हरियाणा जाट आंदोलन में हुए जुर्म की अदालती जांच जरूरी

संपादकीय
26 फरवरी 2016  

हरियाणा में जाट आंदोलन के चलते हुए जितनी तबाही की गई, उसे देखते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रूख दिखाया है कि जिन लोगों ने तोडफ़ोड़, आगजनी की है, उन लोगों से नुकसान की भरपाई की जाए। इसके अलावा अदालत ने खुद होकर इस बात की जांच शुरू की है कि क्या सड़कों पर रोकी गई कारों से महिलाओं और लड़कियों को निकालकर उनके साथ बलात्कार या सामूहिक बलात्कार किया गया है? 
हिन्दुस्तान में लोगों की भीड़ जहां जुटती है, वहां उनके दिमाग काम करना बंद कर देते हैं, और एक सामूहिक, हिंसक, एकजुटता हर तरह के अपराध को न्यायसंगत ठहराने में लग जाती है। इसके पहले भी देश की कई अदालतों ने शहर बंद करवाने को लेकर राजनीतिक दलों या संगठनों को नोटिस दिए हैं, या तोडफ़ोड़ को लेकर नुकसान की भरपाई ऐसे संगठनों से करवाने के आदेश दिए हैं जो कि बंद या आंदोलन करवाते हैं। लेकिन ऐसे अनगिनत आदेश आते और चले जाते हैं, राज्य सरकारें भीड़ को नाराज करने का खतरा नहीं उठातीं। नतीजा यह होता है कि देश के लोगों को कभी भी ऐसी बर्बादी करने वाले लोग सजा पाते नहीं दिखते हैं, और फिर किसी जगह, फिर किसी मुद्दे पर, फिर कोई भीड़ वही, वैसी ही हिंसा करने लगती है, सरकारी या निजी संपत्ति की बर्बादी करने लगती है।  इस बार हरियाणा में बात इससे और बहुत भयानक हुई, और सड़कों से गुजरती हुई लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार या बदसलूकी सामने आई है। कुछ लोगों ने खुलकर बयान दिया है कि उनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 
इसके बाद भी हरियाणा की सरकार इस पर कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर देश की सबसे बड़ी अदालत को सीधे दखल देना चाहिए, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में अब यह समझ आ रहा है कि जिन तबकों को चुनाव नहीं लडऩा है, वे ही भीड़ को नाराज करने का हौसला दिखा सकते हैं। राजनीतिक दल जब तक सरकार चलाते हैं, तब तक सरकारों की कार्रवाई, सरकारों के फैसले भीड़ को लुभाने की हरकतों से आजाद नहीं हो सकते। देश में जगह-जगह हिंसक आंदोलनों में तोडफ़ोड़ और आगजनी के बाद भी किसी राज्य की सरकार ने कड़ाई से कार्रवाई नहीं की, और लोगों को सजा नहीं मिली। नतीजा यह हुआ कि तोडफ़ोड़ बढ़ते-बढ़ते अब सामूहिक बलात्कार तक आ गई। इससे अधिक शर्मनाक बात किसी आंदोलन में और क्या हो सकती है? 
और हरियाणा के इस जाट आरक्षण आंदोलन को लेकर यह चर्चा भी है कि यह सरकारी नौकरियों के लिए चलाया जा रहा आंदोलन नहीं है, यह हरियाणा में भाजपा सरकार के भीतर एक जाट मुख्यमंत्री की अघोषित नीयत से किया गया आंदोलन है। आंदोलन के पीछे चाहे जो भी नीयत हो, अगर वह सड़कों पर से मुसाफिर महिलाओं को उठाकर उनके बलात्कार तक पहुंचता है, तो इस देश के लोकतंत्र के लिए यह डूब मरने की बात है। इस मामले में राज्य सरकार पर कार्रवाई नहीं छोड़ी जा सकती, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में इन आरोपों की जांच करवानी चाहिए, वरना यह हिंसा और ऐसे जुर्म बढ़कर बाकी प्रदेशों तक भी पहुंच सकते हैं। 

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