संस्कृतियों का टकराव

संपादकीय
2 फरवरी 2016
जर्मनी सहित योरप के कई देशों की खबर है कि वहां पर सीरिया से पहुंचने वाले लाखों शरणार्थियों का स्थानीय लोगों के साथ हिंसक टकराव हो रहा है। ये बाहरी लोग वहां की स्थानीय संस्कृति को समझ नहीं पा रहे हैं, उसके मुताबिक अपने बर्ताव को ढाल नहीं पा रहे हैं, और कहीं वे छेडख़ानी कर रहे हैं, कहीं बलात्कार कर रहे हैं, और कहीं पर वे छेडख़ानी रोकने वाले बुजुर्गों को मार रहे हैं। नतीजा यह है कि दशकों से मेहनत करके जो योरप रंगभेद, नस्लभेद से अपने आपको उबारने की कोशिश कर रहा था, उस योरप में एक बार फिर धर्म को लेकर, नस्ल को लेकर, रंग को लेकर, और देशों की संस्कृतियों को लेकर नफरत खड़ी हो रही है। हिटलर जैसी नीतियों के हिमायती हिंसक नवनाजीवादी लोग जगह-जगह सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं, और कई देशों की सरकारें लगातार इस तनाव में हैं कि आए हुए शरणार्थियों का क्या करें, और शरणार्थियों को जगह देने की अंतरराष्ट्रीय अपील का क्या करें, और अपने मौजूदा नागरिकों की नाराजगी का क्या करें? 
छत्तीसगढ़ में हम लोगों ने बाहर से आए हुए शरणार्थियों को आधी सदी में कई बार देखा है। विभाजन के वक्त पाकिस्तान से आए हुए लोगों को भी छत्तीसगढ़ में बसाया गया, उसके बाद तिब्बत से आए हुए तिब्बतियों को भी मैनपाट में बसाया गया, और 1971 के बांग्लादेश वाले युद्ध के दौरान वहां से आए हुए बांग्लादेशी शरणार्थियों को भी राजधानी रायपुर में ही जगह दी गई थी। ऐसे लाखों लोगों को इस छोटे से इलाके में राज्य बनने के पहले भी जगह दी, और इनमें से हर कोई स्थानीय संस्कृति के साथ इस तरह से मिल गए कि न कहीं कोई टकराव हुआ, और न ही आज तक इनको अलग देखा-समझा गया। लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि जब वे किसी दूसरी जगह पर पहुंचते हैं, कहीं पर वे शरण लेने के लिए जाते हैं, तो स्थानीय संस्कृति, रीति-रिवाज, और स्थानीय लोगों की भावनाओं, उनके तनाव का सम्मान करना चाहिए। और ऐसा सिर्फ दूसरे देश जाने पर ही नहीं होता, एक देश के भीतर भी जब एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करते हैं, या बसते हैं, तो उन्हें स्थानीय भावनाओं और जरूरतों का सम्मान करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में दसियों लाख लोग ओडिशा से आकर बसे हुए हैं, उनको लेकर कभी कोई तनाव नहीं हुआ, दूसरी तरफ ओडिशा में बाहर से जाकर बसे व्यापारी समुदाय को लेकर वहां पर भारी तनाव हुआ था, और हिंसा के साथ वैसे लोगों को वहां से भगाया गया था।
इस पूरे सिलसिले में पारसी समुदाय के इतिहास को याद करने की जरूरत है। अब पता नहीं यह बात सच है, या महज कहानी है, लेकिन पारसी-इतिहास की गंभीर किताबों में यह घटना लिखी हुई है। ईरान से निकले, या निकाले गए लोग जब भारत के गुजरात में समुद्र तट पर लगे, तो वहां के राजा के दरबार में उन्हें पेश किया गया। भाषा की दिक्कत थी, इसलिए राजा की तरफ से उन्हें एक लोटे में लबालब भरा हुआ दूध पेश किया गया, जिसका संदेश यह था कि उनके राज्य में और समाने के लिए जगह नहीं है। कहानी कहती है कि इस पर पारसियों ने शक्कर उस लोटे में डाली, और यह संदेश दिया कि अलग से कोई जगह लिए बिना वे स्थानीय समाज के साथ इस तरह मिलकर रहेंगे जैसे कि दूध में शक्कर घुल जाती है। और तब से अब तक पारसियों का इतिहास कहता है कि उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ जोड़ा, और भारत के ही होकर रह गए।
दरअसल सीरिया या बाकी देशों का सांस्कृतिक अंतरसंबंध योरप के देशों से ऐसा नहीं रहा कि आम सीरियाई वहां की संस्कृति को समझे हुए हों। फिर मुस्लिम देशों में महिलाओं का जिस तरह का दर्जा रहता है, वहां के मर्दों के लिए योरप पहुंचने के बाद वहां की आजाद महिलाओं को देखकर आपा खो देना एक स्वाभाविक खतरा था, और वह हुआ भी। इस बात की चर्चा आज हम यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भारत के लोग भी दुनिया के कई देशों में जाते हैं, शरणार्थी की तरह नहीं जाते, लेकिन प्रवासी कामगारों की तरह जरूर जाते हैं। अपने देश में रहते-रहते ही हिन्दुस्तानियों को यह सीखने की जरूरत है कि जिन देशों में जाने की उनकी हसरत है, वहां की संस्कृति की उदारता को समझ लेना जरूरी है। जैसा देश, वैसा भेष, यह बात पोशाक के अलावा भी बाकी तौर-तरीकों और तहजीब पर लागू होती है। खाड़ी के देशों में गए हुए हिन्दुस्तानी अगर वहां की धार्मिक और सामाजिक संस्कृति का सम्मान न करें, तो उनका सिर भी कलम हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ सिर सलामत रहने पर भी योरप या अमरीका, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा जैसे देशों में काम सलामत नहीं रह सकता, वीजा सलामत नहीं रह सकता, अगर गए हुए हिन्दुस्तानियों में वहां के रीति-रिवाजों के लिए, वहां के कानून के लिए सम्मान न हो। अपनी खुद की घरेलू संस्कृति अपने ही देश तक काम आती है, बाहर जाने पर दूसरों का सम्मान करना भी आना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें