दूसरे देशों की संक्रामक महामारी से गंदे हिन्दुस्तान को सीखने की जरूरत

संपादकीय
27 जनवरी 2016

दक्षिण और मध्य अमरीका के कुछ देशों में जीका नाम के एक वायरस के खतरे को देखते हुए लोगों को यह सलाह दी गई है कि वे 2018 तक गर्भधारण न करें। डेंगू की तरह मच्छरों से फैलने वाले इस वायरस से दुनिया के दर्जनों देश खतरे में आ गए हैं, और अमरीका के आसपास के देशों के अलावा कैरेबियन देशों में भी यह बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है, और इससे प्रभावित गर्भवती महिलाओं के बच्चे बहुत छोटे और विकृत सिर के साथ पैदा हो रहे हैं। दूसरी तरफ एक अलग खबर में योरप के डेनमार्क से भी खबर आई है कि वहां एक नागरिक को जीका वायरस से प्रभावित पाया गया है। 
भारत इन इलाकों से खासा दूर है लेकिन भारत भी पिछले बरसों में डेंगू से लेकर स्वाइन फ्लू तक कई तरह की संक्रामक बीमारियों को झेल चुका है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले गुजरात के सूरत में प्लेग ऐसी बुरी तरह फैला था कि लोग वहां से आने वाली गाडिय़ों से लोगों का उतरना भी पसंद नहीं कर रहे थे। और भारत के साथ एक दिक्कत यह भी है कि यहां तीर्थयात्राओं के मौकों पर एक-एक जगह पर लाखों लोग जुटते हैं, और साफ-सफाई की समझ या परवाह हिन्दुस्तानियों में न के बराबर है। लोग जहां पखाना करते हैं, उसी के आसपास खाना भी पकता है और लोग वहीं खा भी लेते हैं। लोग गरीबी में गंदा पानी पीने को बेबस रहते हैं, और खराब हो चुके खाने से भी लाखों लोगों का पेट भरता है। ऐसे में अगर यह कल्पना करें कि जिस तरह मुर्गीखानों में बीमारियां फैलने के बाद एक-एक प्रदेश में दसियों लाख मुर्गियां या तो मर जाती हैं, या मारी जाती हैं, वैसी नौबत अगर भारत में इंसानों के बीच आ जाए तो क्या होगा? 
गुजरात के लोग बताते हैं कि प्लेग के बाद सूरत शहर में इतना साफ रहना सीख लिया था, कि वह लोगों के लिए मिसाल बन गया था। अब उसी गुजरात के नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनकर पूरे देश में सफाई अभियान छेड़े हुए हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी हैं कि गंदगी करने की अपनी अपार क्षमता के पूरे इस्तेमाल से कम और किसी बात पर समझौता नहीं करते। आज अगर हिन्दुस्तानी शहरों में लोग अगर यह सोचें कि वे पैदल चलकर ट्रैफिक जांच और ईंधन की खपत घटाने में मदद कर सकते हैं, तो सड़कों के किनारे आमतौर पर इस कदर गंदगी रहती है कि बदबू के बीच वहां से निकलना मुश्किल पड़ता है। ऐसे देश में जब संक्रामक रोग आकर फैलेगा, तो भ्रष्टाचार से लदी हुई सरकारी दवा खरीदी, बेअसर और निकम्मी सरकारी स्वास्थ्य सेवा किस हद तक किसी महामारी का मुकाबला कर पाएगी यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। आज हिन्दुस्तान इन खबरों को महज पढ़ रहा है कि किस तरह दूसरे देशों में बच्चे विकृत सिरों के साथ पैदा हो रहे हैं, लेकिन जो देश भी गंदा रहता है, वहां कभी भी इस तरह की, या इससे भी बुरी कोई संक्रामक बीमारी आ सकती है, और आने वाली पीढ़ी को जिंदगी भर के लिए कई तरह की बीमारियों के साथ पैदा करके टिकी भी रह सकती है। 
भारत जैसे गंदे देश को अपनी सेहत के लिए न सिर्फ इलाज पर अंधविश्वास से बचना चाहिए, बल्कि सामाजिक और निजी स्तर पर साफ-सफाई की आदत भी डालनी चाहिए। अगर किसी संक्रामक रोग से लाखों हिन्दुस्तानी मारे जाएंगे, तो भी वह सस्ता पड़ेगा, बजाय इसके कि लाखों बच्चे बाकी पूरी जिंदगी के लिए किसी गंभीर बीमारी के साथ पैदा हों। भारत में ऐसी नौबत आने पर लोग इसे पिछल जन्म के पाप से जोड़ देंगे, या यह कहने लगेंगे कि जब धरती की आबादी बढ़ती है तो ईश्वर इसी तरह उसे काबू में करता है। लेकिन ऐसी तमाम बातों के बीच लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे अपनी आने वाली पीढ़ी को गंदगी के साथ-साथ ऐसी महामारी का तोहफा भी देकर जाना चाहते हैं? लोग अपनी अगली पीढिय़ों के लिए जमीन-जायदाद तो जुटाकर जाते हैं ताकि अगली सात पुश्तें आराम से जियें, लेकिन गंदगी और महामारी के बीच जीना भी कोई जीना होगा?

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