सीता और भगत सिंह को इंसाफ दिलाने के मुकदमे

संपादकीय
1 फरवरी 2016

दो बड़े पुराने मुद्दों को लेकर दो अलग-अलग देशों की अदालतों में दिलचस्प मामले दायर हुए हैं। भारत में बिहार के सीतामढ़ी में एक अदालत में एक मामला दर्ज हुआ है। मुकदमा करने वाले स्थानीय वकील का तर्क है कि एक धोबी की बात सुनकर भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल दिया। ऐसा कर उन्होंने सीता पर अत्याचार किया है। वकील ने कहा कि वह भी मिथिला में पैदा हुए और सीता भी मिथिला में ही पैदा हुई थीं। लेकिन अयोध्या नरेश ने मिथिला की बेटी के साथ इंसाफ नहीं किया। सीता मैय्या को न्याय दिलाने के लिए यह केस दर्ज कराया है। उनका मकसद सिर्फ सीता को न्याय दिलाना है, किसी धर्म या किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं। इस वकील चंदन सिंह का कहना है कि स्त्री उत्पीडऩ त्रेता युग में ही शुरू हो गया था। इसलिए जब तक त्रेता युग की नारी को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक कलियुग की नारी को भी न्याय नहीं मिल सकता। उन्होंने राम के विवेक पर भी सवाल उठाया है। कहा-इस पर बहस होनी चाहिए कि क्या राम का विवेक सही था।
दूसरी तरफ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश अधिकारी जेपी सैंडर्स की हत्या के दोषी करार दिये गये शहीद भगत सिंह को निर्दोष साबित करने के लिए पाकिस्तान की एक अदालत बुधवार से मामले की सुनवाई करेगी। भगत सिंह को फांसी दिए जाने के करीब 85 साल बाद अदालत याचिका पर सुनवाई शुरू कर रही है। लाहौर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक खंडपीठ बनाई है। इस याचिका पर अंतिम सुनवाई मई 2013 में न्यायमूर्ति शुजात अली खान ने की थी। उन्होंने इस मामले को एक बड़े पीठ को सौंपने के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था। 17 दिसंबर 1928 को हुई इस घटना की सुनवाई के लिये भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने नवंबर में लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कुरैशी ने कहा था कि भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अखंड भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने कोर्ट से कहा कि अविभाजित भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले भगत सिंह हमारे भी स्वतंत्रता सेनानी हैं। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के कारण 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी। उन्हें हत्या के जुर्म से बरी दिया जाना चाहिए।
इन दो मामलों की इतनी लंबी जानकारी हम यहां इसलिए दे रहे हैं कि इनके बिना इन मुकदमों की बुनियाद नहीं समझी जा सकती, और यह बुनियाद इन मुकदमों से परे भी दुनिया के काम की है। दुनिया का इतिहास किताबों में दफन रखकर आज के समाज से अलग नहीं किया जा सकता। बहुत सी ऐसी ऐतिहासिक गलतियां, और गलत काम इतिहास में दर्ज हैं, जिनका असर आज हजारों बरस बाद भी लोगों पर पड़ता है। दुनिया में आदिवासियों के साथ, महिलाओं के साथ, अश्वेतों के साथ, अल्पसंख्यक धर्म के लोगों के साथ हजार किस्म की ज्यादतियां की गईं, और आज जब समाज जागरूक हो रहे हैं, तो वे उन गलत कामों पर मलाल भी कर रहे हैं। लेकिन यह मलाल सिर्फ कागजी नहीं होना चाहिए, और ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का काम भी होना चाहिए। ये दोनों मामले भी इसी किस्म के हैं। हो सकता है कि इन दोनों देशों के मौजूदा कानून आगे की सुनवाई में इन्हीं खारिज करने के लिए मजबूर हों, लेकिन उससे फर्क नहीं पड़ता, जब अदालत में सुनवाई होती है, तो एक मुद्दा सामने आता है, और सामाजिक बदलाव के लिए यह मुद्दा जरूरी है।
राम ने सीता के साथ जो किया वह एक बहुत बड़ा अन्याय था, और वह अन्याय सीता के वक्त से लेकर आज तक हिन्दू और हिन्दुस्तानी समाज में बाकी सीताओं के साथ जारी है। इसी तरह जब एक सेना किसी दुश्मन देश के सैनिक को मारती है, तो वह हत्या नहीं कहलाती, वह अपने देश को बचाने के लिए की गई फौजी कार्रवाई कहलाती है, और उसके लिए अपने देश में तमगे मिलते हैं। इसी तरह भगत सिंह ने जो किया था, वह विदेशी हमलावर एक देश के अफसर से अपने देश को आजाद कराने के लिए किया था, वह कोई निजी हत्या नहीं थी, बल्कि वह उस फौजी अफसर द्वारा की गई सैकड़ों हिन्दुस्तानियों की हत्याओं के खिलाफ की गई एक हिन्दुस्तानी की आजादी की लड़ाई के तहत कार्रवाई थी। हम इस बात को एक बहुत महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कार्रवाई मानते हैं कि भगत सिंह को हत्यारे के आरोप से बरी करने के लिए अदालती कार्रवाई की जाए, और पाकिस्तान की अदालत जिस गंभीरता से इस मामले में सुनवाई कर रही है, और हाईकोर्ट ने एक खास बेंच इसी के लिए बनाई है, उससे इस मामले की गंभीरता पता लगती है। दूसरी तरफ भारत में भी एक अदालत ने राम के खिलाफ सीता की तरफ से ऐसी एक अपील मंजूर की है, और इसका भी प्रतीकात्मक महत्व बहुत अधिक है। एक बेकसूर पत्नी को घर से निकाल देने वाले राम के खिलाफ अदालती तर्क दिलचस्प होंगे, और भारत के सभी न्यायप्रिय लोगों को ध्यान से यह अदालती मामला देखना चाहिए।

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