भारत-पाक अमन की कोशिशें कभी भी आतंकी साजिशों से परे नहीं रह पाईं हैं...

संपादकीय
5 जनवरी 2016

पंजाब में भारतीय वायुसेना के अड्डे पर आतंकी हमले से भारत में लोग बहुत विचलित हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सहयोगी दलों के लोग भी अपना बर्दाश्त खो रहे हैं, और शिवसेना ने खासे कड़े शब्दों में कहा है कि  गणतंत्र दिवस की परेड के हथियार क्या महज दिखाने के लिए हैं? दूसरी तरफ पाकिस्तान में लोगों का यह कहना है कि अभी आतंकी-हमलावरों के पाकिस्तानी होने की शिनाख्त भी नहीं हुई है, और पाकिस्तान पर तोहमत लगाना ठीक नहीं है। पाकिस्तान का एक तर्क यह भी है कि वह खुद अपनी जमीन पर आतंकी हमलों से परेशान है, और आए दिन वह खुद जिंदगियां खोते रहता है। भारतीय प्रधानमंत्री जाहिर है कि ऐसी नौबत में एक तनाव से घिरे हुए होंगे क्योंकि वे सौ कदम आगे बढ़कर खुद पाकिस्तान हो आए हैं, और अब वे पाकिस्तान की तरफ से हुए दिखने वाले हमलों को लेकर चुप रहने पर मजबूर हैं।
लेकिन सरहद के दोनों तरफ के जो समझदार लोग हैं वे हमेशा से यह कहते आए हैं कि जब कभी दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरने की नौबत आती है, तो आतंकी या साजिश करने वाले लोग समझौता एक्सप्रेस को पटरी से उतारने में लग जाते हैं। और यह बात काफी हद तक सही भी है। पाकिस्तान के साथ भारत के मुकाबले एक दिक्कत अधिक यह भी है कि वहां की फौज शायद देश की सरकार के काबू में उस तरह नहीं रहती जिस तरह भारत में एक मजबूत लोकतंत्र के चलने की वजह से है। लेकिन जैसा कि बड़े बुजुर्ग कह गए हैं, आप अपने दोस्त तो छांट सकते हैं, पड़ोसी नहीं छांट सकते, इसलिए पड़ोसियों से बेहतर रिश्तों की कोशिश हर समझदार-जिम्मेदार को करनी चाहिए। भारत और पाकिस्तान न सिर्फ पड़ोसी हैं, बल्कि दोनों के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते सदियों से चले आ रहे हैं, जब देश दो नहीं थे, सरहद नहीं थी, तब भी ये रिश्ते थे, और आज भी बनते हैं। फिर इन दोनों देशों के बीच संस्कृति, खेल, कला, और साहित्य का लेनादेना इतना अधिक है कि कोई सरहद इनके बीच अच्छी नहीं लगती। ऐसे में जब आतंकी इन दो देशों के रिश्ते बिगाड़कर जंग खड़ी करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी नीयत से हर किसी को चौकन्ना रहने की जरूरत है।
भारत चूंकि एक बड़ा देश है, इसमें लोकतंत्र अधिक मजबूत है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालत पार्टी के भीतर, सरकार के भीतर, और फौज पर, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के मुकाबले बहुत अधिक मजबूत है, इसलिए बड़प्पन दिखाने की अधिक जिम्मेदारी मोदी पर ही है। लेकिन मोदी यह बड़प्पन निभा पाएं, इसकी जवाबदेही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर भी आती है कि उनको खुलकर, खुद होकर यह खुलासा करना चाहिए कि भारत के भीतर हुए इस आतंकी हमले से उनके देश के किन लोगों का क्या लेना-देना हो सकता है, और ऐसी नौबत रोकने के लिए वे क्या कर रहे हैं? जब तक पाकिस्तान की तरफ ऐसा दिलासा नहीं आएगा, तब तक इस बात को भारत में अधिक लोग नहीं मानेंगे कि पाकिस्तानी आतंकियों को रोक पाना पाकिस्तान के लिए मुमकिन नहीं है। इन दोनों देशों के बीच सद्भावना न सिर्फ रहनी चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए। दोनों देशों के भीतर के लोग एक-दूसरे के खिलाफ जिस तरह की भड़काऊ बातें कहते आए हैं, उनके चलते भरोसा आसानी से कायम नहीं हो सकता, और इसके लिए सार्वजनिक रूप से बोलना भी जरूरी है।


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