सोशल मीडिया से नफरत बढ़ती है, या मोहब्बत ?

संपादकीय
19 फरवरी 2016     
सोशल मीडिया हिन्दुस्तान जैसे लोगों की जिंदगी और समझ को बेहतर बना रहा है, या उसके लिए खतरे बढ़ा रहा है? यह सवाल कई लोगों को परेशान करता है, क्योंकि यह अंदाज लगाना आसान नहीं है कि सोशल मीडिया के चलते जनता में मोहब्बत बढ़ रही है, नफरत बढ़ रही है, समझ बढ़ रही है, या नासमझी बढ़ रही है? हमारे पास भी इसका अंदाज लगाने का कोई जरिया नहीं है, इसलिए हमारा सोचना हमारी हसरत अधिक हो सकती है कि सोशल मीडिया का कैसा असर होना चाहिए। 
हिन्दी के भक्ति काव्य की एक लाईन बड़ी प्रचलित है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। यही हाल सोशल मीडिया का है, जो नफरतजीवी लोग हैं, उनको लगता है कि अब नफरत फैलाने के लिए किसी और औजार या हथियार की जरूरत नहीं रह गई है, और जिस तरह फिल्म शोले में जेलर सबको एक साथ बदल डालने की बात कहता है, वैसा ही आज सोशल मीडिया को लेकर लोगों के मन में भरोसा है। लोगों को लगता है कि गिने-चुने सिक्यूलर (सेक्युलरों को सिक यानि बीमार बताने वाले लोगों ने यह नया शब्द गढ़ा है) बाकी हैं, और सोशल मीडिया पर उन पर हमले करके जल्द ही उनकी आवाज को दफन कर दिया जाएगा। दूसरी तरफ नफरत के खिलाफ बात करने वाले अमन-पसंद और अक्लमंद लोगों को लगता है कि तटस्थ बैठी आम जनता के राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए सोशल मीडिया मुफ्त में मिला हुआ एक ब्लैकबोर्ड है, और इसका इस्तेमाल करके दुनिया को बेहतर बनाया जा सकता है। एक तीसरी सोच मौन रहने वाले विज्ञान और टेक्नालॉजी की है, जिनका मानना है कि वे तो महज औजार हैं, और उनसे लोग चाहें तो सब्जी काट लें, और चाहें तो एक-दूसरे के गले काट लें। 
दरअसल यह सिर्फ बातचीत के बहाने का मुद्दा है, और यह सोशल मीडिया के नफे और नुकसान पर किसी तरह का अंदाज नहीं है। यह सिर्फ मुद्दे और सोच की बात है कि जहां नफरत फैलाने के लिए लोग अपनी कमअक्ली, या बेअक्ली को हिंसा के साथ मिलाकर लहू फैलाने में लगे रहते हैं, वहीं पर इंसाफपसंद लोगों को भी इस हिंसा को उजागर करना चाहिए। जो लोग दंगाईयों को नंगाई कहते हुए उनसे परे रहना बेहतर समझते हैं, उनको भी यह इतिहास मालूम है कि बढ़ते हुए दंगाईयों से कोई महफूज नहीं रह सकते। आज अगर लोगों की साजिशों को, कट्टरता के उनके फतवों को अनदेखा किया जाएगा, तो भले लोगों का भी आने वाला कल और बुरा होगा। इसलिए सोशल मीडिया को अनदेखा करना, देखकर भी चुप्पी रखना ठीक नहीं है। जिस मुंह में भी जुबान है, और जिन उंगलियों में भी जान है, उन्हें समाज की भलाई के लिए सक्रिय रहना चाहिए। जैसा कि दुनिया के लोकतांत्रिक चुनावों के इतिहास में हमेशा से कहा जाता रहा है कि घर बैठे भले-बहुमत के कारण गलत किस्म का अल्पमत भी चुनकर आ जाता है, उसी तरह चुप बैठ गए अमन-पसंद लोगों की चुप्पी से सोशल मीडिया पर भी हिंसक-साम्प्रदायिक लोग हावी होते चलते हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें