जेएनयू की साजिश पर सरकार संसद में बोले

23 फरवरी 2016
संपादकीय

संसद के पहले सर्वदलीय बैठक में सीपीएम ने प्रधानमंत्री से मांग की कि सरकार सदन में इस बात पर जवाब दे कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के भाषण के साथ साजिश करके छेडख़ानी किसने की, और उनके खिलाफ दुष्प्रचार करने वाले कौन लोग थे। पिछले दस दिनों से देश को जिस तरह जेएनयू के मामले में झुलसाया जा रहा है, और जिस तरह कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों पर रात-दिन ऐसे भाषण सुनाए गए जो पाकिस्तान के समर्थन में लगाए जा रहे नारे सुना रहे थे, लेकिन शुरूआती जांच में ही यह साबित हो गया कि ये टेप झूठे थे, और तस्वीरों और आवाजों का आपस में कोई रिश्ता नहीं था। यह एक अलग बात है कि अपनी नौकरी के इस आखिरी पखवाड़े में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बस्सी ने जितनी गैरजिम्मेदारी के साथ भड़काऊ और पक्षपाती अंदाज में कार्रवाई की, और बयान दिए, उनसे देश भर में तनाव और अधिक फैला। 
अब सवाल यह उठता है कि झूठे टेप तैयार करके उनको चुनिंदा टीवी चैनल साजिश के तहत बार-बार दिखाएं, लोगों को भड़काएं, तो क्या पुलिस की और केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसी राष्ट्रविरोधी साजिश का भांडाफोड़ करे, और इसके पीछे की ताकतों को, ऐसे मीडिया को कटघरे में खड़ा करे? दूसरी तरफ कल एक बड़े समाचार-समूह ने जिस तरह एक स्टिंग ऑपरेशन से उन वकीलों के बयान रिकॉर्ड करके दिखाए हैं, जिन्होंने जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया पर हमला किया था। ये लोग बड़े फख्र के साथ यह बता रहे हैं कि किस तरह पुलिस हिरासत के भीतर उन्होंने इस छात्र नेता को मारा-पीटा, और कितना पीटा। अब सवाल यह है कि केंद्र सरकार इन सब बातों को अगर अनदेखा कर रही है, अगर मारने वालों में भाजपा के विधायक शामिल हैं, तो फिर दिल्ली में बैठी हुई अलग-अलग दर्जे की बहुत सी अदालतें क्या कर रही हैं? जब देश में हिंसक और हमलावर ताकतें कानून अपने हाथ में लेकर, मीडिया पर काबू करके, अफसरों को अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बनाकर इस तरह से अलोकतांत्रिक हिंसा बढ़ा रही हैं, तो क्या देश की अदालतें किसी रियलिटी शो की दर्शकदीर्घा में बैठकर इस तरह मजा ले सकती हैं? 
जो मांग सीपीएम ने की है वह एकदम जायज है कि जेएनयू के भाषणों की रिकॉर्डिंग को छेड़छाड़ करके देश में हिंसा और अशांति फैलाने की साजिश पर सरकार संसद के भीतर बयान दे। 

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