संविधान की सालगिरह कड़वा एहसास लाती है

संपादकीय
25 जनवरी 2016

भारतीय संविधान के लागू होने की सालगिरह एक बार फिर आ गई। यह संविधान भारत के लोगों को जिन अधिकारों का भरोसा दिलाता है, वे सारे के सारे आज तरह-तरह के खतरों का सामना कर रहे हैं। धार्मिक समानता, अमीर और गरीब के अधिकारों का फर्क, अलग-अलग जातियों के बीच समानता की बात, लोगों के समान अवसरों की बात, ये सब खतरे में हैं। और जो तबके गैरबराबरी को झेल रहे हैं, वे इसकी तकलीफ को समझ रहे हैं, और मन के भीतर उबलते हुए भी उनको यह समझ नहीं आ रहा है कि लोकतंत्र के दायरे में रहते हुए वे क्या कर सकते हैं? 
देश की आर्थिक नीतियां लगातार बड़े पूंजीपतियों की मर्जी की होती चली गई हैं, और जनता के हक वाली खदानें, जमीनें, पानी, जंगल और आसमान, उन सब पर पैसे वालों का जिस तरह का हक हो गया है, उसमें गरीब की कोई आवाज नहीं रह गई, और उसका कोई हक नहीं रह गया। रात-दिन प्रदूषण की चर्चा होती है, उसके सुबूत और आंकड़े सवाल बने हुए खड़े रहते हैं लेकिन सरकारों का कोई काबू कारखानों पर नहीं रहता। धीरे-धीरे करके तमाम शहरी जिंदगी संपन्न तबके के लायक होती चली गई है, और गरीब हाशिए पर जा चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई से लेकर इलाज तक, इन सबका जिस रफ्तार से और जिस अंदाज में निजीकरण हुआ है, संविधान के बराबरी की सोच में अब गरीब कहीं नहीं रह गए। उनके बच्चों के इलाज से लेकर पढ़ाई तक गैरबराबरी झेल रहे हैं। 
संविधान के तहत देश का जो कानून है, वह गैरबराबरी की सबसे बड़ी मिसाल है। ताकतवर लोग अदालतों में और भी अधिक ताकतवर साबित होते हैं, और गरीब शिकायतकर्ता भी अदालतों में मुजरिम की तरह सहमे खड़े रहने को मजबूर रहते हैं। देश की मौजूदा न्याय व्यवस्था में किसी गरीब के इंसाफ पाने की संभावनाएं बहुत बुरी तरह घट चुकी हैं, और वे उतनी ही रह गई हैं, जितनी कि किसी ताकतवर के सजा पाने की हैं। लेकिन यह सब लोकतंत्र के नाम पर, और लोकतंत्र कहे जाने वाले ढांचे के भीतर ही इस तरह से हुआ है कि बिना खून बहाए लोकतंत्र के साथ हिंसा हो गई, गरीबों के तन-मन पर जख्म आ गए, और यह सब जुर्म की तरह दर्ज भी नहीं हो रहा है। 
भारत के लिए लोकतंत्र से बेहतर और कोई व्यवस्था हो नहीं सकती थी, हो नहीं सकती है, लेकिन लोकतंत्र के लचीलेपन का सारा इस्तेमाल जब ताकतवर तबके मिलकर अपने वर्गहित में कर रहे हैं, तो फिर संविधान की सालगिरह का क्या मतलब रह जाता है? हमारे पास मनाने के लिए इससे बेहतर और कोई बात है नहीं, लेकिन मनाने की यह नौबत भी भला किसी जश्न की नौबत है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें