पैर गया पर हौसला नहीं, आसमान छूते हुए पहाड़ों को जीतने की कहानी

संपादकीय
3 जनवरी 2016

भारत की एक पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा ने अभी दुनिया की पांचवीं चोटी पर फतह पाई है। वे इसके पहले अपने कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट जीत चुकी हैं, और अर्जेंटीना की करीब सात हजार मीटर ऊंची पर्वत चोटी को जीतकर वे कृत्रिम पैर वाली दुनिया की ऐसी पहली महिला भी बन गई हैं। एक ट्रेन हादसे में अरुणिमा अपना पैर खो बैठी थी, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा था, और पर्वतारोहण का अपना शौक जारी रखा था। वह एवरेस्ट पर चढऩे वाली कृत्रिम पैर वाली पहली महिला थी। अरुणिमा सीआईएसएफ की नौकरी के लिए इम्तिहान देने जा रही थी कि चोरों ने उनका बैग छीनने के फेर में उनको ट्रेन से धक्का दे दिया था, और वे गिरकर पैर गंवा बैठी थीं। 
ऐसा हादसा और खोया हुआ पैर, अच्छे-अच्छे लोगों का हौसला पस्त कर सकता था, लेकिन अरुणिमा तो उसके बाद भी कुदरत की बनाई दुनिया की ऊंची पहाड़ी चोटियों को जीतते ही चल रही हैं। ऐसे लोगों की कहानी स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि लोग अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी दिक्कतों को बहाने की तरह इस्तेमाल न कर सकें, और ऐसी मिसाल से हौसला पाकर आगे बढ़ सकें। पहाड़ों को जीतने वाले लोग ऐसे ही दीवाने होते हैं। कई बरस पहले एक दूसरे पर्वतारोही की कहानी सामने आई थी जिसने दोनों पैर कट जाने के बाद भी नकली पैरों से एवरेस्ट जीता था। और इतनी बर्फीली पहाडिय़ों पर स्टील के पैरों से चढ़ते हुए उसके पैरों का कुछ हिस्सा गल गया था, और लौटने पर ऑपरेशन करके कटे हुए पैरों को और काटना पड़ा था, और उस वक्त उसने कहा था कि एवरेस्ट जीतने के मुकाबले यह नुकसान कुछ भी नहीं है, उसे कोई भी अफसोस नहीं है। ऐसे भी बहुत से लोग एवरेस्ट जीत चुके हैं जो कि देख नहीं पाते, और छड़ी की मदद से, गाईड के साथ चलते हुए, खुद पहाडिय़ां चढ़कर वे एवरेस्ट जीत आते हैं। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी पिछले ही हफ्ते विकलांग कहे जाने वाले लोगों के बारे में कहा था कि जब उनके शरीर के कोई अंग काम नहीं करते हैं, तो दूसरे अंग सामान्य से अधिक अच्छा काम करने लगते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए। अंग्रेजी विकलांग को अपमानजनक मानकर उसकी जगह, विशिष्ट क्षमता वाले लोग, शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। हिन्दी में भी अपमानजनक शब्दों को छोड़कर नए शब्द ढूंढने या गढऩे चाहिए। शब्दों के जो गूढ़ या प्रचलित अर्थ होते हैं, उनका एक सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव पडऩे लगता है। इसलिए शब्दों के अर्थ सिर्फ डिक्शनरी के नजरिए से नहीं देखने चाहिए, और उनको आधुनिक संदर्भों में अधिक संवेदनशील तरीके से दुबारा तौलना चाहिए कि वे सदियों से चले आ रहे सामाजिक अन्याय को तो नहीं बढ़ा रहे। जब हम विशिष्ट क्षमताओं वाले लोगों की बात करते हैं, तो अंग्रेजी के इन शब्दों का हिन्दी में कोई असरदार और स्वाभाविक लगता हुआ विकल्प नहीं सूझता है। इसलिए मोदी की यह बात गौर करने के लायक है, और हो सकता है कि वह इस्तेमाल भी होने लगे। 
हम अरुणिमा सिन्हा की ताजा कामयाबी की इस चर्चा में यह भी अनदेखा नहीं कर सकते कि वह एक महिला होते हुए भी हौसले के ऐसे काम कर रही है जिनको भारतीय सामाजिक संदर्भों में महिलाओं के लिए बहुत माकूल नहीं माना जाता। महिलाओं के बारे में सोच यही है कि उनको हिफाजत से घर पर रहना चाहिए, लेकिन जब वे दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर पहुंचती हैं, समंदर चीरकर रिकॉर्ड कायम करती हैं, अंतरिक्ष तक चली जाती हैं, तो उससे महिलाओं पर लगने वाली बंदिशों की दकियानूसी सामाजिक सोच को भी बदलने की गुंजाइश निकलती है। महिलाओं की कामयाबी की कहानियां, विशिष्ट शारीरिक जरूरतों या क्षमताओंं वाले लोगों की कामयाबी की कहानियां, गरीब या समाज में दबे-कुचले जाति-धर्म के लोगों की कामयाबी की कहानियां औरों को एक अच्छी राह दिखा सकती हैं। सरकार और समाज को मुफ्त में मिलने वाली ऐसी प्रेरणा को बच्चों तक पहुंचाना चाहिए, ताकि अगली पीढ़ी हौसलामंद हो सके। 

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