पिछले बरस भाई खोने वाले गृहमंत्री खुद सड़क पर जख्मी

संपादकीय
13 फरवरी 2016

पिछले बरस छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के बड़े भाई एक मोटरसाइकिल हादसे में गुजर गए। मोटरसाइकिल फिसली, और सिर पत्थर से टकराया, और जान चली गई। खबरों के मुताबिक उन्होंने हेलमेट नहीं लगाया हुआ था। आमतौर पर हेलमेट किसी हादसे में सिर को तो बचा ही लेता है, और बाकी चोटें मामूली रहती हैं, और जान बच जाती है। अभी दो दिन पहले प्रदेश के गृहमंत्री एक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी हुए हैं, और उन्होंने सरकारी गाड़ी में चलते हुए सीट बेल्ट नहीं लगाया था। हो सकता है कि सीट बेल्ट लगा होता तो उन्हें चोट कुछ कम लगती, या नहीं लगती।
अब देखें तो छत्तीसगढ़ में पिछले दो-तीन बरस से मुख्यमंत्री के स्तर पर कई बार यह कोशिश हुई कि दुपहिया चलाने वालों, और उन पर पीछे बैठने वालों के लिए हेलमेट लागू किया जाए। शहरों में पुलिस ने दसियों हजार लोगों से जुर्माना भी वसूल किया, और पूरे प्रदेश में लाखों लोगों ने हेलमेट खरीद भी लिया। लेकिन फिर पुलिस ढीली पड़ी, और जनता में जागरूकता और जिम्मेदारी की, आत्मरक्षा की समझ की इतनी कमी है, कि उसने हेलमेट ताक पर रख दिए। लोगों का रूख इस देश में कुछ ऐसा रहता है कि हेलमेट उनके अपने सिर की हिफाजत के लिए नहीं, पुलिस के कानून की हिफाजत के लिए रहता है। लोग चोरों की तरह गलियों से निकल जाते हैं, लेकिन अपनी जान बचाने वाला यह सामान इस्तेमाल करने से बचते हैं। छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने जो ढिलाई इस मामले में दिखाई है, वह अगर मामूली सी कड़ाई भी बरती जाती, तो हो सकता है इस प्रदेश के गृहमंत्री के भाई आज जिंदा होते, और अभी जख्मी हुए गृहमंत्री सीट बेल्ट से शायद बिना घायल हुए बच जाते।
मुख्यमंत्री और राज्यपाल की तरफ से ऐसी हर मौतों के बाद श्रद्धांजलि के संदेश आते हैं, लेकिन अगर सरकार अपनी इस न्यूनतम जिम्मेदारी को पूरा नहीं करती है, तो ऐसे संदेशों के क्या मायने हैं? इसी देश में दूसरे प्रदेशों में बड़ी साधारण सी सरकारें कड़ाई से हेलमेट लागू कर चुकी हैं। राजस्थान के जयपुर में देखें, तो दुपहियों के पीछे की सीट पर बैठी हुई घाघरा पहनी, घूंघट निकाली हुई महिलाएं भी हेलमेट पहनकर बैठती हैं, और इसे लागू करने के लिए वहां किसी बंदूक की जरूरत नहीं पड़ी, पुलिस ने नियमों को ठीक से लागू किया, और हर बार जुर्माना देने के बजाय लोग जिम्मेदार हो गए। इतनी आसान सी बात छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं हो पाती, यह समझना नामुमकिन है। हेलमेट लागू करवाने के लिए मुख्यमंत्री खुद दुपहिए पर सड़कों पर निकले थे, और आधी-चौथाई जनता राजधानी रायपुर में हेलमेट लगाते दिखने भी लगी थी। और अब तो हर किस्म के चुनाव भी निपट चुके हैं, और मूर्ख जनता खुद होकर जिस जिम्मेदारी का महत्व नहीं समझ पाती, उसे ट्रैफिक जुर्माने के साथ उसके सिर पर थोपने की जरूरत है। आज लोग घायल होकर जब सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो उन पर खर्च तो सरकार का ही होता है। जब लोग सरकार के दिए हुए इलाज के कार्ड को लेकर निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो वह पैसा भी सरकार का ही दिया हुआ होता है। ऐसे में हेलमेट लागू नहीं करना, कारों के सीट बेल्ट का नियम लागू नहीं करना, तेज रफ्तार गाडिय़ों वालों के लोगों के लाइसेंस निलंबित या रद्द नहीं करना, सरकार की गैरजिम्मेदारी है। 
एक जनकल्याणकारी सरकार को जनता को नियम-कायदे सिखाने का कड़वा काम भी करना चाहिए। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनको लोग खुद नहीं समझ पाते, खुद जिन पर अमल नहीं कर पाते। ऐसी बातों के लिए सरकार को अपना जिम्मेदारी का काम करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में हेलमेट और सीट बेल्ट सहित सड़कों के तमाम नियम अगर सरकार कड़ाई से लागू करे तो हर बरस हजारों जिंदगियां यहां पर बचेंगी, और दसियों हजार लोग स्थायी विकलांगता के साथ जीने को मजबूर नहीं होंगे। आज इस राज्य की सरकार सड़कों के ढांचे बनाने में और शहरों को खूबसूरत बनाने में हर बरस दस-बीस हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है। लेकिन इन सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए अपना दिल भी कड़ा नहीं कर पा रही है। राज्य के गृहमंत्री, जो कि पुलिस और ट्रैफिक के भी जिम्मेदार हैं, उन्होंने पिछले बरस ही अपना भाई खोया है, और अभी खुद बुरी तरह घायल हुए हैं। किसी सरकार के लिए दुख के ऐसे मौके से बड़ा कोई दूसरा मौका एक कड़ा संकल्प लेने के लिए नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री इस काम को अपनी प्राथमिकता मानकर पूरे प्रदेश में सड़क सुरक्षा कड़ाई से लागू करें। आज फिर सरकार की यह मुनादी छपी है कि नियमों को कड़ाई से लागू किया जाएगा, और जुर्माना बढ़ाया जाएगा। यह काम लगातार क्यों नहीं चलता यह हमारी समझ से परे है।

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