प्रधानमंत्री के रेडियो प्रसारण से परे भी देश में मानसिक परामर्शदाताओं की जरूरत

संपादकीय
28 फरवरी 2016  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान दे रहे बच्चों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए आज के अपने रेडियो प्रसारण में देश के कुछ मशहूर लोगों की बातें भी सुनाई। यह बात प्रधानमंत्री के प्रसारण से परे भी पूरे देश में जरूरी है, और हमारे पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस बात को लिखते आ रहे हैं कि परीक्षा या दूसरे तरह के तनाव घटाने के लिए, लोगों को परामर्श देने के लिए, पूरे देश में परामर्शदाताओं की भारी संख्या में जरूरत है, और लगातार होती आत्महत्याओं के बाद भी केन्द्र या राज्य सरकारों को इसकी फिक्र नहीं हो रही है। ऐसा कोई दिन नहीं निकल रहा है कि कई प्रदेशों से छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की खबरें न आएं, लेकिन सरकारी या निजी क्षेत्र में मनोचिकित्सकों, और परामर्शदाताओं की जरूरत पूरी करने की सोच भी सरकार या समाज में नहीं है। 
प्रधानमंत्री ने यह चर्चा छेड़कर इस मुद्दे का महत्व तो सामने रखा है, लेकिन ऐसे किसी एक कार्यक्रम भर से कुछ नहीं होता। बच्चों और बड़ों को, तनाव और कुंठा से गुजर रहे, निराशा से जूझ रहे हिन्दुस्तानियों को पेशेवर लोगों से परामर्श की भारी जरूरत है। अभी जब हम यह लिख रहे हैं, उसी वक्त पहले पन्ने पर यह खबर लग रही है कि किस तरह महाराष्ट्र में एक आदमी ने अपने परिवार के 14 लोगों की हत्या करके खुदकुशी कर ली। उसके अलावा जगह-जगह छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की खबरें हैं, कहीं लड़कियां और महिलाएं छेडख़ानी की पुलिस रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई न होने से निराश होकर अपने आपको जला रही हैं, तो कहीं किसान कर्ज से थककर आत्महत्या कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला इन खबरों के नीचे बड़ी संख्या में ऐसी निराशा का सुबूत भी है, जो निराशा खबरों तक नहीं आ पाती है, क्योंकि खबरों में तो मौत के आंकड़े ही जगह पाते हैं, समाज में हताशा, कुंठा, और तनाव कभी सरकारी आंकड़े नहीं बन पाते। 
छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे मनोवैज्ञानिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करें, और स्कूल-कॉलेज के लिए यह जरूरी करना चाहिए कि कितने सौ, या कितने हजार बच्चों पर ऐसे एक परामर्शदाता को अनिवार्य रूप से रखा जाए। सरकार को एक तरफ कोर्स शुरू करना चाहिए, और दूसरी तरफ ऐसे पद मंजूर करके बजट में उसका इंतजाम करना चाहिए। आज इन दोनों में से किसी बात के लिए खबरों से परे कोई फिक्र दिखाई नहीं पड़ती है। समाज का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे, यह रातों-रात नहीं हो सकता, इसके लिए बरसों पहले से तैयारी की जरूरत पड़ेगी, और तब जाकर पांच-दस बरस में इसका असर दिखाई पड़ेगा। पढ़ाई से परे भी नौजवानों के बीच भावनात्मक और शारीरिक संबंधोंं को लेकर बहुत तरह के तनाव रहते हैं, कहीं बेरोजगारी का तनाव रहता है, तो कहीं गरीबी का। समाज में एक-दूसरे के देखादेखी अधूरी हसरतें रहती हैं, उससे भी तनाव रहता है। ऐसी तमाम बातों को देखते हुए सरकार को शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य पर भी खर्च करना चाहिए, और दिमागी रूप से सेहतमंद समाज देश के लिए अधिक उत्पादक भी हो सकता है। 

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