धर्मस्थलों पर महिलाओं का बराबरी का हक हो

संपादकीय
28 जनवरी 2016

महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में महिलाओं को कभी दाखिला नहीं मिला, और कुछ महीने पहले एक महिला के वहां चले जाने के बाद जिस तरह से शनि प्रतिमा का शुद्धिकरण किया गया, उसके खिलाफ एक महिला आंदोलन वहां शुरू हुआ है। शुरुआती खबरें ये हैं कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस ने भी आंदोलन का समर्थन किया है और यह विचार व्यक्त किया है कि किसी भी मंदिर में महिलाओं पर रोक नहीं रहनी चाहिए। सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा के साथ ही कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि देश की कुछ प्रमुख दरगाहों में महिलाओं का दाखिला नहीं है, और वहां भी ऐसी ही व्यवस्था की जानी चाहिए।
 हर धर्म के रिवाज अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश में आम अधिकारों को लेकर कानून एक सरीखा है तो धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर भी ऐसी बात कई मामलों में उठती ही है। जब मस्जिदों पर लाउडस्पीकर लगे रहते हैं, तो मंदिरों से भी वैसी ही मांग उठती है, और फिर यह तर्क धरे रह जाता है कि मस्जिद से दिन में कुछ बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए ही आवाज लगाई जाती है, और मंदिरों में कई-कई दिनों का लगातार रामधुन सप्ताह भी होता है। इसी तरह सड़कों के किनारे धार्मिक जगहों के अवैध कब्जे हटाने की बात होने पर लोग एक-दूसरे के धर्म गिनाने लगते हैं। हमारा यह मानना है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को सार्वजनिक जीवन में धर्म के नाम पर होने वाले किसी भी तरह के गलत काम को इसलिए कड़ाई से रोकना चाहिए ्क्योंकि ये मामले आगे बढ़कर धार्मिक उन्माद की हिंसा, और देखा-देखी की साम्प्रदायिकता में भी बदलते हैं। आम जुर्म उतने गंभीर नहीं होते जितने कि धर्म से जुड़े हुए जुर्म होते हैं। इसलिए धार्मिक मामलों में सरकार का नजरिया बड़ा साफ रहना चाहिए, और सभी तरह के धर्मों के सभी गलत कामों के प्रति रियायत को सरकारी धर्मनिरपेक्षता मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। सभी धर्मों के सभी गलत कामों पर कड़ी कार्रवाई ही देश को बचा सकती है। 
जहां तक महिला अधिकारों की बात है तो सभी धर्मों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की तरफ आगे बढऩे की जरूरत है। और धर्म को माने बिना जिन लोगों का काम नहीं चलता उन महिलाओं से तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन जिन महिलाओं का काम धर्म के बिना चल सकता है, उनको धर्म को महत्वहीन मानकर भी चलना चाहिए। धार्मिक स्थल महिलाओं पर बंदिश लगाएं, उसके बजाय महिलाओं को ऐसे धार्मिक स्थलों के बहिष्कार की भी सोचनी चाहिए, और जो लोग महिलाओं के बराबर के हक के तरफदार हैं, उनको भी ऐसे धर्मस्थलों का पूरा बहिष्कार करना चाहिए। जब ऐसी जगहों को चलाने वाले ट्रस्टों की कमाई मारी जाएगी, तब उन्हें महिलाओं और उनके हक के हिमायती आदमियों का महत्व समझ में आएगा। 
फिलहाल हम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के इस मामले में अब तक के रूख की तारीफ करेंगे कि उन्होंने भाजपा के मुख्यमंत्री होते हुए भी हिन्दू धर्म से जुड़े हुए इस मामले में एक उदारता दिखाई है, और प्रगतिशील नजरिए से वे इसे निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। 

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