दिल्ली से सीखने की जरूरत, और दिल्ली को सिखाने की भी

संपादकीय
10 जनवरी 2016

दिल्ली में हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसके आभार पर अदालत ने सरकार से बार-बार पूछा कि उसे सम-विषम कार नियम लागू करके एक पखवाड़े तक प्रदूषण क्यों नापना है, और यह एक हफ्ते में क्यों नहीं हो सकता? सरकार ने अदालत को अपना जवाब दिया है, लेकिन हमारा यह मानना है कि यह प्रयोग सिर्फ प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बहुत से सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं, शहरी यातायात का बहुत सा ऐसा मामला है जो कि इन पन्द्रह दिनों में सामने आ सकता है। और इस प्रयोग को खत्म करने की ऐसी हड़बड़ी भी नहीं करनी चाहिए कि लोग एक पखवाड़े के लिए कारों के इस्तेमाल पर रोकथाम को बर्दाश्त न कर सकें, और प्रतिबंधों के हिसाब से अपनी आवाजाही को दुबारा तय न कर सकें। 
एक तो दिल्ली सहित पूरे हिन्दुस्तान में राजनीतिक कड़वाहट इतनी फैल चुकी है कि भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच नफरत के सिवाय और कोई बात नहीं दिखती। केजरीवाल की राज्य सरकार के इस प्रयोग को नाकामयाब बताने के लिए दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों की बहुत पुरानी भीड़ की तस्वीरों को ताजा बताते हुए सोशल मीडिया पर नफरत का एक अभियान छेड़ा गया, और केजरीवाल को कोसा गया। दूसरी तरफ आम जनता ने मोटे तौर पर इस भारी प्रतिबंधों वाले प्रयोग का साथ दिया, और महज बड़बोले लोग इसके खिलाफ रहे। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि जिस दिल्ली में आज प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि बच्चे भयानक बड़े पैमाने पर अस्थमा के शिकार हो रहे हैं, लोगों के फेफड़ों में जहर जमा हो रहा है, लोगों के घंटों सड़कों पर ट्रैफिक में फंसे हुए खराब हो रहे हैं, वहां पर अगर शहरी आवाजाही को सुधारने के लिए कोई प्रयोग हो रहे हैं, तो उन्हें शुरू होने के पहले ही खारिज करना एक बेअक्ली के सिवाय और कुछ नहीं होगा। 
लेकिन अकेले दिल्ली के मामले को लेकर लिखना हमारा मकसद नहीं है। अभी दो दिन छत्तीसगढ़ में भी देश भर के शहरी नियोजक इक_ा हुए, और टाऊन प्लानिंग पर चर्चा हुई। इसमें भी यह बात सामने आई कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन बढ़ाए बिना गुजारा नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी भी भारी ट्रैफिक जाम झेलती है, और देश के सैकड़ों और शहरों का भी ऐसा ही हाल है। यह सिलसिला सार्वजनिक बसों या दूसरे साधनों की कमी से और निजी गाडिय़ों को बढ़ावा देने से आगे बढ़ते चल रहा है। यह अमरीका जैसा मॉडल है जिसमें जिसके पास निजी गाड़ी नहीं है, वह मानो जिंदा ही नहीं है। भारत को बहुत तेजी से इस नौबत को बदलना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि आज तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल-पेट्रोल की कीमतें जमीन पर आ गिरी हैं, और देश पर बोझ घटा है। लेकिन अगर यह कीमत एक तिहाई होने के बजाय तीन गुना हो गई होती, तो क्या भारत में लोग डेढ़ सौ रूपए लीटर का पेट्रोल खरीदकर चल पाते? अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें भारत के हाथ में नहीं हैं, और किसी भी दिन दुनिया में कोई युद्ध छिडऩे से ऐसी नौबत आ सकती है। वैसी हालत में देश के लोग निजी गाडिय़ों को चलाते हुए दीवालिया हो जाएंगे, और इसलिए भी शहरों में लोगों के लिए सार्वजनिक गाडिय़ां जरूरी हैं जिनसे निजी किफायत हो, सरकार का पेट्रोलियम आयात घटे, प्रदूषण घटे, और शहरी ट्रैफिक जाम में लोगों का बर्बाद होने वाला वक्त भी घटे। आज आग लगी हुई नहीं है, इसलिए भारत को सार्वजनिक परिवहन बढ़ाने का एक मौका वक्त के साथ मिला हुआ है। समझदारी से और तेजी से इसका इस्तेमाल करके निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटानी चाहिए, और शहरों को बसों या दूसरे साधनों से ऐसा सुविधा-संपन्न बनाना चाहिए कि लोग अपनी अगली पीढ़ी को अस्थमा दिए बिना जा सकें। 
और यह भी जरूरी नहीं है कि बाकी का भारत दिल्ली के इस प्रयोग को देखने के बाद ही जागे। कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें राज्यों में हुए प्रयोग से भी देश की राजधानी सीख और नसीहत ले सकती है, और हर राज्य को युद्ध स्तर पर स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक शहरी आवाजाही के मॉडल विकसित करने चाहिए। 

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