मोदी सरकार के इस काम को राजधानी रायपुर के तमाम लोग सौ फीसदी विश्वसनीय मानते हैं

16 फरवरी 2016
संपादकीय
मोदी सरकार के दूसरे बहुत से कामों को लेकर विरोधियों के मन में यह शक रहता है कि उनके कहने और करने में बड़ा फर्क रहता है। लेकिन कल मोदी सरकार का देश में सफाई या गंदगी का जो सर्वे सामने आया है उसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहने वाले लोग ईमानदारी से किया हुआ सर्वे मानेंगे। दस लाख से अधिक आबादी के  जिन 73 शहरों का सर्वे हुआ उसमें रायपुर देश के सबसे गंदे छह शहरों में से एक साबित हुआ। यह नौबत इस शहर में रहने वाले लोग हमेशा से देखते आए हैं। इस शहर के आसमान पर कारखाने के प्रदूषण का हमला किसी दुश्मन देश पर होने वाले फौजी हमले की तरह का है, और दूसरी तरफ मानो लोगों को जीते-जी मारने के लिए वह काफी न हो, इसलिए प्रदेश की राजधानी एक घूरा बनाकर रख दी गई है। बार-बार जानकार विशेषज्ञों की चेतावनी छपती है कि प्रदूषण से लोग किस तरह जीते-जी मर रहे हैं, और गंदगी से बीमारियां इस तरह बढ़ रही हैं कि वे मौत के आंकड़ों में तब्दील नहीं हो पातीं, मौत के आने की रफ्तार बढ़ जाती है, लेकिन मौत ऐसे झटके से नहीं आती कि वह आंकड़ों में आकर सिर चढ़कर बोले।
और यह हाल तब है जब प्रदेश की राजधानी होने के नाते इस एक अकेले शहर में सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये हर बरस खर्च हो रहे हैं, एक के बाद एक गौरवपथ बन रहे हैं, शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है, लेकिन इसे साफ रखने में सत्ता की दिलचस्पी नहीं है। यह एक बड़ी अजीब बात है कि शहर को साफ किए बिना इसे खूबसूरत बनाने का सपना देखा जा रहा है। खुद म्युनिसिपल की अपनी इमारत को एक बड़ी फिजूलखर्ची से सामंती महलनुमा बनाया गया है, जिसमें बैठकर काम करने वालों की सोच शहर की सेवा करने के बजाय शहर पर राज करने की होना स्वाभाविक है। लेकिन सामंतवाद हिंदुस्तान मिजाज से जाता नहीं है। बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग बड़ी-बड़ी योजनाओं के ताजमहल बनाना चाहते हैं, ताकि बाद में वे ओहदे पर रहें, या न रहें, उनके नाम के साथ ताजमहल हमेशा जुड़े रहें। लेकिन आगरा की गलियों और नालियों की सफाई से शाहजहां को इतिहास में नाम नहीं मिला होता, इसलिए छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में भी नेताओं से लेकर अफसरों तक सबकी प्राथमिकता बड़ी योजनाएं हैं।
म्युनिसिपल हो या रायपुर विकास प्राधिकरण इनकी पहली पसंद खाली सरकारी जमीन पर बड़ी-बड़ी इमारतों के प्रोजेक्ट हैं। लेकिन म्युनिसिपल की जो बुनियादी जिम्मेदारी अंगे्रजों के समय से चली आ रही है, जो दुनिया के हर विकसित और सभ्य देश में मानी जाती है, वह जिम्मेदारी राजधानी रायपुर में घूरे पर फेंक दी गई है, और वहां कूड़े के पहाड़ तले वह अच्छी तरह दफन भी हो गई है। किसी शहर की इज्जत वहां के स्टेडियम, वहां के फ्लाईओवर, वहां की महलनुमा इमारतों से नहीं बनती, शहर की इज्जत बनती है उसके साफ रहने से। राजधानी रायपुर को केंद्र सरकार ने सबसे गंदे आधा दर्जन शहरों में पाया है, और यह सर्वे एकदम ईमानदार लगता है। 
इस शहर में लोग यह मलाल कर रहे हैं कि इस स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। केंद्र सरकार की ऐसी योजना में शामिल हुए बिना भी अगर यह शहर साफ कर दिया जाए, तो हजारों करोड़ के खर्च के बिना भी यह स्मार्ट दिखने लगेगा, वरना मोटे खर्च के बावजूद यह अपनी गंदगी के साथ स्मार्ट नहीं बन पाएगा। राज्य सरकार को इस एक नतीजे को लेकर आत्ममंथन करना चाहिए, और मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे सरकार के बाहर के लोगों से भी, राजनीति के बाहर के लोगों से भी राय लें कि सरकार की नीतियों में कौन-कौन सी बुनियादी खामियां हैं। आज अगर यह सरकार दो बरस बाद के ऐसे ही एक सर्वे में अपनी हालत सुधार नहीं सकेगी, तो प्रदेश के बाहर तो इस राजधानी का नाम तो कल शाम ही बदनाम हो चुका है, दो बरस बाद भी यही बदनामी इसके माथे पर चिपकी रहेगी तो उसके लिए कोई बहाना नहीं चल पाएगा। राज्य सरकार को यह बीड़ा उठाना चाहिए कि वह दो बरस बाद होने वाले सर्वे में अपनी हालत बहुत बेहतर करके दिखाएगी, इसके बिना मौजूदा ढर्रा सरकार की चुनावी संभावनाओं को भी खत्म कर रहा है, और प्रदेश के नगरीय प्रशासन को पूरी तरह बेकाबू भी बता रहा है।










































कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें