हुनर और उद्यमशीलता बनें भारत की बेहतरी के दो रास्ते

संपादकीय
29 फरवरी 2016

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के पेश किए हुए बजट का विशेषज्ञ-जानकारों का विश्लेषण कुछ देर में आना शुरू होगा, लेकिन बजट की दो बातों पर हम यहां लिखना चाहते हैं। एक तो यह कि देश में आज कौशल विकास, या हुनर को बेहतर बनाने को लेकर जो सोच चल रही है, उसके लिए देश भर में 15 सौ ट्रेनिंग सेंटर खोलने की बात कही गई है। हालांकि इसके लिए रकम बहुत कम रखी गई है और ऐसे हर केन्द्र को कुल एक-एक करोड़ रूपए ही मिलने जा रहे हैं, लेकिन राज्य सरकारों की मदद से, उन्हें शामिल करके यह योजना लोगों की जिंदगी में लागत के मुकाबले बहुत अधिक फायदे का फर्क ला सकती है। दूसरी योजना स्टार्टअप नाम से पिछले दिनों लागू की गई है जिसके तहत नए उद्यमशील लोगों को बढ़ावा देकर उन्हें रोजगार देने वाला बनाने की महत्वाकांक्षी बात कही गई है। आज लोग रोजगार मांगते हैं, जो कि सरकार के पास हैं नहीं। दूसरी तरफ अगर नए हुनर सीखकर, नए कामकाज शुरू करने वाले लोग अपने अलावा दो-चार और लोगों को भी काम दे सकेंगे, तो उससे देश की तस्वीर एकदम बदल सकती है। केन्द्र सरकार ने ऐसे नए उद्यमियों के लिए 10 लाख रूपए तक के कर्ज को बिना किसी संपत्ति को गिरवी रखे देना शुरू भी कर दिया है, और हो सकता है कि इसके अच्छे नतीजे सामने आएं। 
हम इन दो बातों पर जोर इसलिए दे रहे हैं कि भारत में आबादी की कोई कमी नहीं है, और मामूली पढ़े-लिखे नौजवानों से लेकर खासे पढ़े-लिखे लोगों तक आबादी काफी है, और इस आबादी को अगर आर्थिक उत्पादक बनाया जा सके, तो आज जो देश पर बोझ लग रहे हैं, वे कल देश की दौलत भी हो सकते हैं। बाकी दुनिया के मुकाबले भारत में मानव-श्रम इतना सस्ता है, और यहां पर काम की स्थितियां मौसम की वजह से तकरीबन साल भर अच्छी बनी रहती हैं, इसलिए यह दुनिया की सेवा करने वाला एक कामयाब देश बन सकता है। इसके लिए यहां के लोगों के हुनर को बेहतर बनाने की जरूरत है, और इसके साथ-साथ नई उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की भी। केन्द्र सरकार नारों के रूप में तो ये दोनों योजनाएं बढ़ा रही है, लेकिन जब तक राज्यों का योगदान और उनकी सक्रिय हिस्सेदारी इसमें नहीं रहेगी, इनकी कामयाबी मुश्किल ही रहेगी। लेकिन हमको इन दो बातों में जो एक सकारात्मक बात दिखती है, वह यह कि सरकारी नौकरियों के मुकाबले लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने, अपने आपके दम पर कमाऊ बनने का रास्ता अगर सरकार दिखाना चाहती है, तो वह सरकारी नौकरी के मुकाबले बहुत ही अच्छी बात है। 
हम भारत की आबादी को बोझ मानने से हमेशा ही इंकार करते आए हैं, और हमारा यह मानना है कि दुनिया के जिन देशों में भी जाकर हिन्दुस्तानी कामगार काम करते हैं, वे देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कमाई को घर भी भेजते हैं। ऐसे में इस देश की नौजवान पीढ़ी को अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों के मुताबिक बेहतर हुनर, और बेहतर अंतरराष्ट्रीय समझ वाला बनाया जाए, तो दुनिया के विकसित देशों में कामगारों की मारामारी बहुत अधिक है। विकसित देशों में लोग अब हफ्ते में पांच दिन के बजाय चार दिन काम करने लगे हैं, और वहां पर बहुत से कामकाज के लिए गरीब देशों से गए हुए लोगों की रोजगार की संभावनाएं इसी अनुपात में बढ़ती चल रही हैं। फिर जापान जैसे देशों में आबादी बूढ़ी होती चल रही है, और नए जन्म घटते जा रहे हैं। ऐसे देशों में भी बुजुर्ग आबादी का ख्याल रखने के लिए कई तरह के कामकाज की गुंजाइश रहेगी। भारत सरकार को और यहां की राज्य सरकारों को भी अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को देखते हुए अपनी नौजवान पीढ़ी को हुनर के अलावा अलग-अलग देशों की भाषाओं और संस्कृति को सिखाने का काम भी करना चाहिए। भारत की आबादी यहां के लिए एक बड़ी कमाई का जरिया बन सकती है। इस बजट से परे भी राज्यों को अपने आने वाले बजट में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए, और सरकारी नौकरियों की तरफ से लोगों का ध्यान हटाना भी चाहिए। जो प्रदेश अपने लोगों के हुनर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जरूरतों के मुताबिक बेहतर बनाते चलेंगे, वे केरल या आंध्र की तरह अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारते भी चलेंगे। 

प्रधानमंत्री के रेडियो प्रसारण से परे भी देश में मानसिक परामर्शदाताओं की जरूरत

संपादकीय
28 फरवरी 2016  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान दे रहे बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए आज के अपने रेडियो प्रसारण में देश के कुछ मशहूर लोगों की बातें भी सुनाई। यह बात प्रधानमंत्री के प्रसारण से परे भी पूरे देश में जरूरी है, और हमारे पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस बात को लिखते आ रहे हैं कि परीक्षा या दूसरे तरह के तनाव घटाने के लिए, लोगों को परामर्श देने के लिए, पूरे देश में परामर्शदाताओं की भारी संख्या में जरूरत है, और लगातार होती आत्महत्याओं के बाद भी केन्द्र या राज्य सरकारों को इसकी फिक्र नहीं हो रही है। ऐसा कोई दिन नहीं निकल रहा है कि कई प्रदेशों से छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की खबरें न आएं, लेकिन सरकारी या निजी क्षेत्र में मनोचिकित्सकों, और परामर्शदाताओं की जरूरत पूरी करने की सोच भी सरकार या समाज में नहीं है। 
प्रधानमंत्री ने यह चर्चा छेड़कर इस मुद्दे का महत्व तो सामने रखा है, लेकिन ऐसे किसी एक कार्यक्रम भर से कुछ नहीं होता। बच्चों और बड़ों को, तनाव और कुंठा से गुजर रहे, निराशा से जूझ रहे हिन्दुस्तानियों को पेशेवर लोगों से परामर्श की भारी जरूरत है। अभी जब हम यह लिख रहे हैं, उसी वक्त पहले पन्ने पर यह खबर लग रही है कि किस तरह महाराष्ट्र में एक आदमी ने अपने परिवार के 14 लोगों की हत्या करके खुदकुशी कर ली। उसके अलावा जगह-जगह छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की खबरें हैं, कहीं लड़कियां और महिलाएं छेडख़ानी की पुलिस रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई न होने से निराश होकर अपने आपको जला रही हैं, तो कहीं किसान कर्ज से थककर आत्महत्या कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला इन खबरों के नीचे बड़ी संख्या में ऐसी निराशा का सुबूत भी है, जो निराशा खबरों तक नहीं आ पाती है, क्योंकि खबरों में तो मौत के आंकड़े ही जगह पाते हैं, समाज में हताशा, कुंठा, और तनाव कभी सरकारी आंकड़े नहीं बन पाते। 
छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे मनोवैज्ञानिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करें, और स्कूल-कॉलेज के लिए यह जरूरी करना चाहिए कि कितने सौ, या कितने हजार बच्चों पर ऐसे एक परामर्शदाता को अनिवार्य रूप से रखा जाए। सरकार को एक तरफ कोर्स शुरू करना चाहिए, और दूसरी तरफ ऐसे पद मंजूर करके बजट में उसका इंतजाम करना चाहिए। आज इन दोनों में से किसी बात के लिए खबरों से परे कोई फिक्र दिखाई नहीं पड़ती है। समाज का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे, यह रातों-रात नहीं हो सकता, इसके लिए बरसों पहले से तैयारी की जरूरत पड़ेगी, और तब जाकर पांच-दस बरस में इसका असर दिखाई पड़ेगा। पढ़ाई से परे भी नौजवानों के बीच भावनात्मक और शारीरिक संबंधोंं को लेकर बहुत तरह के तनाव रहते हैं, कहीं बेरोजगारी का तनाव रहता है, तो कहीं गरीबी का। समाज में एक-दूसरे के देखादेखी अधूरी हसरतें रहती हैं, उससे भी तनाव रहता है। ऐसी तमाम बातों को देखते हुए सरकार को शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य पर भी खर्च करना चाहिए, और दिमागी रूप से सेहतमंद समाज देश के लिए अधिक उत्पादक भी हो सकता है। 

देवी और राक्षस को लेकर शुरू बहस एक अच्छी शुरुआत, पौराणिक इतिहास में करवट

संपादकीय
27 फरवरी 2016  
 
देश में भारतीय हिन्दू पौराणिक कथाओं को लेकर एक नई बहस छिड़ी है जो कि देश के दलितों की एक अलग मान्यता को पहली बार राष्ट्रीय बहस का ऐसा मुद्दा बना पा रही है। यह सिलसिला जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में महिषासुर को लेकर शुरू हुआ, और सनातनी हिन्दू संस्कृति मानने वाले लोगों ने इस राक्षस या असुर की पूजा करने वालों को हिन्दू देवी दुर्गा का विरोधी करार दिया। दूसरी तरफ आज भाजपा के सांसद, और एक वक्त इस पार्टी के बाहर रहते हुए देश के एक प्रमुख दलित-आंदोलनकारी उदित राज ने इस विवाद पर कहा है कि वे बाबा साहब आंबेडकर की सोच को मानते हैं जो कि यह लिखते आए हैं कि जिनको असुर या राक्षस कहा जाता था, वे दरअसल भारत के दलित थे, और इसी सोच के तहत उदित राज सहित बहुत से दलित-आंदोलनकारी, दक्षिण भारत के बहुत से इलाके उन राक्षसों या असुरों को अपना नायक मानते हैं, जिनको सनातनी हिन्दू संस्कृति राक्षस मानकर जलाती है, या मारती है। 
देश में पौराणिक कथाओं को लेकर, धार्मिक मान्यताओं को लेकर शुरू हुई यह बहस इस हिसाब से बहुत अच्छी है कि भारत का धार्मिक इतिहास उन जातियों के लोगों का ही लिखा हुआ है जो कि ताकतवर रही हैं, जो कि राज करने वाली रही हैं, और जैसा कि दुनिया में हर कही इतिहास विजेताओं के नजरिए से लिखा जाता है, भारत में भी इतिहास दलितों और आदिवासियों के खिलाफ ही लिखा गया है। कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने, और कुछ दलित इतिहासकारों ने जरूर सनातनी सोच से परे भारत का इतिहास लिखा है, और सवर्ण हिन्दू सोच की आक्रामकता से कुचले हुए दलित-आदिवासियों का नजरिया भी सामने रखा है। लेकिन सदियों से देश की सोच सवर्ण तबकों के हिसाब से लिखे गए इतिहासतले ऐसी कुचली हुई है कि आज सनातनी सोच से परे की कोई बात की जाती है तो वह हिन्दू धर्मविरोधी करार दे दी जाती है। कहने के लिए हिन्दू जब अपनी आबादी को अधिक दिखाना चाहते हैं, तो वे आदिवासियों और दलितों को अपने में गिन लेते हैं, लेकिन जब आदिवासियों और दलितों को हक देने की बात आती है, तो इनको जाति व्यवस्था में पैरों में जगह दी जाती है, पैरों के भी नीचे जगह दी जाती है। 
आज चाहे जेएनयू से कई तरह के राजनीतिक संदर्भों से यह बहस उठी है, लेकिन यह पूरे देश के दलित-आदिवासी तबकों के हित में इसलिए है कि भारत की पौराणिक कहानियों का इतिहास एक नए नजरिए को भी सुन रहा है, और इन तबकों के नायक, इनके शहीद, इनके पूजा और आस्था के केन्द्र अब केवल राक्षस या असुर कहकर मारे नहीं जा सकते। आस्था का बहस में फिर से आना उन लोगों के हक के लिए अच्छा है जिनकी कोई जगह इतिहास लेखन में नहीं रही है। भारत में धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं और आस्था को लेकर यह नया नजरिया कई लोगों की जमी-जमाई मान्यताओं को परेशान जरूर करेगा, लेकिन जब भी दबा-कुचला तबका अपने हक मांगता है, तो दबाने और कुचलने वाले तबकों को परेशानी तो होती ही है। और फिर आज भारत में छिड़ी हुई यह बहस महज धार्मिक और सांस्कृतिक नहीं रहने जा रही, यह एक नए राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी शुरू कर चुकी है, और जिन लोगों ने इसे छेड़ा है, उनको महज आबादी के आंकड़ों को देख लेने की जरूरत है कि देश में दलित-आदिवासी आबादी कितनी है। 

हरियाणा जाट आंदोलन में हुए जुर्म की अदालती जांच जरूरी

संपादकीय
26 फरवरी 2016  

हरियाणा में जाट आंदोलन के चलते हुए जितनी तबाही की गई, उसे देखते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रूख दिखाया है कि जिन लोगों ने तोडफ़ोड़, आगजनी की है, उन लोगों से नुकसान की भरपाई की जाए। इसके अलावा अदालत ने खुद होकर इस बात की जांच शुरू की है कि क्या सड़कों पर रोकी गई कारों से महिलाओं और लड़कियों को निकालकर उनके साथ बलात्कार या सामूहिक बलात्कार किया गया है? 
हिन्दुस्तान में लोगों की भीड़ जहां जुटती है, वहां उनके दिमाग काम करना बंद कर देते हैं, और एक सामूहिक, हिंसक, एकजुटता हर तरह के अपराध को न्यायसंगत ठहराने में लग जाती है। इसके पहले भी देश की कई अदालतों ने शहर बंद करवाने को लेकर राजनीतिक दलों या संगठनों को नोटिस दिए हैं, या तोडफ़ोड़ को लेकर नुकसान की भरपाई ऐसे संगठनों से करवाने के आदेश दिए हैं जो कि बंद या आंदोलन करवाते हैं। लेकिन ऐसे अनगिनत आदेश आते और चले जाते हैं, राज्य सरकारें भीड़ को नाराज करने का खतरा नहीं उठातीं। नतीजा यह होता है कि देश के लोगों को कभी भी ऐसी बर्बादी करने वाले लोग सजा पाते नहीं दिखते हैं, और फिर किसी जगह, फिर किसी मुद्दे पर, फिर कोई भीड़ वही, वैसी ही हिंसा करने लगती है, सरकारी या निजी संपत्ति की बर्बादी करने लगती है।  इस बार हरियाणा में बात इससे और बहुत भयानक हुई, और सड़कों से गुजरती हुई लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार या बदसलूकी सामने आई है। कुछ लोगों ने खुलकर बयान दिया है कि उनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 
इसके बाद भी हरियाणा की सरकार इस पर कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर देश की सबसे बड़ी अदालत को सीधे दखल देना चाहिए, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में अब यह समझ आ रहा है कि जिन तबकों को चुनाव नहीं लडऩा है, वे ही भीड़ को नाराज करने का हौसला दिखा सकते हैं। राजनीतिक दल जब तक सरकार चलाते हैं, तब तक सरकारों की कार्रवाई, सरकारों के फैसले भीड़ को लुभाने की हरकतों से आजाद नहीं हो सकते। देश में जगह-जगह हिंसक आंदोलनों में तोडफ़ोड़ और आगजनी के बाद भी किसी राज्य की सरकार ने कड़ाई से कार्रवाई नहीं की, और लोगों को सजा नहीं मिली। नतीजा यह हुआ कि तोडफ़ोड़ बढ़ते-बढ़ते अब सामूहिक बलात्कार तक आ गई। इससे अधिक शर्मनाक बात किसी आंदोलन में और क्या हो सकती है? 
और हरियाणा के इस जाट आरक्षण आंदोलन को लेकर यह चर्चा भी है कि यह सरकारी नौकरियों के लिए चलाया जा रहा आंदोलन नहीं है, यह हरियाणा में भाजपा सरकार के भीतर एक जाट मुख्यमंत्री की अघोषित नीयत से किया गया आंदोलन है। आंदोलन के पीछे चाहे जो भी नीयत हो, अगर वह सड़कों पर से मुसाफिर महिलाओं को उठाकर उनके बलात्कार तक पहुंचता है, तो इस देश के लोकतंत्र के लिए यह डूब मरने की बात है। इस मामले में राज्य सरकार पर कार्रवाई नहीं छोड़ी जा सकती, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में इन आरोपों की जांच करवानी चाहिए, वरना यह हिंसा और ऐसे जुर्म बढ़कर बाकी प्रदेशों तक भी पहुंच सकते हैं। 

निजी जिंदगी की गरीबी से मुकाबले के बाद राष्ट्रीय मुकाबले में मैडल

संपादकीय
25 फरवरी 2016  
चारों तरफ नकारात्मक और निराशा पैदा करने वाली खबरों के बीच हौसला बढ़ाने वाली खबर कभी आती है, तो वह दिल को हिला जाती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां खेलों पर सैकड़ों करोड़ रूपए के स्टेडियम और दूसरे खर्च होते हैं, वहां पर जलाऊ लकड़ी बेचकर गुजर-बसर करने वाली पे्रमलता पाटिल नाम की अकेली महिला ने जिंदगी के संघर्ष के साथ-साथ अपने बेटे को राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग मुकाबले तक पहुंचने का रास्ता भी जुटाकर दिया, और इस बेटे ने दो रजत पदक जीतकर यह भी साबित किया कि गरीबी के बीच भी मां के दिए हौसले से कहां तक पहुंचा जा सकता है। मजदूर पिता की बेवक्त मौत हो चुकी थी, और पिछले दस बरस अकेली मां तीन बच्चों को बड़ा करते आ रही है। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ एक बच्चे को एक निजी खेल मुकाबले, वेटलिफ्टिंग में किस तरह से मां ने बढ़ावा दिया होगा, यह सोचना भी कल्पना से परे की बात है। बेटे अतीश ने पटना में आयोजित 52वीं जूनियर नेशनल वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में दो रजत पदक जीतकर छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है। ग्यारहवीं कक्षा में पढऩे वाले अतीश ने यह यश आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए हासिल किया है।
राज्य सरकार को चाहिए कि प्रदेश में जहां-जहां ऐसी प्रतिभाएं हैं, उनकी आर्थिक दिक्कतों से बाहर निकालकर बढ़ावा देना चाहिए। लोगों को याद होगा कि चीन जैसा देश जो कि ओलंपिक मुकाबलों से किलो के हिसाब से गोल्ड मैडल लेकर लौटता है, वहां पर बच्चों को बचपन से ही छांट लिया जाता है, और फिर सरकार उनके ओलंपिक मैडल तक पल-पल उन पर मेहनत करती है, और मां-बाप की गरीबी या अमीरी का कोई फर्क बच्चों पर नहीं पडऩे दिया जाता। ऐसा ही हाल दुनिया के कई और देशों का भी है, और भारत में भी कुछ प्रदेशों में सरकारें अपने होनहार खिलाडिय़ों पर अधिक ध्यान देती हैं। छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले तो होने लगे हैं, खेलों का ढांचा भी हजारों करोड़ से विकसित हो गया है, लेकिन जब ऐसे प्रतिभाशाली और होनहार खिलाड़ी अपने परिवार के साथ जिंदगी के संघर्ष में लगे दिखते हैं, तो लगता है कि सरकारी सोच और कोशिश में बड़ी कमी है। कहने के लिए तो इस राज्य में हर खेल के संघ बने हुए हैं, और उनमें से लगभग हर पर नेता और अफसर काबिज भी हैं, लेकिन हकीकत यह है कि खिलाड़ी अभावों से जूझते हुए लगातार संघर्ष करते हैं, और खेल के मुकाबले के साथ-साथ खेलने के, तैयारी के इंतजाम का जिंदगी का मुकाबला भी चलते ही रहता है। इस एक मामले को एक नमूना और मिसाल मानते हुए राज्य सरकार को तुरंत ही इस होनहार खिलाड़ी को अभाव की जिंदगी से बाहर निकालकर हर मुमकिन तैयारी करवानी चाहिए, उसके बिना नामी-गिरामी टूर्नामेंटों में नामी-गिरामी खेल संघ-नेताओं के रहने का कोई खास मतलब नहीं रहेगा। 
   














































































ऐसी हमलावर सोच से खिसक रहा है भाजपा का जनाधार

संपादकीय
24 फरवरी 2016     
राजस्थान के एक भाजपा विधायक ने बड़े दिलचस्प आंकड़े पेश किए हैं कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से रोज इस्तेमाल किए हुए तीन हजार कंडोम निकलते हैं, और गर्भनिरोधक इंजेक्शनों की भी सैकड़ों में गिनती उन्होंने गिनाई है। वहां के कचरे में निकलने वाली रोजाना 50 हजार हड्डियों का बयान भी उन्होंने दिया है। राष्ट्रवाद को लेकर किसी विधायक का ऐसा समर्पण देखने लायक है कि वह एक पूरे विश्वविद्यालय कैम्पस में घूम-घूमकर इस्तेमाल किए हुए हजारों कंडोम को गिने, और यह साबित करने की कोशिश करें कि यह कितनी राष्ट्रविरोधी जगह है, और कैसा राष्ट्रद्रोह वहां पर चल रहा है। 
हिन्दुस्तान की जिस 21वीं सदी को बाकी दुनिया में घूम-घूमकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बेचने की कोशिश कर रहे हंै, उनकी पार्टी के नेता, सांसद और विधायक, मंत्री और सहयोगी मोदी की पहुंच से भी परे जाकर दुनिया भर में खबरें खड़ी कर रहे हैं, और हिन्दुस्तान की एक ऐसी तस्वीर बना रहे हैं जो कि रबर के आविष्कार के पहले की है। जिस देश में रबर के पेड़ों के जंगल रहते हों, जिस देश में सदियों पहले वात्सायन ने दुनिया का सेक्स का सबसे चर्चित गंभीर ग्रंथ लिखा था, जहां मंदिरों की दीवारों पर सेक्स की प्रतिमाएं सजी हुई हैं, जहां की सामंती संस्कृति में राजाओं और रईसों की औलादें सीखने के लिए नगरवधुओं के पास भेजी जाती रही हैं, जो देश रासलीला और श्रृंगारलीलाओं से समृद्ध रहा हुआ हो, उस देश में आज सेक्स को एक जुर्म की तरह पेश किया जा रहा है, और बीमारी से, अवांछित गर्भ से बचाने वाले कंडोम को इस जुर्म के एक हथियार की तरह बताया जा रहा है। ऐसी हमलावर और ओछी सोच रखने वाले, और उसका प्रचार करने वाले विधायक या सांसद अपनी पार्टी से पूरी की पूरी उस नौजवान पीढ़ी को काटकर अलग कर दे रहे हैं जिसके लिए कंडोम इस्तेमाल का एक सामान है, जो लोगों को मुसीबत से बचाता है। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी इस बात को शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि भारतीय संस्कृति के इतिहास की एक फर्जी और फरेबी तस्वीर को जिस हमलावर अंदाज में लोगों पर लादा जा रहा है, उससे देश की जनता के बड़े-बड़े तबके भाजपा से कटते जा रहे हैं। जिस तरह से दलितों और आदिवासियों के खानपान की संस्कृति को कुचला जा रहा है, जिस तरह ईसा मसीह को एक तमिल ब्राम्हण साबित किया जा रहा है, जिस तरह मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों को गद्दार साबित करने की कोशिश हो रही है, और अब जिस तरह कंडोम को जुर्म का हथियार साबित किया जा रहा है, उससे बड़े-बड़े तबके भाजपा से कट रहे हंै, और बाकी तमाम खतरों और नुकसानों के अलावा, यह तो भाजपा का भारी चुनावी नुकसान भी हो रहा है। यह पार्टी जमीनी हकीकत से कटते हुए दिख रही है, और ऐसी आक्रामकता आत्मघाती होने के अलावा और कुछ नहीं है। 
हैदराबाद में एक दलित छात्र की आत्महत्या की बेबसी का मामला आज संसद में भी उठा है, और पूरे देश के दलित देश में खड़े किए जा रहे दलित-विरोधी, आदिवासी-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी, आधुनिकता-विरोधी माहौल को लेकर दहशत में भी हैं, और तनाव भी हैं। यह सामाजिक टकराव पूरे देश को अलग-अलग तबकों में बांट रहा है, और भारतीय संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास का दावा करने वाला पाखंड आज बाकी पूरे देश को उसी संस्कृति की कल्पना में ढालने पर आमादा है, और ऐसी मनमर्जी किसी लोकतांत्रिक समाज में चल नहीं सकती, और आने वाले किसी भी चुनाव में ऐसी हमलावर सोच भारी पड़ेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न तो बाकी दुनिया में भारत की बिगड़ती तस्वीर को सम्हालते दिख रहे हैं, और न ही देश के भीतर अपने खिसकते हुए जनाधार को देख पा रहे हैं। यह नौबत बाकी देश और लोकतंत्र के लिए तो भयानक है ही, मोदी और भाजपा के लिए भी ऐसे हमलावर तेवर चुनावी-आत्मघाती हैं।

जेएनयू की साजिश पर सरकार संसद में बोले

23 फरवरी 2016
संपादकीय

संसद के पहले सर्वदलीय बैठक में सीपीएम ने प्रधानमंत्री से मांग की कि सरकार सदन में इस बात पर जवाब दे कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के भाषण के साथ साजिश करके छेडख़ानी किसने की, और उनके खिलाफ दुष्प्रचार करने वाले कौन लोग थे। पिछले दस दिनों से देश को जिस तरह जेएनयू के मामले में झुलसाया जा रहा है, और जिस तरह कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों पर रात-दिन ऐसे भाषण सुनाए गए जो पाकिस्तान के समर्थन में लगाए जा रहे नारे सुना रहे थे, लेकिन शुरूआती जांच में ही यह साबित हो गया कि ये टेप झूठे थे, और तस्वीरों और आवाजों का आपस में कोई रिश्ता नहीं था। यह एक अलग बात है कि अपनी नौकरी के इस आखिरी पखवाड़े में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बस्सी ने जितनी गैरजिम्मेदारी के साथ भड़काऊ और पक्षपाती अंदाज में कार्रवाई की, और बयान दिए, उनसे देश भर में तनाव और अधिक फैला। 
अब सवाल यह उठता है कि झूठे टेप तैयार करके उनको चुनिंदा टीवी चैनल साजिश के तहत बार-बार दिखाएं, लोगों को भड़काएं, तो क्या पुलिस की और केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसी राष्ट्रविरोधी साजिश का भांडाफोड़ करे, और इसके पीछे की ताकतों को, ऐसे मीडिया को कटघरे में खड़ा करे? दूसरी तरफ कल एक बड़े समाचार-समूह ने जिस तरह एक स्टिंग ऑपरेशन से उन वकीलों के बयान रिकॉर्ड करके दिखाए हैं, जिन्होंने जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया पर हमला किया था। ये लोग बड़े फख्र के साथ यह बता रहे हैं कि किस तरह पुलिस हिरासत के भीतर उन्होंने इस छात्र नेता को मारा-पीटा, और कितना पीटा। अब सवाल यह है कि केंद्र सरकार इन सब बातों को अगर अनदेखा कर रही है, अगर मारने वालों में भाजपा के विधायक शामिल हैं, तो फिर दिल्ली में बैठी हुई अलग-अलग दर्जे की बहुत सी अदालतें क्या कर रही हैं? जब देश में हिंसक और हमलावर ताकतें कानून अपने हाथ में लेकर, मीडिया पर काबू करके, अफसरों को अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाकर इस तरह से अलोकतांत्रिक हिंसा बढ़ा रही हैं, तो क्या देश की अदालतें किसी रियलिटी शो की दर्शकदीर्घा में बैठकर इस तरह मजा ले सकती हैं? 
जो मांग सीपीएम ने की है वह एकदम जायज है कि जेएनयू के भाषणों की रिकॉर्डिंग को छेड़छाड़ करके देश में हिंसा और अशांति फैलाने की साजिश पर सरकार संसद के भीतर बयान दे। 

जहां असहमति की जगह नहीं, वह जगह लोकतंत्र बिल्कुल नहीं

विशेष संपादकीय
22 फरवरी 2016

सुनील कुमार
बस्तर खबरों के साथ कुछ इस कदर हमबिस्तर रहता है, कि दोनों एक-दूसरे को छोड़ ही नहीं पाते। फिलहाल ताजा मामला वहां पर पुलिस की तरफ से नक्सल-आरोप झेल रही, और आम आदमी पार्टी की एक नेता सोनी सोरी का है, जिसे सुनसान सड़क पर रोककर मुंह किसी रसायन से काला करके धमकी देकर छोड़ा गया कि वह पुलिस के खिलाफ, या साफ-साफ कहें तो बस्तर पुलिस के आईजी एस.आर. कल्लूरी के खिलाफ शिकायत करना बंद कर दे वरना नतीजे और खराब होंगे। सोनी सोरी पर यह हमला बस्तर में पुलिस से असहमति रखने वाले लोगों पर हो रहे हमलों के सिलसिले की महज एक और कड़ी है, कोई नई बात नहीं। पिछले कुछ हफ्तों में बस्तर पुलिस ने मालिनी सुब्रमण्यम नाम की एक स्वतंत्र पत्रकार को बस्तर छोड़कर चले जाने को मजबूर किया, और इसके लिए उसने वहां पर ताजा खड़े हुए एक सामाजिक संगठन को भी इस्तेमाल किया। इसके बाद बाहर से आकर बस्तर में रहकर वहां पुलिस-हिंसा से प्रभावित, और तरह-तरह के नक्सल-आरोपों को झेलने वाले गरीब आदिवासियों के मामले उठाने वाले नौजवान वकीलों के एक जनसंगठन को खदेड़ा, और पुलिस ने यह तर्क दिया कि बाहर से आए वकीलों की वजह से स्थानीय वकीलों के रोजगार पर खतरा खड़ा हो गया है, इस वजह से एक तनाव खड़ा हो रहा था। 
इस पूरे सिलसिले को एक व्यापक नजर से देखें तो यह साफ है कि बस्तर में लोकतंत्र उस तरह से नहीं बच गया है जिस तरह का लोकतंत्र भारत के संविधान नाम की एक किताब में बताया जाता है। और सरकार में बैठे ताकतवर लोग राजधानी से बस्तर पुलिस की ऐसी हरकतों का साथ दे रहे हैं, और उनका यह तर्क है कि नक्सलियों को खत्म करने के लिए ये तमाम तरीके नाजायज नहीं हैं। हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ हफ्तों में दो-तीन बार और लिख चुके हैं, लेकिन आज इस पर लिखने की एक और वजह है। कल ग्वालियर में दलित छात्रों के एक कार्यक्रम में आरक्षण पर बोलते हुए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक का भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी ने हिंसक विरोध किया, और कार्यक्रम बंद करवा दिया। दूसरी तरफ पिछले दस दिनों से देश की राजधानी में जेएनयू के छात्रों के मामले को लेकर जो चल रहा है, उसे पूरा देश देख रहा है। जिन छात्रों ने जेएनयू में देश के खिलाफ कुछ नहीं कहा, उनके साथ भी देश की अदालतों में जजों के सामने जिस तरह मारपीट की गई, जिस तरह उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है, और जिस तरह भाजपा के दिल्ली के एक विधायक सहित दिल्ली के कई वकील इन छात्रों के साथ मारपीट कर रहे हैं, उसको भी बस्तर की इस घटना के साथ-साथ देखने और समझने की जरूरत है। 
इन तमाम बातों को मिलाकर देखें तो इनसे एक बात खुलकर सामने आती है कि इस देश में असहमति की जगह खत्म कर दी जा रही है। लोकतंत्र में असहमति नाम की चीज को लोकतांत्रिक जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा आबंटित किया गया था, उस एक कतरा जमीन के पट्टे को आज खारिज किया जा रहा है क्योंकि वहां लगा हुआ झंडा-बैनर लोगों को रास नहीं आ रहा है। देश की जनता को खानपान की आजादी रहे, यह कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा, कुछ लोग घोर साम्प्रदायिक और आक्रामक राष्ट्रवाद से परे भी कुछ सोचें, यह रास नहीं आ रहा, और कुछ लोग मुंह खोल सकें, और अदालतों में देशद्रोही करार देकर हड्डियां तोडऩे पर कराहें, यह भी लोगों को रास नहीं आ रहा। बस्तर में लोग लोकतांत्रिक तरीके से काम करें, यह भी छत्तीसगढ़ की, और खासकर बस्तर की पुलिस को रास नहीं आ रहा है। 
अब सवाल यह उठता है कि बस्तर जैसे जिस इलाके में सरकारी और राजनीतिक भ्रष्टाचार और जुल्म के चलते आदिवासियों के बीच एक हिंसक नक्सल-आंदोलन उठकर खड़ा हुआ, पनपा, और लोगों की सोच लोकतंत्र से अलग हुई, उस बस्तर में एक तरफ तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह लगातार नक्सलियों को लोकतंत्र की मूलधारा में लौटने का न्यौता दे रहे हैं, और जो लोग लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर अखबारनवीसी कर रहे हैं, अदालतों में बेजुबान आदिवासियों के हक के लिए लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर मुफ्त में मुकदमे लड़ रहे हैं, जो लोग लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर सड़कों पर आदिवासी हकों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उनको कुचलने का काम छत्तीसगढ़ की, और खासकर बस्तर की पुलिस कर रही है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं? एक तरफ तो जो लोग लोकतंत्र को छोड़ चुके हैं, और हथियार उठा चुके हैं, उनको वापिस लोकतंत्र में लाने का नारा लगाया जा रहा है, और जो लोग अब तक लोकतंत्र पर जमे हुए हैं, डटे हुए हैं, उन्हें बस्तर से लेकर जेएनयू तक, और ग्वालियर के सभागृह तक से, कहीं नक्सल-समर्थक कहकर और कहीं देशद्रोही कहकर खदेड़ा जा रहा है। 
देश की राजनीतिक ताकतों को यह समझने की जरूरत है कि आपातकाल के वक्त भी आंदोलनों के खिलाफ तानाशाह लोगों ने यही तर्क दिया था कि जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में देश में विदेशी ताकतें लोकतंत्र को खतरे में डालने और सरकार पलटाने की कोशिश कर रही हैं। उस वक्त सरकार तो नहीं पलटी, लोकतंत्र जरूर पलट गया था। आज छत्तीसगढ़ से लेकर ग्वालियर वाले मध्यप्रदेश में, और दिल्ली पुलिस चलाने वाली केन्द्र सरकार तक कुछ उसी तरह की बात लोकतांत्रिक-विरोध के खिलाफ की जा रही है कि ये सरकार के खिलाफ साजिश है, देश और प्रदेश के खिलाफ साजिश है। दरअसल अफसरों को ऐसी किसी साजिश का डर दिखाते हुए नेताओं की राजनीतिक और लोकतांत्रिक समझ को दबाने का एक मौका मिलता है कि अगर लोकतंत्र को बचाना है तो ऐसे लोकतांत्रिक आंदोलनों को कुचलना होगा। पल भर में किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन को, अखबारनवीसी को, और गरीबों की मददगार वकालत को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। अफसरों के लिए यह तरीका बड़ा आसान रहता है क्योंकि वे किसी लोकतंत्र से बंधे नहीं रहते, और न ही उनकी कोई राजनीतिक जवाबदेही रहती है। 
लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि चार दिन रेलगाडिय़ां और रेल्वे स्टेशन जलाने पर हरियाणा के जाट आंदोलनकारियों की मांगें जिस रफ्तार से पूरी हो गईं, क्या किसी मांग को पूरा करवाने के लिए लोकतंत्र में यही एक जरिया होना चाहिए? क्या लोकतंत्र में किसी आंदोलन के ऐसे ही तेज रफ्तार और हिंसक भीड़तंत्र वाले रूख को पल भर में सुना जाए, और देश के दलित और आदिवासी तबकों को खानपान की बंदिशों से भी जकड़कर रखा जाए, उनके खिलाफ झूठे वीडियो गढ़कर उन्हें देशद्रोही करार दिया जाए, गिरफ्तार किया जाए, अदालतों में पीटा जाए, तो यह देश किस तरह के लोकतांत्रिक आंदोलन की तरफ धकेला जा रहा है? 
छत्तीसगढ़ का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि आपातकाल की ज्यादतियों के बाद 1977 में जब आम चुनाव हुए थे, तो पूरे के पूरे बस्तर ने एकमुश्त जुल्मी कांग्रेस सरकार को खारिज कर दिया था। उस वक्त तो आदिवासियों के पास संचार के लोकतांत्रिक साधन भी नहीं थे, और नक्सलियों की लाई हुई अलोकतांत्रिक-राजनीतिक चेतना भी नहीं थी। लेकिन आदिवासियों की अपनी परंपरागत समझ, आजादी के उनके प्राकृतिक मिजाज की समझ बहुत थी, और उन्होंने सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को, नेहरू की बेटी को भी एकमुश्त खारिज कर दिया था। आपातकाल के उस दौर में भी सरकार हांकने वाले अफसरों को बस्तर में नसबंदी से लेकर बाकी कई तरह की मनमानी जायज लगी थी, क्योंकि इंदिरा गांधी को सपने में भी विदेशी हाथ दिखने लगा था। आज बस्तर में लोकतंत्र को बचाने के पुलिसिया-तरीके के चलते हुए सबसे बड़ी हत्या अगर किसी की हो रही है, तो वह खुद लोकतंत्र की हो रही है। लोकतांत्रिक-असहमति की जगह को खारिज करके नक्सल हिंसा को खत्म नहीं किया जा सकता। कुछ बड़े अफसरों को यह तरीका सुहा बहुत सकता है, लेकिन ऐसे ही बड़े अफसरों ने इंदिरा गांधी की सरकार को पूरे देश में डुबाकर रख दिया था। आज देश में जगह-जगह असहमति का कत्ल करके, और रेलगाडिय़ां जलाने वाले जाट आंदोलनकारियों की बातों को आनन-फानन सुनकर एक अलोकतांत्रिक माहौल खड़ा किया जा रहा है, जो देश-प्रदेश सबको खासा महंगा पड़ेगा। यहां बात-बात पर हर लोकतांत्रिक पहलू को नक्सल-समर्थक करार देने, और उसे कुचलने के लिए हर नाजायज अलोकतांत्रिक तरीके को न्यायसंगत ठहराने की अफसरी सोच का नतीजा अगले चुनाव में देखने मिलना तय है।

महंगी स्मार्ट सिटी के मुकाबले रुर्बन योजना अधिक काम की

संपादकीय
21 फरवरी 2016     
ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं देने के लिए केन्द्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में शुरू की। पूरे देश में लागू होने वाली इस योजना को इस राज्य में अचानक आकर यहां से इसकी शुरुआत करना इस राज्य के लिए भी महत्वपूर्ण है, और यह योजना अपने आपमें कई नई संभावनाएं लेकर आई है। दो लाईनों में अगर इस सोच को कहें, तो ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे-छोटे गांवों के समूह बनाकर उनके बीच में एक साथ सुविधाओं को विकसित करना, बड़ा महत्वपूर्ण हो सकता है। लोगों को याद होगा कि एनडीए के समय राष्ट्रपति रहे डॉ. अब्दुल कलाम ने भी पुरा नाम से ऐसी ही सोच को आगे लाने की कोशिश की थी जिसमें गांवों को शहरों जैसी सुविधा दी जा सके, लेकिन इस बार की यह सोच योजना के साथ आई है, और यह शहरों को अनायास बोझ से बचा भी सकती है, और शहरीकरण के बजाय इससे एक विकेंद्रीकरण भी हो सकता है। यह मामला राजनीतिक नहीं है, और शहरी-ग्रामीण विकास से जुड़ा हुआ है। और यह योजना इतनी सरल और सहज भी है कि हमारी तरह के तकनीकी-जानकारी के बिना इस बारे में सोचने वाले लोगों को भी यह आसानी से समझ आ रही है। 
गांधी के समय से यह बात चलती आ रही है कि भारत की जिंदगी गांवों में बसती है। और ग्रामीण विकास हुए बिना देश का विकास नहीं हो सकता। लेकिन गांवों की हालत लगातार खराब होती जा रही है, और लोग शहरों पर आश्रित रहने को बेबस होते जा रहे हैं क्योंकि शिक्षक या चिकित्सक जैसे बुनियादी कर्मचारी भी गांव जाकर रहना नहीं चाहते, और जिस किसी ग्रामीण परिवार की जरा सी भी क्षमता हो जाती है, उस परिवार के लोग शहर में बसने की तैयारी करने लगते हैं। दूसरी बात यह है कि चुनावी राजनीति के चलते हर गांव में स्कूल, हर कस्बे में कॉलेज, और इसी तरह से ऐसा सरकारी ढांचा खड़ा कर दिया जाता है जिसका अस्तित्व सरकार पर भारी पडऩे लगता है, और जितने बड़े ढांचे की जरूरत भी नहीं रहती है। ऐसे में अगर कुछ गांवों का समूह बनाकर सुविधाओं को वहां मुहैया कराया जाएगा, तो ऐसी सुविधाओं की उपयोगिता भी होगी, और उनकी आत्मनिर्भरता भी होगी। सरकारी सुविधाएं आखिरकार जनता के पैसों से ही आती हैं, और उन्हें स्थानीय जनता को संतुष्ट करने के नाम पर खोल तो दिया जाता है, लेकिन वहां कुर्सियां खाली पड़ी रहती हैं, आलमारियां खाली पड़ी रहती हैं। इसलिए कुछ गांवों को मिलाकर अगर विकास किया जाएगा, तो हो सकता है कि ऐसे विकसित ग्राम समूहों में कुछ शहरी सुविधाएं रहने से लोग वहां जाकर रहने और काम करने को तैयार हो जाएंगे। आज तो हालत यह है कि गांवों में कोई डॉक्टर जाने तैयार नहीं होते, शिक्षक किसी स्थानीय बेरोजगार को अपना काम ठेके पर दे देते हैं, और बहुत से कर्मचारी शहरों से गांव आना-जाना करते हैं। दूसरी तरफ शहरों पर जो बोझ आबादी बढऩे से बढ़ता है, उसे भी गांव और शहर के बीच अगर कहीं रोका जा सकता है, तो उससे सबके लिए सहूलियत बढ़ सकती है। लेकिन यह योजना किसी पुल, किसी इमारत या किसी बांध जैसी नहीं रहेगी, इसके लिए सरकारों से लेकर स्थानीय संस्थाओं तक लोगों को बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, और जगह-जगह स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना भी बनानी पड़ेगी। यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि केन्द्र सरकार की यह महत्वकांक्षी योजना किस राज्य में किस जगह कितनी सफल हो पाती है। हमारा मानना है कि केन्द्र सरकार की स्मार्ट सिटी जैसी एक निहायत महंगी और अतिशहरी सोच वाली योजनाओं के मुकाबले यह रुर्बन योजना अधिक कारगर और काम की हो सकती है। स्मार्ट सिटी तो शहरी चकाचौंध के मॉडल बनाने की सोच है, जो कि बाकी देश की हालत के मुकाबले बहुत ही विरोधाभासी है, और चाहे जिस वजह से हुआ हो, अगर छत्तीसगढ़ पर ऐसी महंगी स्मार्ट सिटी का बोझ नहीं पड़ा है, तो वह इस राज्य के लिए अच्छी बात है। इस राज्य को ऐसे रुर्बन केन्द्रों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, और यह काम अधिक चुनौती का भी रहेगा। 

आरक्षण का भूत इस बार हरियाणा में फौज बुला लाया

संपादकीय
20 फरवरी 2016     
हरियाणा में अचानक भड़क उठा जाट आंदोलन देश के कई और राज्यों के लिए भी एक खतरा हो सकता है क्योंकि यह समाज संगठित भी है, ताकतवर भी है, और दिल्ली के इर्द-गिर्द कई राज्यों में इसका तगड़ा राजनीतिक ध्रुवीकरण भी है। कई राजनीतिक दलों में जाट नेताओं का बड़ा वजन है, और कोई भी राजनीतिक दल इस समाज की नाराजगी को अनदेखा नहीं कर सकता। अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक जिस जाट आरक्षण की मांग को पूरी तरह से खारिज कर चुका है, उसके लिए अचानक हरियाणा में इतना उग्र आंदोलन हरियाणा और केन्द्र दोनों जगह सरकार चला रही भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक असुविधा की बात हो गई है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि हरियाणा से लगे हुए पंजाब में अभी चुनाव होने जा रहे हैं, और जाट आरक्षण का मुद्दा उत्तरप्रदेश के एक हिस्से पर भी असर डाल सकता है जहां कि चुनाव सामने खड़े हैं। 
जाट समाज को ओबीसी के भीतर अगर देखें, तो यह बहुत कमजोर तबका नहीं लगता, और आरक्षण की जो भावना है, उसके तहत इसे नौकरी के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं दिखती है। बल्कि हम बार-बार आरक्षित तबकों के भीतर से जिन मलाईदार तबकों को हटाने की बात करते हैं, उनमें जाट शायद पिछड़ा वर्ग के बाकी लोगों के मुकाबले सबसे ऊपर आएंगे, और यह पूरा मुद्दा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए कम दिखता है, राजनीतिक आरक्षण का अधिक दिखता है। आज जिस तरह पंचायतों से लेकर म्युनिसिपल तक ओबीसी आरक्षण मौजूद है, और आगे चलकर विधानसभाओं या संसद तक जिसकी संभावना दिखती है, उस ओबीसी आरक्षण के लिए यह आंदोलन अधिक दिख रहा है। और यह राजनीतिक बवाल समय-समय पर सत्ता से बाहर रहने वाले राजनीतिक दल उठाते रहते हैं, आज परेशानी झेलना सत्तारूढ़ भाजपा की मजबूरी है। 
हमारा यह मानना है कि आरक्षण की आज की बहुत सी मांग वैसे भी कमजोर हो गई रहती अगर आरक्षित तबकों के भीतर से मलाईदार तबकों को बाहर कर दिया जाता, और एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देना बंद हो जाता। लेकिन आरक्षण से मदद देने की भावना अलग धरी रह गई, और सरकार से लेकर संसद तक फैसले लेने वाले ताकतवर ओहदों पर कायम आरक्षित तबके के लोग इसलिए कभी मलाईदार तबके को अलग नहीं कर पाए क्योंकि वे खुद इस फायदे से बाहर हो जाएंगे। इसलिए नेताओं से लेकर अफसरों तक, और सांसदों से लेकर विधायकों तक, आरक्षित तबकों के मलाईदार लोग आरक्षण के फायदे पर एक किस्म से एकाधिकार बनाकर चलते हैं, और उनके तबकों के भीतर जो कमजोर हैं वे मलाई की सतह तक भी नहीं पहुंच पाते। 
आरक्षण का आंदोलन देश के दूसरे कुछ राज्यों में भी इससे अधिक हिंसक हो चुका है और राजस्थान में तो महीनों तक राज्य से होकर रेलगाडिय़ों का आना-जाना बंद रहा है। हरियाणा आज देश के सबसे बड़े औद्योगिक केन्द्रों में से एक है, और वहां आज कई जिलों में फौज पहुंच रही है, कई जिलों में कफ्र्यू है, और यह आंदोलन लंबा खींचने पर राज्य की अर्थव्यवस्था को भी चौपट करेगा। ओबीसी तबके के भीतर जाट लोगों को आरक्षण देने का एक मतलब यह भी होगा कि किसी और जाति का आरक्षण घटाना, और ऐसी किसी बात को सोचने पर भी वे दूसरी जातियां भी सड़कों पर होंगी। ऐसे विवादों को अदालत से ही निपटने देना चाहिए और सरकार को, राजनीतिक दलों को इन मुद्दों पर राजनीति बंद करना चाहिए। 

सोशल मीडिया से नफरत बढ़ती है, या मोहब्बत ?

संपादकीय
19 फरवरी 2016     
सोशल मीडिया हिन्दुस्तान जैसे लोगों की जिंदगी और समझ को बेहतर बना रहा है, या उसके लिए खतरे बढ़ा रहा है? यह सवाल कई लोगों को परेशान करता है, क्योंकि यह अंदाज लगाना आसान नहीं है कि सोशल मीडिया के चलते जनता में मोहब्बत बढ़ रही है, नफरत बढ़ रही है, समझ बढ़ रही है, या नासमझी बढ़ रही है? हमारे पास भी इसका अंदाज लगाने का कोई जरिया नहीं है, इसलिए हमारा सोचना हमारी हसरत अधिक हो सकती है कि सोशल मीडिया का कैसा असर होना चाहिए। 
हिन्दी के भक्ति काव्य की एक लाईन बड़ी प्रचलित है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। यही हाल सोशल मीडिया का है, जो नफरतजीवी लोग हैं, उनको लगता है कि अब नफरत फैलाने के लिए किसी और औजार या हथियार की जरूरत नहीं रह गई है, और जिस तरह फिल्म शोले में जेलर सबको एक साथ बदल डालने की बात कहता है, वैसा ही आज सोशल मीडिया को लेकर लोगों के मन में भरोसा है। लोगों को लगता है कि गिने-चुने सिक्यूलर (सेक्युलरों को सिक यानि बीमार बताने वाले लोगों ने यह नया शब्द गढ़ा है) बाकी हैं, और सोशल मीडिया पर उन पर हमले करके जल्द ही उनकी आवाज को दफन कर दिया जाएगा। दूसरी तरफ नफरत के खिलाफ बात करने वाले अमन-पसंद और अक्लमंद लोगों को लगता है कि तटस्थ बैठी आम जनता के राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए सोशल मीडिया मुफ्त में मिला हुआ एक ब्लैकबोर्ड है, और इसका इस्तेमाल करके दुनिया को बेहतर बनाया जा सकता है। एक तीसरी सोच मौन रहने वाले विज्ञान और टेक्नालॉजी की है, जिनका मानना है कि वे तो महज औजार हैं, और उनसे लोग चाहें तो सब्जी काट लें, और चाहें तो एक-दूसरे के गले काट लें। 
दरअसल यह सिर्फ बातचीत के बहाने का मुद्दा है, और यह सोशल मीडिया के नफे और नुकसान पर किसी तरह का अंदाज नहीं है। यह सिर्फ मुद्दे और सोच की बात है कि जहां नफरत फैलाने के लिए लोग अपनी कमअक्ली, या बेअक्ली को हिंसा के साथ मिलाकर लहू फैलाने में लगे रहते हैं, वहीं पर इंसाफपसंद लोगों को भी इस हिंसा को उजागर करना चाहिए। जो लोग दंगाईयों को नंगाई कहते हुए उनसे परे रहना बेहतर समझते हैं, उनको भी यह इतिहास मालूम है कि बढ़ते हुए दंगाईयों से कोई महफूज नहीं रह सकते। आज अगर लोगों की साजिशों को, कट्टरता के उनके फतवों को अनदेखा किया जाएगा, तो भले लोगों का भी आने वाला कल और बुरा होगा। इसलिए सोशल मीडिया को अनदेखा करना, देखकर भी चुप्पी रखना ठीक नहीं है। जिस मुंह में भी जुबान है, और जिन उंगलियों में भी जान है, उन्हें समाज की भलाई के लिए सक्रिय रहना चाहिए। जैसा कि दुनिया के लोकतांत्रिक चुनावों के इतिहास में हमेशा से कहा जाता रहा है कि घर बैठे भले-बहुमत के कारण गलत किस्म का अल्पमत भी चुनकर आ जाता है, उसी तरह चुप बैठ गए अमन-पसंद लोगों की चुप्पी से सोशल मीडिया पर भी हिंसक-साम्प्रदायिक लोग हावी होते चलते हैं। 

राष्ट्रवाद के नाम पर वकीलों की हिंसा पूरी तरह नाजायज

संपादकीय
18 फरवरी 2016     
वकीलों का तबका चूंकि रात-दिन कानून से जुड़े हुए मामले देखता है, इसलिए देश के मामलों की उसकी समझ बाकी लोगों के मुकाबले कुछ अधिक मजबूत रहती है। केन्द्र सरकार चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन की हो, उसमें किसी एक पेशे से आए हुए मंत्री सबसे अधिक संख्या में रहते हैं, तो वे वकील ही रहते हैं। सांसदों में भी बड़ी संख्या में वकील रहते हैं, और अपने पेशे के साथ-साथ वे लगातार सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं। ऐसे में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो हुआ, उससे वकीलों का प्रभावित होना, या विचलित होना, और उस पर प्रतिक्रिया जाहिर करना बड़ी स्वाभाविक बात है। लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने दिल्ली की अदालतों के बाहर, अदालतों के अहाते में, और अदालत के भीतर भी वकीलों के एक तबके ने राष्ट्रवाद के नाम पर जो हमलावाद दिखाया है, वह बहुत ही शर्मिंदगी की बात है, और बहुत ही फिक्र की बात भी है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट खुद इस मामले को देख रहा है, इसलिए हम अपनी ओर से इसका कोई इलाज नहीं सुझा रहे, और अदालत खुद ही इसे तय करेगी, लेकिन हम याद दिलाना जरूर चाहते हैं कि हर किसी को इंसानियत, अपने देश के संविधान, और अपने पेशे की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए। 
आज दिल्ली पुलिस अगर कुछ लोगों को इस आधार पर अदालत में लाकर कटघरे में खड़ा कर रही है कि उन्होंने संविधान के खिलाफ काम किया है, तो ऐसे आरोप सच हैं, या नहीं, यह तय करना अदालत का काम है, वकीलों का नहीं। वकीलों के लिए तो सबसे अच्छी प्रतिक्रिया यह होती कि वे ऐसे अदालती मामलों में दखल देने की अर्जी लगाते, और शायद अदालत उन्हें सरकारी वकील के अलावा खड़े होने की इजाजत देने पर विचार भी करती। लेकिन अगर वकील वकालत को छोड़कर एक विचलित और नाराज नागरिक की तरह अदालत लाए जा रहे लोगों पर हमला करेगी, वहां रिपोर्टिंग को गए मीडिया के लोगों पर हमला करेगी, आरोपियों की तरफ से खड़े होने जा रहे वकीलों पर हमला करेगी, तो यह बहुत ही शर्मनाक रवैया है। वीडियो के इस जमाने में वकीलों के ऐसे हमले खुलकर दर्ज हुए हों, और राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पेशे के साथ धोखा, कानून के साथ धोखा, और आरोपियों पर हिंसा बिल्कुल भी मंजूर नहीं की जा सकती। इसी तरह मानो कल के दिन आतंक के, देशद्रोह के किसी आरोपी को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जाए, और वहां पर डॉक्टर उसके इलाज के बजाय उसे लात-घूंसे मारने लगें, उस पर पत्थर फेंकने लगें, तो क्या वह मंजूर किया जा सकेगा? 
हम दिल्ली के वकीलों को छत्तीसगढ़ की एक मिसाल देना चाहेंगे कि यहां बस्तर के नक्सल मोर्चे पर मुठभेड़ के बाद जब दोनों तरफ के लोग मारे जा चुके थे, तब एक घायल नक्सली को पुलिस के लोग अपने हेलीकॉप्टर में लेकर बस्तर से राजधानी रायपुर तक आए, और उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती किया। पुलिस और सुरक्षा बलों के सैंकड़ों लोगों को नक्सली थोक में मारते आए हैं, लेकिन ऐसे बहुत से मामले हुए हैं जिनमें घायल नक्सलियों को ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने ही खून दिया है। हर किसी को अपने पेशे की जिम्मेदारी समझनी चाहिए, और इसके साथ ही देश के कानून का सम्मान भी करना चाहिए। आज अगर किसी आरोपी को अदालत में लाते हुए उस पर वकील हमला करें, कल के दिन विश्वविद्यालय के पास किसी वकील के निकलने पर छात्र उस पर हमला करें, तो फिर देश में संविधान की, अदालत की, और वकीलों की जरूरत ही क्या रह जाएगी? 
जेएनयू के जिन छात्रों पर लगभग फर्जी दिखते आरोप लगाकर दिल्ली पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया और जेल भिजवाया, उन पर तो देश के कानून के तहत सही या गलत जैसी भी, कार्रवाई पुलिस कर ही चुकी थी। उन पर हाथ साफ करके, हमला करके कोई वकील अपने आपको देशप्रेमी साबित करने की, राष्ट्रभक्त साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो वे साफ-साफ कानून की तौहीन कर रहे हैं। कानून को इस मकसद से, इस तरह तोडऩा कोई राष्ट्रवाद नहीं है, यह एक अलग तरह की हिंसा है, और हमारा मानना है कि अदालत ऐसे वकीलों को ऐसी कड़ी सजा दे कि लोग अदालत और आसपास दहशतगर्दी फैलाना भूल जाएं। यह सिलसिला अगर चलते रहा, तो जज अदालत के भीतर खाली बैठे रहेंगे, और वकील सड़कों पर झंडे के नाम पर डंडे पर एक मुखौटा लगाकर आतंक फैलाते हिंसा करते रहेंगे। इस देश में ऐसे इंसाफ की कोई जगह नहीं है। और यह तो फिर भी जेएनयू के नौजवान छात्र हैं, इस देश में तो कसाब को भी हिफाजत मिली, वकील मिला, और इंसाफ मिला। ये वकील देश का नाम गंदा कर रहे हैं, और शायद ये झूठी शोहरत के चक्कर में ऐसी हरकत कर रहे हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसी हिंसा तुरंत खत्म करना सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है। 

...हो सकता है किसी दिन वे सचमुच ही देशद्रोही भी होने लगें...

संपादकीय
17 फरवरी 2016     
भारत के कुछ इलाकों में परंपरागत रूप से मां-बहन की गालियां, सामाजिक संस्कृति और रोजाना के बोलचाल का एक हिस्सा रहते आई है। एक प्रदेश मां-बहन की गालियों की तरह बेटी की गालियां के लिए भी बदनाम है। लेकिन इन दिनों देश में एक नई गाली ने मां-बहन और बेटी, सबको बेरोजगार कर दिया, यह है देशद्रोह की गाली। दिल्ली में जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय को लेकर इस गाली का इस्तेमाल इतना अधिक हो रहा है कि जिन लोगों ने कभी देश के बारे में सोचा भी नहीं था, वे आज दिन भर में दूसरों को दर्जनों बार देशद्रोही करार देते हुए उतनी ही बार देश भी बोल रहे हैं, और उन्हें यह अटपटा भी लग रहा है कि वे किसके बारे में बात कर रहे हैं? अगर कोई द्रोही की गाली खाने के लिए मौजूद न होता, तो देश का भी पता न होता। लेकिन आज हर मुंह में मानो पान-तम्बाकू आ गया है कि जो चेहरा पसंद न आए, उस पर पीक दागकर उसे देशद्रोही करार दे दिया जाए। कुछ लोगों ने यह बात सही लिखी है कि कश्मीर को लेकर आज मुंह खोलने वाले लोगों को देशद्रोही करार देने वाले लोगों को नेहरू को पढऩा चाहिए, और कश्मीर पर उनकी लिखी बातों को लेकर नेहरू पर भी मरणोपरांत मुकदमा चलाना चाहिए। 
जिन लोगों को आज अचानक बहुत से लोग देशद्रोही लग रहे हैं, उन लोगों में से क्या कोई ऐसे भी हैं जो कि नाथूराम गोडसे को हत्यारा कहते आए हैं? क्या नाथूराम गोडसे की प्रतिमा बनाकर उसे गौरवान्वित करने का उन्होंने कभी विरोध किया था? क्या गांधी के हत्यारे की स्तुति को कभी उन्होंने देशद्रोह कहा था? लेकिन अजीब बात यह है कि आज देश में जिस अंदाज में सड़कों पर देश से गद्दारी तय की जा रही है, यह वही अंदाज है जिसके साथ एक वक्त के खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब की बसों से हिन्दुओं को उतारकर छांटकर मारा था, और उन आतंकियों के हमदर्दी अकालियों के साथ भाजपा का पुराना रिश्ता चले आ रहा है, सत्ता में भागीदारी चली आ रही है। इन्हीं अकालियों के बारे में आज ही कई लेखकों ने यह भी याद दिलाया है कि प्रकाश सिंह बादल ने ही एक वक्त दिल्ली में संविधान की किताब फाड़ी थी, और उसे आग लगाई थी। कश्मीर को लेकर आज देश के गद्दार तय करने वाले लोग यह भूल रहे हैं कि कश्मीर में अफजल गुरू को शहीद का दर्जा देने वाली पीडीपी के साथ भाजपा का सत्तारूढ़ गठबंधन अभी कायम ही है, और इसी पीडीपी ने कश्मीर में एक वक्त हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी दोनों करेंसी की वकालत की थी। इसी पीडीपी ने कश्मीर में हिन्दुस्तानी झंडे जलाने वालों को रिहा किया। 
ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जो कि चुनावी और राजनीतिक, वैचारिक और सैद्धांतिक, कई तरह के बर्दाश्त दर्ज करती हैं। कभी लोकतांत्रिक मजबूरी रहती है, तो कभी मतलबपरस्ती, समय-समय पर हालात से खयालात बदलते हैं, और खयालात से हालात भी। लेकिन अगर बात-बात पर लोग सड़कों पर, अदालत के अहाते में, विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों के बीच भीड़ में लगते नारों से यह तय होने लगे कि कौन देशद्रोही हैं, ऐसा देश किसी संविधान पर बना नहीं दिखता है। देश के एक सबसे बड़े संविधान-विशेषज्ञ सोली सोराबजी ने कल खुलकर देशद्रोह की इन दिनों केन्द्र सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा के समर्थक संगठनों द्वारा की जा रही व्याख्या का विरोध किया है, और कहा है कि देश के खिलाफ नारे लगाना भी देशद्रोह नहीं है। हम नहीं समझते कि संविधान के जानकार इस बात का तर्कसंगत जवाब देने के बजाय अदालत के अहाते में दूसरों को पीटकर जवाब देंगे। 
लेकिन आज देश में देशभक्ति की जो तंगदिल, तंगनजर सोच चल रही है, उसकी नजरों में जो उससे सहमत नहीं हैं, वे सब गद्दार हैं, देशद्रोही हैं। लोगों की यह हमलावर सोच हमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के उस फतवे की याद दिलाती है जिसमें उन्होंने बाकी तमाम दुनिया को तोप की नोंक पर धमकाया था कि जो देश इराक पर हमले में अमरीका के साथ नहीं है, वह देश सद्दाम के साथ है। आज हिन्दुस्तान में गोडसे की प्रतिमा बनाकर उसकी सार्वजनिक पूजा गद्दारी नहीं है, देशद्रोह नहीं है, लेकिन आज केन्द्र सरकार की आलोचना करने वालों को उस भीड़ में लगे कुछ नारों को लेकर भी देश से गद्दारी की तोहमत झेलना पड़ रहा है। यह समझने और याद रखने की जरूरत है कि कोई भी सरकार न देश होती है, न ही देश से बड़ी होती है। किसी सरकार को कोसना या गाली देना देश को गाली देने के बराबर नहीं होता है। फिर लोकतंत्र के भीतर यह लचीलापन भी है कि लोग देश को भी गाली दे सकते हैं, और वह भी देशद्रोह नहीं है। जिनमें लोकतंत्र की समझ नहीं है, वे अभी इस पल दिल्ली की अदालत के बाहर फिर पत्रकारों पर हमला कर रहे हैं। इस देश को देशभक्ति के ऐसे सैलाब से उबरना होगा जिसमें अपने रंग में न रंगे हुए बाकी तमाम लोगों को देश का गद्दार कहा जा रहा है। जब गद्दारी इस तरह सड़कों पर तय होने लगेगी, और बेकसूर लोग पीटे जाने लगेंगे, तो फिर यह याद रखने की जरूरत है कि कुचले हुए बेकसूर कभी नक्सली बनते हैं, कभी फूलन बनते हैं, और हो सकता है कि किसी दिन वे सचमुच ही देशद्रोही भी होने लगें। 

मोदी सरकार के इस काम को राजधानी रायपुर के तमाम लोग सौ फीसदी विश्वसनीय मानते हैं

16 फरवरी 2016
संपादकीय
मोदी सरकार के दूसरे बहुत से कामों को लेकर विरोधियों के मन में यह शक रहता है कि उनके कहने और करने में बड़ा फर्क रहता है। लेकिन कल मोदी सरकार का देश में सफाई या गंदगी का जो सर्वे सामने आया है उसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहने वाले लोग ईमानदारी से किया हुआ सर्वे मानेंगे। दस लाख से अधिक आबादी के  जिन 73 शहरों का सर्वे हुआ उसमें रायपुर देश के सबसे गंदे छह शहरों में से एक साबित हुआ। यह नौबत इस शहर में रहने वाले लोग हमेशा से देखते आए हैं। इस शहर के आसमान पर कारखाने के प्रदूषण का हमला किसी दुश्मन देश पर होने वाले फौजी हमले की तरह का है, और दूसरी तरफ मानो लोगों को जीते-जी मारने के लिए वह काफी न हो, इसलिए प्रदेश की राजधानी एक घूरा बनाकर रख दी गई है। बार-बार जानकार विशेषज्ञों की चेतावनी छपती है कि प्रदूषण से लोग किस तरह जीते-जी मर रहे हैं, और गंदगी से बीमारियां इस तरह बढ़ रही हैं कि वे मौत के आंकड़ों में तब्दील नहीं हो पातीं, मौत के आने की रफ्तार बढ़ जाती है, लेकिन मौत ऐसे झटके से नहीं आती कि वह आंकड़ों में आकर सिर चढ़कर बोले।
और यह हाल तब है जब प्रदेश की राजधानी होने के नाते इस एक अकेले शहर में सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये हर बरस खर्च हो रहे हैं, एक के बाद एक गौरवपथ बन रहे हैं, शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है, लेकिन इसे साफ रखने में सत्ता की दिलचस्पी नहीं है। यह एक बड़ी अजीब बात है कि शहर को साफ किए बिना इसे खूबसूरत बनाने का सपना देखा जा रहा है। खुद म्युनिसिपल की अपनी इमारत को एक बड़ी फिजूलखर्ची से सामंती महलनुमा बनाया गया है, जिसमें बैठकर काम करने वालों की सोच शहर की सेवा करने के बजाय शहर पर राज करने की होना स्वाभाविक है। लेकिन सामंतवाद हिंदुस्तान मिजाज से जाता नहीं है। बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग बड़ी-बड़ी योजनाओं के ताजमहल बनाना चाहते हैं, ताकि बाद में वे ओहदे पर रहें, या न रहें, उनके नाम के साथ ताजमहल हमेशा जुड़े रहें। लेकिन आगरा की गलियों और नालियों की सफाई से शाहजहां को इतिहास में नाम नहीं मिला होता, इसलिए छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में भी नेताओं से लेकर अफसरों तक सबकी प्राथमिकता बड़ी योजनाएं हैं।
म्युनिसिपल हो या रायपुर विकास प्राधिकरण इनकी पहली पसंद खाली सरकारी जमीन पर बड़ी-बड़ी इमारतों के प्रोजेक्ट हैं। लेकिन म्युनिसिपल की जो बुनियादी जिम्मेदारी अंगे्रजों के समय से चली आ रही है, जो दुनिया के हर विकसित और सभ्य देश में मानी जाती है, वह जिम्मेदारी राजधानी रायपुर में घूरे पर फेंक दी गई है, और वहां कूड़े के पहाड़ तले वह अच्छी तरह दफन भी हो गई है। किसी शहर की इज्जत वहां के स्टेडियम, वहां के फ्लाईओवर, वहां की महलनुमा इमारतों से नहीं बनती, शहर की इज्जत बनती है उसके साफ रहने से। राजधानी रायपुर को केंद्र सरकार ने सबसे गंदे आधा दर्जन शहरों में पाया है, और यह सर्वे एकदम ईमानदार लगता है। 
इस शहर में लोग यह मलाल कर रहे हैं कि इस स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। केंद्र सरकार की ऐसी योजना में शामिल हुए बिना भी अगर यह शहर साफ कर दिया जाए, तो हजारों करोड़ के खर्च के बिना भी यह स्मार्ट दिखने लगेगा, वरना मोटे खर्च के बावजूद यह अपनी गंदगी के साथ स्मार्ट नहीं बन पाएगा। राज्य सरकार को इस एक नतीजे को लेकर आत्ममंथन करना चाहिए, और मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे सरकार के बाहर के लोगों से भी, राजनीति के बाहर के लोगों से भी राय लें कि सरकार की नीतियों में कौन-कौन सी बुनियादी खामियां हैं। आज अगर यह सरकार दो बरस बाद के ऐसे ही एक सर्वे में अपनी हालत सुधार नहीं सकेगी, तो प्रदेश के बाहर तो इस राजधानी का नाम तो कल शाम ही बदनाम हो चुका है, दो बरस बाद भी यही बदनामी इसके माथे पर चिपकी रहेगी तो उसके लिए कोई बहाना नहीं चल पाएगा। राज्य सरकार को यह बीड़ा उठाना चाहिए कि वह दो बरस बाद होने वाले सर्वे में अपनी हालत बहुत बेहतर करके दिखाएगी, इसके बिना मौजूदा ढर्रा सरकार की चुनावी संभावनाओं को भी खत्म कर रहा है, और प्रदेश के नगरीय प्रशासन को पूरी तरह बेकाबू भी बता रहा है।










































पूंजी निवेशकों को सुहाना लगना चाहिए छत्तीसगढ़

संपादकीय
15 फरवरी 2016

छत्तीसगढ़ सरकार महानगरों में जाकर देश के उद्योगपतियों और पूंजी निवेशकों को यहां आने का न्यौता दे रही है, और राज्य की खूबियां गिना रही है। बाकी देश के मुकाबिले अगर छत्तीसगढ़ पर एक नजर डाली जाए, तो वह बेमौके की बात नहीं होगी।
आज जब झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्य दसियों हजार करोड़ के घोटालों में कई मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार या कटघरे में देख रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ में सरकार अब तक ऐसी नौबत से बची हुई है। और यह इसी रमन सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है। जब देश के दर्जनभर राज्यों में जुटी हुई है, तब छत्तीसगढ़ में अभी तक स्वास्थ्य विभाग ऐसे एक मामले में फंसा है जो कि बाकी देश के मुकाबिले एक छोटा घोटाला है, शायद सौ-पचास करोड़ का।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने संभावित पूंजी निवेशकों के बीच इस राज्य की जो खूबियां गिनाई हैं, वे असरदार, वजनदार दिखती हैं, इस राज्य में मजदूर असंतोष से कोई हिंसा हुई है, ऐसे मामले इक्का-दुक्का ही इतिहास में दर्ज होंगे। उद्योगपतियों की  साजिश से शहीद शंकर गुहा नियोगी की हत्या हुई थी लेकिन पिछली आधी सदी में हुई ऐसी इस अकेली हत्या के अलावा राज्य शांत है। दिल्ली और हरियाणा में जिस तरह मजदूर, मैनेजरों को जला रहे हैं, वैसा यहां न है, और न शायद होगा। इस राज्य में पड़ोसी राज्यों, और दूर के राज्यों से आए मजदूरों के खिलाफ यहां कोई नफरत नहीं है, जैसी कि महाराष्ट्र में फैलाई जाती है।
छत्तीसगढ़ में कारखानेदार अपनी मनमानी करते हैं, खदानों से खूब चोरी होती है, लेकिन ये बातें शायद ही किसी पूंजी निवेशक को बुरी लगे। आजकल तो बड़े कारखानों और प्रोजेक्ट की रिपोर्ट तैयार करते हुए अलग से यह रिपोर्ट तैयार की जाती है कि किस राज्य में, किस सरकार में चोरी बेईमानी की कितनी गुंजाइश है। इस मामले में भी अब तक छत्तीसगढ़ ही किसी स्टिंग ऑपरेशन, भ्रष्टाचार के सुबूतों से बचा हुआ है। इस राज्य की सरकार का भ्रष्टाचार कर्नाटक, झारखंड और गोवा की तरह न जेल में है, न ही यहां सीबीआई ने राज्य सरकार के खिलाफ कोई केस ही दर्ज किया है। यह बात पूंजी निवेशकों के लिए कम तसल्ली की नहीं होती। इसके अलावा राज्य सरकार के भीतर, भाजपा में मुख्यमंत्री को लेकर पिछले 12 बरस से एक स्थिरता चली आ रही है। स्थिरता के कुछ और खतरे होते हैं, लेकिन पूंजी निवेशकों के नजरिए से देखें, तो उन्हें स्थिरता सुहाती है।
यह देश का अकेला राज्य है जहां जरूरत से अधिक बिजली है, जरूरत से अधिक खनिज हैं, देश के औसत से बहुत अधिक जंगल हैं। यह राज्य बंदरगाहों से जरूर दूर है, लेकिन देश के आधा दर्जन बड़े राज्यों के बीच है और यहां के औद्योगिक उत्पाद के लिए चारों तरफ बाजार है। उद्योगपतियों और पूंजी निवेशकों को तो यह बात भी सुहाती है कि किस राज्य में संगठित या आक्रामक मजदूर आंदोलन नहीं है। उसका नुकसान मजदूर हकों को चाहे कितना ही होता हो, पूंजी निवेश को तो वह पसंद ही आता है। पिछले साल दो साल से लगातार प्रदेश में औद्योगिक प्रदूषण के आंकड़े आ रहे हैं, और प्रदेश की हालत प्रदूषण के मामले में भयानक है। लेकिन इसके बावजूद यहां उद्योग धड़ल्ले से कानून के खिलाफ काम कर रहे हैं, और यह बात भी पूंजी निवेशकों को सुहाने वाली है, न कि उनका हौसला पस्त करने वाली।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लेकर देशभर में यह जनधारणा है कि वे एक सज्जन व्यक्ति हैं। वे विवादों से परे रहने वाले व्यक्ति हैं और उन्होंने इस प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा को रहने नहीं दिया। जब भाजपा के गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश जैसे राज्य साम्प्रदायिक के दाग-धब्बों से घिरे हैं, छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई जानलेवा वारदात नहीं हुई। रमन सिंह शायद अकेले भाजपाई मुख्यमंत्री हैं जो चुनावों में मंदिर-मस्जिद, मजहब, धर्मान्धरण जैसे कोई शब्द भी नहीं बोलते। और उद्योगपतियों को साम्प्रदायिकता से वैसे कोई तकलीफ नहीं लगती, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य की यह एक बात तो है ही कि यहां साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत है।
डॉ. रमन सिंह और उनके कुछ बहुत काबिल मंत्री-अफसर मिलकर अगर इस राज्य में पूंजी निवेश के साथ-साथ, गैर खनिज उद्योग भी ला सकेंगे, तो वह महत्वपूर्ण बात होगी। लेकिन जो एक बात बाकी देश के बारे में कही जाती है, वह छत्तीसगढ़ पर भी लागू होती है, कि यहां पर सरकारी अमला आसानी से किसी कागज को आगे नहीं बढऩे देता। इस कमजोरी से छुटकारा पाना न सिर्फ पूंजी निवेश लाने के लिए जरूरी है, बल्कि राज्य के भीतर सरकार की साख बढ़ाने के लिए भी जरूरी है।

पे्रम के पर्व पर पहरे

संंपादकीय
14 फरवरी 2016
एक और वेलेंटाइन डे आकर चले गया। दुनिया के अधिकतर देशों में पे्रम के पर्व के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन पश्चिम की ईसाई सभ्यता से निकला है, और इसलिए भारत में एक तबका इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ मानने लगा है। और इस दिन को बहुत से हिंदू संगठन, धर्मांध संगठन, नफरतजीवी संगठन अपने अस्तित्व को दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं और सड़कों पर हिंसा से लेकर फतवे जारी करने तक अपने नाम को छपवाने लगे हैं।  कुछ बरस पहले  छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार ने सरकारी स्तर पर इस दिन को मां-बाप की पूजा का दिन बना दिया था, और सरकार के एक आदेश के तहत प्रदेश की सभी स्कूलों में बच्चों के मां-बाप को आमंत्रित कर, उनके बच्चों से उनकी पूजा करवाई जा रही  थी। बच्चे अपने मां-बाप का सम्मान करें, इसके लिए साल में किसी एक दिन को  तय करने की जरूरत नहीं है। यह तो इस देश की संस्कृति और सभ्यता का रोजाना का एक हिस्सा होना चाहिए।
इंसानों की जिंदगी में कई किस्म के रिश्तों की जरूरत होती है, और जब ऐसे सारे रिश्ते अपने-अपने किस्म से स्वस्थ रहते हैं, तब जाकर लोगों का विकास ठीक से होता है। न तो पे्रमी-पे्रमिका मां-बाप की जगह भर सकते, न भाई-बहन पति-पत्नी की जगह भर सकते, न ही दोस्त घरवालों की जगह भर सकते, और न ही घरवाले दोस्त की जगह भर सकते। इसलिए किसी एक को किसी दूसरे का विकल्प बना देना एक बहुत ही असामाजिक बात तो है ही, यह इंसानी मिजाज के भी खिलाफ है, और ऐसे थोपे गए विकल्प से नौजवान पीढ़ी के मन में बुजुर्गों के लिए, समाज के लिए, और सरकार के लिए एक भड़ास भरती चलती है। आज जब छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचे संगीनों के साए में दोस्तों को वहां घुसने से रोक रहे हैं, तो इससे पुलिस और प्रशासन के लिए भी नौजवानों के मन में भारी हिकारत पैदा होती है। और गरीब-मध्यमवर्ग के लड़के-लड़कियां, जो कि महंगे रेस्त्रां नहीं जा सकते, वे आखिर ऐसे दिन एक-दूसरे से मिलने के लिए कहां जाएंगे?
इसलिए कृष्ण जैसे पे्रम के प्रतीक वाले इस देश में पे्रम के नाम पर जब एक दहशत पैदा होती है, और लोगों को मिलने नहीं दिया जाता है, तो ऐसे लोग सुनसान जगहों पर जाने को बेबस होते हैं, और वहां पर जुर्म का शिकार भी होते हैं। छत्तीसगढ़ में इस बात पर हमको हैरानी होती है कि शिव सेना और उसके जैसे दूसरे धर्मांध संगठन खुलकर फतवा जारी करते हैं कि अगर लड़के-लड़कियां किसी सार्वजनिक जगह पर साथ मिले तो उन्हें राखी बंधवाई जाएगी। ऐसे फतवों के बाद भी जब पुलिस और प्रशासन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते, तो ऐसे लोगों का हौसला बाकी गुंडागर्दी के लिए भी बढ़ता है।
हमने पहले भी ऐसे मौकों पर लिखा था कि समझदारी की बात यही है कि समाज अपने नजरिए को हकीकत को मानने वाला बनाए। आज जब इस देश की संस्कृति में जवान लड़के-लड़कियों का मिलना रोका नहीं जा सकता, वे जब साथ-साथ पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं, मोबाइल और मोबाइक के जमाने में उनका घूमना-फिरना एक आम बात हो गई है, तो उनकी आज के जमाने की जरूरतों को एक कानूनी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की जरूरत है। इसके बिना समाज में बलात्कार, आसपास के लोगों का दूसरे किस्म का देहशोषण, बच्चों के साथ बुरा सुलूक, वेश्याओं के साथ असुरक्षित संबंध जैसे बहुत से खतरे बढ़ते चल रहे हैं। भारत का आज का गैरमहानगरीय इलाका बहुत ही पाखंडी मानसिकता के साथ जी रहा है जहां पर कि कुछ लोग यह मानकर, और साबित करते हुए चल रहे हैं कि भारत की संस्कृति में प्रेम कभी था ही नहीं। जबकि यहां का इतिहास और पुराण कृष्ण की तरह-तरह की रासलीलाओं से लेकर वात्सायन के विस्तृत सेक्स-ग्रंथ तक से भरा है और श्रृंगार रस का साहित्य भारत के एक युग में पहाड़ सा पैदा हुआ है। ऐसे देश में एक राजनीतिक सोच भारतीय संस्कृति के एक फर्जी इतिहास का दावा करते हुए प्रेम के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाती है। हिन्दू धर्म के ठेकेदार बनते हुए लाठियां लेकर ये लोग वेलेंटाइन डे पर, नए साल पर जिस तरह से प्रेमी-प्रेमिकाओं पर, दोस्त लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं उनको रोकने में सरकारों की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। यह माहौल आज की नौजवान पीढ़ी को ऐसे लठैतों की नजरों से बचने पर मजबूर करता है। और चूंकि परिवारों के लोग भी अपने जवान बच्चों की जरूरतों को नहीं समझते इसलिए यह पीढ़ी कहीं कोने ढूंढती है तो कहीं कोई दूसरी खाली जगहें। 
हम यहां पर यह भी लिखना चाहते हैं कि एक नौजवान पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को कुचलते हुए अगर कोई समाज अपने आपको बहुत शुद्धता पर टिका समाज मानता है तो वह ऐसी पीढ़ी के सामाजिक योगदान भी संभावनाओं को पहले कुचलता है। अपनी अपूरित जरूरतों के साथ भड़ास और कुंठा से जीने वाले नौजवान अपने समाज और देश-प्रदेश में अपनी पूरी क्षमता से कुछ नहीं जोड़ पाते। इंसानी ताकत से दुनिया के जो देश आगे बढ़े हैं उन सब में इंसान को बहुत बड़ी निजी आजादी मिलने का इतिहास है। जो देश वर्तमान की जरूरत को नहीं समझता, उस देश का भविष्य कभी उसकी संभावनाओं जितना अच्छा नहीं हो सकता। भारत का छत्तीसगढ़ जैसा इलाका इसी तरह अपनी संभावनाओं को खो रहा है। अपनी जवान पीढ़ी में अगर भड़ास बोई जा रही है, तो उससे कभी बहुत मीठे फल मिल भी नहीं सकते।

पिछले बरस भाई खोने वाले गृहमंत्री खुद सड़क पर जख्मी

संपादकीय
13 फरवरी 2016

पिछले बरस छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के बड़े भाई एक मोटरसाइकिल हादसे में गुजर गए। मोटरसाइकिल फिसली, और सिर पत्थर से टकराया, और जान चली गई। खबरों के मुताबिक उन्होंने हेलमेट नहीं लगाया हुआ था। आमतौर पर हेलमेट किसी हादसे में सिर को तो बचा ही लेता है, और बाकी चोटें मामूली रहती हैं, और जान बच जाती है। अभी दो दिन पहले प्रदेश के गृहमंत्री एक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी हुए हैं, और उन्होंने सरकारी गाड़ी में चलते हुए सीट बेल्ट नहीं लगाया था। हो सकता है कि सीट बेल्ट लगा होता तो उन्हें चोट कुछ कम लगती, या नहीं लगती।
अब देखें तो छत्तीसगढ़ में पिछले दो-तीन बरस से मुख्यमंत्री के स्तर पर कई बार यह कोशिश हुई कि दुपहिया चलाने वालों, और उन पर पीछे बैठने वालों के लिए हेलमेट लागू किया जाए। शहरों में पुलिस ने दसियों हजार लोगों से जुर्माना भी वसूल किया, और पूरे प्रदेश में लाखों लोगों ने हेलमेट खरीद भी लिया। लेकिन फिर पुलिस ढीली पड़ी, और जनता में जागरूकता और जिम्मेदारी की, आत्मरक्षा की समझ की इतनी कमी है, कि उसने हेलमेट ताक पर रख दिए। लोगों का रूख इस देश में कुछ ऐसा रहता है कि हेलमेट उनके अपने सिर की हिफाजत के लिए नहीं, पुलिस के कानून की हिफाजत के लिए रहता है। लोग चोरों की तरह गलियों से निकल जाते हैं, लेकिन अपनी जान बचाने वाला यह सामान इस्तेमाल करने से बचते हैं। छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने जो ढिलाई इस मामले में दिखाई है, वह अगर मामूली सी कड़ाई भी बरती जाती, तो हो सकता है इस प्रदेश के गृहमंत्री के भाई आज जिंदा होते, और अभी जख्मी हुए गृहमंत्री सीट बेल्ट से शायद बिना घायल हुए बच जाते।
मुख्यमंत्री और राज्यपाल की तरफ से ऐसी हर मौतों के बाद श्रद्धांजलि के संदेश आते हैं, लेकिन अगर सरकार अपनी इस न्यूनतम जिम्मेदारी को पूरा नहीं करती है, तो ऐसे संदेशों के क्या मायने हैं? इसी देश में दूसरे प्रदेशों में बड़ी साधारण सी सरकारें कड़ाई से हेलमेट लागू कर चुकी हैं। राजस्थान के जयपुर में देखें, तो दुपहियों के पीछे की सीट पर बैठी हुई घाघरा पहनी, घूंघट निकाली हुई महिलाएं भी हेलमेट पहनकर बैठती हैं, और इसे लागू करने के लिए वहां किसी बंदूक की जरूरत नहीं पड़ी, पुलिस ने नियमों को ठीक से लागू किया, और हर बार जुर्माना देने के बजाय लोग जिम्मेदार हो गए। इतनी आसान सी बात छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं हो पाती, यह समझना नामुमकिन है। हेलमेट लागू करवाने के लिए मुख्यमंत्री खुद दुपहिए पर सड़कों पर निकले थे, और आधी-चौथाई जनता राजधानी रायपुर में हेलमेट लगाते दिखने भी लगी थी। और अब तो हर किस्म के चुनाव भी निपट चुके हैं, और मूर्ख जनता खुद होकर जिस जिम्मेदारी का महत्व नहीं समझ पाती, उसे ट्रैफिक जुर्माने के साथ उसके सिर पर थोपने की जरूरत है। आज लोग घायल होकर जब सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो उन पर खर्च तो सरकार का ही होता है। जब लोग सरकार के दिए हुए इलाज के कार्ड को लेकर निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो वह पैसा भी सरकार का ही दिया हुआ होता है। ऐसे में हेलमेट लागू नहीं करना, कारों के सीट बेल्ट का नियम लागू नहीं करना, तेज रफ्तार गाडिय़ों वालों के लोगों के लाइसेंस निलंबित या रद्द नहीं करना, सरकार की गैरजिम्मेदारी है। 
एक जनकल्याणकारी सरकार को जनता को नियम-कायदे सिखाने का कड़वा काम भी करना चाहिए। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनको लोग खुद नहीं समझ पाते, खुद जिन पर अमल नहीं कर पाते। ऐसी बातों के लिए सरकार को अपना जिम्मेदारी का काम करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में हेलमेट और सीट बेल्ट सहित सड़कों के तमाम नियम अगर सरकार कड़ाई से लागू करे तो हर बरस हजारों जिंदगियां यहां पर बचेंगी, और दसियों हजार लोग स्थायी विकलांगता के साथ जीने को मजबूर नहीं होंगे। आज इस राज्य की सरकार सड़कों के ढांचे बनाने में और शहरों को खूबसूरत बनाने में हर बरस दस-बीस हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है। लेकिन इन सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए अपना दिल भी कड़ा नहीं कर पा रही है। राज्य के गृहमंत्री, जो कि पुलिस और ट्रैफिक के भी जिम्मेदार हैं, उन्होंने पिछले बरस ही अपना भाई खोया है, और अभी खुद बुरी तरह घायल हुए हैं। किसी सरकार के लिए दुख के ऐसे मौके से बड़ा कोई दूसरा मौका एक कड़ा संकल्प लेने के लिए नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री इस काम को अपनी प्राथमिकता मानकर पूरे प्रदेश में सड़क सुरक्षा कड़ाई से लागू करें। आज फिर सरकार की यह मुनादी छपी है कि नियमों को कड़ाई से लागू किया जाएगा, और जुर्माना बढ़ाया जाएगा। यह काम लगातार क्यों नहीं चलता यह हमारी समझ से परे है।

छत्तीसगढ़ में रिकॉर्डिंग्स की लहरों पर तैरती राजनीति...

संपादकीय
12 फरवरी 2016

छत्तीसगढ़ की राजनीति अब स्टिंग ऑपरेशनों और टेलीफोन कॉल रिकॉर्डिंग्स पर सवार होकर तूफानों से गुजर रही है। चुनाव में उम्मीदवारों की खरीद-बिक्री से लेकर प्रदेश के सबसे चर्चित जग्गी हत्याकांड तक से जुड़ी हुई होने का दावा करने वाली बातचीत सामने आ रही है, और यह काम करने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से जुड़े हुए एक स्टिंग-ऑपरेटर का कहना है कि ऐसी और बहुत सी रिकॉर्डिंग सामने आ सकती हैं। जानकारों का यह मानना है कि इस एक अकेले आदमी के पास ऐसी हजारों बातचीत रिकॉर्ड हो सकती है, और जैसा कि देश का कानून कहता है, अगर यह अदालत में सुबूत के दर्जे की तकनीक पर बनी होंगी, तो हो सकता है कि इनके आधार पर कुछ लोगों को सजा भी हो जाए। 
हम इन मामलों को लेकर अधिक अटकल लगाना नहीं चाहते लेकिन छत्तीसगढ़ के इन मामलों से सभी लोगों को यह सबक लेने की जरूरत है कि जिंदगी में जिन लोगों के साथ उठना-बैठना होता है, उनके साथ जिस तरह की बातचीत होती है, जैसे काम किए जाते हैं, उनका भुगतान जिंदगी में कभी करना पड़ सकता है। एक वक्त था जब एक फोटो खींचने के लिए कैमरा लगता था, फिल्म लगती थी, और डार्क रूम में जाकर उस फिल्म को धोना-सुखाना पड़ता था। आज बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल फोन है, जो बातचीत भी रिकॉर्ड कर लेते हैं, वीडियो भी रिकॉर्ड कर लेते हैं, और टेलीफोन कॉल भी। ऐसे डिजिटल-जमाने में सिवाय इसके और कोई चारा नहीं है कि लोग अपने चाल-चलन को ठीक रखें, अपने काम ठीक रखें, और अपनी संगत भी ठीक रखें। जमाने से बड़े बुजुर्ग यह नसीहत देते आ रहे हैं कि लोगों को अपनी संगत ठीक रखनी चाहिए, यह बात उस वक्त शायद इतनी अधिक लागू नहीं होती थी जितनी कि आज होती है। आज तो किसी बुरे के साथ कुछ देर के लिए उठना-बैठना भी जानलेवा हो सकता है। 
अभी हम यह कहना नहीं चाहते कि स्टिंग ऑपरेशन या इस तरह की कॉल रिकॉर्डिंग अनैतिक अधिक है, या कानून के काम की अधिक है। जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे अगर किसी जुर्म को उजागर करने के लिए समाज के काम आ सकते हैं, तो नैतिकता का मुद्दा पीछे चले जाता है। छत्तीसगढ़ में आने वाला वक्त ऐसी और बहुत सी रिकॉर्डिंग्स का हो सकता है जो बहुत से लोगों की राजनीतिक और सार्वजनिक जिंदगी को बदलकर रख दे, या तहस-नहस करके रख दे। इससे सबक लेकर तमाम लोगों को अपने तौर-तरीके सुधार लेने चाहिए। 

मातृ-पितृ दिवस मनाने का यह ताजा पाखंड खत्म किया जाए

संपादकीय
11 फरवरी 2016

दो दिन बाद प्रेम का त्यौहार वेलेंटाइन डे आ रहा है, और इसके लिए प्रेमी दिलों ने फूलों और तोहफों की तैयारी कर रखे हैं, दूसरी तरफ प्रेम से नफरत करने वालों ने प्रेमियों को मारने के लिए लाठियों को तेल पिला रखा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में प्रशासन और पुलिस गुंडों को रोकने और जेल भेजने के बजाय बाग-बगीचों से लड़के-लड़कियों को, दोस्तों और प्रेमी जोड़ों को बाहर रखने के लिए हथियार लेकर जवान तैनात कर रखेंगे। नतीजा यह है कि गुंडागर्दी रोकने के बजाय, नफरत और हिंसा रोकने के बजाय, सरकार की पूरी ताकत प्रेम को रोकने में झोंक दी जाएगी। 
इस राज्य में कुछ बरस पहले, उस वक्त बापू कहलाने वाले, और अब आसाराम रह गए एक आदमी ने सरकार को सलाह दी थी कि वेलेंटाइन डे को मनाना बंद करके 14 फरवरी के इस अंग्रेजी तारीख वाले त्यौहार के दिन मातृ-पितृ दिवस मनाया जाए। चूंकि उस वक्त आसाराम, बापू भी कहलाता था इसलिए सरकार ने उसके पांव छूते हुए वह राय मान ली थी, और सरकारी स्तर पर, सरकारी खर्च पर, स्कूलों में यह नए मुखौटे वाला त्यौहार शुरू हो गया था। यह फेरबदल करते हुए सरकार ने किसी भी समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक से यह सलाह नहीं ली थी कि नौजवान पीढ़ी को, लड़के-लड़कियों को अगर स्वाभाविक प्रेम से रोका जाएगा, तो उनके मानसिक विकास पर क्या फर्क पड़ेगा। यह देश इसी तरह के धर्मान्ध पाखंडियों की राय पर अपनी रीति-नीति बदलते रहता है, और यही वजह है कि नौजवान पीढ़ी से लेकर बच्चों तक को अंतहीन बलात्कारों का शिकार होना पड़ता है, कुंठाओं में जीना पड़ता है, और अपनी स्वाभाविक संभावनाओं से कोसों पीछे रहकर मन मारकर दूसरे सभ्य देशों को हसरत से देखना पड़ता है। 
इस देश के इतिहास में इतनी बड़ी मूर्खता कभी नहीं थी कि नौजवान लड़के-लड़कियों को प्रेम से रोका जाए। सैकड़ों बरस पहले का संस्कृत साहित्य प्रेम की कहानियों से, प्रेम की बातों से ऐसा लबालब है कि उसमें से मादक रस टपकते ही रहता है। एक तरफ तो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति, और अपनी संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति के ठेकेदार लाठियां लेकर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, और दूसरी तरफ अपने ही देश के सांस्कृतिक इतिहास में प्रेम की जो लंबी परंपरा रही है, कृष्ण के गोपियों के साथ रास की जो कविताएं, जो तस्वीरें सैकड़ों बरस से चली आ रही हैं, उन सबको अनदेखा करके प्रेम को कुचलना भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म साबित किया जा रहा है। 
नौजवान दिलों की भावनाओं को कुचलकर उससे उनके मां-बाप के लिए सम्मान का प्रतीक चिन्ह नहीं गढ़ा जा सकता। इंसान की जिंदगी में मां-बाप की जरूरत भी होती है, बच्चों की जरूरत भी होती है, और प्रेम या/ और सेक्स की जरूरत भी होती है। इनमें से कोई भी जरूरत एक-दूसरे का विकल्प नहीं होती, जिस तरह जिंदगी मौत का विकल्प नहीं होती, मौत जिंदगी का विकल्प नहीं होती, भजन भोजन का विकल्प नहीं होता, और भोजन भजन का विकल्प नहीं होता। जिंदगी में हर बात की अलग-अलग जगह और जरूरत होती हैं। इनको एक-दूसरे से गड्डमड्ड करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जिस आसाराम ने वेलेंटाइन डे के खिलाफ, नौजवानों के प्रेम के खिलाफ बकवास की थी, वही आसाराम मन में कैसी हिंसक भावनाएं रखता था, यह उसके बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्ची के बयान में खुलकर सामने आया है। छत्तीसगढ़ सरकार को बिना देर किए हुए भारतीय संस्कृति को कुचलने वाले ऐसे मातृ-पितृ दिवस की इस ताजा-ताजा परंपरा को तुरंत खत्म करना चाहिए। और इसके साथ ही प्रेम के ऐसे दिनों पर होने वाली गुंडागर्दी को भी खत्म करना चाहिए जो कि हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व, और भारतीय संस्कृति, इन सबको बदनाम करती है। नौजवान अगर प्रेम नहीं कर पाएंगे, तो कुंठा और भड़ास में वे हिंसा की तरफ बढ़ेंगे। सरकार को अपने ऐसे अवैज्ञानिक फैसले को बिना अधिक देर किए हुए वापिस लेना चाहिए। मां-बाप की इज्जत करने के लिए प्रेमी दिलों की इज्जत का कत्ल जरूरी नहीं है।

बस्तर में महज मीडिया नहीं, लोकतंत्र कुचला जा रहा है

10 फरवरी 2016
विशेष संपादकीय
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ के नक्सल हिंसा वाले इलाके बस्तर को लेकर खबरें कभी थकती ही नहीं हैं। अभी फिर वहां पर एक स्वतंत्र महिला पत्रकार के खिलाफ एक स्थानीय संगठन के विरोध-प्रदर्शन से लेकर उस पत्रकार के घर पर हमले तक की खबरें पूरे देश और दुनिया में फैली हुई हैं। और चूंकि खबरों को फैलाने का काम करने वाला मीडिया बस्तर में पत्रकारों पर खतरे को लेकर फिक्रमंद हैं, इसलिए यह हमला छोटा होते हुए भी उसकी गंभीरता को लोग एक-दूसरे से बांट रहे हैं, और राज्य सरकार से लेकर केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री तक को कह रहे हैं कि इस मामले में कार्रवाई की जाए, और बस्तर में पत्रकारों को आजादी से काम करने के लिए हिफाजत मुहैया कराई जाए। दरअसल हिफाजत मुहैया कराने की बात भी नहीं की जा रही, क्योंकि वहां मीडिया पर हमला या दबाव, जो भी कहें, उसके पीछे पुलिस का ही हाथ होने का शक तमाम लोगों को है, यह एक अलग बात है कि न मीडिया के पास इसके सुबूत हैं, और न ही राज्य सरकार को ऐसे सुबूतों की अधिक परवाह भी है। मालिनी सुब्रमण्यम नाम की इस फ्री लांस महिला पत्रकार से पिछले कई हफ्तों में पुलिस ने तरह-तरह से पूछताछ की है, और वे तरीके सामान्य भी नहीं कहे जा सकते, लेकिन इसकी शिकायत मिलने पर राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है, और बात बढ़ते-बढ़ते पुलिस के उकसावे पर इस महिला के घर पर हमले के आरोप तक पहुंच गई है।
कई हफ्ते पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बस्तर में ही पत्रकारों पर पुलिस की नाजायज कार्रवाई की शिकायतें आने पर राज्य सरकार की एक कमेटी बनाई है, जिसमें सरकारी ओहदे तो शामिल हो गए हैं, लेकिन पत्रकारों के प्रतिनिधि अब तक छांटे नहीं गए हैं, और जिस मकसद से यह कमेटी बनाई जा रही है, वह मकसद दरवाजा खटखटाते खड़ा है, लेकिन कमेटी अस्तित्व में नहीं आई है। मुख्यमंत्री ने जिस नीयत के साथ ऐसी कमेटी बनाकर उसे पत्रकारों के हक की हिफाजत का जिम्मा दिया है, उस कमेटी में दो पत्रकारों के नाम सरकार तय नहीं कर पा रही है। 
लेकिन इस कमेटी से परे बस्तर के हालात को समझने की जरूरत है। वहां पर जिस तरह नक्सलियों की हिंसा खत्म करने के नाम पर पुलिस को एक बेलगाम छूट मिली हुई है, उसे लेकर राज्य सरकार में बैठे बड़े-बड़े ओहदेदार भी हैरान हैं, और वे यह भी मानते हैं कि नक्सलियों के समर्पण के मामले मोटे तौर पर फर्जी और गढ़े हुए हैं। बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता यह मानते हैं कि बस्तर में पुलिस बेकसूरों को मार रही है, और सुरक्षा बल वहां की लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। यह माहौल बस्तर में बरसों से चले आ रहा है, और सरकार के बड़े-बड़े लोग यह मान रहे हैं कि नक्सल हिंसा को खत्म करने के लिए की जा रही कार्रवाई के चलते ऐसी कुछ शिकायतें तो आती ही रहेंगी, और इन शिकायतों को पूरी तरह से रोकने का मतलब नक्सल हिंसा को छूट देना हो जाएगा। 
हम यहां पर सरकार को याद दिलाना चाहेंगे कि लोकतंत्र में रास्ते बहुत छोटे नहीं होते हैं, और कई बार लोकतंत्र को बचाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। अगर नक्सलियां से लोकतंत्र को बचाने के लिए बस्तर के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार खत्म करना ही एक रास्ता है, तो फिर यह रास्ता न लोकतांत्रिक है, और न इससे लोकतंत्र बच पाएगा। उत्तर-पूर्व हो, कश्मीर हो, या पंजाब हो, जहां कहीं पुलिस और सुरक्षा बलों ने, फौज ने या सरकार ने ज्यादतियां की हैं, वहां पर जख्म बरसों बाद भी अब तक हरे हैं। जिस बस्तर में लोकतंत्र खत्म करने के लिए हिंसा करने वाले नक्सलियों को आदिवासियों के बीच एक जगह मिली है, वहां पर राज्य सरकार को अपने अमले के तौर-तरीके के बारे में अधिक सोचना चाहिए। आज सरकार में ऐसे लोगों की भरमार है जो लोकतंत्र की महीन बातों की तरफ से बेपरवाह हैं। चूंकि बस्तर में कुचले जाने वाले अधिकतर लोग आदिवासी हैं, गरीब हैं, इसलिए शहरों में सरकार चलाने वाले लोगों के बीच उनको लेकर अधिक संवेदनशीलता मुमकिन भी नहीं रहती, और बस्तर जैसे इलाके से जो जनप्रतिनिधि आते हैं, वे जीतकर सरकार में आने के बाद अपने खुद के समाज की दिक्कतों, उसके खतरों, की तरफ से बेपरवाह हो जाते हैं। ऐसे में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया के कुछ लोग, या बस्तर में काम करते कुछ नौजवान समर्पित वकील सत्ता की आंखों की किरकिरी बन जाते हैं, क्योंकि वे सरकारी हिंसा के मामलों को उठाते हैं और सरकार से कार्रवाई की मांग करते हैं। और सरकार मानो अघोषित रूप से अपने अमले की हिंसा और ज्यादती को जायज ठहराने के लिए यह मुद्दा खड़ा करती है कि ये आंदोलनकारी नक्सली हिंसा का विरोध क्यों नहीं करते? ये पत्रकार नक्सल हिंसा की रिपोर्टिंग क्यों नहीं करते ? यह सवाल लोकतांत्रिक समझ की कमी बताने वाला है, क्योंकि लोकतंत्र में चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार ही सबके प्रति जवाबदेह रह सकती है, जो नक्सली लोकतंत्र को खत्म करने में जुटे हुए हैं, वे भला किसी के प्रति कैसे जवाबदेह हो सकते हैं? बस्तर में आज सत्ता के प्रतिनिधि, स्थानीय अफसरों से असहमति की कोई भी बात  नक्सलियों से हमदर्दी गिनी जा रही है। यह लोकतंत्र के लिए एक बहुत खतरनाक नौबत है, और नक्सल हिंसा को खत्म करने के नाम पर, खत्म करते हुए भी लोकतंत्र को कुचलना मंजूर नहीं किया जा सकता। पंजाब की मिसाल सबके सामने है जहां पर केपीएस गिल नाम के एक बड़े से नामी-गिरामी और सितारा पुलिस अफसर की कई तरह की ज्यादतियां सरकार ने अनदेखी की थीं, लेकिन केपीएस गिल तो खुद तो बचे रहे, उनके लिए हिंसा करने वाले पुलिस के दूसरे अफसर और कर्मचारी अब तक जेलों में पड़े हैं। छत्तीसगढ़ के लिए सबक सीखने को हिन्दुस्तान में बहुत से प्रदेशों की मिसालें हैं, और लोकतंत्र को जहां-जहां कुचला गया है, वहां उसके लंबे नुकसान देखने मिले हैं। 
बस्तर में अकेली मीडिया पर जुल्म-ज्यादती की बात करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वहां पर हर उसके साथ ज्यादती का खतरा खड़ा हुआ है जो कि पुलिस के साथ नहीं है। यह रंग-ढंग देखकर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का वह नारा याद पड़ता है जो कि उन्होंने सद्दाम हुसैन पर हमला करने के लिए झूठे सुबूतों के साथ गढ़ी गई साजिश पर अमल करते हुए लगाया था कि दुनिया के देश या तो इस हमले में अमरीका के साथ हैं, या फिर आतंक के साथ हैं। लोकतंत्र ऐसा काला-सफेद नहीं होता, इसमें असहमति के कई दर्जे होते हैं, और उनका सम्मान किए बिना कोई लोकतंत्र विकसित नहीं हो सकता। 

जिंदगी मौत से बहुत अधिक बड़ी होती है

संपादकीय
9 फरवरी 2016

भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित जमीन की हिफाजत करने के लिए दोनों देशों के हजारों सैनिकों को सियाचीन जैसे बर्फीले इलाके में बारहों महीने चौकसी करनी पड़ती है, और कभी सरहद के इस तरफ के सैनिक मारे जाते हैं, और कभी सरहद के उस तरफ के। और ये एक-दूसरे की गोलियों से नहीं मरते, मौसम की मार से मरते हैं। दोनों देशों के बीच तनाव का एक नतीजा यह भी होता है कि अंधाधुंध फौजी फिजूलखर्ची के अलावा जिंदगियां खत्म होती हैं, और जिसकी कोई भरपाई अपने-अपने देश की गरीब जनता पर टैक्स लगाकर, या उसके हक के पैसे खर्च करके भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें नहीं कर सकतीं। 
लेकिन लिखने का मुद्दा आज यह है कि एक बर्फीले तूफान से घिरकर, बर्फ से दबकर जो हिन्दुस्तानी फौजी वहां दफन हो गए थे, उनके बारे में फौज ने भी औपचारिक रूप से यह घोषणा कर दी थी कि उनमें से किसी के भी जिंदा बचने के आसार अब नहीं हैं, और उनकी तलाश अब सिर्फ लाशों के रूप में की जा रही थी। बर्फ में दबने के छह दिन बाद, छब्बीस फीट बर्फ के नीचे से दबा हुआ एक हिन्दुस्तानी फौजी आज जब जिंदा पाया गया, तो यह मौत को शिकस्त देकर जीतने वाला फौजी निकला, और उसे दिल्ली तक तो जिंदा पहुंचाया ही गया है। यह पूरी कहानी अपनी तस्वीरों के साथ रौंगटे खड़े कर देती है कि किस तरह जब मौत तय मान ली जाती है, तब भी जिंदगी मानो कब्र से निकलकर चलते हुए आकर खड़ी हो जाती है। छब्बीस फीट बर्फ के नीचे से छह दिनों बाद, बिना किसी ऑक्सीजन की मदद के किस तरह यह फौजी वहां बचा होगा, यह सोचने की बात है। और यह भी देखने की बात है कि यह फौजी दक्षिण भारत के कर्नाटक का है, और एक गर्म इलाके से जाकर वह दुनिया के सबसे सर्द इलाकों में से एक में ड्यूटी कर रहा था, और एक दक्षिण भारतीय किस तरह ऐसी बर्फ के नीचे से निकलकर आया है। 
इस मुद्दे पर लिखने की एक वजह यह है कि जिंदगी में लोगों को कई बार कई तरह के हादसे झेलने पड़ते हैं, जो कि ऐसी निराशा पैदा करते हैं कि अब कुछ भी नहीं बचा है, सब कुछ खत्म हो गया है, अब जीकर क्या करेंगे। ऐसी ही नौबत में रोजाना बहुत से लोग आत्महत्या करते हैं। लेकिन इस बचकर निकले हुए बहादुर फौजी को देखें तो लगता है कि जिंदगी में अनुपम खेर के शो के बाहर भी कुछ भी हो सकता है। इसलिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या उनकी हालत छब्बीस फीट बर्फ के नीचे दबे हुए छठवें दिन से भी अधिक बुरी है? और अगर उनकी हालत इतनी खराब नहीं है, तो उनको यह हौसला रखना चाहिए कि शायद जिंदगी की संभावना उनको तलाश करते हुए उनकी मुसीबतों के नीचे भी पहुंच जाएगी, और बचने का कोई एक रास्ता निकल आएगा। हमको लगता है कि इस तरह के करिश्मों की कहानियां लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है, ताकि लोग हौसला छोडऩे के पहले, जिंदगी खत्म करने के पहले यह सोचें कि कैसी-कैसी नौबतों से जिंदगी मौत को धकेलकर बाहर निकल आती है। जहां हजारों किलोमीटर बर्फ ही बर्फ हो, जहां बर्फ की चादर कई मंजिलों की इमारत जितनी मोटी हो, वहां पर भी लोग न सिर्फ ड्यूटी करके जिंदा लौट आते हैं, बल्कि इस तरह दफन होने पर भी जिंदगी वहां से निकलकर लौट आती है। हर किसी को अपनी-अपनी मुसीबत के वक्त इस घटना के बारे में, इस करिश्मे के बारे में सोचना चाहिए। और जिन लोगों के आसपास लोग उम्मीद और हौसला छोड़ रहे हों, उन लोगों को भी निराश-हताश लोगों को ऐसी कुछ कहानियां बतानी चाहिए। जिंदगी मौत से बहुत अधिक बड़ी होती है। 

खिसकती जमीन को देखकर शंकराचार्य की हड़बड़ाहट

संपादकीय
8 फरवरी 2016

देश के कई शंकराचार्यों में से एक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती पिछले कई महीनों से बड़े हड़बड़ाए हुए दिख रहे हैं। उनको बोलचाल में लोग कांग्रेसी शंकराचार्य भी कहते हैं, क्योंकि वे भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच हमेशा ही कांग्रेस का साथ देते हुए दिखते आए हैं। लेकिन अभी उनकी हड़बड़ाहट कई किस्म की दिख रही है। पिछले बरस उन्होंने शिरडी के सांईबाबा पर हमला किया, और उनके मंदिरों में जाने से हिन्दुओं को मना किया, सांईबाबा को मुसलमान साबित करने की कोशिश की, और लगातार उनके खिलाफ, सांई भक्ति के खिलाफ बयान देते रहे। सांई पूजा को उन्होंने हिन्दू धर्म पर हमला और खतरा भी बताया। अभी कुछ हफ्ते पहले उन्होंने ताजमहल को एक शिव मंदिर करार दिया। 
अभी उन्होंने कहा कि इस्कॉन के मंदिर कमाई का अड्डा है, और भारत में इस्कॉन-मंदिरों में आने वाली चढ़ावे की रकम अमरीका भेजी जाती है क्योंकि इस्कॉन भारत में नहीं बल्कि अमरीका में पंजीकृत संस्था है। उन्होंने इस्कॉन अनुयायियों से पूछा कि वृंदावन में राधे-राधे कहा जाता है और मंदिर बनवाए जाते हैं, लेकिन झारखंड व असम में जाकर अनुयायी क्यों नहीं मंदिर बनाते हैं। उन्होंने कहा, अनुयायी वहां इसलिए नहीं जाते हैं कि वहां पर ईसाई उनके बंधु बनकर बैठे हुए हैं। शंकराचार्य ने सरकार से मांग की है कि इन मंदिरों से जो चढ़ावा अमेरिका जाता है, उसकी जांच की जाए।
पिछले कुछ हफ्तों से चल रहे शनि पूजा विवाद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा है कि शनि पूजा करके महिलाओं का भला नहीं हो सकता है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि शनि, देवता नहीं हैं केवल ग्रह हैं और ग्रहों की पूजा नहीं होती। एक अलग बयान में स्वरूपानंद ने कहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में आरएसएस के कार्यकर्ता गोमांस खाते हैं।
परंपरा के प्रश्न पर शंकराचार्य ने कहा कि हम कहते है पोप जो है वह स्त्री नहीं होता, मुस्लिम स्त्रियां जो है मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ती हैं। क्या आप वहा पहुंचा सकते हो, तो फिर क्या सारी पंचायत हमारे ऊपर है, हमारी परंपरा तोडऩे के लिए सामाजिक न्याय का सहारा ले रहे हो। यह कौन सी बात है सरकार को इससे क्या लेना देना है वह क्यों इसके बीच में पड़ती है। 
शंकराचार्य की हड़बड़ाहट इन बातों को लेकर दिखती है कि धर्म के मुद्दे अब धर्मगुरुओं के काबू से बाहर निकल रहे हैं, और सामाजिक आंदोलन की शक्ल ले रहे हैं। शिरडी के सांई बाबा के मंदिरों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों जाते हैं, और वहां भजन भी होते हैं, और कव्वाली भी होती है। ऐसे में शंकराचार्य को अपना धर्म खतरे में दिख रहा है। लेकिन वे इस हकीकत को समझना नहीं चाहते कि धार्मिक मुखिया साम्प्रदायिकता को चाहे कितना ही बढ़ाने की कोशिश करें, उनके खिलाफ सामाजिक आंदोलन खड़े हो रहे हैं, और वे धर्म की साजिश को उजागर भी कर रहे हैं। ये शंकराचार्य खुद होकर यह मानते हैं कि उनको कांग्रेसी शंकराचार्य माना जाता है। जो धर्मगुरू अपनी खुद की छवि धर्म तक सीमित नहीं रख पा रहा, और राजनीतिक दलों की राजनीति में जिसे एक पक्ष का भागीदार माना जाता है, वैसी जनधारणा न सिर्फ धर्मगुरू की, बल्कि धर्म की भी साख चौपट करती है। 
शंकराचार्य के बारे में ऐसा लगता है कि समाज में लोग धार्मिक कट्टरता से जैसे-जैसे दूर हो रहे हैं, वैसे-वैसे शंकराचार्य, या दूसरे धर्मों के भी ऐसे गुरू दहशत में आ रहे हैं, और लोगों को फिर कट्टरता की तरफ खींचने के लिए तरह-तरह के बयान दे रहे हैं। सांई बाबा को लेकर तो शंकराचार्य ने जितनी ओछी और जितनी भद्दी बातें कही हैं, वे तो कोई जिम्मेदार आम इंसान भी नहीं कह सकते थे। लेकिन शंकराचार्य की ऐसी बातों से लोगों का एक भला भी हो रहा है, धर्म और धर्मगुरू दोनों की नीयत उजागर भी हो रही है। 

केजरीवाल की साधारण पोशाक में क्या बुराई है?

संपादकीय
07 फरवरी 2016

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गणतंत्र दिवस पर मफलर से लिपटे सिर के साथ सलामी क्या ले ली, उनसे नफरत करने वाले लोग इंटरनेट पर उन पर टूट पड़े और सलामी की गरिमा, गणतंत्र दिवस की गरिमा गिनाने लगे। अब खबर आई है कि विशाखापट्टनम के एक इंजीनियर ने केजरीवाल को कुछ सौ रूपए का एक चेक भेजा है ताकि वे अपने लिए जूते खरीद लें, और ऐसे मौकों पर सैंडल पहनकर न जाएं। 
भारत के लोग अभी तक मुगलों की राजशाही, और अंग्रेजों की गुलामी तले दबी-कुचली मानसिकता से उबर नहीं पा रहे हैं। हिन्दुस्तान के अनगिनत नेता अपनी घोषित कमाई से सैकड़ों गुना अधिक खर्च करते दिखते हैं, लेकिन लोगों को उस पर कोई आपत्ति नहीं होती और लोग उसे शान-शौकत मानते हैं, और उसके खिलाफ कोई अभियान नहीं चलता। अब सवाल यह है कि ईमानदारी के मुद्दे पर सरकार तक पहुंचा हुआ एक नौजवान अपनी जाहिर तौर पर चर्चित खांसी और ठंड के बीच अपने को मफलर से लपेटे हुए सलामी लेता है, तो उसमें कौन सी बात गरिमा के खिलाफ है? ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जो फक्कड़ मिजाज रहे हैं, और सलामी भी लेते रहे हैं। हाल के बरसों में लोगों ने जॉर्ज फर्नांडीज को रक्षामंत्री रहते हुए बिना कलफ, बिना इस्तरी किए हुए खद्दड़ के कुर्ते-पायजामे में फौज के अफसरों के बीच, सलामी लेते हुए देखा है। और अगर आज के रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर को देखें, तो वे भी बिना मोजे पहने जूते या सैंडिल में, साधारण कपड़ों में फौज की सलामी लेते दिखते हैं। यह सोच एक बहुत ही आभिजात्य सोच है कि किसी पद पर बैठे हुए लोगों को किसी खास किस्म के कपड़े ही पहनने चाहिए, या जूते पहनने ही चाहिए। यह अंग्रेजों की गुलामी के दौर की मानसिकता भी है जो कि उससे उबर नहीं पाई है। राजतंत्र के दिनों में तो सत्ता पर बैठे लोग तरह-तरह की नौटंकीनुमा पोशाकें पहनते थे, और उनके दरबारियों, कर्मचारियों तक की पोशाकें तय रहती थीं। अब लोकतंत्र में उसी तरह के पैमानों को थोपना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि गुलामी भी है। 
लोगों को आम जिंदगी में भी इंसानों की तरह रहना सीखना चाहिए, और संपन्नता के बाजार के खड़े किए हुए गरिमा के पैमानों को लात मारनी चाहिए। बाजार से लेकर सरकारी कुर्सी तक, और राजनीति से लेकर महिलाओं की फैशन तक बाजार इस तरह के पैमाने थोपते चलता है कि उसका खुद का कारोबार बढ़ता रहे। लोगों में यह हौसला रहना चाहिए कि इससे उबर सकें। लोगों के सामने बाजार की कुछ मिसालें भी हैं, एप्पल जैसी सबसे बड़ी कंपनियों में से एक के संस्थापक स्टीव जॉब्स पूरी जिंदगी एक ही किस्म के मामूली टी-शर्ट और जींस में ही दिखते रहे हैं। अरबों का कारोबार करने जा रहे एप्पल-प्रोडक्ट पेश करते हुए भी समारोह में वे वैसे ही रहते थे। अब फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का वही हाल है, और उनके पास एक ही किस्म के जींस और टी-शर्ट के अलावा शायद ही कोई दूसरे कपड़े हैं। 
इंसान की पहचान कपड़ों या उसके महंगे सामानों से नहीं होती। इंसान की पहचान उसके कामों से, और उसकी सोच से होनी चाहिए। दुनिया का सबसे गरीब प्रधानमंत्री उरुग्वे का है। जोस मुजिका नाम का यह प्रधानमंत्री अपने साधारण कपड़ों में, अपनी पुरानी खटारा कार चलाते हुए चलता है, और इलाज की जरूरत पडऩे पर अस्पताल में और लोगों के साथ बैठकर बारी का इंतजार करता है। अभी-अभी उनका कार्यकाल पूरा हुआ है, और उनकी सादगी दुनिया के सामने एक मिसाल है। जो लोग आज केजरीवाल या वैसे साधारण लोगों की मजाक उड़ाते हैं, वे धिक्कार के लायक हैं।