जोगी से परे छत्तीसगढ़ कांग्रेस, और कांग्रेस से परे जोगी

संपादकीय
7 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के इतिहास में विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल को पार्टी से निकालने की कार्रवाई के बाद यह शायद तीसरी सबसे बड़ी कार्रवाई है जब अमित जोगी को पार्टी से निकाला गया है, और अजीत जोगी को निकालने का प्रस्ताव पारित करके पार्टी हाईकमान को फैसले के लिए भेज दिया गया है। बरसों से इस किस्म की सुगबुगाहट चली आ रही थी, और प्रदेश के लोगों को हर बार ऐसा लगता था कि अब शायद जोगी पिता-पुत्र पर पार्टी विरोधी हरकतों की वजह से कार्रवाई होगी, लेकिन लोगों का अनुभव यह था कि सोनिया गांधी के पास जोगी के खिलाफ किसी तरह की कोई सुनवाई नहीं होती, और सारी सिफारिश धरी रह जाती है। प्रदेश में कांग्रेस के एक से अधिक अध्यक्षों का अनुभव यही रहा कि दिल्ली में जोगी के खिलाफ कोई सुनवाई नहीं होती, और सोनिया के दरबार में उनकी पकड़ एक रहस्य बनी रहते आई है। अजीत जोगी सार्वजनिक रूप से हर मौके पर यह बात भी कहते आए हैं कि उनके परिवार के सारे मामले सोनिया गांधी खुद तय करती हैं, और वे अपने राजनीतिक फैसले खुद नहीं लेते।
छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति को दूर से देखने वाले लोगों का भी यह अनुभव रहा है कि अजीत जोगी और उनके बेटे का कांग्रेस संगठन के साथ शतरंज के घोड़े की तरह का ढाई घर का रिश्ता रहते आया है। चरणदास महंत हों, या धनेन्द्र साहू, या फिर भूपेश बघेल, अजीत जोगी के लिए इनमें से किसी को भी बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं था, और ऐसे दर्जनों मौके हैं जब दिल्ली से आए हुए कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में अजीत जोगी ने प्रदेश के बाकी तमाम बड़े नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई, और अपने लोगों से उठवाई। दरअसल जोगी का बर्ताव कांग्रेस के बाकी तमाम छत्तीसगढ़ी नेताओं के लिए बड़ी हिकारत का रहते आया है, और मौके-बेमौके उन्होंने इसे जाहिर करने से कोई परहेज नहीं किया। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने सरकार और संगठन को जिस तरह से अकेले चलाया, वे उस ताकत की याद और हसरत से कभी उबर नहीं पाए, और पिछले बारह बरस वे किसी और कांग्रेस नेता को बर्दाश्त नहीं कर पाए। 
लेकिन अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के कुछ समुदायों पर खासी पकड़ रखने की वजह से भी जाने जाते हैं, और उन पर लगातार ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि चुनावों में वे बहुत से कांग्रेस उम्मीदवारों को हराने का काम करते हैं। यह कांग्रेस पार्टी का भीतरी मामला है, और जनता के हक में महज यह हैरानी है कि ऐसे आरोपों के बावजूद कभी जोगी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लेकिन अनगिनत बरसों से छोटी और बड़ी अदालतों में लगातार जाति के मामले, नागरिकता या चुनाव याचिका के मामले झेलते हुए अमित जोगी और अजीत जोगी एक असाधारण लड़ाई लड़ते आए हैं। हत्या के मामले में अमित जोगी के जेल में कटे बरस को लेकर भी लोगों को लगता था कि उनकी ताकत टूट जाएगी, लेकिन वैसा नहीं हुआ। मुख्यमंत्री रहते हुए जोगी ने भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायकों का जिस तरह दल-बदल कराया, जिस तरह उसके बाद उनका नाम चुनाव हारने के बाद भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा, जिस तरह वे मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस पार्टी से निलंबित हुए, और जिस तरह एक  सड़क हादसे के शिकार होकर पहियों वाली कुर्सी पर आ गए, वह एक बहुत ही असाधारण जीवट जीवन है। 
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास पसंद बड़ी साफ दिखाई पड़ती है। या तो कांग्रेस पार्टी को जोगी के हवाले कर दिया जाए, और बाकी तमाम नेताओं को कांग्रेस से हटा दिया जाए, तो अजीत जोगी प्रदेश में सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। और दूसरी तरफ जोगी पिता-पुत्र को पार्टी से हटा दिया जाए, तो बाकी नेता प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि इन दोनों पक्षों का सहअस्तित्व बनाए हुए कांग्रेस पार्टी इस प्रदेश में कभी सरकार में आए, तो वह एक असंभव सी बात लगती है। राजनीति में संभव या असंभव कुछ नहीं होता, और किस तरह जमीन पर गिरने के बाद उठकर आसमान तक पहुंचा जाता है, यह अजीत जोगी ने कई बार साबित किया है। लेकिन अब देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी की बर्दाश्त के ऊपर से पानी निकल जाने के बाद कांग्रेस हाईकमान की आंख खुलती है या नहीं? और अगर पिता-पुत्र दोनों को कांग्रेस से हटा दिया जाता है, तो वे राज्य में एक तीसरी प्रादेशिक शक्ति के रूप में उभर सकते हैं, या नहीं? कांग्रेस से परे जोगी छत्तीसगढ़ के चुनावों में एक ऐसा त्रिकोण बना सकते हैं, जो मतगणना तक सभी लोगों को बेचैन रख सकता है। फिलहाल कांग्रेस पार्टी को यह तय करना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को जोगी परिवार को लीज पर देकर चुनाव जीतने की उम्मीद करे, या जोगी से परे बाकी कांग्रेस नेताओं को पार्टी में रखे। 

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