आमिर के बाद अमिताभ, दिक्कत क्या है?

25 जनवरी 2016

भारत में विदेशी सैलानियों को खींचने के लिए बरसों से आमिर खान ब्रांड एम्बेसडर बने चले आ रहे थे। अब उनके साथ अनुबंध खत्म होने के बाद अमिताभ बच्चन को यह जिम्मा दिया गया है। लोगों को यह ताजा मामला याद होगा जब आमिर खान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि देश में असहिष्णुता को देखकर उनकी पत्नी सहमी हुई हैं, और उन्होंने आमिर से पूछा है कि क्या बच्चों के लिए यह देश सुरक्षित रहेगा, या इसे छोड़कर कहीं चले जाना चाहिए। ये शब्द थोड़े से अलग हो सकते हैं, लेकिन बात कुल मिलाकर ऐसी ही थी, और इसके लिए आमिर खान को देश का गद्दार तक करार दे दिया गया था, उनकी फिल्मों के बहिष्कार की घोषणा की गई थी, और सैकड़ों शहरों में उनकी तस्वीरों को जूते मारे गए थे। 
अब सोशल मीडिया और इंटरनेट मीडिया पर लोगों ने अमिताभ बच्चन को कोसना शुरू किया है कि आमिर खान को हटाकर मोदी सरकार ने जो रूख दिखाया है, उसके चलते अमिताभ को यह जिम्मा नहीं लेना था। कुछ लोगों को यह बात तर्कसंगत लग सकती है कि एक फिल्म अभिनेता को इस तरह हटाने, या जारी न रखने के मामले में दूसरे अभिनेता को यह जिम्मा नहीं लेना था। लेकिन बातों को तर्कसंगत या न्यायसंगत तरीके से देखना सीखना चाहिए। व्यक्ति और मुद्दे तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन इंसाफ का नजरिया बने रहना अधिक जरूरी होता है। 
पहली बात तो यह कि आमिर खान ने चाहे सार्वजनिक मंच से अपनी एक घरेलू बात का जिक्र किया हो, उस बात को देश के साम्प्रदायिक तबके ने गलत तरीके से लिया, और उसका एक बिल्कुल बेइंसाफ विरोध शुरू किया है। जब तक देश के किसी नागरिक ने सचमुच देश से गद्दारी न की हो, और वह किसी अदालत में साबित न हो जाए, तब तक उसे गद्दार कहने वाले लोग लोकतंत्र और इंसानियत के साथ गद्दारी तो करते ही हैं। आमिर को गद्दार कहने वाले तमाम लोग इस पैमाने पर अपने बयान के साथ ही गद्दार साबित हो चुके थे। 
लेकिन वह मुद्दा एक अलग है, और एक दूसरा मुद्दा अब यह आता है कि देश के पर्यटन को बढ़ावा देने का काम किसे दिया जाना चाहिए? आमिर खान ने अपनी घरेलू चर्चा को सार्वजनिक बहस बनाते हुए एक ऐसी छवि देश की बनाई कि यहां असहिष्णुता को लेकर लोगों के बीच घबराहट है। यह बात पूरी तरह सही है, और देश में लाखों लोग यह फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और वे लोग मुस्लिम या अल्पसंख्यक हों, भाजपा या संघ के विरोधी हों, ऐसा भी नहीं है, आम लोग देश में इन दिनों खड़े हुए तनाव को लेकर फिक्रमंद हैं। 
हर देश की जिम्मेदारी यह रहती है कि वह ऐसे तनावों के बीच भी दूसरे देश के सैलानियों को आकर्षित करे। और सरकार की अपनी ऐसी बुनियादी जिम्मेदारी क्या आमिर खान को ब्रांड एम्बेसडर बनाए रखकर जारी रह सकती थी? ब्रांड एम्बेसडर का मतलब ही यह होता है कि किसी की शोहरत, किसी की खूबसूरती, किसी का नाम, किसी का काम, इस्तेमाल करके किसी देश या प्रदेश के लिए लोगों को खींचा जा सके। ऐसा करने के लिए बाजारू कंपनियां भी जिन लोगों को ब्रांड एम्बेसडर बनाती हैं, उनके किसी भी विवाद में फंसने पर आनन-फानन उन लोगों को उस काम से हटा दिया जाता है। 
अब आमिर खान के साथ अनुबंध पूरा हो चुका था। सरकार को किसी नाम पर फैसला लेना ही था। ऐसे में जब आमिर खान एक विवाद, चाहे जायज, चाहे नाजायज, में फंसे हुए थे, तो यह बात जाहिर है कि वे भारत के नाम को दूसरे देशों में बढ़ावा देने के लिए सबसे सही व्यक्ति तो नहीं थे। और ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी यह बनती है कि वह किसी विवादहीन को यह जिम्मा दे, जो देश की हालत या आलोचना के साथ जुड़ा हुआ न दिखता हो। ऐसे में आमिर की जगह अमिताभ को लाने का सरकार का फैसला गलत नहीं कहा जा सकता, और आमिर को ही वह काम जारी न रखकर अमिताभ को दिया गया काम मंजूर करके अमिताभ ने कुछ गलत नहीं किया। यह न तो एक अभिनेता को बेरोजगार करके उसका काम छीनने जैसे बात है, और न ही आमिर ने इसे मुद्दा बनाकर किसी से यह अपील की थी कि उन्हें ब्रांड एम्बेसडर आगे भी रखा जाए, कोई और यह जिम्मा न ले। 
किसी सरकार या बाजार के लिए ही नहीं, बहुत से गैरसरकारी संगठन भी ऐसे होते हैं जो कि अपने मुद्दों के प्रचार-प्रसार के लिए किसी खिलाड़ी को, या किसी फिल्मी सितारे को ब्रांड एम्बेसडर बनाते हैं, और ऐसे लोगों के किसी भी विवाद मेें फंसने पर जब उनको हटाया जाता है तो वे खुद भी विवाद को आगे नहीं बढ़ाते, जैसा कि आमिर ने भी इसे आगे नहीं बढ़ाया।
दरअसल मोदी सरकार की आलोचना में लगे हुए चौकन्ने और जिम्मेदार लोग हर बात पर आलोचना करके कभी-कभी गैरजिम्मेदारी भी दिखा बैठते हैं। ऐसे ही लोग अमिताभ बच्चन को बहुत मतलबपरस्त कह रहे हैं कि उन्होंने भारत का ब्रांड एम्बेसडर बनना क्यों मंजूर कर लिया? किसी अखबार के संपादक का अनुबंध पूरा हो जाए, और उसे आगे न बढ़ाया जाए, तो क्या कोई दूसरा उसका संपादक न बने? किसी क्रिकेट टीम में किसी एक खिलाड़ी को आगे जारी न रखा जाए, तो क्या दूसरे खिलाड़ी उस टीम में शामिल ही न हों?
आज भारत में बहस में शामिल लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर अपनी खुद की विश्वसनीयता को खोकर भी अपनी असहमति को जताना चाहते हैं। मोदी के भक्त और मोदी के विरोधी तबके अपने-अपने पूर्वाग्रहों के साथ देश के हर मुद्दे को इन दो खेमों में बांटने में लगे रहते हैं। एक खेमा दूसरे को भक्त कहता है, फेंकू कहता है, और दूसरा तबका इन लोगों को सिक्यूलर (मानसिक बीमार सेक्युलर) साबित करते रहता है। इनके बीच तर्क और न्याय ये दोनों पिस रहे हैं। ऐसे में इंसाफपसंद एक ऐसा तबका जरूरी है जो दोनों तरफ के हमले झेलने की कीमत पर भी इंसाफ की बात कर सके, और पूर्वाग्रह की इस लड़ाई में खेमेबाजी में न लग जाए। हमारा यह मानना है कि किसी धर्म या विचारधारा, संगठन या मुद्दे के समर्थक भी तभी तक काम के रहते हैं जब तक कि वे अपनी खुद की विश्वसनीयता कायम रख सकें। अपनी साख खोने वाले अपने झंडे की साख को ऊपर नहीं ले जा सकते। 

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