जहां असहमति की जगह नहीं, वह जगह लोकतंत्र बिल्कुल नहीं

विशेष संपादकीय
22 फरवरी 2016

सुनील कुमार
बस्तर खबरों के साथ कुछ इस कदर हमबिस्तर रहता है, कि दोनों एक-दूसरे को छोड़ ही नहीं पाते। फिलहाल ताजा मामला वहां पर पुलिस की तरफ से नक्सल-आरोप झेल रही, और आम आदमी पार्टी की एक नेता सोनी सोरी का है, जिसे सुनसान सड़क पर रोककर मुंह किसी रसायन से काला करके धमकी देकर छोड़ा गया कि वह पुलिस के खिलाफ, या साफ-साफ कहें तो बस्तर पुलिस के आईजी एस.आर. कल्लूरी के खिलाफ शिकायत करना बंद कर दे वरना नतीजे और खराब होंगे। सोनी सोरी पर यह हमला बस्तर में पुलिस से असहमति रखने वाले लोगों पर हो रहे हमलों के सिलसिले की महज एक और कड़ी है, कोई नई बात नहीं। पिछले कुछ हफ्तों में बस्तर पुलिस ने मालिनी सुब्रमण्यम नाम की एक स्वतंत्र पत्रकार को बस्तर छोड़कर चले जाने को मजबूर किया, और इसके लिए उसने वहां पर ताजा खड़े हुए एक सामाजिक संगठन को भी इस्तेमाल किया। इसके बाद बाहर से आकर बस्तर में रहकर वहां पुलिस-हिंसा से प्रभावित, और तरह-तरह के नक्सल-आरोपों को झेलने वाले गरीब आदिवासियों के मामले उठाने वाले नौजवान वकीलों के एक जनसंगठन को खदेड़ा, और पुलिस ने यह तर्क दिया कि बाहर से आए वकीलों की वजह से स्थानीय वकीलों के रोजगार पर खतरा खड़ा हो गया है, इस वजह से एक तनाव खड़ा हो रहा था। 
इस पूरे सिलसिले को एक व्यापक नजर से देखें तो यह साफ है कि बस्तर में लोकतंत्र उस तरह से नहीं बच गया है जिस तरह का लोकतंत्र भारत के संविधान नाम की एक किताब में बताया जाता है। और सरकार में बैठे ताकतवर लोग राजधानी से बस्तर पुलिस की ऐसी हरकतों का साथ दे रहे हैं, और उनका यह तर्क है कि नक्सलियों को खत्म करने के लिए ये तमाम तरीके नाजायज नहीं हैं। हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ हफ्तों में दो-तीन बार और लिख चुके हैं, लेकिन आज इस पर लिखने की एक और वजह है। कल ग्वालियर में दलित छात्रों के एक कार्यक्रम में आरक्षण पर बोलते हुए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक का भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी ने हिंसक विरोध किया, और कार्यक्रम बंद करवा दिया। दूसरी तरफ पिछले दस दिनों से देश की राजधानी में जेएनयू के छात्रों के मामले को लेकर जो चल रहा है, उसे पूरा देश देख रहा है। जिन छात्रों ने जेएनयू में देश के खिलाफ कुछ नहीं कहा, उनके साथ भी देश की अदालतों में जजों के सामने जिस तरह मारपीट की गई, जिस तरह उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है, और जिस तरह भाजपा के दिल्ली के एक विधायक सहित दिल्ली के कई वकील इन छात्रों के साथ मारपीट कर रहे हैं, उसको भी बस्तर की इस घटना के साथ-साथ देखने और समझने की जरूरत है। 
इन तमाम बातों को मिलाकर देखें तो इनसे एक बात खुलकर सामने आती है कि इस देश में असहमति की जगह खत्म कर दी जा रही है। लोकतंत्र में असहमति नाम की चीज को लोकतांत्रिक जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा आबंटित किया गया था, उस एक कतरा जमीन के पट्टे को आज खारिज किया जा रहा है क्योंकि वहां लगा हुआ झंडा-बैनर लोगों को रास नहीं आ रहा है। देश की जनता को खानपान की आजादी रहे, यह कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा, कुछ लोग घोर साम्प्रदायिक और आक्रामक राष्ट्रवाद से परे भी कुछ सोचें, यह रास नहीं आ रहा, और कुछ लोग मुंह खोल सकें, और अदालतों में देशद्रोही करार देकर हड्डियां तोडऩे पर कराहें, यह भी लोगों को रास नहीं आ रहा। बस्तर में लोग लोकतांत्रिक तरीके से काम करें, यह भी छत्तीसगढ़ की, और खासकर बस्तर की पुलिस को रास नहीं आ रहा है। 
अब सवाल यह उठता है कि बस्तर जैसे जिस इलाके में सरकारी और राजनीतिक भ्रष्टाचार और जुल्म के चलते आदिवासियों के बीच एक हिंसक नक्सल-आंदोलन उठकर खड़ा हुआ, पनपा, और लोगों की सोच लोकतंत्र से अलग हुई, उस बस्तर में एक तरफ तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह लगातार नक्सलियों को लोकतंत्र की मूलधारा में लौटने का न्यौता दे रहे हैं, और जो लोग लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर अखबारनवीसी कर रहे हैं, अदालतों में बेजुबान आदिवासियों के हक के लिए लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर मुफ्त में मुकदमे लड़ रहे हैं, जो लोग लोकतंत्र की मूलधारा में रहकर सड़कों पर आदिवासी हकों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उनको कुचलने का काम छत्तीसगढ़ की, और खासकर बस्तर की पुलिस कर रही है। ये दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं? एक तरफ तो जो लोग लोकतंत्र को छोड़ चुके हैं, और हथियार उठा चुके हैं, उनको वापिस लोकतंत्र में लाने का नारा लगाया जा रहा है, और जो लोग अब तक लोकतंत्र पर जमे हुए हैं, डटे हुए हैं, उन्हें बस्तर से लेकर जेएनयू तक, और ग्वालियर के सभागृह तक से, कहीं नक्सल-समर्थक कहकर और कहीं देशद्रोही कहकर खदेड़ा जा रहा है। 
देश की राजनीतिक ताकतों को यह समझने की जरूरत है कि आपातकाल के वक्त भी आंदोलनों के खिलाफ तानाशाह लोगों ने यही तर्क दिया था कि जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में देश में विदेशी ताकतें लोकतंत्र को खतरे में डालने और सरकार पलटाने की कोशिश कर रही हैं। उस वक्त सरकार तो नहीं पलटी, लोकतंत्र जरूर पलट गया था। आज छत्तीसगढ़ से लेकर ग्वालियर वाले मध्यप्रदेश में, और दिल्ली पुलिस चलाने वाली केन्द्र सरकार तक कुछ उसी तरह की बात लोकतांत्रिक-विरोध के खिलाफ की जा रही है कि ये सरकार के खिलाफ साजिश है, देश और प्रदेश के खिलाफ साजिश है। दरअसल अफसरों को ऐसी किसी साजिश का डर दिखाते हुए नेताओं की राजनीतिक और लोकतांत्रिक समझ को दबाने का एक मौका मिलता है कि अगर लोकतंत्र को बचाना है तो ऐसे लोकतांत्रिक आंदोलनों को कुचलना होगा। पल भर में किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन को, अखबारनवीसी को, और गरीबों की मददगार वकालत को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। अफसरों के लिए यह तरीका बड़ा आसान रहता है क्योंकि वे किसी लोकतंत्र से बंधे नहीं रहते, और न ही उनकी कोई राजनीतिक जवाबदेही रहती है। 
लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि चार दिन रेलगाडिय़ां और रेल्वे स्टेशन जलाने पर हरियाणा के जाट आंदोलनकारियों की मांगें जिस रफ्तार से पूरी हो गईं, क्या किसी मांग को पूरा करवाने के लिए लोकतंत्र में यही एक जरिया होना चाहिए? क्या लोकतंत्र में किसी आंदोलन के ऐसे ही तेज रफ्तार और हिंसक भीड़तंत्र वाले रूख को पल भर में सुना जाए, और देश के दलित और आदिवासी तबकों को खानपान की बंदिशों से भी जकड़कर रखा जाए, उनके खिलाफ झूठे वीडियो गढ़कर उन्हें देशद्रोही करार दिया जाए, गिरफ्तार किया जाए, अदालतों में पीटा जाए, तो यह देश किस तरह के लोकतांत्रिक आंदोलन की तरफ धकेला जा रहा है? 
छत्तीसगढ़ का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि आपातकाल की ज्यादतियों के बाद 1977 में जब आम चुनाव हुए थे, तो पूरे के पूरे बस्तर ने एकमुश्त जुल्मी कांग्रेस सरकार को खारिज कर दिया था। उस वक्त तो आदिवासियों के पास संचार के लोकतांत्रिक साधन भी नहीं थे, और नक्सलियों की लाई हुई अलोकतांत्रिक-राजनीतिक चेतना भी नहीं थी। लेकिन आदिवासियों की अपनी परंपरागत समझ, आजादी के उनके प्राकृतिक मिजाज की समझ बहुत थी, और उन्होंने सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को, नेहरू की बेटी को भी एकमुश्त खारिज कर दिया था। आपातकाल के उस दौर में भी सरकार हांकने वाले अफसरों को बस्तर में नसबंदी से लेकर बाकी कई तरह की मनमानी जायज लगी थी, क्योंकि इंदिरा गांधी को सपने में भी विदेशी हाथ दिखने लगा था। आज बस्तर में लोकतंत्र को बचाने के पुलिसिया-तरीके के चलते हुए सबसे बड़ी हत्या अगर किसी की हो रही है, तो वह खुद लोकतंत्र की हो रही है। लोकतांत्रिक-असहमति की जगह को खारिज करके नक्सल हिंसा को खत्म नहीं किया जा सकता। कुछ बड़े अफसरों को यह तरीका सुहा बहुत सकता है, लेकिन ऐसे ही बड़े अफसरों ने इंदिरा गांधी की सरकार को पूरे देश में डुबाकर रख दिया था। आज देश में जगह-जगह असहमति का कत्ल करके, और रेलगाडिय़ां जलाने वाले जाट आंदोलनकारियों की बातों को आनन-फानन सुनकर एक अलोकतांत्रिक माहौल खड़ा किया जा रहा है, जो देश-प्रदेश सबको खासा महंगा पड़ेगा। यहां बात-बात पर हर लोकतांत्रिक पहलू को नक्सल-समर्थक करार देने, और उसे कुचलने के लिए हर नाजायज अलोकतांत्रिक तरीके को न्यायसंगत ठहराने की अफसरी सोच का नतीजा अगले चुनाव में देखने मिलना तय है।

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