भारत में निराशा-हताशा, और आत्महत्याएं घटें भी तो कैसे?

संपादकीय
24 जनवरी 2016

दक्षिण भारत में एक मेडिकल कॉलेज की तीन छात्राओं ने कल प्रबंधन से नाराज होकर एक साथ कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में आज ही सुबह के अखबार दो बच्चों की अलग-अलग आत्महत्या की खबरों के हैं, एक को स्कूल न जाने पर मां-बाप ने डांटा तो उनके जाते ही उसने फांसी लगा ली, और एक दूसरी स्कूली बच्ची ने स्कूल से घर लौटते ही आग लगाकर जलते हुए छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। इन सब घटनाओं का एक-दूसरे से लेना-देना नहीं है, लेकिन हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र की दलित मुद्दों को लेकर की गई आत्महत्या के बीच ऐसी खबरें बच्चों और नौजवानों में निराशा और हताशा, और आत्महिंसा के बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं। 
हैदराबाद में जब एक दलित मां के बेटे ने आत्महत्या की, और दलित मुद्दों पर की, तो कई लोगों ने उसे कोसते हुए यह भी लिखा कि अगर वह हौसलेमंद था, तो उसे व्यवस्था से लडऩा था, न कि आत्महत्या करना था। यह बात तमाम आत्महत्याओं पर लागू होती है, और किसी पर सरकार की व्यवस्था, किसी पर स्कूल-कॉलेज की व्यवस्था, और किसी पर समाज-परिवार की व्यवस्था का तनाव या दबाव रहता है। अब सवाल यह है कि किस पर कितना दबाव था, और उसे बर्दाश्त करने की कितनी क्षमता रहनी थी, क्या-क्या करना था, और निराश-हताश को क्या-क्या मदद मिली, ये तमाम बातें हर खुदकुशी में अलग-अलग होती हैं। यह बात तो तय है कि फिल्म या टीवी देखकर नकल में चूक से आत्महत्या कर बैठे कुछ बच्चों की बात को छोड़ दें, तो बाकी तमाम लोग परले दर्जे के तनाव या निराशा, या गुस्से और उत्तेजना में से किसी एक या एक से अधिक बातों के साथ आत्महत्या करते हैं। हमारा यह मानना है कि ऐसी आत्महिंसा करने वाले लोगों के आसपास के लोग कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी पूरी न करने के जिम्मेदार रहते हैं, वह चाहे दफ्तर की बात हो, स्कूल-कॉलेज की बात हो, या समाज-परिवार की बात हो। अगर साथ के लोग मदद करें तो ऐसा तनाव नहीं आ सकता है। अधिकतर आत्महत्याएं टालने के लायक होती हैं, और समय रहते हमदर्दी या सलाह-मशविरे से उनको रोका जा सकता है। 
भारत में एक समय तो पारिवारिक या सामाजिक सलाह-मशविरे की जगह थी, लेकिन शहरीकरण बढऩे के साथ, पीढिय़ों का फासला बढऩे के साथ, परिवारों के छोटे होते जाने के साथ अब वह नौबत नहीं रही। ऐसे में अगर कोई पेशेवर मनोचिकित्सक या परामर्शदाता की मदद लेने की भी सोचे, तो भी भारत में ऐसे शिक्षित-प्रशिक्षित चिकित्सक या मनोविज्ञानी गिनती के हैं। दरअसल सरकार और समाज ने पिछली आधी सदी में कभी यह अंदाज नहीं लगाया कि समाज में तनाव धीरे-धीरे बढ़कर कितना हिंसक हो जाएगा, और उसमें कितनी मदद की जरूरत रहेगी। आज बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में भी इक्का-दुक्का मनोचिकित्सक रहते हैं, और दस-बीस लाख की आबादी के शहर में दस-बीस मनोचिकित्सक भी नहीं रहते। हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य का एक नमूना देखें तो यहां ढाई करोड़ आबादी पर ढाई सौ मनोचिकित्सक भी नहीं हैं। 
आज जरूरत है देश के विश्वविद्यालयों में मनोचिकित्सकों, और मनोविज्ञानी परामर्शदाताओं के कोर्स बढ़ाने की, ताकि धीरे-धीरे समाज में यह जरूरत पूरी हो सके, और न सिर्फ आत्महत्याएं, बल्कि  तमाम तरह की हिंसा, हर तरह के तनाव को घटाने में मदद मिल सके। यह एक लंबी तैयारी की बात है, और तकलीफ यह है कि हिन्दुस्तान में इसकी चर्चा भी नहीं होती। 

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