बलात्कार की शिकार, अदालत से निराश युवती की खुदकुशी

संपादकीय
31 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक दिल दहलाने वाली खबर है कि गरीब परिवार की एक युवती ने बलात्कार के लंबे सिलसिले के बाद पुलिस में जाने का हौसला दिखाया और मामले के अदालत में चलते हुए न्याय व्यवस्था से निराश होकर उसने खुदकुशी कर ली। यह बलात्कार अस्पताल में एक डॉक्टर और दो पुलिस सिपाहियों ने किया था, और इस युवती की शिकायत के मुताबिक इन लोगों ने उसे वीडियो रिकॉर्डिंग की धमकी दे-देकर महीनों तक बलात्कार जारी रखा। आखिरकार रिपोर्ट होने पर पुलिस ने तुरंत इन तीनों को गिरफ्तार किया, लेकिन अदालत की पांच पेशियों पर जाते हुए, अदालत के रूख को देखते हुए इंसाफ की तरफ से बिल्कुल ही निराश होकर इस युवती ने आखिरी चि_ी लिखी और खुदकुशी कर ली। 
किसी के भी मृत्युपूर्व बयान को मोटे तौर पर सही माना जाता है, इसलिए हम अभी इस युवती के बयान को लेकर अधिक खुलासे में नहीं जा रहे, और इस देश में बलात्कार की शिकार महिला की समाज से लेकर अदालत तक हालत यही रहती है। बड़े कड़वे शब्दों में कहें, तो बलात्कार का विरोध करते हुए, उसकी रिपोर्ट लिखाने वाली महिला के साथ बाद के बरसों में थाने से लेकर अदालत तक और परिवार से लेकर पड़ोस के समाज तक कई बार और बलात्कार हो जाता है। बलात्कार की शिकार महिला को भारतीय समाज में एक मुजरिम की तरह देखा जाता है, और उसके इस हौसले की कोई तारीफ नहीं करते कि उसने एक मुजरिम को उजागर करने का काम किया है जिससे कि वैसे बलात्कारी से बाद में दूसरे लोग बच भी सकें। ऐसे योगदान को गिनने के बजाय लोग बलात्कार की शिकार महिला को ही दागी मानकर चलते हैं, और उसे ही बदचलन करार देते हैं। 
भारत की न्याय व्यवस्था, भारत की जांच एजेंसियां ऐसे तमाम मामलों में संवेदनाशून्य हैं। खुदकुशी करने वाली इस युवती ने अपनी वकील के बारे में भी लिखा है कि उसने भी बहुत निराश किया और लगातार यह समझाने में लगी रही कि उसे इंसाफ मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह बात अगर सही है तो भी अटपटी इसलिए नहीं है कि भारतीय समाज में अधिकांश लोग ऐसी महिला को ठीक यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, और परिवार के भीतर बच्चों के यौन शोषण से लेकर कामकाज की जगह पर महिला के शोषण, या महिला के साथ हुए किसी भी तरह के सेक्स-अपराध को लेकर लोगों का रूख यही रहता है कि बात को बढ़ाने से महिला की ही बदनामी होगी। इसी रूख के चलते सौ सेक्स-अपराधों से किसी एक की ही पुलिस रिपोर्ट होती होगी, और उसी का नतीजा रहता है कि मुजरिम समाज में, घर और पड़ोस में फिर ऐसा ही जुर्म करने के लिए आजाद घूमते रहते हैं। 
भिलाई की इस घटना को लेकर अस्पताल को अपने इंतजाम के बारे में सोचना चाहिए, पुलिस को अपने सिपाहियों के बारे में सोचना चाहिए, अदालत को आखिरी चि_ी में लगाई गई इस तोहमत के बारे में सोचना चाहिए कि पांच पेशियों में पहुंची इस युवती से अदालत में हाजिरी के दस्तखत भी नहीं करवाए गए, और इंसाफ न मिलने का आसार देखकर जुर्म की शिकार एक युवती को खुदकुशी करनी पड़ी। अगर इस मामले को तीन बलात्कारियों को सजा दिलाने तक सीमित रखा गया, तो फिर व्यवस्था को सुधारने की कोई संभावना नहीं होगी। इस मामले को एक नमूना मानकर राज्य सरकार को सभी पहलुओं पर गंभीरता से रिपोर्ट तैयार करवानी चाहिए, महिला आयोग को इसे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए, और अपने अस्तित्व को साबित करना चाहिए। 

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