केजरीवाल की साधारण पोशाक में क्या बुराई है?

संपादकीय
07 फरवरी 2016

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गणतंत्र दिवस पर मफलर से लिपटे सिर के साथ सलामी क्या ले ली, उनसे नफरत करने वाले लोग इंटरनेट पर उन पर टूट पड़े और सलामी की गरिमा, गणतंत्र दिवस की गरिमा गिनाने लगे। अब खबर आई है कि विशाखापट्टनम के एक इंजीनियर ने केजरीवाल को कुछ सौ रूपए का एक चेक भेजा है ताकि वे अपने लिए जूते खरीद लें, और ऐसे मौकों पर सैंडल पहनकर न जाएं। 
भारत के लोग अभी तक मुगलों की राजशाही, और अंग्रेजों की गुलामी तले दबी-कुचली मानसिकता से उबर नहीं पा रहे हैं। हिन्दुस्तान के अनगिनत नेता अपनी घोषित कमाई से सैकड़ों गुना अधिक खर्च करते दिखते हैं, लेकिन लोगों को उस पर कोई आपत्ति नहीं होती और लोग उसे शान-शौकत मानते हैं, और उसके खिलाफ कोई अभियान नहीं चलता। अब सवाल यह है कि ईमानदारी के मुद्दे पर सरकार तक पहुंचा हुआ एक नौजवान अपनी जाहिर तौर पर चर्चित खांसी और ठंड के बीच अपने को मफलर से लपेटे हुए सलामी लेता है, तो उसमें कौन सी बात गरिमा के खिलाफ है? ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जो फक्कड़ मिजाज रहे हैं, और सलामी भी लेते रहे हैं। हाल के बरसों में लोगों ने जॉर्ज फर्नांडीज को रक्षामंत्री रहते हुए बिना कलफ, बिना इस्तरी किए हुए खद्दड़ के कुर्ते-पायजामे में फौज के अफसरों के बीच, सलामी लेते हुए देखा है। और अगर आज के रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर को देखें, तो वे भी बिना मोजे पहने जूते या सैंडिल में, साधारण कपड़ों में फौज की सलामी लेते दिखते हैं। यह सोच एक बहुत ही आभिजात्य सोच है कि किसी पद पर बैठे हुए लोगों को किसी खास किस्म के कपड़े ही पहनने चाहिए, या जूते पहनने ही चाहिए। यह अंग्रेजों की गुलामी के दौर की मानसिकता भी है जो कि उससे उबर नहीं पाई है। राजतंत्र के दिनों में तो सत्ता पर बैठे लोग तरह-तरह की नौटंकीनुमा पोशाकें पहनते थे, और उनके दरबारियों, कर्मचारियों तक की पोशाकें तय रहती थीं। अब लोकतंत्र में उसी तरह के पैमानों को थोपना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि गुलामी भी है। 
लोगों को आम जिंदगी में भी इंसानों की तरह रहना सीखना चाहिए, और संपन्नता के बाजार के खड़े किए हुए गरिमा के पैमानों को लात मारनी चाहिए। बाजार से लेकर सरकारी कुर्सी तक, और राजनीति से लेकर महिलाओं की फैशन तक बाजार इस तरह के पैमाने थोपते चलता है कि उसका खुद का कारोबार बढ़ता रहे। लोगों में यह हौसला रहना चाहिए कि इससे उबर सकें। लोगों के सामने बाजार की कुछ मिसालें भी हैं, एप्पल जैसी सबसे बड़ी कंपनियों में से एक के संस्थापक स्टीव जॉब्स पूरी जिंदगी एक ही किस्म के मामूली टी-शर्ट और जींस में ही दिखते रहे हैं। अरबों का कारोबार करने जा रहे एप्पल-प्रोडक्ट पेश करते हुए भी समारोह में वे वैसे ही रहते थे। अब फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का वही हाल है, और उनके पास एक ही किस्म के जींस और टी-शर्ट के अलावा शायद ही कोई दूसरे कपड़े हैं। 
इंसान की पहचान कपड़ों या उसके महंगे सामानों से नहीं होती। इंसान की पहचान उसके कामों से, और उसकी सोच से होनी चाहिए। दुनिया का सबसे गरीब प्रधानमंत्री उरुग्वे का है। जोस मुजिका नाम का यह प्रधानमंत्री अपने साधारण कपड़ों में, अपनी पुरानी खटारा कार चलाते हुए चलता है, और इलाज की जरूरत पडऩे पर अस्पताल में और लोगों के साथ बैठकर बारी का इंतजार करता है। अभी-अभी उनका कार्यकाल पूरा हुआ है, और उनकी सादगी दुनिया के सामने एक मिसाल है। जो लोग आज केजरीवाल या वैसे साधारण लोगों की मजाक उड़ाते हैं, वे धिक्कार के लायक हैं। 

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