इस देश से सरकारी बंगले खत्म करने की जरूरत

संपादकीय
05 फरवरी 2016

पश्चिम बंगाल कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के सरकारी बंगले को खाली कराए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाया है। चौधरी द्वारा दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया है। सुनवाई से इंकार करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि वह अपनी गरिमा का ख्याल रखें और क्या कोई दूसरा आकर कहेगा कि बंगला खाली करिए। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी चौधरी की याचिका खारिज कर दी थी। केंद्र की दलील थी कि चौधरी ने सरकारी आवास में रहने के लिए तीन बार अलग अलग तरह की बातें कही हैं जिसके साथ ही आवास में ठहरने की उनकी सारी योग्यता खत्म हो गई है। 
यह अपने आपमें कोई अनोखा मामला नहीं है और जनता के पैसों पर पलने वाले लोगों के हाथ जब कभी सत्ता आती है, तो वे उसे अपनी खानदानी जायदाद मानकर उस पर काबिज हो जाते हैं, और मीरा कुमार से लेकर अजीत सिंह तक बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने पिता के नाम की शोहरत या राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए सरकारी बंगलों को पीढ़ी दर पीढ़ी घरेलू जायदाद बना लेना चाहते हैं। यह बात सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली में नहीं है, यह बात देश के हर प्रदेश की राजधानी में है जहां काम खत्म होने के बाद भी नेता और अफसर, कलाकार और अखबारनवीस, खिलाड़ी या कोई और, हर कोई सरकारी मकानों में बने रहना चाहते हैं। राज्यों सहित केन्द्र में सरकारें जनता का बेतहाशा पैसा ऐसे बंगलों के रख-रखाव पर खर्च करती हैं, और जब इन बंगलों में रहने वालों के पास सरकारी विभाग होते हैं, तो उनका भी बहुत सा अघोषित पैसा इन पर खर्च होता है, सरकारी अमला यहां पर घरेलू नौकरों की तरह झोंक दिया जाता है। 
लोकतंत्र में सरकारों को चाहिए कि सरकारी बंगलों का सिलसिला खत्म ही करें। एक-एक बंगले पर करोड़ों की जमीन और करोड़ों की इमारत लगती है। उन पर लाखों रूपए महीने का खर्च होता है। इससे बेहतर यह है कि हर पद के मुताबिक एक किराया तय कर दिया जाए, और लोग अपनी मर्जी से मकान किराए पर लेकर रहें, या खरीदकर रहें। जिस दिन पद न रहे उस दिन किराया अपने-आप बंद हो जाए। ऐसे मामलों को लेकर लोग अदालतों का वक्त भी बर्बाद करते हैं, और सत्ता की ऐसी एक बेशर्म तस्वीर पेश करते हैं जिससे कि पूरा लोकतंत्र शर्मिंदा होता है। इससे जनता के मन में सत्ता के खिलाफ एक नफरत भी पनपती है, और देश के कानून के खिलाफ लोग मन में रंज पाल लेते हैं, टैक्स देते हुए उनको लगता है कि उनके टैक्स पर सत्ता इसी तरह की हरामखोरी करेगी। देश भर में जिस तरह से सरकारें सरकारी बंगलों पर खर्च करती हैं, उसके खिलाफ किसी को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत है कि गरीब देश का पैसा किस तरह बचाया जा सकता है, और मंत्रियों से लेकर जजों तक हर किसी को एक भाड़ा मिल जाए और वे मर्जी के घरों में किराया देकर रहें। 

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