, और उसकी तस्वीरें खबरों के लिए आईं। वैसे तो राज्य में जगह-जगह हर दिन कई लोग मारे जाते हैं, और खबरें भी अखबारों के उन्हीं इलाकों के संस्करण तक आमतौर पर सीमित रह जाती हैं। जिस तरह देश के प्रमुख शहरों में देश की आबादी के आंकड़े और प्रदूषण के आंकड़े इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर सड़क किनारे दिखाकर लोगों को जागरूक किया जाता है, उसी तरह हर प्रदेश को पिछले चौबीस घंटों में सड़कों पर मौतों के आंकड़े भी दिखाने चाहिए। 
छत्तीसगढ़ के बारे में हम यह कहना चाहेंगे कि पुलिस और परिवहन विभाग आधे-अधूरे मन से कार्रवाई करते हैं, और राजधानी रायपुर में हेलमेट लागू करने जैसे आसान काम को पिछले बरसों में कई बार किया गया, और अधूरा छोड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि लोगों के मन में यह बात घर कर गई है कि हेलमेट पर चालान कुछ दिन होंगे,और उसके बाद इंसानी सिरों को फूटने की आजादी फिर मिल जाएगी। लोगों के बीच जागरूकता की बदहाली ऐसी है कि लोग समझते हैं कि हेलमेट ट्रैफिक पुलिस की जान बचाने के लिए है, और बाकी दुपहिया चलाने वालों के सिर लाईफ टाईम गारंटी के साथ बनकर आए हैं, और किसी हादसे में भी वे फूट नहीं सकते। बेवकूफों की ऐसी बस्ती में सरकार को जिस कड़ाई की जरूरत है, वह गायब है। राजधानी के हर चौराहे पर पुलिस खड़ी रहती है, और अगर एक पखवाड़े भी हेलमेट के लिए कड़ाई से अभियान चलाया जाए, गाडिय़ों को जब्त किया जाए, लोगों के लाइसेंस निलंबित किए जाएं, तो लोगों को अक्ल आ जाएगी। 
मध्यप्रदेश से खबरें आती हैं कि वहां अलग-अलग शहरों में प्रशासन ने यह नियम लागू किया है कि बिना हेलमेट लगाए आने वाले दुपहिया चालकों को पेट्रोल नहीं बेचा जाएगा। अब पता नहीं ऐसा नियम कानून के मुताबिक मुमकिन है या नहीं, लेकिन कानून के मुताबिक जो मुमकिन है, वह काम भी अगर राजधानी में नहीं होता है तो बाकी राज्य में तो उसकी कल्पना करना बेकार है। बार-बार आधे-अधूरे मन से, कमजोर कोशिश के साथ जबकि कोई बदलाव लाया जाता है, तो उसके नाकामयाब होने पर लोगों के मन में उसके लिए एक हिकारत पैदा हो जाती है। छत्तीसगढ़ में हेलमेट को लेकर यही हो रहा है। 
राज्य सरकार को चाहिए कि सड़क सुरक्षा को लेकर साल में एक बार एक हफ्ते का जलसा मनाने के बजाय हर दिन नियमों को कड़ाई से लागू करे, और लोगों की जान बचाए। एक जनकल्याणकारी सरकार को जनता की जान बचाने के लिए कई तरह की कड़ाई बरतनी पड़ती है। जब बिगड़ैल जनता तम्बाकू खा-पीकर अपनी जान देने पर आमादा रहती है, तब भी सरकार को कई तरह के नियम लागू करने पड़ते हैं। हेलमेट और सीट बेल्ट के नियम अगर कड़ाई से लागू किए जाएं, तो लोगों के मन में बाकी तरह का अनुशासन भी अपने आप आएगा। यह इंसानी मिजाज की बात है कि लापरवाही और सावधानी लोगों के दिल-दिमाग में हमेशा सहेलियों के साथ आती हैं। जो लोग सावधान रहते हैं, वे सभी मामलों में सावधान रहते हैं, और हर नियम को मानते हैं। राज्य सरकार बददिमाग और बेदिमाग लोगों पर कड़ी कार्रवाई करके आम जनता के बीच नियमों का सम्मान बढ़ाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करे, इसके बिना आने वाली पीढ़ी अभी से गैरजिम्मेदारी सीख रही है, और सड़कों पर जान भी दे रही है। 

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