निजी जिंदगी की गरीबी से मुकाबले के बाद राष्ट्रीय मुकाबले में मैडल

संपादकीय
25 फरवरी 2016  
चारों तरफ नकारात्मक और निराशा पैदा करने वाली खबरों के बीच हौसला बढ़ाने वाली खबर कभी आती है, तो वह दिल को हिला जाती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां खेलों पर सैकड़ों करोड़ रूपए के स्टेडियम और दूसरे खर्च होते हैं, वहां पर जलाऊ लकड़ी बेचकर गुजर-बसर करने वाली पे्रमलता पाटिल नाम की अकेली महिला ने जिंदगी के संघर्ष के साथ-साथ अपने बेटे को राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग मुकाबले तक पहुंचने का रास्ता भी जुटाकर दिया, और इस बेटे ने दो रजत पदक जीतकर यह भी साबित किया कि गरीबी के बीच भी मां के दिए हौसले से कहां तक पहुंचा जा सकता है। मजदूर पिता की बेवक्त मौत हो चुकी थी, और पिछले दस बरस अकेली मां तीन बच्चों को बड़ा करते आ रही है। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ एक बच्चे को एक निजी खेल मुकाबले, वेटलिफ्टिंग में किस तरह से मां ने बढ़ावा दिया होगा, यह सोचना भी कल्पना से परे की बात है। बेटे अतीश ने पटना में आयोजित 52वीं जूनियर नेशनल वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में दो रजत पदक जीतकर छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है। ग्यारहवीं कक्षा में पढऩे वाले अतीश ने यह यश आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए हासिल किया है।
राज्य सरकार को चाहिए कि प्रदेश में जहां-जहां ऐसी प्रतिभाएं हैं, उनकी आर्थिक दिक्कतों से बाहर निकालकर बढ़ावा देना चाहिए। लोगों को याद होगा कि चीन जैसा देश जो कि ओलंपिक मुकाबलों से किलो के हिसाब से गोल्ड मैडल लेकर लौटता है, वहां पर बच्चों को बचपन से ही छांट लिया जाता है, और फिर सरकार उनके ओलंपिक मैडल तक पल-पल उन पर मेहनत करती है, और मां-बाप की गरीबी या अमीरी का कोई फर्क बच्चों पर नहीं पडऩे दिया जाता। ऐसा ही हाल दुनिया के कई और देशों का भी है, और भारत में भी कुछ प्रदेशों में सरकारें अपने होनहार खिलाडिय़ों पर अधिक ध्यान देती हैं। छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले तो होने लगे हैं, खेलों का ढांचा भी हजारों करोड़ से विकसित हो गया है, लेकिन जब ऐसे प्रतिभाशाली और होनहार खिलाड़ी अपने परिवार के साथ जिंदगी के संघर्ष में लगे दिखते हैं, तो लगता है कि सरकारी सोच और कोशिश में बड़ी कमी है। कहने के लिए तो इस राज्य में हर खेल के संघ बने हुए हैं, और उनमें से लगभग हर पर नेता और अफसर काबिज भी हैं, लेकिन हकीकत यह है कि खिलाड़ी अभावों से जूझते हुए लगातार संघर्ष करते हैं, और खेल के मुकाबले के साथ-साथ खेलने के, तैयारी के इंतजाम का जिंदगी का मुकाबला भी चलते ही रहता है। इस एक मामले को एक नमूना और मिसाल मानते हुए राज्य सरकार को तुरंत ही इस होनहार खिलाड़ी को अभाव की जिंदगी से बाहर निकालकर हर मुमकिन तैयारी करवानी चाहिए, उसके बिना नामी-गिरामी टूर्नामेंटों में नामी-गिरामी खेल संघ-नेताओं के रहने का कोई खास मतलब नहीं रहेगा। 
   














































































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