...हो सकता है किसी दिन वे सचमुच ही देशद्रोही भी होने लगें...

संपादकीय
17 फरवरी 2016     
भारत के कुछ इलाकों में परंपरागत रूप से मां-बहन की गालियां, सामाजिक संस्कृति और रोजाना के बोलचाल का एक हिस्सा रहते आई है। एक प्रदेश मां-बहन की गालियों की तरह बेटी की गालियां के लिए भी बदनाम है। लेकिन इन दिनों देश में एक नई गाली ने मां-बहन और बेटी, सबको बेरोजगार कर दिया, यह है देशद्रोह की गाली। दिल्ली में जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय को लेकर इस गाली का इस्तेमाल इतना अधिक हो रहा है कि जिन लोगों ने कभी देश के बारे में सोचा भी नहीं था, वे आज दिन भर में दूसरों को दर्जनों बार देशद्रोही करार देते हुए उतनी ही बार देश भी बोल रहे हैं, और उन्हें यह अटपटा भी लग रहा है कि वे किसके बारे में बात कर रहे हैं? अगर कोई द्रोही की गाली खाने के लिए मौजूद न होता, तो देश का भी पता न होता। लेकिन आज हर मुंह में मानो पान-तम्बाकू आ गया है कि जो चेहरा पसंद न आए, उस पर पीक दागकर उसे देशद्रोही करार दे दिया जाए। कुछ लोगों ने यह बात सही लिखी है कि कश्मीर को लेकर आज मुंह खोलने वाले लोगों को देशद्रोही करार देने वाले लोगों को नेहरू को पढऩा चाहिए, और कश्मीर पर उनकी लिखी बातों को लेकर नेहरू पर भी मरणोपरांत मुकदमा चलाना चाहिए। 
जिन लोगों को आज अचानक बहुत से लोग देशद्रोही लग रहे हैं, उन लोगों में से क्या कोई ऐसे भी हैं जो कि नाथूराम गोडसे को हत्यारा कहते आए हैं? क्या नाथूराम गोडसे की प्रतिमा बनाकर उसे गौरवान्वित करने का उन्होंने कभी विरोध किया था? क्या गांधी के हत्यारे की स्तुति को कभी उन्होंने देशद्रोह कहा था? लेकिन अजीब बात यह है कि आज देश में जिस अंदाज में सड़कों पर देश से गद्दारी तय की जा रही है, यह वही अंदाज है जिसके साथ एक वक्त के खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब की बसों से हिन्दुओं को उतारकर छांटकर मारा था, और उन आतंकियों के हमदर्दी अकालियों के साथ भाजपा का पुराना रिश्ता चले आ रहा है, सत्ता में भागीदारी चली आ रही है। इन्हीं अकालियों के बारे में आज ही कई लेखकों ने यह भी याद दिलाया है कि प्रकाश सिंह बादल ने ही एक वक्त दिल्ली में संविधान की किताब फाड़ी थी, और उसे आग लगाई थी। कश्मीर को लेकर आज देश के गद्दार तय करने वाले लोग यह भूल रहे हैं कि कश्मीर में अफजल गुरू को शहीद का दर्जा देने वाली पीडीपी के साथ भाजपा का सत्तारूढ़ गठबंधन अभी कायम ही है, और इसी पीडीपी ने कश्मीर में एक वक्त हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी दोनों करेंसी की वकालत की थी। इसी पीडीपी ने कश्मीर में हिन्दुस्तानी झंडे जलाने वालों को रिहा किया। 
ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जो कि चुनावी और राजनीतिक, वैचारिक और सैद्धांतिक, कई तरह के बर्दाश्त दर्ज करती हैं। कभी लोकतांत्रिक मजबूरी रहती है, तो कभी मतलबपरस्ती, समय-समय पर हालात से खयालात बदलते हैं, और खयालात से हालात भी। लेकिन अगर बात-बात पर लोग सड़कों पर, अदालत के अहाते में, विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों के बीच भीड़ में लगते नारों से यह तय होने लगे कि कौन देशद्रोही हैं, ऐसा देश किसी संविधान पर बना नहीं दिखता है। देश के एक सबसे बड़े संविधान-विशेषज्ञ सोली सोराबजी ने कल खुलकर देशद्रोह की इन दिनों केन्द्र सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा के समर्थक संगठनों द्वारा की जा रही व्याख्या का विरोध किया है, और कहा है कि देश के खिलाफ नारे लगाना भी देशद्रोह नहीं है। हम नहीं समझते कि संविधान के जानकार इस बात का तर्कसंगत जवाब देने के बजाय अदालत के अहाते में दूसरों को पीटकर जवाब देंगे। 
लेकिन आज देश में देशभक्ति की जो तंगदिल, तंगनजर सोच चल रही है, उसकी नजरों में जो उससे सहमत नहीं हैं, वे सब गद्दार हैं, देशद्रोही हैं। लोगों की यह हमलावर सोच हमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के उस फतवे की याद दिलाती है जिसमें उन्होंने बाकी तमाम दुनिया को तोप की नोंक पर धमकाया था कि जो देश इराक पर हमले में अमरीका के साथ नहीं है, वह देश सद्दाम के साथ है। आज हिन्दुस्तान में गोडसे की प्रतिमा बनाकर उसकी सार्वजनिक पूजा गद्दारी नहीं है, देशद्रोह नहीं है, लेकिन आज केन्द्र सरकार की आलोचना करने वालों को उस भीड़ में लगे कुछ नारों को लेकर भी देश से गद्दारी की तोहमत झेलना पड़ रहा है। यह समझने और याद रखने की जरूरत है कि कोई भी सरकार न देश होती है, न ही देश से बड़ी होती है। किसी सरकार को कोसना या गाली देना देश को गाली देने के बराबर नहीं होता है। फिर लोकतंत्र के भीतर यह लचीलापन भी है कि लोग देश को भी गाली दे सकते हैं, और वह भी देशद्रोह नहीं है। जिनमें लोकतंत्र की समझ नहीं है, वे अभी इस पल दिल्ली की अदालत के बाहर फिर पत्रकारों पर हमला कर रहे हैं। इस देश को देशभक्ति के ऐसे सैलाब से उबरना होगा जिसमें अपने रंग में न रंगे हुए बाकी तमाम लोगों को देश का गद्दार कहा जा रहा है। जब गद्दारी इस तरह सड़कों पर तय होने लगेगी, और बेकसूर लोग पीटे जाने लगेंगे, तो फिर यह याद रखने की जरूरत है कि कुचले हुए बेकसूर कभी नक्सली बनते हैं, कभी फूलन बनते हैं, और हो सकता है कि किसी दिन वे सचमुच ही देशद्रोही भी होने लगें। 

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