हमलावर सोच वाले अमरीका में ओबामा के आंसू बेमतलब

संपादकीय
6 जनवरी 2016

अमरीका में घर-घर में बिखरे हथियारों से हर दिन कोई न कोई बेकसूर मारे जा रहे हैं, और वहां पर हथियार बनाने वाली कंपनियां इन पर किसी तरह की रोक लगने नहीं देती। आज वहां पर गन-कंट्रोल की वकालत करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा रो पड़े। उन्होंने इस बात पर तकलीफ जताई कि हर दिन कहीं न कहीं बेकसूर बच्चे मारे जा रहे हैं। 
यह बात सही है कि हॉलीवुड की फिल्मों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी जंग की कहानियों तक, और अमरीका के घर-घर में फैले हुए भयानक हथियारों तक से अमरीकी मिजाज हमलावर और कातिल सा हो गया है। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि हथियार बनाने वाली कंपनियों से परे भी अमरीकी जनता खुद होकर हथियारों का मोह छोड़ पाएगी, तो इसके लिए उस देश को अपनी पूरी सोच बदलनी पड़ेगी। जिस देश में यह लंबा इतिहास हो कि दुनिया के बेकसूर देशों पर जाकर किस तरह बमबारी की जाए, किस तरह सरकारें पलटी जाएं, कैसे अपने जहाजी बेड़े दूसरे देशों में भेज दिए जाएं, उस देश में घरेलू सोच को हथियारों के आकर्षण से बचा पाना मुमकिन नहीं है। चूंकि हर आम अमरीकी वियतनाम या इराक जाकर फौजी विमानों से बम नहीं बरसा सकते, इसलिए वे हॉलीवुड के हीरो या विलेन की तरह हथियारों को थामकर अपनी हसरत पूरी करते हैं। वे निशानेबाजी के अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज में जाते हैं, बंदूकें लेकर जंगलों में शिकार के लिए जाते हैं, और घर-घर में हथियार सजाकर रखते हैं। दुनिया का यह सबसे विकसित देश इस कदर के बावलेपन का शिकार है कि आत्मरक्षा के नाम पर वहां पर लोगों को ऐसे हथियार खरीदने की इजाजत है जो कि मिनटों में सैकड़ों की जान ले सकते हैं। यह हथियार किसी भी तरह से आत्मरक्षा के लिए बने ही नहीं हैं, तब तक जब तक कि कोई फौज ही किसी घर पर हमला न कर दे। और ऐसे हथियारों के साथ जीते और सोते हुए लोग कब तनाव के किसी पल में उन्हें लेकर विश्वविद्यालयों में घुस जाते हैं, या स्कूलों में घुस जाते हैं, और दर्जनों को मारकर आ जाते हैं। 
अमरीका दरअसल एक बहुत ही हिंसक मानसिकता का देश कई मायनों में बन गया है। जानलेवा हथियारों से परे भी पर्यावरण के मुद्दों से लेकर कारोबार के कानूनों तक अमरीका दूसरे देशों पर धाक जमाए रखता है। और वहां की सरकारों की यही सोच वहां की जनता के दिल-दिमाग में भी समा जाती है। अपने देश को दुनिया का रखवाला, दुनिया का सबसे ताकतवर, दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक देश मानकर चलने वाले अमरीकी धरती पर अपना एक अनोखा हक मानकर चलते हैं। वे कुदरत के दिए हुए साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल, और बेजा इस्तेमाल, करते हैं, और बाकी दुनिया को प्रदूषण का बोझ उठाने का जिम्मा दे देते हैं। अमरीका हथियारों पर पाबंदी लगाए, यह तो उसका घरेलू मामला है, लेकिन बाकी दुनिया पर एक दादा की तरह हमले करे, यह तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं के सोचने का भी मुद्दा है जिन्हें कि अमरीका ने पांव-पोंछने जैसा बनाकर रखा है। 
फिलहाल अमरीकी राष्ट्रपति के आंसू अधिक मायने इसलिए नहीं रखते क्योंकि अमरीका में साल भर में घरेलू हथियारों से जितने अमरीकी मारे जाते हैं, उनसे सौ गुना अधिक बेकसूर दूसरे देशों में अमरीकी फौजें जाकर मारते आई हैं। अमरीका चूंकि मीडिया में छाए रहता है, इसलिए वहां ओबामा के आंसू दुनिया की हर टीवी स्क्रीन से टपकने लगते हैं, लेकिन अमरीका जब तक अपनी हमलावर सोच को नहीं मिटाएगा, तब तक उसके लोगों का मोह भी निजी हथियारों से कम नहीं होगा। यही एक फर्क है जो कि भारत जैसे अमन-पसंद देशों और अमरीका में हमेशा बने रहेगा। गांधी की बताई राह के चलते आम हिन्दुस्तानी लाठी तक से बचे रहते हैं। इस बारे में अमरीका को हिन्दुस्तान जैसे देशों से सीखना चाहिए। 

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