बाजारों के ढांचे का इस्तेमाल चौबीसों घंटे क्यों नहीं हो?

संपादकीय
4 जनवरी 2016

केन्द्र सरकार की खबर है कि वह दुकानों, बाजार या रेस्त्रां चौबीसों घंटे खुले रखने की इजाजत देने के लिए कानून में बदलाव लाने की तैयारी में है। आज देश का यह आर्थिक ढांचा आमतौर पर आधे वक्त ही काम आता है, और बड़े शहरों में भी बाजार रात से सुबह तक बारह घंटे बंद रहते हैं। एक तरफ तो दिल्ली जैसे शहर गाडिय़ों के प्रदूषण से घबराकर बड़े कड़े प्रयोग कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कल्पनाशीलता की कमी लोगों में है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से छत्तीसगढ़ सरकार को यह सलाह देते आ रहे हैं कि होटल, रेस्त्रां देर रात तक खुले रहने चाहिए, और बाजार भी, जिससे कि दिन में ट्रैफिक की भीड़ के बीच लोगों को बाजार निपटाने की मजबूरी न हो। आज लोगों के काम के समय अलग-अलग हैं, लोग शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं, पढऩे वाले नौजवान देर रात तक जागते हैं, और लोगों की खरीददारी की सहूलियत अलग-अलग समय पर रहती है। 
दरअसल सरकार जब कभी कारोबार पर बहुत अधिक नियमों को लादती है, तो उसका नुकसान देश की अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ता है। आज क्या वजह है कि टीवी चैनल चौबीसों घंटे काम करते हैं, लेकिन लोगों को खाने का सामान देर रात नहीं मिल पाता। और तो और बाजार सुनसान होने से दवा की दुकानें भी इक्का-दुक्का ही खुली रहती हैं। जो लोग दिन में खरीददारी नहीं कर पाते, वे रात में बाजार नहीं जा पाते। दिन में पार्किंग की जगह नहीं, और रात में शटर बंद। यह सिलसिला पहले से खत्म होना था, लेकिन सरकारों की आदत अनंतकाल से नियमों को थोपने की है। आज केन्द्र सरकार के सामने यह मुद्दा इसलिए भी खड़ा है कि लोग इंटरनेट पर ऑनलाईन खरीददारी करते चल रहे हैं, और बाजारों का भौतिक ढांचा पिछड़ते चले जा रहा है। लोग दो बजे रात भी ऑनलाईन सामान छांटकर ऑर्डर कर देते हैं, लेकिन बाजार नहीं जा पाते। यह सिलसिला जितनी जल्दी खत्म हो, उतना ही अच्छा है। 
इसके साथ एक बात और है, जब भारत पर्यटकों की उम्मीद करता है, अंतरराष्ट्रीय पूंजीनिवेश पाने की कोशिश करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय शहरों के तौर-तरीकों को भी सीखना पड़ेगा। दुनिया के विकसित और बड़े शहर दिन-रात एक ही तरह काम करते हैं, और उसका फायदा उनके लोगों को भी मिलता है, पर्यटकों को भी, और अर्थव्यवस्था को भी। दिल्ली शहर में आज बाहर से आए पर्यटक रात आठ बजे के बाद हस्तकला का कोई सामान नहीं खरीद सकते, हाथकरघे के कपड़े नहीं खरीद सकते, क्योंकि बाजार बंद करने का नियम है। ऐसे में पर्यटकों का सीमित समय न उनके काम आ पाता, और न ही भारत के दुकानदारों को देशी-विदेशी सैलानियों से हो सकने वाली संभावित कमाई हो पाती है। 
भारत की सरकारी सोच को ग्राहक और बाजार इन दोनों के लिए दोस्ताना नजरिया बनाना होगा, आज तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग इस बात के लिए बेताब रहते हैं कि कैसे दूसरों पर अपना हुक्म लादा जाए। अब पूरी दुनिया की सरकारें बाजार के मुताबिक चल रही हैं, और देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों तक भाजपा की सरकारें हैं, और यह पार्टी व्यापारियों की हमदर्द मानी जाती है। इन सबको देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को भी यह सोचना चाहिए कि जहां केन्द्र के कानूनी फेरबदल की जरूरत नहीं है, वहां पर वह खुद किस तरह अपने शहरों की जिंदगी को लंबा कर सकती है, बाजारों को देर तक खोलकर, और ट्रैफिक जाम कम करके। 

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