राज्य सरकारें म्युनिसिपलों के लिए दानदाता बनना छोड़ें...

संपादकीय
 29 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की तरफ से संपत्ति कर को डेढ़ गुना करने की घोषणा के बाद विपक्षी कांग्रेस ने आज प्रदेश बंद रखा है, और सरकार के खिलाफ यह एक बड़ा मुद्दा बन रहा है। लोकतंत्र में एक तरफ सरकार को टैक्स बढ़ाकर कमाई करने, और उसे जरूरी कामों पर खर्च करने का एक बुनियादी हक है, और दूसरी तरफ सत्तारूढ़ पार्टी की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह अपने ऐसे काम को तर्कसंगत और न्यायसंगत ठहराने के लिए जनता के सामने अपना पक्ष रखे। दूसरी तरफ एक चौकन्ने विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी होती है कि सरकारी फैसलों से असहमत होने पर उन्हें लेकर सरकार को जनता के बीच घेरे। और संपत्ति कर बढऩे का मुद्दा किसी राजनीतिक कटुता का मुद्दा नहीं है, यह जनता से जुड़ा हुआ एक मुद्दा है, जिस पर सरकार को अपना नजरिया सार्वजनिक रूप से साफ करना ही होगा। 
शहरी विकास हो या गांवों का विकास, वह टैक्स बिना पूरा नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ-साथ दो-तीन मुद्दे जरूरी हैं, एक तो यह कि टैक्स का बोझ उन पर अधिक पडऩा चाहिए चूंकि उसे ढोने की ताकत रखते हैं। शहरों में बड़े और महंगे मकानों पर संपत्ति कर इसी आधार पर तय भी किया जाता है, लेकिन इसे और अधिक तर्कसंगत बनाने की जरूरत है, और यह समझने की जरूरत है कि किस तरह संपन्न तबका सड़कों से लेकर सड़क पर गाडिय़ां खड़ी करने तक कई तरह से शहरी-क्षमता का इस्तेमाल करता है। दूसरी बात यह कि सरकार जब वसूले गए टैक्स का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के आरोपों के बिना कर पाती है, तो लोगों को टैक्स देने में उतना दर्द भी नहीं होता। शहरी स्थानीय संस्थाओं में अधिकारी-कर्मचारी से लेकर निर्वाचित लोगों तक ये भ्रष्टाचार की कहानियां रोज ही सामने आती हैं, और ऐसी संस्थाओं द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स देने में लोगों को दर्द अधिक होता है। तीसरी बात यह कि स्थानीय संस्थाओं को अपनी कमाई बढ़ाकर उससे काम चलाना सीखना चाहिए, और यह बात छत्तीसगढ़ सरकार के स्थानीय शासन मंत्री भी बार-बार कह चुके हैं। 
लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से प्रदेश की स्थानीय संस्थाओं के चुंगीकर को बंद करके म्युनिसिपलों की कमाई का एक बड़ा जरिया खत्म कर दिया गया था। उस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर संगठित चोरी होती थी, और कदम-कदम पर गाडिय़ों को रूककर जांच करानी पड़ती थी। उसका खत्म होना तो ठीक हुआ, लेकिन उसके बाद से म्युनिसिपल अनुदान के लिए राज्य सरकारों पर इस तरह मोहताज हो गई हैं कि मानो वे चंदा मांगते किसी के दरवाजे खड़ी हों। हमारा मानना है कि पश्चिमी देशों की तरह स्थानीय म्युनिसिपल को न सिर्फ टैक्स, बल्कि योजना बनाने, और कमाई बढ़ाने के अधिकार बहुत अधिक मिलने चाहिए, और इसी से स्थानीय लीडरशिप की कल्पनाशीलता का उपयोग हो सकेगा। अलग-अलग शहर अपनी कल्पनाशीलता, क्षमता और अपनी मेहनत से अपनी संभावनाओं को पा सकेंगे। और एक शहर दूसरे कामयाब शहर से कुछ सीख भी सकेंगे। 
राज्य सरकारें शहरों पर अपने कब्जे को ढीला करना नहीं चाहती हैं। जबकि सरकार को एक मोटे ढांचे के भीतर जाकर बहुत बारीकी के काम नहीं करना चाहिए। शहरों को अपने हिसाब से विकसित होने का मौका देना चाहिए। विकसित दुनिया में न सिर्फ फायर ब्रिगेड, बल्कि पुलिस भी स्थानीय संस्थाओं के मातहत होती है, और वैसी ही दुनिया अधिक आगे भी बढ़ती है। वहां पर स्थानीय संस्थाओं से निकलकर जो लीडरशिप सामने आती है वह प्रदेश और देश का बेहतर विकास भी कर पाती है। भारतीय सोच यह है कि जिसके हाथ में जो अधिकार आ गए हैं, उनको वे छोडऩा ही नहीं चाहते। अगर स्थानीय संस्थाओं को खुलकर काम करने दिया जाएगा, तो वे राज्य सरकारों के मुकाबले भी अधिक विकास करके दिखा सकती हैं। 
संपत्ति कर बढ़ाया जाए, या नहीं, और बढ़ाएं तो कितना बढ़ाएं, यह सब स्थानीय स्तर पर तय होना चाहिए, न कि राज्य सरकार के स्तर पर। और राज्य सरकार को बुनियादी पैमानों पर देख-रेख करने से परे, म्युनिसिपलों के रोज के कामकाज, उनके छोटे-छोटे मुद्दों में दखल नहीं देनी चाहिए। देश में एक स्वस्थ लोकतंत्र विकसित होने के लिए भी यह जरूरी है। लेकिन जब तक राज्य सरकारें अपने आपको अनुदान देने की दानदाता वाली भूमिका में पसंद करती रहेंगी, शहर विकसित नहीं हो पाएंगे।

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