खिसकती जमीन को देखकर शंकराचार्य की हड़बड़ाहट

संपादकीय
8 फरवरी 2016

देश के कई शंकराचार्यों में से एक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती पिछले कई महीनों से बड़े हड़बड़ाए हुए दिख रहे हैं। उनको बोलचाल में लोग कांग्रेसी शंकराचार्य भी कहते हैं, क्योंकि वे भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच हमेशा ही कांग्रेस का साथ देते हुए दिखते आए हैं। लेकिन अभी उनकी हड़बड़ाहट कई किस्म की दिख रही है। पिछले बरस उन्होंने शिरडी के सांईबाबा पर हमला किया, और उनके मंदिरों में जाने से हिन्दुओं को मना किया, सांईबाबा को मुसलमान साबित करने की कोशिश की, और लगातार उनके खिलाफ, सांई भक्ति के खिलाफ बयान देते रहे। सांई पूजा को उन्होंने हिन्दू धर्म पर हमला और खतरा भी बताया। अभी कुछ हफ्ते पहले उन्होंने ताजमहल को एक शिव मंदिर करार दिया। 
अभी उन्होंने कहा कि इस्कॉन के मंदिर कमाई का अड्डा है, और भारत में इस्कॉन-मंदिरों में आने वाली चढ़ावे की रकम अमरीका भेजी जाती है क्योंकि इस्कॉन भारत में नहीं बल्कि अमरीका में पंजीकृत संस्था है। उन्होंने इस्कॉन अनुयायियों से पूछा कि वृंदावन में राधे-राधे कहा जाता है और मंदिर बनवाए जाते हैं, लेकिन झारखंड व असम में जाकर अनुयायी क्यों नहीं मंदिर बनाते हैं। उन्होंने कहा, अनुयायी वहां इसलिए नहीं जाते हैं कि वहां पर ईसाई उनके बंधु बनकर बैठे हुए हैं। शंकराचार्य ने सरकार से मांग की है कि इन मंदिरों से जो चढ़ावा अमेरिका जाता है, उसकी जांच की जाए।
पिछले कुछ हफ्तों से चल रहे शनि पूजा विवाद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा है कि शनि पूजा करके महिलाओं का भला नहीं हो सकता है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि शनि, देवता नहीं हैं केवल ग्रह हैं और ग्रहों की पूजा नहीं होती। एक अलग बयान में स्वरूपानंद ने कहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में आरएसएस के कार्यकर्ता गोमांस खाते हैं।
परंपरा के प्रश्न पर शंकराचार्य ने कहा कि हम कहते है पोप जो है वह स्त्री नहीं होता, मुस्लिम स्त्रियां जो है मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ती हैं। क्या आप वहा पहुंचा सकते हो, तो फिर क्या सारी पंचायत हमारे ऊपर है, हमारी परंपरा तोडऩे के लिए सामाजिक न्याय का सहारा ले रहे हो। यह कौन सी बात है सरकार को इससे क्या लेना देना है वह क्यों इसके बीच में पड़ती है। 
शंकराचार्य की हड़बड़ाहट इन बातों को लेकर दिखती है कि धर्म के मुद्दे अब धर्मगुरुओं के काबू से बाहर निकल रहे हैं, और सामाजिक आंदोलन की शक्ल ले रहे हैं। शिरडी के सांई बाबा के मंदिरों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों जाते हैं, और वहां भजन भी होते हैं, और कव्वाली भी होती है। ऐसे में शंकराचार्य को अपना धर्म खतरे में दिख रहा है। लेकिन वे इस हकीकत को समझना नहीं चाहते कि धार्मिक मुखिया साम्प्रदायिकता को चाहे कितना ही बढ़ाने की कोशिश करें, उनके खिलाफ सामाजिक आंदोलन खड़े हो रहे हैं, और वे धर्म की साजिश को उजागर भी कर रहे हैं। ये शंकराचार्य खुद होकर यह मानते हैं कि उनको कांग्रेसी शंकराचार्य माना जाता है। जो धर्मगुरू अपनी खुद की छवि धर्म तक सीमित नहीं रख पा रहा, और राजनीतिक दलों की राजनीति में जिसे एक पक्ष का भागीदार माना जाता है, वैसी जनधारणा न सिर्फ धर्मगुरू की, बल्कि धर्म की भी साख चौपट करती है। 
शंकराचार्य के बारे में ऐसा लगता है कि समाज में लोग धार्मिक कट्टरता से जैसे-जैसे दूर हो रहे हैं, वैसे-वैसे शंकराचार्य, या दूसरे धर्मों के भी ऐसे गुरू दहशत में आ रहे हैं, और लोगों को फिर कट्टरता की तरफ खींचने के लिए तरह-तरह के बयान दे रहे हैं। सांई बाबा को लेकर तो शंकराचार्य ने जितनी ओछी और जितनी भद्दी बातें कही हैं, वे तो कोई जिम्मेदार आम इंसान भी नहीं कह सकते थे। लेकिन शंकराचार्य की ऐसी बातों से लोगों का एक भला भी हो रहा है, धर्म और धर्मगुरू दोनों की नीयत उजागर भी हो रही है। 

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